इस अध्याय मे हम वैश्वीकरण, वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था, वैश्वीकरण को संभव बनाने वाले कारक, बहुराष्ट्रीय कंपनियां, विदेश व्यापार और बाजारों का एकीकरण, विश्व व्यापार संगठन, न्यायसंगत वैश्वीकरण के लिए प्रयास आदि के बारे में विस्तार से पड़ेगे।
वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था
वैश्वीकरण :-
वैश्वीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाएँ व्यापार, निवेश, तकनीक और सेवाओं के माध्यम से आपस में अधिक जुड़ती हैं और विश्व एक एकीकृत बाजार का रूप ले लेता है, इसे वैश्वीकरण कहते हैं।
🔸 सरल शब्दों में :- विभिन्न देशों के बीच परस्पर संबंध और तीव्र एकीकरण की प्रक्रिया ही वैश्वीकरण है।
उदारीकरण :-
उदारीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें सरकार व्यापार और उद्योगों पर लगाए गए अनावश्यक नियंत्रण, नियम और प्रतिबंधों को कम या समाप्त करती है ताकि निजी क्षेत्र को अधिक स्वतंत्रता मिल सके, इसे उदारीकरण कहते हैं।
🔸 सरल शब्दों में :- सरकार द्वारा व्यापार से अवरोधों और प्रतिबंधों को हटाने की प्रक्रिया को उदारीकरण कहते हैं।
निजीकरण :-
निजीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों या सेवाओं का स्वामित्व या प्रबंधन निजी क्षेत्र को सौंपा जाता है, इसे निजीकरण कहते हैं।
विदेशी व्यापार :-
विदेशी व्यापार वह प्रक्रिया है जिसमें वस्तुओं और सेवाओं का एक देश से दूसरे देश के बीच आदान-प्रदान होता है, जिससे उत्पादकों को अपने देश के बाज़ार से बाहर अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों तक पहुँचने का अवसर मिलता है, इसे विदेशी व्यापार कहते हैं।
निवेश :-
परिसंपत्तियों जैसे भूमि, भवन, मशीन, और अन्य उपकरणों की खरीद पर किया गया व्यय निवेश कहलाता है।
विदेशी निवेश :-
जब बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ या विदेशी कंपनियाँ किसी अन्य देश में पूंजी लगाती हैं, उसे विदेशी निवेश कहते हैं। निवेश का उद्देश्य लाभ अर्जित करना होता है।
वैश्वीकरण कैसे काम करता है?
- कंपनियाँ उत्पादन के अलग-अलग हिस्से विभिन्न देशों में करती हैं।
- सस्ती श्रमशक्ति, संसाधन, और बाजार का लाभ लिया जाता है।
- तैयार वस्तुएँ पूरी दुनिया में बेची जाती हैं।
उपभोक्ता विकल्पों में वृद्धि :-
पहले बाजार में सीमित वस्तुएँ और ब्रांड उपलब्ध थे लेकिन आज एक ही वस्तु के कई मॉडल, डिज़ाइन और कीमतें उपलब्ध हैं।
जब बाजार में किसी वस्तु या सेवा के कई ब्रांड, मॉडल, डिज़ाइन और अलग-अलग कीमतों के विकल्प उपलब्ध होते हैं, जिससे उपभोक्ता अपनी पसंद और बजट के अनुसार चयन कर सकता है, इसे उपभोक्ता विकल्पों में वृद्धि कहते हैं।
🔸 उदाहरण: मोबाइल फोन, कारें, कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक्स आदि।
भारतीय बाज़ार में परिवर्तन के प्रमुख कारण :-
बाज़ार में वस्तुओं और सेवाओं की विविधता, उपलब्धता और प्रतिस्पर्धा में तेज़ वृद्धि के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण रहे हैं:
🔸 (i) बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ (MNCs) :- बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगमन से भारतीय बाज़ार में नए उत्पाद, ब्रांड और बेहतर गुणवत्ता की वस्तुएँ उपलब्ध हुईं। इससे प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ता विकल्प बढ़े।
🔸 (ii) उदारीकरण :- सरकार द्वारा व्यापार और उद्योगों पर लगे कई प्रतिबंधों एवं नियंत्रणों को कम किया गया। इससे विदेशी कंपनियों के लिए भारतीय बाज़ार में प्रवेश आसान हुआ और प्रतिस्पर्धा बढ़ी।
🔸 (iii) तकनीकी विकास :- सूचना प्रौद्योगिकी (IT) और परिवहन के विकास से उत्पादन, संचार और वितरण तेज़ तथा सस्ता हुआ। इससे वैश्विक व्यापार को बढ़ावा मिला।
🔸 (iv) विदेशी निवेश :- विदेशी कंपनियों द्वारा भारतीय उद्योगों में पूंजी निवेश से उत्पादन क्षमता, तकनीक और वस्तुओं की विविधता में वृद्धि हुई।
निष्कर्ष :- इन सभी कारणों से भारतीय बाज़ार अधिक प्रतिस्पर्धात्मक बना तथा उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प और बेहतर गुणवत्ता की वस्तुएँ प्राप्त हुईं।
बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ :-
बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ वे कंपनियाँ होती हैं जो एक से अधिक देशों में उत्पादन, व्यापार या सेवाओं पर नियंत्रण रखती हैं, इन्हें बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ कहते हैं।
बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ (MNCs) दूसरे देशों में क्यों जाती हैं?
बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अधिक लाभ कमाने और व्यवसाय का विस्तार करने के लिए दूसरे देशों में जाती हैं। इसके पीछे कई प्रमुख कारण होते हैं:
- सस्ती श्रमशक्ति प्राप्त करने के लिए।
- कच्चे माल की आसान उपलब्धता के लिए।
- बड़े और नए बाज़ारों तक पहुँचने के लिए।
- उत्पादन लागत कम करने के लिए।
- उन्नत तकनीक और संसाधनों का लाभ लेने के लिए।
- अधिक लाभ कमाने के लिए।
- सरकारी नीतियों और कर लाभों का फायदा उठाने के लिए।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) उत्पादन इकाई कहाँ स्थापित करती हैं?
बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ उत्पादन इकाई लगाने के लिए ऐसे स्थान चुनती हैं जहाँ:
- बाज़ार से नज़दीकी: जहाँ उनका माल आसानी से बेचा जा सके।
- सस्ता श्रम: जहाँ कुशल और अकुशल दोनों तरह के मजदूर सस्ते दामों पर मिल सकें।
- संसाधनों की उपलब्धता: जहाँ उत्पादन के लिए ज़रूरी दूसरी चीज़ें (जैसे भूमि, बिजली, कच्चा माल) आसानी से मिल जाएँ।
- सरकारी नीतियाँ: जहाँ की सरकार की नीतियाँ उनके हितों की रक्षा करती हों।
👉 उद्देश्य: कम लागत + अधिक लाभ
बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) के कार्य करने के प्रमुख तरीके :-
बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ स्थानीय बाज़ार में अपनी उपस्थिति स्थापित करने के लिए सामान्यतः निम्नलिखित तरीकों को अपनाती हैं:
🔸 (i) संयुक्त उत्पादन :- MNCs स्थानीय कंपनियों के साथ साझेदारी कर उत्पादन करती हैं। इससे स्थानीय कंपनियों को पूंजी और आधुनिक तकनीक का लाभ मिलता है।
🔸 (ii) स्थानीय कंपनियों का अधिग्रहण :- बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ स्थानीय कंपनियों को खरीद लेती हैं, जिससे उन्हें तैयार बाज़ार, ब्रांड और उत्पादन नेटवर्क मिल जाता है।
🔸 (iii) उत्पादन के लिए ऑर्डर देना :- MNCs छोटे या स्थानीय उत्पादकों को वस्तुओं के निर्माण के लिए ऑर्डर देती हैं और बाद में उन्हें अपने ब्रांड नाम से बेचती हैं।
बहुराष्ट्रीय उत्पादन के लाभ :-
- उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प और बेहतर गुणवत्ता की वस्तुएँ मिलती हैं।
- आधुनिक तकनीक और उन्नत उत्पादन पद्धतियाँ विकसित होती हैं।
- रोजगार के अवसरों में वृद्धि होती है।
- उत्पादन लागत कम होती है, जिससे वस्तुएँ सस्ती हो सकती हैं।
- वैश्विक बाज़ारों तक पहुँच आसान होती है।
- स्थानीय उद्योगों में प्रतिस्पर्धा और दक्षता बढ़ती है।
- देश में विदेशी निवेश और आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलता है।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों से लाभ :-
- उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प और बेहतर गुणवत्ता की वस्तुएँ मिलती हैं।
- नई तकनीक और आधुनिक उत्पादन पद्धतियाँ आती हैं।
- रोजगार के अवसरों में वृद्धि होती है।
- प्रतिस्पर्धा बढ़ने से वस्तुओं की गुणवत्ता सुधरती है।
- विदेशी निवेश से आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलता है।
- उत्पादन लागत कम हो सकती है, जिससे वस्तुएँ सस्ती हो सकती हैं।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों से हानियाँ :-
- छोटे और स्थानीय उद्योगों को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है।
- रोजगार में अस्थिरता या छँटनी की संभावना बढ़ सकती है।
- लाभ कमाने पर अधिक ध्यान, सामाजिक हित कम हो सकते हैं।
- स्थानीय कंपनियाँ बाज़ार से बाहर हो सकती हैं।
- आर्थिक असमानता बढ़ने की संभावना रहती है।
विदेशी व्यापार कैसे बाज़ारों का एकीकरण करता है?
- विदेशी व्यापार उत्पादकों को घरेलू बाज़ार से बाहर अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों तक पहुँचने का अवसर प्रदान करता है।
- यह देशों के बीच माल और सेवाओं के आदान-प्रदान को संभव बनाता है।
- उत्पादक अपने देश के बाज़ारों के साथ-साथ विदेशी बाज़ारों में भी बिक्री कर सकते हैं।
- बाज़ार में उपभोक्ताओं के लिए वस्तुओं के विकल्प बढ़ जाते हैं।
- विदेशी व्यापार से नई प्रौद्योगिकी और विचारों को बढ़ावा मिलता है।
- उत्पादकों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ती है, जिससे वस्तुओं और सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार होता है।
- परिणामस्वरूप, विभिन्न देशों के बाज़ार आपस में जुड़ते हैं और बाज़ारों का एकीकरण होता है।
वैश्वीकरण के प्रमुख आयाम (क्या-क्या जुड़ रहा है?)
वैश्वीकरण की प्रक्रिया में मुख्य रूप से चीज़ों का आदान-प्रदान बढ़ रहा है:
- वस्तुएँ: अलग-अलग देशों में बनी चीज़ें।
- सेवाएँ: बैंकिंग, IT, कॉल सेंटर जैसी सेवाएँ।
- निवेश: एक देश का दूसरे देश में पैसा लगाना।
- प्रौद्योगिकी: नई मशीनें, निर्माण के तरीके, आदि।
- वस्तुओं और सेवाओं के अलावा, लोगों का एक देश से दूसरे देश जाना भी वैश्वीकरण का हिस्सा है।
वैश्वीकरण को संभव बनाने वाले कारक :-
- प्रौद्योगिकी में तीव्र उन्नति ने वैश्वीकरण को गति दी।
- परिवहन प्रौद्योगिकी में सुधार से वस्तुओं की तेज़ और सस्ती आपूर्ति संभव हुई।
- सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) के विकास ने विश्व को जोड़ा।
- दूरसंचार सुविधाओं (टेलीफोन, मोबाइल, फैक्स आदि) ने त्वरित संपर्क संभव किया।
- संचार उपग्रहों ने वैश्विक संचार को सुगम बनाया।
- कंप्यूटरों के व्यापक उपयोग से व्यापार और सूचना आदान-प्रदान आसान हुआ।
- इंटरनेट ने सूचनाओं और संचार को त्वरित व कम लागत वाला बनाया।
- सरकार द्वारा व्यापार अवरोधों की समाप्ति से अंतरराष्ट्रीय व्यापार आसान हुआ।
- आयात-निर्यात पर प्रतिबंधों में कमी से वैश्वीकरण को गति मिली।
व्यापार अवरोधक :-
सरकार द्वारा विदेश व्यापार को नियंत्रित करने या उस पर प्रतिबंध लगाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले उपायों को ‘व्यापार अवरोधक’ कहते हैं। आयात पर कर (आयात शुल्क) व्यापार अवरोधक का एक उदाहरण है।
व्यापार अवरोधक की विशेषताएँ :-
- इसे अवरोधक इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह विदेशी वस्तुओं के मुक्त प्रवेश पर प्रतिबंध लगाता है।
- सरकार व्यापार अवरोधकों का उपयोग विदेशी व्यापार के नियमन के लिए करती है।
- सरकारें इसका इस्तेमाल यह तय करने के लिए करती हैं:
- कितना विदेशी माल देश में आएगा? (आयात को कम या ज्यादा करना)
- किस तरह का माल आयात होगा?
- व्यापार अवरोधक घरेलू उद्योगों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से सुरक्षा प्रदान करते हैं।
भारत ने अतीत में अवरोधक क्यों लगाए ? (आज़ादी के बाद) (1950 – 1990)
🔸 स्वतंत्रता के पश्चात भारत सरकार द्वारा विदेश व्यापार और विदेशी विनिमय पर अवरोधक लगाने के कारण :-
भारत सरकार ने आज़ादी के बाद विदेशी व्यापार और निवेश पर कई पाबंदियाँ (अवरोधक) लगा रखी थीं।
🔸 वजह क्या थी?
- उस समय (1950-60 के दशक) भारत में नए-नए उद्योग शुरू हो रहे थे।
- अगर उस समय विदेशी कंपनियाँ सस्ता माल बेचने लगतीं, तो भारत के नए उद्योग बर्बाद हो जाते।
- इसलिए, उन्हें विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाना (संरक्षण देना) ज़रूरी था।
🔸 क्या आयात होता था?
केवल मशीनरी, उर्वरक और पेट्रोलियम जैसी ज़रूरी चीज़ों के आयात की अनुमति थी।
🔸 तुलना :- दुनिया के सभी विकसित देशों ने भी अपने शुरुआती दौर में अपने घरेलू उद्योगों को इसी तरह सुरक्षा दी थी।
1991 के बाद बदली नीतियाँ (उदारीकरण) :-
1991 के आसपास भारत सरकार ने अपनी नीतियों में बड़े बदलाव किए। सरकार ने सोचा कि अब अब भारतीय उत्पादकों को विश्व के उत्पादकों के साथ प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए।
🔸 प्रतिस्पर्धा के फायदे :- माना गया कि विदेशी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा से भारतीय कंपनियाँ अपनी गुणवत्ता (क्वालिटी) और प्रदर्शन (परफॉर्मेंस) सुधारेंगी।
अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने इन सुधारों का समर्थन किया।
उदारीकरण के बाद भारत में क्या बदला?
- वस्तुओं और सेवाओं का आयात-निर्यात अधिक आसान हो गया।
- विदेशी कंपनियों को भारत में कारखाने और कार्यालय स्थापित करने की अनुमति मिली।
- व्यवसायियों को यह स्वतंत्रता मिली कि वे क्या आयात या निर्यात करना चाहते हैं।
- बाज़ार में सरकार का नियंत्रण और हस्तक्षेप कम हो गया।
- अर्थव्यवस्था अधिक खुली और प्रतिस्पर्धात्मक बन गई।
विश्व व्यापार संगठन (WTO) :-
- विश्व व्यापार संगठन का उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को उदार बनाना है।
- यह संगठन अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार से संबंधित नियम निर्धारित करता है।
- सदस्य देशों द्वारा नियमों के पालन की निगरानी करता है।
- विश्व के लगभग 160 देश इसके सदस्य हैं।
- WTO की स्थापना विकसित देशों की पहल पर हुई।
विश्व व्यापार संगठन (WTO) से जुड़ी आलोचनाएँ :-
- व्यवहार में विकसित देश अक्सर व्यापार अवरोधकों को बनाए रखते हैं।
- विकासशील देशों पर व्यापार अवरोध हटाने का अधिक दबाव डाला जाता है।
- इससे असमानता और अनुचित प्रतिस्पर्धा की स्थिति बनती है।
- कृषि व्यापार इसका प्रमुख उदाहरण है।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर वैश्वीकरण का प्रभाव :-
वैश्वीकरण ने भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए हैं। लेकिन इसका प्रभाव सभी लोगों पर समान नहीं रहा है।
🔸 उपभोक्ताओं पर प्रभाव :-
- उपभोक्ताओं के लिए वस्तुओं के अधिक विकल्प उपलब्ध हुए।
- उपभोक्ताओं को बेहतर गुणवत्ता की वस्तुएँ प्राप्त हुईं।
- अनेक उत्पादों की कीमतों में कमी आई।
- शहरी क्षेत्रों के संपन्न वर्ग को अधिक लाभ हुआ।
- उपभोक्ताओं के जीवन स्तर में सुधार हुआ।
🔸 बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) का प्रभाव :-
- बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत में अपने निवेश में वृद्धि की।
- MNCs ने उद्योग और सेवा क्षेत्रों में निवेश किया।
- नए रोजगार अवसरों का सृजन हुआ।
- स्थानीय आपूर्तिकर्ता कंपनियाँ लाभान्वित हुईं।
🔸 भारतीय कंपनियों पर प्रभाव :-
- बढ़ती प्रतिस्पर्धा से कई भारतीय कंपनियाँ मजबूत हुईं।
- बढ़ती प्रतिस्पर्धा से कई भारतीय कंपनियाँ मजबूत हुईं।
- भारतीय कंपनियों ने आधुनिक प्रौद्योगिकी अपनाई।
- उत्पादन की गुणवत्ता और मानकों में सुधार हुआ।
- कुछ कंपनियों ने विदेशी कंपनियों से सहयोग किया।
🔸 भारतीय कंपनियों का वैश्विक विस्तार :-
- कुछ भारतीय कंपनियाँ स्वयं बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ बनीं।
- उदाहरण → टाटा मोटर्स, इंफोसिस, एशियन पेंट्स आदि।
🔸 सेवा क्षेत्र पर प्रभाव :-
- वैश्वीकरण से सेवा क्षेत्र में नए अवसर उत्पन्न हुए।
- सूचना प्रौद्योगिकी और संचार सेवाओं का विकास हुआ।
- कॉल सेंटर और डाटा सेवाओं का विस्तार हुआ।
- भारत से विकसित देशों को सेवाओं का निर्यात बढ़ा।
- सेवा क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़े।
वैश्वीकरण के नकारात्मक प्रभाव :-
- वैश्वीकरण का लाभ सभी वर्गों को समान रूप से प्राप्त नहीं हुआ।
- छोटे और स्थानीय उत्पादकों को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा।
- कई छोटे उद्योग बाजार से बाहर हो गए।
- सस्ती विदेशी वस्तुओं से घरेलू उद्योग प्रभावित हुए।
- रोजगार के अवसरों में अस्थिरता बढ़ी।
- श्रमिकों पर काम का दबाव और असुरक्षा बढ़ी।
- आय और संपत्ति में असमानता बढ़ी।
- बड़ी कंपनियों का बाजार पर नियंत्रण बढ़ा।
- किसानों और पारंपरिक उत्पादकों को नुकसान हुआ।
- विकासशील देशों को अधिक प्रतिस्पर्धात्मक दबाव झेलना पड़ा।
विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए उठाए गए कदम :-
- विदेशी कंपनियों को निवेश हेतु प्रोत्साहित करने के लिए विशेष नीतियाँ अपनाई गईं।
- विशेष आर्थिक क्षेत्रों (SEZs) की स्थापना की गई।
- SEZs में विश्व स्तरीय सुविधाएँ उपलब्ध कराई गईं।
- प्रारंभिक वर्षों में कंपनियों को कर मुक्त सुविधा दी गई।
- विदेशी निवेश आकर्षित करने हेतु श्रम कानूनों में लचीलापन लाया गया।
- कंपनियों को कुछ श्रम नियमों से छूट दी गई।
- कंपनियों को अस्थायी श्रमिक नियुक्त करने की अनुमति मिली।
- श्रम लागत कम करने हेतु लोचदार रोजगार प्रणाली अपनाई गई।
- विदेशी कंपनियों को निवेश के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान किया गया।
विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) :-
विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) वे औद्योगिक क्षेत्र होते हैं जहाँ व्यवसाय और उद्योगों को प्रोत्साहित करने के लिए विश्व स्तरीय सुविधाएँ एवं करों में छूट प्रदान की जाती है, इन्हें विशेष आर्थिक क्षेत्र कहते हैं।
SEZ का उद्देश्य :-
- उद्योगों को बढ़ावा देना और निवेश आकर्षित करना।
- निर्यात बढ़ाना और रोजगार के अवसर उत्पन्न करना।
SEZ की मुख्य विशेषताएँ :-
- SEZ विशेष रूप से विकसित औद्योगिक क्षेत्र होते हैं।
- यहाँ विश्व स्तरीय अवसंरचना सुविधाएँ उपलब्ध होती हैं।
- बिजली, पानी, सड़क और परिवहन की बेहतर व्यवस्था होती है।
- कंपनियों को करों में छूट और प्रोत्साहन दिए जाते हैं।
- निर्यात को बढ़ावा देने पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
- विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए स्थापित किए जाते हैं।
- उत्पादन और व्यापार को आसान बनाने हेतु नियम सरल होते हैं।
न्यायसंगत वैश्वीकरण :-
न्यायसंगत वैश्वीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें वैश्वीकरण के लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से पहुँचें और सभी के हितों की रक्षा हो, इसे न्यायसंगत वैश्वीकरण कहते हैं।
न्यायसंगत वैश्वीकरण की मुख्य विशेषताएँ :-
- यह सभी के लिए समान अवसर सुनिश्चित करता है।
- वैश्वीकरण के लाभों में सभी की भागीदारी पर बल देता है।
- समाज के कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा करता है।
- केवल शक्तिशाली वर्ग के बजाय सभी नागरिकों को लाभ पहुँचाता है।
- आर्थिक असमानता को कम करने का प्रयास करता है।
न्यायसंगत वैश्वीकरण लाने में सरकार की भूमिका :-
- सरकार न्यायसंगत वैश्वीकरण सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- सरकार को सभी नागरिकों के हितों का संरक्षण करना चाहिए।
- श्रमिक कानूनों का उचित कार्यान्वयन सुनिश्चित करना आवश्यक है।
- श्रमिकों को उनके अधिकार और सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए।
- सरकार छोटे उत्पादकों को प्रतिस्पर्धा के लिए सक्षम बनाने में सहायता कर सकती है।
- आवश्यक होने पर व्यापार और निवेश अवरोधकों का उपयोग किया जा सकता है।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर न्यायसंगत वैश्वीकरण लाने के लिए उपाय :-
- सरकार WTO में न्यायसंगत नियमों के लिए समझौते कर सकती है।
- विकासशील देशों को विकसित देशों के वर्चस्व का विरोध करना चाहिए।
- समान हितों वाले देशों को मिलकर अपने हितों की रक्षा करनी चाहिए।