इस अध्याय मे हम मुद्रा विनिमय का एक माध्यम, मुद्रा के आधुनिक रूप, साख, साख की शर्तें, भारत में औपचारिक क्षेत्रक में साख, स्वयं सहायता समूह आदि के बारे में विस्तार से पड़ेगे।
मुद्रा और साख
मुद्रा :-
मुद्रा विनिमय प्रक्रिया में एक मध्यवर्ती के रूप में कार्य करती है। लोग वस्तु के बदले वस्तु का सीधे आदान-प्रदान नहीं करते, बल्कि मुद्रा का उपयोग करते हैं। इसलिए मुद्रा को विनिमय का माध्यम कहा जाता है।
रोज़मर्रा के जीवन में मुद्रा का महत्व (मुद्रा का उपयोग) :-
मुद्रा हमारे दैनिक जीवन का एक अहम हिस्सा है। हम एक दिन में कई लेन-देन करते हैं, जैसे:
- दुकान से सामान खरीदना
- ऑटो / बस का किराया देना
- डॉक्टर की फीस देना
- मोबाइल रिचार्ज कराना
- बिजली / पानी का बिल भरना
- ट्यूशन फीस देना
- मजदूरी / वेतन प्राप्त करना
👉 अधिकांश लेन-देन में वस्तुओं या सेवाओं के बदले मुद्रा का भुगतान होता है।
मुद्रा का उपयोग क्यों किया जाता है?
क्योंकि मुद्रा से कोई भी वस्तु या सेवा आसानी से खरीदी जा सकती है। लोग भुगतान के रूप में मुद्रा लेना पसंद करते हैं क्योंकि इसे हर जगह स्वीकार किया जाता है।
वस्तु विनिमय प्रणाली :-
वस्तु विनिमय प्रणाली वह प्रणाली है जिसमें वस्तुओं के बदले वस्तुओं का लेन-देन किया जाता है। इसमें मुद्रा का उपयोग नहीं होता।
वस्तु विनिमय प्रणाली की सीमाएँ :-
- वस्तु विनिमय के लिए आवश्यकताओं का दोहरा संयोग आवश्यक होता है।
- धन या मूल्य के संचयन में कठिनाई होती है।
- अविभाज्य वस्तुओं का विनिमय कठिन होता है।
- वस्तुओं को लंबे समय तक संग्रहित करना कठिन होता है।
- सेवाओं के मूल्य निर्धारण और विनिमय में कठिनाई होती है।
आवश्यकताओं का दोहरा संयोग :-
जब विनिमय करने वाले दोनों पक्षों को एक-दूसरे की वस्तु की आवश्यकता हो, तो इसे आवश्यकताओं का दोहरा संयोग कहा जाता है।
🔸 उदाहरण: एक जूता निर्माता को ऐसे किसान को ढूंढना होगा जो जूते लेना चाहता हो और बदले में गेहूँ देना चाहता हो।
🔸 चुनौती: ऐसी आवश्यकताओं का मिलना कठिन और समय लेने वाला होता है। इसे ही आवश्यकताओं का दोहरा संयोग की समस्या कहते हैं।
🔸 Note :-
- यह समस्या वस्तु विनिमय प्रणाली में आती है।
- इसी कठिनाई को दूर करने के लिए मुद्रा के उपयोग की आवश्यकता पड़ी।
मुद्रा कैसे आवश्यकताओं का दोहरा संयोग की समस्या का हल करती है?
मुद्रा आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की जरूरत को खत्म कर देती है।
अब मोची को केवल अपने जूतों के लिए एक खरीददार ढूँढ़ना है (जो उसे मुद्रा देगा)। एक बार उसके पास मुद्रा आ गई, तो वह किसी भी किसान से आसानी से गेहूँ खरीद सकता है। उसे इस बात की चिंता नहीं है कि किसान को जूते चाहिए या नहीं।
मुद्रा के लाभ :-
मुद्रा ने आर्थिक गतिविधियों को बहुत आसान बना दिया है। इसके मुख्य लाभ हैं:
- मुद्रा विनिमय की प्रक्रिया को सरल बनाती है।
- आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की समस्या को समाप्त करती है।
- वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्य का सामान्य माप प्रदान करती है।
- भविष्य के लिए धन संचय संभव बनाती है।
- उधार और भुगतान को आसान बनाती है।
- व्यापार और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देती है।
मुद्रा के आधुनिक रूप :-
- करेंसी
- कागज़ के नोट
- सिक्के
- बैंक जमा
- चेक
- डेबिट कार्ड
- क्रेडिट कार्ड
- यू.पी.आई. (UPI) / डिजिटल भुगतान
- मोबाइल एवं नेट बैंकिंग
आधुनिक मुद्रा: करेंसी (Currency) :-
करंसी वह धन है जो सामान्यतः लेन-देन में स्वीकार की जाती है। इसमें सिक्के और कागज़ के नोट शामिल होते हैं। इसे सरकार/केंद्रीय बैंक द्वारा जारी किया जाता है और अर्थव्यवस्था में परिचालित किया जाता है।
आधुनिक मुद्रा का स्वयं का कोई आंतरिक मूल्य नहीं होता। 👉 फिर भी ये हर जगह स्वीकार किए जाते हैं।
मूल्य न होने पर भी लोग करेंसी क्यों स्वीकार करते हैं?
आधुनिक मुद्रा का स्वयं का कोई आंतरिक मूल्य नहीं होता, फिर भी लोग इसे स्वीकार करते हैं क्योंकि इसे सरकार की गारंटी और कानूनी मान्यता प्राप्त होती है।
सरकार यह घोषित करती है कि यह करेंसी वैध मुद्रा (Legal Tender) है, इसलिए लोग विश्वास के साथ वस्तुओं और सेवाओं के बदले इसे स्वीकार करते हैं।
भारत में करेंसी :-
भारत में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI – Reserve Bank of India) केंद्र सरकार की तरफ से करेंसी नोट जारी करता है। रुपये को विनिमय के माध्यम के रूप में व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है।
🔹 मुद्रा जारी करने का कानूनी नियम :-
भारतीय कानून के अनुसार मुद्रा जारी करने का अधिकार केवल भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) को प्राप्त है। कोई भी व्यक्ति या निजी संस्था अपनी मुद्रा जारी नहीं कर सकती।
🔸 इस नियम का महत्व :-
- नकली एवं अवैध मुद्रा पर रोक लगती है।
- मुद्रा प्रणाली में विश्वास बना रहता है।
- अर्थव्यवस्था में स्थिरता बनी रहती है।
वैध मुद्रा (Legal Tender) का अर्थ :-
भारत सरकार ने रुपये को ‘वैध मुद्रा’ (Legal Tender) का दर्जा दिया है। इसका मतलब है कि भारत में किसी भी सौदे के भुगतान के लिए रुपये का इस्तेमाल करना कानूनी रूप से सही है।
कोई भी व्यक्ति कानूनी तौर पर रुपयों में किए गए भुगतान को मना नहीं कर सकता। अगर आपके पास रुपये हैं, तो दुकानदार आपको सामान देने से इनकार नहीं कर सकता।
रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI) के प्रमुख कार्य :-
- भारत सरकार की ओर से मुद्रा जारी करता है।
- बैंकों की कार्यप्रणाली पर नियंत्रण और निगरानी रखता है।
- ब्याज दरों और ऋण की शर्तों को नियंत्रित/प्रभावित करता है।
- बैंकों के नकद भंडार की जानकारी रखता है।
- अर्थव्यवस्था में ऋण के प्रवाह को नियंत्रित करता है।
बैंकों में निक्षेप (जमा) :-
बैंकों में निक्षेप मुद्रा को संचय करने का एक महत्वपूर्ण रूप है। लोग बैंक खाता खोलकर अपना अतिरिक्त धन जमा करते हैं। बैंक जमा राशि स्वीकार करते हैं और इस पर ब्याज देते हैं। जमाकर्ता अपनी आवश्यकतानुसार धन निकाल सकते हैं।
बैंक में धन जमा करने के कारण :-
- सुरक्षा: घर पर नकद रखने की तुलना में बैंक अधिक सुरक्षित होता है।
- ब्याज: बैंक जमा राशि पर सूद देते हैं, जिससे धन बढ़ता है।
- सुविधा: आवश्यकता पड़ने पर धन आसानी से निकाला जा सकता है।
माँग जमा :-
बैंक खातों में जमा वह धन जिसे जमाकर्ता अपनी आवश्यकता के अनुसार कभी भी निकाल सकता है, ‘माँग जमा’ कहलाता है।
🔸 उदाहरण: बचत खाता (Savings Account) या चालू खाता (Current Account) में जमा पैसा।
माँग जमा की मुख्य विशेषताएँ :-
- धन को कभी भी निकाला जा सकता है।
- भुगतान के साधन के रूप में उपयोग संभव है।
- लोग व्यापक स्तर पर भुगतान के माध्यम के रूप में स्वीकार करते हैं।
- आधुनिक मुद्रा का महत्वपूर्ण रूप है।
चेक :-
चेक एक लिखित आदेश है, जिसके द्वारा बैंक को निर्देश दिया जाता है कि वह खाताधारक के खाते से चेक पर लिखे नाम वाले व्यक्ति को निश्चित राशि का भुगतान किया जाए।
🔸 फायदा: चेक की सुविधा से बिना नकदी (करेंसी) का इस्तेमाल किए सीधा भुगतान किया जा सकता है।
चेक की विशेषताएँ :-
- नकद ले जाने की आवश्यकता नहीं।
- सुरक्षित एवं सुविधाजनक भुगतान।
- बैंक खाते से सीधे धन अंतरण।
बैंक की कार्यप्रणाली: जमा से ऋण तक :-
- बैंक जमा राशि का केवल छोटा हिस्सा नकद के रूप में रखते हैं (नकद भंडार)।
- यह नकद ग्राहकों की निकासी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए होता है।
- जमा राशि का बड़ा भाग ऋण देने के लिए उपयोग किया जाता है।
- बैंक जमाकर्ताओं और कर्जदारों के बीच मध्यस्थ का कार्य करते हैं।
- बैंक जमा पर कम ब्याज देते हैं और ऋण पर अधिक ब्याज लेते हैं।
- दोनों ब्याज के अंतर को ही बैंक की आय का प्रमुख स्रोत माना जाता है।
- बैंकिंग प्रणाली अर्थव्यवस्था में धन के प्रवाह और विकास को बढ़ावा देती है।
ऋण (उधार) :-
ऋण (उधार) वह व्यवस्था है जिसमें कोई व्यक्ति या संस्था (कर्जदार) अपनी आवश्यकता के लिए ऋणदाता से धन/वस्तुएँ/सेवाएँ उधार लेता है और उसे भविष्य में भुगतान का वादा करता है।
ऋण की सकारात्मक भूमिका :-
जब ऋण व्यक्ति की आय बढ़ाने और उसकी स्थिति को बेहतर बनाने में मदद करता है, तो इसे सकारात्मक साख कहते हैं।
🔸 उदाहरण :-
सलीम (शहरी क्षेत्र): सलीम उत्पादन के लिए जरूरी कार्यशील पूंजी (कच्चा माल, मजदूरी) जुटाने के लिए ऋण लेता है। इससे वह समय पर उत्पादन कर पाता है और अपनी कमाई बढ़ा लेता है।
किसान (ग्रामीण क्षेत्र): किसान फसल उगाने के लिए बीज, खाद, कीटनाशक आदि खरीदने हेतु ऋण लेते हैं। फसल तैयार होने में 3-4 महीने लग जाते हैं, इस बीच ऋण काम आता है। फसल बिकने के बाद वे ऋण चुका देते हैं।
🔸 निष्कर्ष :- ऐसी स्थिति में ऋण आय वृद्धि और जीवन स्तर सुधार में सहायक होता है।
ऋण की नकारात्मक भूमिका (कर्ज-जाल) :-
जब ऋण व्यक्ति की स्थिति सुधारने के बजाय उसे आर्थिक संकट में डाल दे, तो इसे ऋण की नकारात्मक भूमिका कहा जाता है।
🔸 उदाहरण :- स्वप्ना (किसान) ने फसल उगाने के लिए ऋण लिया, लेकिन प्राकृतिक कारणों (सूखा/बाढ़) से फसल बर्बाद हो गई।
🔸 परिणाम :- अब उसके पास ऋण चुकाने का कोई साधन नहीं बचा। मजबूरन उसे कर्ज उतारने के लिए अपनी जमीन का कुछ हिस्सा बेचना पड़ा। और उसकी आर्थिक स्थिति बदतर हो गई।
🔸 कर्ज-जाल :- इस स्थिति को कर्ज-जाल कहते हैं, जहाँ व्यक्ति कर्ज के बोझ में फँस जाता है और उससे बाहर निकलना कठिन हो जाता है।
कर्ज-जाल :-
कर्ज-जाल वह स्थिति है जब कर्जदार ऋण चुकाने में असमर्थ हो जाता है और उसे पुराने ऋण को चुकाने के लिए नया ऋण लेना पड़ता है, जिससे उसका कर्ज लगातार बढ़ता जाता है।
कर्ज–जाल उत्पन्न होने की परिस्थितियाँ :-
- जब कर्जदार समय पर ऋण चुकाने में असमर्थ हो जाता है।
- पुराने ऋण को चुकाने के लिए नया ऋण लेने की मजबूरी हो जाती है।
- आय का स्रोत अनिश्चित हो (जैसे फसल बर्बाद होना, बेरोज़गारी)।
- उच्च ब्याज दर पर ऋण लिया गया हो।
- ऋण अदायगी के लिए जमीन या अन्य संपत्ति बेचनी पड़े।
- परिणामस्वरूप कर्जदार की आर्थिक स्थिति बद से बदतर हो जाती है।
ऋण की शर्तें :-
ब्याज दर, समर्थक ऋणाधार, आवश्यक कागज़ात एवं भुगतान के तरीके को सम्मिलित रूप से ऋण की शर्तें कहा जाता है। ऋण की शर्तें विभिन्न व्यक्तियों या समूहों के लिए अलग-अलग हो सकती हैं।
🔹 ऋण की शर्तों में भिन्नता :-
ऋण की शर्तें हर जगह एक जैसी नहीं होतीं। ये निम्नलिखित बातों पर निर्भर करती हैं:
- उधारदाता की प्रकृति: बैंक में ब्याज दर कम और कागजी कार्रवाई अधिक होती है, जबकि साहूकार की ब्याज दर बहुत अधिक हो सकती है।
- कर्जदार की स्थिति: व्यक्ति की आय और उसकी साख (Credit score) के आधार पर शर्तें बदल सकती हैं।
- ऋण का उद्देश्य: खेती के लिए ऋण की शर्तें व्यापारिक ऋण से अलग हो सकती हैं।
समर्थक ऋणाधार :-
समर्थक ऋणाधार वह संपत्ति होती है जिसे कर्जदार ऋण की गारंटी के रूप में उधारदाता के पास रखता है। यदि कर्जदार ऋण चुकाने में असमर्थ हो जाए, तो उधारदाता उस संपत्ति को बेचकर अपनी राशि वसूल कर सकता है।
🔸 उदाहरण :- संपत्ति जैसे कि जमीन, बैंकों में जमा पूँजी, पशु इत्यादि समर्थक ऋणाधार के आम उदाहरण हैं, जिनका उपयोग कर्ज लेने के लिए किया जाता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में ऋण की विभिन्न व्यवस्थाएँ :-
ग्रामीण क्षेत्रों में ऋण की मुख्य माँग फसल उत्पादन के लिए होती है। खेती में बीज, उर्वरक, कीटनाशक, सिंचाई, बिजली, उपकरणों की मरम्मत आदि पर खर्च होता है। गाँव में विभिन्न प्रकार के ऋण स्रोत होते हैं:
🔸 (i) साहूकारों से ऋण :- छोटे किसान गाँव के साहूकारों से उच्च ब्याज दर पर ऋण लेते हैं। ऊँची ब्याज दर के कारण किसान अक्सर कर्ज-जाल में फँस जाते हैं।
🔸 (ii) व्यापारियों से ऋण :- किसानों को कृषि व्यापारियों से अपेक्षाकृत कम ब्याज दर पर ऋण मिलता है। इसके बदले किसान व्यापारी को अपनी फसल बेचने का वादा करता है। व्यापारी किसान से कम कीमत पर फसल खरीदता है और बाद में ऊँचे दाम पर बेचकर लाभ कमाता है।
🔸 (iii) बैंकों से ऋण :- मध्यम और बड़े किसान खेती के लिए कम ब्याज दर पर बैंकों से ऋण लेते हैं। बैंक उधारकर्ताओं को अन्य सुविधाएँ भी प्रदान करते हैं।
🔸 (iv) नियोक्ता से ऋण :- भूमिहीन कृषि मजदूर और अन्य मजदूर ऋण के लिए अपने नियोक्ताओं पर निर्भर रहते हैं। जमींदार मजदूरों को लगभग 5% मासिक ब्याज पर ऋण देते हैं और बदले में उनसे काम करवाते हैं।
🔸 (v) सहकारी समितियों से ऋण :- सहकारी समितियाँ ग्रामीण क्षेत्रों में सस्ते ऋण का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। इनसे कृषि उपकरण, खेती, कृषि व्यापार, मत्स्यपालन, घर निर्माण और अन्य आवश्यकताओं के लिए ऋण मिलता है।
कुछ व्यक्तियों या समूहों को बैंक द्वारा ऋण न मिलने के कारण :-
- पर्याप्त समर्थक ऋणाधार का अभाव।
- नियमित / स्थिर आय का स्रोत नहीं होना।
- आवश्यक दस्तावेज़ों (कागज़ात) की कमी।
- बैंक की कठोर ऋण शर्तें पूरी न कर पाना।
- ऋण का उद्देश्य बैंक के अनुसार विश्वसनीय न होना।
- पहले से लिया गया ऋण या खराब ऋण इतिहास।
ऋण के स्रोत: औपचारिक और अनौपचारिक क्षेत्र :-
लोग अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विभिन्न स्रोतों से ऋण लेते हैं। इन ऋण स्रोतों को मुख्य रूप से दो वर्गों में बाँटा जाता है — औपचारिक क्षेत्रक ऋण और अनौपचारिक क्षेत्रक ऋण।
औपचारिक क्षेत्रक ऋण :-
औपचारिक क्षेत्रक के अंतर्गत वे संस्थाएँ आती हैं जो सरकारी नियमों के अनुसार कार्य करती हैं। जैसे:- बैंक, सहकारी समितियाँ।
🔹 औपचारिक क्षेत्रक ऋण की विशेषताएँ :-
- ब्याज दर अपेक्षाकृत कम होती है।
- ऋण की शर्तें स्पष्ट और तय होती हैं।
- समर्थक ऋणाधार और आवश्यक कागज़ात माँगे जाते हैं।
- इनकी निगरानी भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) करता है।
🔸 RBI की भूमिका :-
- बैंकों के नकद भंडार पर निगरानी।
- यह देखना कि ऋण केवल बड़े व्यापारियों को नहीं,
- बल्कि छोटे किसानों, छोटे उद्योगों और कमजोर वर्गों को भी मिले।
- बैंकों से ऋण और ब्याज दरों की जानकारी प्राप्त करना।
अनौपचारिक क्षेत्रक ऋण :-
अनौपचारिक क्षेत्रक में वे ऋणदाता आते हैं जिन पर सरकारी नियंत्रण नहीं होता। जैसे :- साहूकार, व्यापारी, जमींदार / नियोक्ता, रिश्तेदार और मित्र।
अनौपचारिक क्षेत्रक ऋण की विशेषताएँ :-
- ब्याज दरें प्रायः बहुत अधिक होती हैं।
- ऋण की शर्तें मनमानी हो सकती हैं।
- ऋण वसूली के अनुचित तरीके अपनाए जा सकते हैं।
- कर्जदार के लिए ऋण महँगा पड़ता है।
अनौपचारिक ऋण के दुष्परिणाम :-
- अनौपचारिक ऋण पर ब्याज दरें बहुत अधिक होती हैं।
- ऋण की लागत बढ़ जाती है, जिससे कर्जदार पर बोझ पड़ता है।
- कर्जदार की आय का बड़ा हिस्सा ऋण चुकाने में खर्च हो जाता है।
- आर्थिक स्थिति सुधरने के बजाय खराब हो सकती है।
- व्यक्ति के कर्ज–जाल में फँसने की संभावना बढ़ जाती है।
- ऋणदाता द्वारा अनुचित वसूली तरीकों का खतरा रहता है।
- भविष्य में नया व्यवसाय या निवेश शुरू करना कठिन हो जाता है।
औपचारिक एवं अनौपचारिक ऋण में अंतर :-
| औपचारिक क्षेत्रक ऋण | अनौपचारिक क्षेत्रक ऋण |
|---|---|
| बैंक एवं सहकारी समितियों द्वारा दिया जाता है | साहूकार, व्यापारी, रिश्तेदार आदि द्वारा दिया जाता है |
| सरकारी नियमों के अंतर्गत कार्य करते हैं | सरकारी नियंत्रण नहीं होता |
| ब्याज दरें सामान्यतः कम होती हैं | ब्याज दरें प्रायः बहुत अधिक होती हैं |
| ऋण की शर्तें स्पष्ट एवं तय होती हैं | ऋण की शर्तें मनमानी हो सकती हैं |
| समर्थक ऋणाधार एवं कागज़ात आवश्यक | प्रायः औपचारिक कागज़ात नहीं |
| ऋण अपेक्षाकृत सस्ता और सुरक्षित | ऋण महँगा और जोखिमपूर्ण |
| RBI द्वारा निगरानी की जाती है | किसी संस्था द्वारा निगरानी नहीं |
महँगे ऋण के नुकसान :-
- महँगे ऋण पर ब्याज दरें अधिक होती हैं।
- कर्जदार की आय का बड़ा हिस्सा ब्याज चुकाने में खर्च हो जाता है।
- आवश्यक खर्चों के लिए कम धन बचता है।
- ऋण का बोझ धीरे-धीरे बढ़ता जाता है।
- व्यक्ति के कर्ज-जाल में फँसने की संभावना बढ़ जाती है।
- आर्थिक स्थिति सुधरने के बजाय खराब हो सकती है।
- नया व्यवसाय या निवेश शुरू करना कठिन हो जाता है।
सस्ता ऋण क्यों जरूरी है?
देश के विकास के लिए सस्ता और सामर्थ्य के अनुकूल ऋण अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि यह लोगों को आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ाने में सहायता करता है।
🔸 फायदे :-
- लोग कम ब्याज दर पर ऋण लेकर खेती एवं उत्पादन कर सकते हैं।
- छोटे व्यापारी एवं उद्यमी छोटा कारोबार या उद्योग स्थापित कर सकते हैं।
- निवेश बढ़ता है, जिससे रोज़गार के अवसर बढ़ते हैं।
- लोगों की आय में वृद्धि होती है।
- गरीबी कम करने में सहायता मिलती है।
- अर्थव्यवस्था के समग्र विकास को बढ़ावा मिलता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में बैंक ऋण से जुड़ी समस्याएँ :-
- भारत के सभी ग्रामीण क्षेत्रों में बैंक उपलब्ध नहीं हैं।
- जहाँ बैंक हैं, वहाँ से ऋण लेना कठिन प्रक्रिया है।
- बैंक से ऋण लेने के लिए समर्थक ऋणाधार और विशेष कागज़ात आवश्यक होते हैं।
- गरीब लोगों के पास अक्सर ऋणाधार नहीं होता, इसलिए वे बैंक से ऋण नहीं ले पाते।
- इसी कारण गरीब लोग अनौपचारिक ऋणदाताओं पर निर्भर हो जाते हैं।
स्वयं सहायता समूह (SHG) :-
स्वयं सहायता समूह ग्रामीण गरीबों, विशेषकर महिलाओं, को छोटे समूहों में संगठित करने की व्यवस्था है। इसका मुख्य उद्देश्य आपसी सहयोग और बचत के माध्यम से सदस्यों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना है।
🔹 स्वयं सहायता समूह की मुख्य विशेषताएँ :-
- समूह में सामान्यतः 15–20 सदस्य होते हैं।
- सदस्य नियमित रूप से बैठक और बचत करते हैं।
- प्रति सदस्य बचत छोटी राशि (₹25 – ₹100 या अधिक) हो सकती है।
- बचत धन समूह की सामूहिक पूँजी बनता है।
स्वयं सहायता समूह (SHG) के कार्य :-
- सदस्यों की छोटी-छोटी बचत (जमा पूँजी) को एकत्रित करना।
- सदस्यों को बिना समर्थक ऋणाधार के ऋण उपलब्ध कराना।
- सदस्यों को कम एवं उचित ब्याज दर पर ऋण देना।
- ग्रामीण गरीबों, विशेषकर महिलाओं को संगठित करना।
- सदस्यों के बीच सहयोग एवं सामूहिक जिम्मेदारी विकसित करना।
- स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा, घरेलू समस्याओं जैसे सामाजिक मुद्दों पर चर्चा के लिए मंच प्रदान करना।
स्वयं सहायता समूह SHG में ऋण व्यवस्था :-
- सदस्य अपनी आवश्यकता के लिए समूह से ही छोटा ऋण ले सकते हैं।
- समूह ब्याज लेता है, परंतु यह साहूकार से कम होता है।
- ऋण का उद्देश्य, राशि, ब्याज दर एवं अवधि का निर्णय समूह स्वयं करता है।
- यदि समूह नियमित रूप से कार्य करता है, तो कुछ समय बाद वह बैंक से ऋण लेने के योग्य हो जाता है।
- बैंक समूह के नाम पर ऋण प्रदान करता है।
🔸 जिम्मेदारी :- ऋण चुकाने की जिम्मेदारी पूरे समूह की होती है। अगर एक सदस्य नहीं चुकाता, तो बाकी सदस्य उसे चुकाने के लिए दबाव बनाते हैं। इसी कारण बैंक बिना ऋणाधार के भी SHG को ऋण देने के लिए तैयार हो जाते हैं।
SHG ऋण का उपयोग :-
सदस्य ऋण का उपयोग कर सकते हैं:
- खेती के लिए बीज, खाद, उपकरण
- छोटा व्यवसाय / स्वरोज़गार
- सिलाई मशीन, पशु, हथकरघा
- घर निर्माण या अन्य आवश्यकताएँ
स्वयं सहायता समूह SHG के लाभ :-
- गरीबों को सस्ता ऋण उपलब्ध होता है।
- साहूकारों पर निर्भरता कम होती है।
- ऋणाधार की समस्या दूर होती है।
- आय बढ़ाने के अवसर मिलते हैं।
- महिलाएँ आर्थिक रूप से सशक्त बनती हैं।
- सामाजिक मुद्दों पर चर्चा का मंच मिलता है।