NCERT Class 10th Social Science Economics Notes Chapter 2 भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक

 इस अध्याय मे हम प्राथमिक क्षेत्रक, द्वितीयक क्षेत्रक, तृतीयक क्षेत्रक, सकल घरेलू उत्पादक, प्रच्छन्न बेरोज़गारी, शिक्षित बेरोज़गारी, संगठित क्षेत्रक, असंगठित क्षेत्रक, सार्वजनिक क्षेत्र, निजी क्षेत्र आदि के बारे में विस्तार से पड़ेगे।

भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक

आर्थिक क्रियाकलाप :-

वे सभी क्रियाकलाप जिनके माध्यम से व्यक्ति आय अर्जित करता है और अपनी आजीविका चलाता है, आर्थिक क्रियाकलाप कहलाते हैं।

अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक :-

अर्थव्यवस्था में होने वाली सभी आर्थिक गतिविधियों (जिनसे आय प्राप्त होती है) को मुख्यतः तीन क्षेत्रकों में बाँटा गया है:

  • (i) प्राथमिक क्षेत्रक
  • (ii) द्वितीयक क्षेत्रक
  • (iii) तृतीयक क्षेत्रक

(i) प्राथमिक क्षेत्रक :-

वह क्षेत्र जिसमें हम प्राकृतिक संसाधनों का सीधे तौर पर उपयोग करके वस्तुओं का उत्पादन करते हैं, प्राथमिक क्षेत्रक कहलाते हैं। इसे कृषि एवं सहायक क्षेत्रक भी कहा जाता है।

🔸 ‘प्राथमिक’ क्यों कहा जाता है?

क्योंकि यह हमारे जीवन की सबसे बुनियादी जरूरतों को पूरा करता है और बाकी सभी क्षेत्रक इसी पर निर्भर करते हैं। यह अन्य सभी उत्पादों का आधार है।

🔸 उदाहरण :-

  • कृषि – कपास, गेहूँ, धान
  • डेयरी – दूध उत्पादन
  • मत्स्यन – मछली पालन
  • वन – लकड़ी, गोंद
  • खनन – खनिज, अयस्क

प्राथमिक क्षेत्रक की विशेषताएँ :-

  • प्रकृति पर निर्भर (वर्षा, जलवायु, सूर्य प्रकाश)
  • प्राकृतिक उत्पाद प्राप्त होते हैं।
  • अन्य सभी क्षेत्रकों का आधार है।

(ii) द्वितीयक क्षेत्रक :-

वह क्षेत्रक जिसमे प्राथमिक क्षेत्रक से प्राप्त वस्तुओं को लेकर नई वस्तुओं का विनिर्माण किया जाता है, द्वितीयक क्षेत्रक कहलाता है। इसे ‘औद्योगिक क्षेत्रक’ भी कहा जाता है क्योंकि यह विभिन्न प्रकार के उद्योगों से जुड़ा है।

🔸 उदाहरण :-

  • कपास से सूत कातना और उससे कपड़ा बनाना।
  • गन्ना लेकर उससे चीनी या गुड़ बनाना।
  • मिट्टी लेकर उससे ईंटें बनाना।
  • लोहे के अयस्क से लोहा गलाना और उससे मशीनें या वाहन बनाना।

द्वितीयक क्षेत्रक की विशेषताएँ :-

  • प्राथमिक क्षेत्रक पर आधारित होता हैं
  • वस्तुएँ सीधे प्रकृति से नहीं मिलतीं है
  • कारखानों, कार्यशालाओं या घरों में उत्पादन
  • विनिर्माण प्रक्रिया आवश्यक
  • मूल्य में वृद्धि

(iii) तृतीयक क्षेत्रक :-

वे गतिविधियाँ जो वस्तुओं का उत्पादन नहीं करतीं, बल्कि प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रक की मदद करती हैं, तृतीयक क्षेत्रक कहलाती हैं। इसे सेवा क्षेत्रक भी कहते हैं।

🔸 उदाहरण (दो तरह की सेवाएँ) :-

  • उत्पादन में सहायक सेवाएँ: परिवहन, भंडारण, संचार, बैंकिंग, बीमा आदि।
  • व्यक्तिगत एवं अन्य आवश्यक सेवाएँ: ये सेवाएँ भी जरूरी हैं, भले ही ये सीधे वस्तु न बनाएँ। जैसे-
  • शिक्षक (शिक्षा)
  • डॉक्टर (स्वास्थ्य)
  • नाई, धोबी, मोची (दैनिक जीवन की सुविधा)
  • वकील, प्रशासनिक अधिकारी
  • आधुनिक सेवाएँ: इंटरनेट कैफे, एटीएम, कॉल सेंटर, सॉफ्टवेयर कंपनियाँ।

तृतीयक क्षेत्रक की विशेषताएँ :-

  • सेवाएँ प्रदान करता है
  • उत्पादन और व्यापार में सहायक होता हैं
  • आधुनिक अर्थव्यवस्था का महत्त्वपूर्ण भाग है

प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्रकों के बीच अंतर :-

प्राथमिक क्षेत्रकद्वितीयक क्षेत्रकतृतीयक क्षेत्रक
प्राथमिक क्षेत्रक प्राकृतिक संसाधनों के सीधे उपयोग पर आधारित होता है।द्वितीयक क्षेत्रक कच्चे माल के विनिर्माण या निर्माण पर आधारित होता है।तृतीयक क्षेत्रक उत्पादन एवं जीवन की गतिविधियों में सहायता प्रदान करता है।
प्राथमिक क्षेत्रक से प्राकृतिक उत्पाद प्राप्त होते हैं, जैसे – कपास, दूध, अयस्क।द्वितीयक क्षेत्रक से निर्मित वस्तुएँ प्राप्त होती हैं, जैसे – कपड़ा, चीनी, मशीन।तृतीयक क्षेत्रक से सेवाएँ प्राप्त होती हैं, जैसे – परिवहन, शिक्षा, बैंकिंग।
प्राथमिक क्षेत्रक को कृषि एवं सहायक क्षेत्रक कहा जाता है।द्वितीयक क्षेत्रक को औद्योगिक क्षेत्रक कहा जाता है।तृतीयक क्षेत्रक को सेवा क्षेत्रक कहा जाता है।
प्राथमिक क्षेत्रक – खेती, मत्स्यन, खनन, डेयरी।द्वितीयक क्षेत्रक – कपड़ा मिल, चीनी कारखाना, ईंट-भट्ठा।तृतीयक क्षेत्रक – ट्रक चालक, डॉक्टर, बैंक कर्मचारी, शिक्षक।
प्राथमिक क्षेत्रक सभी क्षेत्रकों का आधार होता है।द्वितीयक क्षेत्रक कच्चे माल को उपयोगी वस्तुओं में परिवर्तित करता है।तृतीयक क्षेत्रक अन्य दोनों क्षेत्रकों को जोड़ता है तथा सहायता प्रदान करता है।

सकल घरेलू उत्पाद :-

किसी देश की भौगोलिक सीमाओं के भीतर, एक विशेष वर्ष (आमतौर पर एक वित्तीय वर्ष) में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के कुल बाजार मूल्य को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) कहते हैं।

🔸 सरल शब्दों में: एक साल में देश में जितना भी उत्पादन होता है, उसका कुल रुपये में मूल्य ही सकल घरेलू उत्पाद GDP है।

🔸 सकल घरेलू उत्पाद (GDP) = प्राथमिक क्षेत्रक + द्वितीयक क्षेत्रक + तृतीयक क्षेत्रक के कुल मूल्य का योग।

भारत में GDP का मापन कौन करता है?

भारत में यह कार्य केन्द्र सरकार के मंत्रालय द्वारा किया जाता है, जो राज्यों और विभागों से आँकड़े (Data) एकत्र करता है।

सकल मूल्य वर्धित (GVA – Gross Value Added) :-

हाल ही में सरकार ने GDP के साथ-साथ सकल मूल्य वर्धित (GVA) का भी उपयोग करना शुरू किया है।

🔸 GVA क्या है?

यह अर्थव्यवस्था के तीनों क्षेत्रकों (प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक) के योगदान को मापता है।

🔸 GDP और GVA में अंतर: असल में, GVA में उत्पादन पर लगने वाले कर (Tax) और सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी (Subsidy) को समायोजित किया जाता है।

सीधे शब्दों में, GDP यह बताता है कि देश में कुल कितना उत्पादन हुआ, जबकि GVA यह बताता है कि तीनों क्षेत्रों ने उस उत्पादन में कितना-कितना योगदान दिया।

तृतीयक क्षेत्रक (सेवा क्षेत्रक) के बढ़ते महत्त्व के कारण :-

  • हर देश में अस्पताल, शिक्षा, बैंक, परिवहन जैसी बुनियादी सेवाओं की आवश्यकता होती है।
  • विकासशील देशों में इन बुनियादी सेवाओं का प्रबंधन प्रायः सरकार करती है।
  • कृषि और उद्योग के विकास से परिवहन, व्यापार और भण्डारण सेवाओं की माँग बढ़ती है।
  • प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रक जितने विकसित होंगे, सेवाओं की जरूरत उतनी बढ़ेगी।
  • आय बढ़ने पर लोग रेस्तरां, पर्यटन, निजी शिक्षा जैसी सेवाओं की माँग करने लगते हैं।
  • बड़े नगरों में सेवा क्षेत्रक का तेज विस्तार स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
  • सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) आधारित सेवाएँ आज अपरिहार्य और तेज़ी से बढ़ती सेवाएँ हैं।

तृतीयक क्षेत्रक (सेवा क्षेत्रक) में विषमता (सभी सेवाओं में समान विकास नहीं) :-

  • सेवा क्षेत्रक की सभी सेवाओं में समान वृद्धि नहीं हो रही है।
  • कुछ सेवाओं में केवल उच्च कुशल श्रमिकों को रोजगार मिलता है।
  • अधिकतर लोग छोटी दुकानों, मरम्मत, परिवहन जैसी कम आय वाली सेवाओं में लगे हैं।
  • कई लोग इन सेवाओं में इसलिए काम करते हैं क्योंकि उनके पास अन्य रोजगार विकल्प नहीं होते।
  • भारत में सेवा क्षेत्रक के केवल कुछ भागों का महत्व अधिक तेजी से बढ़ रहा है।

प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्रकों की परस्पर निर्भरता के कारण :-

  • प्राथमिक क्षेत्रक को उत्पादन बढ़ाने और वस्तुओं के वितरण के लिए तकनीक, मशीनों एवं परिवहन सेवाओं की आवश्यकता होती है।
  • द्वितीयक क्षेत्रक (उद्योग) के लिए आवश्यक कच्चा माल प्राथमिक क्षेत्रक से ही प्राप्त होता है।
  • तृतीयक क्षेत्रक (सेवा क्षेत्रक) का विकास प्राथमिक एवं द्वितीयक क्षेत्रक की गतिविधियों पर निर्भर करता है, क्योंकि इन्हीं से भण्डारण, बैंकिंग, परिवहन, व्यापार जैसी सेवाओं की माँग उत्पन्न होती है।

तीनों क्षेत्रक एक-दूसरे के पूरक हैं तथा किसी एक क्षेत्रक की कमी से अन्य क्षेत्रकों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। आर्थिक विकास के लिए तीनों क्षेत्रकों का संतुलित विकास आवश्यक है।

खुली बेरोजगारी :-

जब कोई व्यक्ति काम करने के लिए तैयार और योग्य हो, परन्तु उसे कोई रोजगार प्राप्त न हो तथा वह पूरी तरह बेकार हो, तो इसे खुली बेरोजगारी कहते हैं।

प्रच्छन्न बेरोज़गारी ( छिपी हुई बेरोजगारी ) की समस्या :-

जब किसी काम में जरूरत से ज्यादा लोग लगे हों और यदि उनमें से कुछ लोगों को हटा भी दिया जाए, तो कुल उत्पादन पर कोई फर्क न पड़े, तो इसे ‘अल्प बेरोजगारी’ या ‘प्रच्छन्न (छिपी हुई) बेरोजगारी’ कहते हैं।

  • यह समस्या मुख्यतः कृषि क्षेत्र में अधिक पाई जाती है।
  • यह खुली बेरोजगारी से अलग है क्योंकि लोग बेकार नहीं दिखते।

प्रच्छन्न बेरोजगारी क्यों कहते हैं?

इसे ‘छिपी हुई’ इसलिए कहते हैं क्योंकि यहाँ व्यक्ति काम करता हुआ तो दिखता है (वह खाली नहीं बैठा), लेकिन उसकी क्षमता का पूरा इस्तेमाल नहीं हो रहा होता।

अन्य क्षेत्रकों में अल्प बेरोजगारी :-

अल्प बेरोजगारी की समस्या सिर्फ कृषि क्षेत्र तक सीमित नहीं है, यह दूसरे क्षेत्रकों, विशेषकर सेवा क्षेत्रक (तृतीयक) के असंगठित हिस्से में भी देखी जा सकती है।

🔸 शहरी क्षेत्रों के उदाहरण :-

  • शहरों में कई लोग अनियत कार्यों पर निर्भर रहते हैं।
  • जैसे – प्लम्बर, पेंटर, ठेला चालक, छोटे विक्रेता आदि।
  • ये लोग पूरा दिन काम करते हैं, परन्तु आय बहुत कम होती है।
  • लोग यह कार्य इसलिए करते हैं क्योंकि उनके पास बेहतर रोजगार विकल्प नहीं होते।

रोजगार के अवसर कैसे बढ़ाएँ?

कृषि में छिपी हुई बेरोजगारी को दूर करने और नए अवसर पैदा करने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं:

🔹 कृषि में रोजगार वृद्धि के उपाय :-

🔸 सिंचाई सुविधाओं का विस्तार :-

  • कुएँ, नहरें और बाँध बनाकर सिंचाई की सुविधा बढ़ाई जा सकती है।
  • सिंचाई से किसान एक से अधिक फसलें उगा सकते हैं।
  • इससे कृषि क्षेत्र में अतिरिक्त रोजगार के अवसर उत्पन्न होते हैं।

🔸 परिवहन और भण्डारण का विकास :-

  • अधिक उत्पादन होने पर किसानों को उत्पाद बेचने की आवश्यकता होती है।
  • ग्रामीण सड़कों, परिवहन और गोदामों में निवेश से कृषि एवं सेवा क्षेत्र दोनों में रोजगार बढ़ता है।
  • इससे किसानों की आय में वृद्धि होती है।

🔸 सस्ती कृषि साख की सुविधा :-

  • गरीब किसानों को बीज, खाद और उपकरण खरीदने के लिए ऋण की आवश्यकता होती है।
  • यदि बैंक कम ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराएँ, तो किसान बेहतर खेती कर सकते हैं।
  • इससे साहूकारों पर निर्भरता कम होती है।

🔸 अर्द्ध-ग्रामीण क्षेत्रों में उद्योगों का विकास :-

  • कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा देकर रोजगार बढ़ाया जा सकता है।
  • जैसे – दाल मिल, शीत भण्डारण गृह, प्रसंस्करण उद्योग।
  • इससे कृषि के साथ-साथ द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रक का भी विकास होता है।
  • वन क्षेत्रों में शहद संग्रह केन्द्र जैसे छोटे उद्योग रोजगार प्रदान करते हैं।
  • प्रसंस्करण उद्योगों से ग्रामीण एवं अर्द्ध-ग्रामीण क्षेत्रों में स्थायी रोजगार सृजित होता है।

सेवा क्षेत्रक में रोजगार की संभावनाएँ :-

  • शिक्षा क्षेत्र में अध्यापकों एवं कर्मचारियों की माँग से रोजगार के बड़े अवसर उत्पन्न होते हैं।
  • केवल शिक्षा क्षेत्र में लगभग 20 लाख रोजगार सृजित किए जा सकते हैं।
  • स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार हेतु अधिक डॉक्टर, नर्स एवं स्वास्थ्य कर्मियों की आवश्यकता होती है।
  • सेवा क्षेत्रक का विकास विकास के महत्त्वपूर्ण पहलुओं को मजबूत करता है।

राज्यों में रोजगार वृद्धि के स्रोत :-

  • प्रत्येक राज्य में आय एवं रोजगार बढ़ाने की विशेष संभावनाएँ होती हैं।
  • रोजगार सृजन के प्रमुख साधन – पर्यटन, क्षेत्रीय शिल्प, सूचना प्रौद्योगिकी।
  • इन क्षेत्रों के विकास के लिए समुचित योजना एवं सरकारी सहायता आवश्यक है।
  • पर्यटन क्षेत्र के विकास से प्रतिवर्ष 35 लाख से अधिक रोजगार सृजित हो सकते हैं।

शिक्षित बेरोज़गारी :-

जब शिक्षित एवं प्रशिक्षित व्यक्तियों को उनकी योग्यता के अनुसार रोजगार प्राप्त नहीं होता, तो इसे शिक्षित बेरोज़गारी कहते हैं।

महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) :-

केन्द्र सरकार द्वारा लागू यह कानून ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार उपलब्ध कराने हेतु बनाया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को रोजगार की कानूनी गारंटी प्रदान करना है।

🔸 मुख्य प्रावधान :-

  • यह कानून भारत के लगभग 625 जिलों में लागू है।
  • इसके अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति वर्ष 100 दिन के रोजगार की गारंटी दी जाती है।
  • यदि सरकार रोजगार उपलब्ध नहीं करा पाती, तो बेरोजगारी भत्ता दिया जाता है।
  • इस अधिनियम के तहत ऐसे कार्यों को प्राथमिकता दी जाती है जो भविष्य में भूमि की उत्पादकता बढ़ाएँ।

संगठित क्षेत्रक :-

संगठित क्षेत्रक में वे उद्यम या कार्य-स्थान आते हैं जहाँ रोज़गार की अवधि नियमित एवं निश्चित होती है। ये संस्थाएँ सरकार द्वारा पंजीकृत होती हैं तथा सरकारी नियमों एवं विनियमों का पालन करती हैं।

इसे संगठित क्षेत्रक कहा जाता है क्योंकि इसमें औपचारिक नियम, प्रक्रियाएँ और कार्य-विधियाँ होती हैं।

🔹 संगठित क्षेत्रक की मुख्य विशेषताएँ :-

  • ये उद्यम सरकार द्वारा पंजीकृत होते हैं।
  • सरकारी नियमों एवं कानूनों का पालन करते हैं।
  • कार्य-समय निर्धारित होता है।
  • रोज़गार सुरक्षित होता हैं।

🔹 लागू कानूनों के उदाहरण :-

  • कारखाना अधिनियम
  • न्यूनतम मजदूरी अधिनियम
  • सेवानुदान अधिनियम
  • दुकान एवं प्रतिष्ठान अधिनियम

संगठित क्षेत्रक के कर्मचारियों को मिलने वाले लाभ :-

  • रोज़गार सुरक्षा प्राप्त होती है।
  • काम के निश्चित घंटे होते हैं तथा अतिरिक्त काम पर अतिरिक्त वेतन दिया जाता है।
  • कर्मचारियों को सवेतन छुट्टियाँ और अवकाशकालीन वेतन मिलता है।
  • भविष्य निधि (PF) और सेवानुदान का लाभ मिलता है।
  • चिकित्सीय सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं।
  • नियोक्ता द्वारा स्वच्छ पेयजल एवं सुरक्षित कार्य-पर्यावरण सुनिश्चित किया जाता है।
  • सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन मिलती है।

असंगठित क्षेत्रक :-

असंगठित क्षेत्रक छोटी-छोटी और बिखरी हुई इकाइयों से बना होता है। यह क्षेत्रक अधिकांशतः सरकारी नियंत्रण से बाहर होता है।

🔹 असंगठित क्षेत्रक की मुख्य विशेषताएँ :-

  • यह क्षेत्रक अधिकांशतः सरकारी नियंत्रण से बाहर होता है।
  • नियम तो होते हैं, परन्तु उनका ठीक से पालन नहीं होता।
  • यहाँ काम अनियमित, अस्थायी और कम वेतन वाला होता है।
  • रोज़गार की कोई सुरक्षा नहीं होती।

🔹 असंगठित क्षेत्रक की समस्याएँ :-

  • कोई नौकरी सुरक्षा या अन्य लाभ (PF, पेंशन) नहीं होते।
  • श्रमिकों को बिना कारण काम से हटाया जा सकता है।
  • सवेतन छुट्टी, बीमारी की छुट्टी, अवकाश या अतिरिक्त वेतन जैसी सुविधाएँ नहीं मिलतीं।
  • श्रमिक नियोक्ता की पसन्द और इच्छा पर निर्भर रहते हैं।

असंगठित क्षेत्रक में कार्यरत श्रमिकों की स्थिति :-

  • असंगठित क्षेत्रक में वेतन कम और अनियमित होता है।
  • श्रमिकों का शोषण किया जाता है और उचित मजदूरी नहीं दी जाती।
  • रोजगार असुरक्षित होता है और कोई सामाजिक लाभ नहीं मिलता।
  • बीमार होने या काम न मिलने पर आय पूरी तरह रुक जाती है।

असंगठित क्षेत्रक के उदाहरण :-

  • छोटे किसान (लक्ष्मी की तरह) और खेतिहर मजदूर।
  • सड़कों पर ठेला लगाने वाले, सब्जी बेचने वाले।
  • नाई, मोची, मरम्मत करने वाले (रिपेयर शॉप)।
  • निर्माण श्रमिक जो रोजाना मजदूरी पर काम करते हैं।
  • छोटी दुकानों में काम करने वाले कर्मचारी।

संगठित एवं असंगठित क्षेत्रकों में अंतर :-

संगठित क्षेत्रकअसंगठित क्षेत्रक
सरकारी पंजीकृत संस्थाएँ होती हैं।अधिकांश इकाइयाँ सरकारी नियंत्रण से बाहर होती हैं।
सरकारी नियमों एवं कानूनों का पालन अनिवार्य होता है।नियम तो होते हैं, परंतु उनका पालन प्रायः नहीं होता।
रोजगार नियमित एवं सुनिश्चित होता है।रोजगार अनियमित एवं असुरक्षित होता है।
कर्मचारियों को नौकरी की सुरक्षा प्राप्त होती है।श्रमिकों को कभी भी काम से हटाया जा सकता है।
निश्चित कार्य-घंटे निर्धारित होते हैं।कार्य-घंटे निश्चित नहीं होते।
अतिरिक्त समय कार्य पर अतिरिक्त वेतन मिलता है।अतिरिक्त कार्य पर प्रायः अतिरिक्त वेतन नहीं मिलता।
सवेतन छुट्टी, भविष्य निधि, पेंशन आदि लाभ मिलते हैं।सवेतन छुट्टी एवं सामाजिक सुरक्षा लाभ नहीं मिलते।
वेतन सामान्यतः स्थिर एवं अधिक होता है।वेतन कम एवं अस्थिर होता है।
उदाहरण – सरकारी कार्यालय, बैंक, बड़े उद्योग।उदाहरण – छोटे दुकानदार, किसान, दिहाड़ी मजदूर।

भारत में कृषि के असंगठित क्षेत्रक में होने के कारण :-

भारत में कृषि को असंगठित क्षेत्रक माना जाता है क्योंकि —

  • काम के घंटे निश्चित नहीं होते।
  • श्रमिकों को अक्सर अतिरिक्त समय पर अतिरिक्त वेतन नहीं मिलता।
  • कृषि मजदूरों को दैनिक मजदूरी के अतिरिक्त सामाजिक सुरक्षा लाभ (जैसे पेंशन, भविष्य निधि) नहीं मिलते।
  • रोजगार नियमित एवं सुरक्षित नहीं होता।
  • श्रमिकों के लिए सुरक्षा एवं कार्य-पर्यावरण की उचित व्यवस्था नहीं होती।
  • सरकारी नियमों एवं विनियमों का पालन प्रायः नहीं होता।

असंगठित क्षेत्रक में संरक्षण की आवश्यकता वाले लोग :-

🔸 ग्रामीण क्षेत्रों में :-

  • भूमिहीन कृषि श्रमिक
  • छोटे और सीमांत किसान
  • फसल बँटाईदार
  • ग्रामीण कारीगर (जैसे – बुनकर, लुहार, बढ़ई, सुनार आदि)

🔸 शहरी क्षेत्रों में :-

  • लघु उद्योगों के श्रमिक
  • निर्माण कार्य में लगे श्रमिक
  • व्यापार एवं परिवहन के आकस्मिक श्रमिक
  • सड़क किनारे विक्रेता
  • सिर पर बोझा ढोने वाले श्रमिक
  • वस्त्र-निर्माण करने वाले एवं कबाड़ बीनने वाले

निजी क्षेत्र :-

इस क्षेत्रक में संसाधनों (जमीन, कारखाना, मशीनें) का स्वामित्व और सेवाओं के वितरण की जिम्मेदारी एकल व्यक्ति या कंपनी (Private Company) के हाथों में होती है।

निजी क्षेत्र की विशेषताएँ :-

  • निजी क्षेत्रक का मुख्य उद्देश्य लाभ अर्जित करना होता है।
  • इनकी सेवाओं के लिए उपभोक्ताओं को सीधा भुगतान करना पड़ता है।
  • रोज़गार व श्रमिक असुरक्षित होते हैं।
  • सवैतनिक छुट्टी व अन्य सेवाएँ सामान्यतः नहीं दी जाती।

🔸 उदाहरण :- टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी, रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड।

सार्वजनिक क्षेत्रक :-

सार्वजनिक क्षेत्रक में अधिकांश परिसंपत्तियों का स्वामित्व और सेवाओं के प्रबंधन की जिम्मेदारी सरकार के पास होती है। यह केंद्र सरकार, राज्य सरकार या स्थानीय निकाय (नगर निगम, ग्राम पंचायत) हो सकते हैं।

सार्वजनिक क्षेत्रक की विशेषताएँ :-

  • सेवाओं की उपलब्धता की पूरी जिम्मेदारी सरकार की होती है।
  • सार्वजनिक क्षेत्रक का मुख्य उद्देश्य लाभ कमाना नहीं, बल्कि सार्वजनिक कल्याण होता है।
  • सरकार अपने खर्च की भरपाई करों एवं अन्य स्रोतों से करती है।
  • रोजगार सुरक्षा दी जाती है।
  • सवैतनिक छुट्टी व अन्य सेवाएँ दी जाती हैं।

🔸 उदाहरण :- रेलवे, डाकघर, सड़कें, पुल, बाँध, बिजली परियोजनाएँ।

सार्वजनिक क्षेत्रक एवं निजी क्षेत्रक में अंतर :-

सार्वजनिक क्षेत्रकनिजी क्षेत्रक
परिसंपत्तियों का स्वामित्व सरकार के पास होता है।परिसंपत्तियों का स्वामित्व व्यक्ति या कंपनी के पास होता है।
सेवाएँ सरकार द्वारा प्रदान की जाती हैं।सेवाएँ निजी व्यक्ति या कंपनियाँ प्रदान करती हैं।
मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक कल्याण होता है।मुख्य उद्देश्य लाभ अर्जित करना होता है।
खर्च की भरपाई करों एवं सरकारी आय से होती है।सेवाओं के लिए उपभोक्ताओं से सीधा भुगतान लिया जाता है।
समाज के हित और विकास पर अधिक ध्यान दिया जाता है।निजी लाभ और व्यवसायिक हित पर अधिक ध्यान दिया जाता है।
भारी निवेश वाली सुविधाएँ सरकार उपलब्ध कराती है।निजी क्षेत्रक अधिक लाभकारी गतिविधियों में निवेश करता है।
उदाहरण – रेलवे, डाकघर, सरकारी अस्पताल।उदाहरण – टाटा, रिलायंस, निजी विद्यालय।

सार्वजनिक क्षेत्रक की आवश्यकता क्यों है?

कुछ सेवाएँ एवं सुविधाएँ जैसे सड़क, पुल, रेलवे, बिजली, बाँध आदि में बहुत अधिक पूँजी निवेश की आवश्यकता होती है, जिन्हें निजी क्षेत्रक आसानी से उपलब्ध नहीं करा सकता।

  • सार्वजनिक क्षेत्रक का मुख्य उद्देश्य सामाजिक कल्याण होता है, न कि केवल लाभ कमाना।
  • सरकार सभी नागरिकों को आवश्यक सेवाएँ न्यूनतम / सस्ती दरों पर उपलब्ध कराती है।
  • आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन एवं वितरण में सरकार सहायता एवं अनुदान प्रदान करती है।
  • सार्वजनिक क्षेत्रक स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • यह गरीब एवं कमजोर वर्गों के विकास पर विशेष ध्यान देता है।
  • सार्वजनिक क्षेत्रक देश के संतुलित एवं समावेशी विकास के लिए आवश्यक है।

सार्वजनिक क्षेत्रक का राष्ट्र निर्माण में महत्त्व :-

  • सार्वजनिक क्षेत्रक देश में ढाँचागत सुविधाओं जैसे सड़क, बिजली, सिंचाई आदि का विकास करता है।
  • यह कृषि एवं उद्योगों को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • जनता को आवश्यक सेवाएँ एवं सुविधाएँ न्यूनतम / सस्ती दरों पर उपलब्ध कराता है।
  • आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन एवं वितरण में सरकार सहायता एवं अनुदान प्रदान करती है।
  • सार्वजनिक क्षेत्रक का मुख्य उद्देश्य सामाजिक कल्याण होता है, न कि केवल लाभ कमाना।
  • श्रमिकों को नियमित रोजगार, उचित वेतन एवं सुरक्षित कार्य-पर्यावरण उपलब्ध कराया जाता है।
  • यह गरीब एवं कमजोर वर्गों के विकास पर विशेष ध्यान देता है।

सरकार भारी व्यय क्यों उठाती है?

  • कुछ सेवाएँ ऐसी होती हैं जिनमें बहुत अधिक पूँजी निवेश की आवश्यकता होती है।
  • निजी क्षेत्रक इन्हें उचित कीमत पर उपलब्ध नहीं करा पाता।
  • उदाहरण – सड़कें, रेलवे, पत्तन, बिजली, सिंचाई बाँध।
  • इसलिए सरकार स्वयं इन पर व्यय करती है और सभी को सुविधा उपलब्ध कराती है।

तेजी से बढ़ती जनसंख्या का रोजगार पर प्रभाव :-

  • जनसंख्या की तुलना में रोज़गार के अवसर पर्याप्त मात्रा में नहीं बढ़ते।
  • कृषि एवं शहरी क्षेत्रों में प्रच्छन्न (छिपी) बेरोज़गारी की समस्या बढ़ जाती है।
  • उपलब्ध संसाधनों पर दबाव एवं बोझ बढ़ जाता है।
  • अधिक श्रमशक्ति उपलब्ध होने से रोज़गार से प्राप्त आय का स्तर घट जाता है।
  • लोगों की क्रय-शक्ति कम होने लगती है।
  • वस्तुओं एवं सेवाओं की माँग बढ़ने से कीमतों में वृद्धि हो सकती है।
  • परिणामस्वरूप बेरोज़गारी एवं गरीबी की समस्या और गंभीर हो जाती है।

शहरी क्षेत्रों में रोजगार सृजन की विधियाँ :-

  • क्षेत्रीय शिल्प उद्योगों एवं सेवाओं को प्रोत्साहन देना चाहिए।
  • पर्यटन उद्योग के विकास से रोजगार के अनेक अवसर उत्पन्न किए जा सकते हैं।
  • रोजगार में बाधा बनने वाली अनावश्यक सरकारी नीतियों एवं नियमों में सुधार आवश्यक है।
  • शहरी क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं एवं तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देना चाहिए।
  • उद्यमों एवं लघु उद्योगों को आसान शर्तों पर ऋण एवं आर्थिक सहायता उपलब्ध करानी चाहिए।
  • लघु एवं सूक्ष्म उद्योगों के विकास पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
  • नई सेवाओं एवं सूचना प्रौद्योगिकी आधारित कार्यों को बढ़ावा देना चाहिए।

कृषि में अधिक रोजगार सृजन के उपाय :-

  • किसानों को कृषि उपकरण एवं मशीनें खरीदने के लिए सस्ती दरों पर ऋण उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
  • सूखा प्रभावित क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाओं का विकास (जैसे – बाँध, नहर, कुएँ) किया जाना चाहिए।
  • किसानों को उन्नत बीज एवं उर्वरकों पर सब्सिडी प्रदान की जानी चाहिए।
  • कृषि उत्पादों के लिए भण्डारण की पर्याप्त सुविधा उपलब्ध करानी चाहिए।
  • बेहतर परिवहन सुविधाएँ एवं ग्रामीण सड़कें विकसित करनी चाहिए।
  • किसानों को कृषि आधारित उद्योगों (दाल मिल, खाद्य प्रसंस्करण आदि) से जोड़ा जाना चाहिए।
  • बहु-फसली प्रणाली को बढ़ावा देना चाहिए।
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