इस अध्याय मे हम उपभोक्ता, उत्पादक, उपभोक्ताओं के अधिकार, उपभोक्ताओं के शोषण, भारत में उपभोक्ता आंदोलन, उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम 1986 ( कोपरा ), उपभोक्ता निवारण प्रक्रिया की सीमाएँ, भारत सरकार द्वारा उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए उठाए गए कदम आदि के बारे में विस्तार से पड़ेगे।
उपभोक्ता अधिकार
उपभोक्ता :-
वे व्यक्ति जो अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वस्तुएँ या सेवाएँ खरीदते या उपयोग करते हैं, उपभोक्ता कहलाते हैं।
उत्पादक :-
वे व्यक्ति, समूह या संस्थाएँ जो बाजार में बेचने के लिए वस्तुओं तथा सेवाओं का निर्माण या उत्पादन करते हैं, उत्पादक कहलाते हैं।
उपभोक्ताओं के अधिकार :-
उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए कानून द्वारा दिए गए प्रमुख अधिकार निम्नलिखित हैं —
- सुरक्षा का अधिकार
- सूचना का अधिकार
- चुनने का अधिकार
- सुने जाने का अधिकार
- क्षतिपूर्ति निवारण का अधिकार
- उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार
बाज़ार में उपभोक्ताओं का शोषण कैसे होता है?
बाज़ार में उपभोक्ताओं का शोषण विभिन्न तरीकों से किया जाता है, जैसे —
- कम तौलना :- विक्रेता सही वजन से कम मात्रा में वस्तु देते हैं।
- अधिक मूल्य वसूलना :- वस्तु पर अंकित मूल्य (MRP) से अधिक कीमत लेना।
- मिलावट और दोषपूर्ण वस्तुएँ :- खराब, नकली या मिलावटी सामान बेचना।
- भ्रामक विज्ञापन / गलत सूचना :- विज्ञापनों के माध्यम से झूठे या बढ़ा-चढ़ाकर दावे करना।
- छिपे हुए शुल्क :- ऐसी अतिरिक्त लागत जोड़ना जिनकी पहले जानकारी नहीं दी गई हो।
उपभोक्ताओं के शोषण के प्रमुख कारण :-
- जानकारी की कमी के कारण उपभोक्ता ठगे जाते हैं।
- भ्रामक विज्ञापन गलत विश्वास पैदा करते हैं।
- नकली और घटिया वस्तुओं की बिक्री।
- माप-तौल में धोखाधड़ी।
- अधिक कीमत वसूली (ओवरचार्जिंग)।
- मिलावट और गुणवत्ता में कमी।
- शिकायत निवारण की कमजोर व्यवस्था।
- उपभोक्ता अधिकारों के प्रति जागरूकता का अभाव।
बाजार में नियमों और विनियमों की आवश्यकता क्यों?
बाजार हमेशा निष्पक्ष नहीं होता, इसलिए नियम और नियंत्रण जरूरी हैं क्योंकि:
- असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की सुरक्षा के लिए।
- साहूकारों के शोषण से बचाने के लिए।
- पर्यावरण संरक्षण के लिए।
- उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए।
उपभोक्ता आंदोलन :-
- उपभोक्ता आंदोलन का प्रारंभ उपभोक्ताओं के असंतोष से हुआ।
- विक्रेता कई अनुचित व्यावसायिक व्यवहारों में शामिल होते थे।
🔹 उपभोक्ता आंदोलन के कारण :-
- पहले उपभोक्ताओं को शोषण से बचाने के लिए कोई कानूनी व्यवस्था नहीं थी।
- असंतुष्ट उपभोक्ता आमतौर पर उस ब्रांड/दुकान से खरीद बंद कर देता था।
- यह माना जाता था कि सावधानी बरतना पूरी तरह उपभोक्ता की जिम्मेदारी है।
- जागरूकता फैलाने में संस्थाओं को भारत व विश्व स्तर पर कई वर्ष लगे।
- आंदोलन ने वस्तुओं/सेवाओं की गुणवत्ता की जिम्मेदारी विक्रेताओं पर भी डाली।
उपभोक्ता आंदोलन का उद्देश्य :-
- उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा।
- अनैतिक एवं अनुचित व्यापार पर रोक।
- विक्रेताओं को भी जिम्मेदार बनाना।
- वस्तुओं/सेवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करना।
भारत में उपभोक्ता आंदोलन का उदय :-
- भारत में उपभोक्ता आंदोलन एक ‘सामाजिक बल’ के रूप में उभरा।
- उद्देश्य: उपभोक्ताओं को अनैतिक व अनुचित व्यापारिक कार्यों से बचाना।
- 1960 के दशक में खाद्य कमी, जमाखोरी, कालाबाजारी, मिलावट के कारण आंदोलन तेज हुआ।
- 1970 के दशक तक उपभोक्ता संस्थाएँ लेखन, प्रदर्शनी, जागरूकता गतिविधियों में सक्रिय हुईं।
- हाल के वर्षों में उपभोक्ता संगठनों/दल की संख्या में वृद्धि हुई।
- आंदोलन ने कंपनियों व सरकार पर दबाव बनाकर अनुचित प्रथाओं में सुधार कराया।
उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम 1986 ( कोपरा ) :-
- 1986 में सरकार ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (COPRA), 1986 लागू किया।
- COPRA का उद्देश्य: उपभोक्ता अधिकारों की सुरक्षा और शोषण से रक्षा।
COPRA के अंतर्गत त्रिस्तरीय तंत्र :-
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (COPRA) के अंतर्गत उपभोक्ता विवादों के समाधान के लिए एक त्रिस्तरीय न्यायिक तंत्र स्थापित किया गया है, ताकि उपभोक्ताओं को सरल और त्वरित न्याय मिल सके। यह तंत्र तीन स्तरों पर कार्य करता है:
🔸 (i) जिला आयोग (District Commission) :- यह जिला स्तर पर कार्य करता है और 1 करोड़ रुपये तक के दावों से संबंधित मामलों की सुनवाई करता है।
🔸 (ii) राज्य आयोग (State Commission) :- यह राज्य स्तर पर स्थापित होता है तथा 1 करोड़ से 10 करोड़ रुपये तक के मामलों पर विचार करता है।
🔸 (iii) राष्ट्रीय आयोग (National Commission) :- यह राष्ट्रीय स्तर पर कार्य करता है और 10 करोड़ रुपये से अधिक के दावों से संबंधित विवादों की सुनवाई करता है।
यदि उपभोक्ता जिला आयोग के निर्णय से संतुष्ट नहीं होता, तो वह राज्य आयोग में अपील कर सकता है, और राज्य आयोग के निर्णय के विरुद्ध राष्ट्रीय आयोग में अपील की जा सकती है।
इस प्रकार, COPRA का यह त्रिस्तरीय तंत्र उपभोक्ताओं को न्याय और क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का प्रभावी माध्यम प्रदान करता है।
उपभोक्ताओं के कर्त्तव्य :-
- कोई भी वस्तु खरीदते समय उपभोक्ता को उसकी गुणवत्ता और मानक अवश्य जाँचने चाहिए।
- जहाँ भी संभव हो, गारंटी/वारंटी कार्ड लेना चाहिए।
- खरीदे गए सामान या सेवा की रसीद (कैश मेमो) अवश्य लेनी चाहिए और सुरक्षित रखनी चाहिए।
- वस्तु या सेवा में कमी होने पर शिकायत दर्ज करनी चाहिए।
- आई.एस.आई., एगमार्क जैसे मानक चिह्नों वाले उत्पादों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
- उपभोक्ता को अपने अधिकारों की जानकारी होनी चाहिए।
- आवश्यकता पड़ने पर उपभोक्ता को अपने अधिकारों का प्रयोग करना चाहिए।
सूचना पाने का अधिकार :-
🔸 वस्तुओं एवं सेवाओं से संबंधित आवश्यक जानकारी :-
- वस्तु के पैकेट पर उपभोक्ता को आवश्यक जानकारियाँ मिलती हैं जैसे :- अवयव (Ingredients), मूल्य (Price), बैच संख्या (Batch No.), निर्माण तिथि (Mfg Date), अंतिम तिथि (Expiry Date), निर्माता का पता।
- दवाओं पर उचित प्रयोग के निर्देश, दुष्प्रभाव (Side Effects) और खतरों की जानकारी दी जाती है।
- वस्त्रों पर धुलाई संबंधी निर्देश (Washing Instructions) दिए जाते हैं।
सूचना का अधिकार क्यों जरूरी है?
🔸 उपभोक्ता को जानकारी क्यों आवश्यक है :-
- ये नियम इसलिए बनाए गए हैं ताकि उपभोक्ता को वस्तु/सेवा के बारे में पूरी और सही जानकारी मिल सके।
- जानकारी मिलने से उपभोक्ता खराब वस्तु पर शिकायत, मुआवजा या वस्तु बदलने की मांग कर सकता है।
- यदि वस्तु अंतिम तिथि से पहले खराब हो जाए तो उपभोक्ता उसे बदलने का अधिकार रखता है।
- अंतिम तिथि न छपने पर निर्माता जिम्मेदारी से बच सकता है — इसलिए जानकारी देना आवश्यक है।
- एक्सपायरी दवाओं की बिक्री कानूनन अपराध है, शिकायत की जा सकती है।
- यदि कोई विक्रेता MRP से अधिक मूल्य वसूलता है तो उपभोक्ता विरोध/शिकायत कर सकता है।
- उपभोक्ता MRP से कम दाम पर मोल-भाव भी कर सकता है।
सूचना का अधिकार कानून (RTI – 2005) :-
- अक्टूबर 2005 में RTI Act लागू किया गया।
- यह नागरिकों को सरकारी विभागों से जानकारी प्राप्त करने का अधिकार देता है।
- इससे सरकारी सेवाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ी।
चुनने का अधिकार (Right to Choose) :-
उपभोक्ता को अपनी पसंद की वस्तु/सेवा स्वतंत्र रूप से चुनने का अधिकार है। विक्रेता उपभोक्ता को अनावश्यक वस्तु खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।
- उदाहरण: दंतमंजन खरीदते समय ब्रश खरीदने के लिए मजबूर करना – अधिकार का उल्लंघन।
- उदाहरण: नया गैस कनेक्शन लेते समय चूल्हा लेने का दबाव – अधिकार का उल्लंघन।
उपभोक्ता को केवल वही वस्तु खरीदने का अधिकार है जिसकी उसे वास्तविक आवश्यकता हो।
क्षतिपूर्ति निवारण का अधिकार :-
🔸 उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन – न्याय कहाँ मिले?
- उपभोक्ता अधिकारों की अवहेलना के मामलों में उपभोक्ता को न्याय पाने का अधिकार है।
- उपभोक्ताओं को अनुचित व्यापार व्यवहार और शोषण के विरुद्ध क्षतिपूर्ति का अधिकार प्राप्त है।
- क्षति होने पर उपभोक्ता मुआवजा (Compensation) मांग सकता है।
🔸 शिकायत कैसे दर्ज करें?
- शिकायत दर्ज कराने के लिए एक सरल और प्रभावी जन-प्रणाली बनाई गई है।
- उपभोक्ता अपनी शिकायत उपभोक्ता आयोग/केंद्र में दर्ज करा सकता है।
- उपभोक्ता वकील के साथ या बिना वकील के भी शिकायत कर सकता है।
- शिकायत व्यक्तिगत या समूह के रूप में दर्ज की जा सकती है।
- आजकल शिकायतें ऑनलाइन/इंटरनेट के माध्यम से भी दर्ज की जा सकती हैं।
- वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग द्वारा सुनवाई की सुविधा उपलब्ध है।
उपभोक्ता हितों की रक्षा में संगठनों का योगदान :-
- उपभोक्ता आंदोलन ने कई उपभोक्ता संगठन और परिषदों के निर्माण में योगदान दिया।
- ये संगठन उपभोक्ताओं को मार्गदर्शन और सहायता प्रदान करते हैं।
- कई बार ये संगठन उपभोक्ताओं का प्रतिनिधित्व भी करते हैं।
- जागरूकता फैलाने हेतु ये संगठन सरकार से वित्तीय सहयोग प्राप्त करते हैं।
- निवासी कल्याण संघ (RWA) भी उपभोक्ता हितों की रक्षा में मदद करते हैं।
उपभोक्ता निवारण प्रणाली की सीमाएँ :-
- उपभोक्ता निवारण प्रक्रिया अक्सर जटिल, खर्चीली और समय-साध्य होती है।
- कई मामलों में उपभोक्ताओं को वकीलों का सहारा लेना पड़ता है।
- अदालती कार्यवाहियों में शामिल होने के कारण मुकदमे लंबे समय तक चलते हैं।
- खरीदारी के समय अक्सर रसीद (कैश मेमो) नहीं दी जाती, जिससे प्रमाण जुटाना कठिन हो जाता है।
- बाज़ार में अधिकांश खरीददारियाँ छोटे फुटकर दुकानदारों से होती हैं, जहाँ नियमों का पालन कम होता है।
- कानून होने के बावजूद विशेषकर असंगठित क्षेत्र में उनका प्रभाव कमजोर रहता है।
- परिणामस्वरूप, बाज़ार में नियमों और विनियमों का पालन प्रायः नहीं होता।
न्याय पाने के लिए उपभोक्ता को कहाँ जाना चाहिए?
उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन होने या शोषण की स्थिति में उपभोक्ता को उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में शिकायत दर्ज करानी चाहिए। COPRA के अंतर्गत यह व्यवस्था त्रिस्तरीय है:
- जिला उपभोक्ता आयोग – 1 करोड़ रुपये तक के दावों के लिए
- राज्य उपभोक्ता आयोग – 1 करोड़ से 10 करोड़ रुपये तक के दावों के लिए
- राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग – 10 करोड़ रुपये से अधिक के दावों के लिए
उपभोक्ता अपनी शिकायत वकील के साथ या बिना वकील के भी दर्ज कर सकता है। यदि निचले आयोग के निर्णय से संतुष्ट न हो, तो ऊपरी स्तर पर अपील कर सकता है।
जागरूक उपभोक्ता बनने के लिए आवश्यक बातें :-
- उपभोक्ता को अपने अधिकारों और कर्तव्यों की पूरी जानकारी होनी चाहिए।
- वस्तु खरीदते समय उसकी गुणवत्ता, मूल्य, और मानक चिह्न (ISI, Agmark) अवश्य जाँचने चाहिए।
- हर खरीदारी पर रसीद (कैश मेमो) लेना और सुरक्षित रखना चाहिए।
- भ्रामक विज्ञापनों से सावधान रहना चाहिए।
- उत्पाद के पैकेट पर दी गई जानकारी (Expiry Date, Batch No., MRP) ध्यान से पढ़नी चाहिए।
- खराब वस्तु या सेवा मिलने पर शिकायत दर्ज करनी चाहिए।
- उपभोक्ता को MRP से अधिक मूल्य देने से इंकार करना चाहिए।
- उपभोक्ता संगठनों और उपभोक्ता आयोगों की जानकारी रखनी चाहिए।
- आवश्यकता पड़ने पर अपने अधिकारों का प्रयोग करना चाहिए।