वर्ण-विचार: हिंदी व्याकरण में परिभाषा, भेद और नियम जानें
वर्ण-विचार (ORTHOGRAPHY)
वर्ण— वर्ण उस मूल ध्वनि को कहते हैं, जिसके खंड या टुकड़े नहीं हो सकते। जैसे—
अ, आ, इ, ई, ओ, क्, ख्, ग्, च्, छ्, य्, र्, ल् आदि ।
अब कुछ शब्द या ध्वनियाँ लें और इनमें निहित मूल ध्वनि (वर्ण) को समझें। जैसे— “खा लो।”
उपर्युक्त वाक्य में दो शब्द या ध्वनियाँ हैं । अब इसका खंड करें—
ध्वनि / शब्द मूल ध्वनि (वर्ण)
खा = ख् + आ (दो वर्ण)
लो = ल् + ओ (दो वर्ण)
स्पष्ट है कि अब— 'ख्, आ' तथा 'ल्, ओ' के और टुकड़े या खंड नहीं हो सकते, इसलिए इन्हें वर्ण या मूल ध्वनि कहते हैं ।
वर्णमाला (Alphabet)
वर्णों के क्रमबद्ध समूह को वर्णमाला कहते हैं । हिन्दी वर्णमाला में 52 वर्ण या ध्वनियाँ प्रयुक्त होती हैं—

नोट— व्यंजन वर्णों में उच्चारण की सुविधा के लिए 'अ' स्वर मिलाकर लिखा गया है। इनके शुद्ध रूप हैं— क्, ख्, ग्, घ् ङ् आदि ।
वर्ण के भेद
वर्ण के दो भेद हैं—
(1) स्वर वर्ण (Vowel)
(2) व्यंजन वर्ण (Consonant)
स्वर वर्ण
स्वर वर्ण स्वर उन वर्णों या ध्वनियों को कहते हैं, जिनका उच्चारण स्वतः होता है। जैसे—
अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ ।
इनकी संख्या 11 है । ये व्यंजन वर्णों के उच्चारण में भी सहायक होते हैं। जैसे—
क् + अ = क।
ख् + अ = ख।
नोट – (1) अं ( ं) और अ: (:) – हिन्दी वर्णमाला में 'अं' और ‘अः’ को स्वरों के साथ लिखने की परंपरा है, लेकिन 'अं' (अनुस्वार) और ‘अः' (विसर्ग) स्वर नहीं हैं । इन्हें 'अयोगवाह' कहा जाता है।
(2) ऑ ( ̆ ) — इसे ‘अर्द्धचन्द्र' कहते हैं । इसका उच्चारण स्वर की तरह होता है, लेकिन यह अँगरेजी की स्वर-ध्वनि है। इसे आगत स्वरध्वनि भी कहते हैं। इसका प्रयोग प्रायः अँगरेजी शब्दों में होता है । जैसे—
ऑफिस, ऑफसेट, कॉलेज, नॉलेज, स्पॉट, स्टॉप आदि ।
स्वर वर्ण के भेद
स्वर वर्ण के भेद मुख्यतः दो आधार पर किए जाते हैं—
(1) उच्चारण में लगनेवाले समय और (2) जाति के आधार पर ।
(1) उच्चारण में लगनेवाले समय के आधार पर स्वर वर्ण के तीन भेद हैं—
(क) ह्रस्व स्वर, (ख) दीर्घ स्वर और (ग) प्लुत स्वर ।
(क) ह्रस्व स्वर—‘अ, इ, उ' एवं 'ऋ' ह्रस्व स्वर हैं । इन्हें मूल स्वर भी कहते हैं। ये एकमात्रिक होते हैं तथा इनके उच्चारण में दीर्घ स्वर की अपेक्षा आधा समय लगता है।
(ख) दीर्घ स्वर— 'आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ' एवं 'औ' दीर्घ स्वर हैं। इनके उच्चारण में ह्रस्व स्वर की अपेक्षा दुगना समय लगता है । चूँकि इनमें दो मात्राओं का समय लगता है, अतः इन्हें द्विमात्रिक स्वर भी कहते हैं । दूसरी बात, इनमें दो स्वरों की संधि भी रहती है । जैसे—
आ = अ + अ।
ई = इ + इ।
ऊ = उ + उ।
ए = (अ + इ) / (अ + ई) / (आ + इ) / (आ + ई)।
ऐ = (अ + ए) / (आ + ए) / (अ + ऐ) / (आ + ऐ)।
ओ = (अ + उ) / (आ + उ) / (अ + ऊ) / (आ + ऊ)।
औ = (अ + ओ) / (आ + ओ) / (अ + औ) / (आ + औ)।
नोट – इन्हीं दीर्घ स्वरों में— 'ए, ऐ, ओ' तथा 'औ' संयुक्त स्वर हैं ।
ह्रस्व स्वर और दीर्घ स्वर में लगनेवाले समय को इन शब्दों के उच्चारण से समझा जा सकता है—

(ग) प्लुत स्वर – जिस स्वर के उच्चारण में दीर्घ स्वर से भी ज्यादा समय लगता है उसे प्लुत स्वर कहते हैं। किसी को देर तक पुकारने या नाटक-संवाद में इसका प्रयोग देखा जाता है । इसे त्रिमात्रिक स्वर भी कहते हैं। इसके लिए ३ का अंक लगाया जाता है । जैसे— ओ३म् ।
(2) जाति के आधार पर स्वर वर्ण के दो भेद हैं—
(क) सजातीय स्वर और
(ख) विजातीय स्वर ।
(क) सजातीय स्वर – अ-आ, इ-ई, उ-ऊ आदि जोड़े आपस में सजातीय स्वर कहे जाते हैं, क्योंकि ये एक ही उच्चारण-ढंग या उच्चारणप्रयत्न से उच्चरित होते हैं । इनमें सिर्फ मात्रा का अंतर होता है।
(ख) विजातीय स्वर – अ-इ, अ-ई, अ-उ, अ-ऊ, आ-इ, आ-ई आदि जोड़े आपस में विजातीय स्वर हैं, क्योंकि ये दो उच्चारण-ढंग या उच्चारणप्रयत्न से उच्चरित होते हैं ।
स्वर - मात्रा एवं स्वर व्यंजन संयोग
"स्वर के संकेत - चिह्न को मात्रा कहते हैं ।" स्वर के दस संकेत-चिह्न हैं, लेकिन 'अ' का कोई संकेत चिह्न या मात्रा नहीं होती । 'अ' स्वर जब किसी व्यंजन से मिलता है, तो उसका हल - चिह्न (्) लुप्त हो जाता है । जैसे—
क् + अ = क ।
ख् + अ = ख |

कुछ विशेष निर्देश:
(1) मात्राएँ व्यंजनों के पहले या बाद में अथवा ऊपर या नीचे लगती हैं। लेकिन, 'र्' व्यंजन के साथ जब उ ( ु) या ऊ ( ू ) की मात्रा लगती है, तो यह ठीक बीच में लगाई जाती है। जैसे—
र् + उ ( ु) = रु—रुकना, रुकावट, रुख, रुग्ण, रुचना, रुचि, रुझान, रुठ, रुतबा, रुदन, रुद्र, रुधिर, रुपया, रुलाना, रुष्ट, रुस्तम आदि ।
र् + ऊ ( ू) = रू–रूई, रूख, रूखा, रूठना, रूढ़, रूढ़ि, रूप, रूपक, रूपकार, रूपमय, रूपवती, रूपा, रूबरू, रूम, रूमाल, रूस आदि ।
(2) किसी भी स्वर के साथ किसी दूसरे स्वर की मात्रा या उसकी (स्वर) अपनी मात्रा नहीं लगती। जैसे—
अवरेस्ट, औसा, एैसा, अस, डुस, ऋण आदि लिखना गलत है ।
(3) 'श्' और 'ह्' के साथ जब 'ऋ' ( ृ ) की मात्रा लगती है, तो इनका रूप होता है—
श् + ऋ (ृ) = शृ — श्रृंखला, श्रृंग, श्रृंगार, श्रृंगाल आदि ।
ह् + ऋ (ृ) = हृ — हृदय, हृषीकेश, हृष्टपुष्ट आदि ।
बारहखड़ी
किसी व्यंजन के साथ स्वरों की मात्राएँ ('ऋ' को छोड़कर) अनुस्वार और विसर्ग के साथ लिखने को बारहखड़ी कहते हैं। जैसे—
क, का, कि, की, कु, कू, के, कै, को, कौ, कं, कः ।
ख, खा, खि, खी, खु, खू, खे, खै, खो, खौ, खं, खः।
इसी प्रकार अन्य व्यंजनों की बारहखड़ी लिखी जाती है ।
व्यंजन वर्ण
व्यंजन वर्ण — स्वर वर्ण की सहायता से जिस वर्ण का उच्चारण होता है उसे व्यंजन वर्ण कहते हैं । जैसे—
क, ख, ग आदि का उच्चारण स्वर की सहायता से होता है, अतः ये व्यंजन वर्ण हैं। क से ह तक कुल 33 मूल व्यंजन हैं।
व्यंजन वर्ण के भेद
सभी व्यंजनों को मुख्यतः तीन भागों में बाँटा गया है—
(1) स्पर्श व्यंजन, (2) अंतःस्थ व्यंजन और (3) ऊष्म व्यंजन ।
(1) स्पर्श व्यंजन — जो व्यंजन कंठ, तालु, मूर्द्धा (तालु का ऊपरी भाग), ओंठ, दाँत आदि के स्पर्श से बोले जाते हैं, उन्हें स्पर्श व्यंजन कहते हैं । इनकी संख्या 25 है । इन्हें 'वर्गीय व्यंजन' भी कहते हैं, क्योंकि ये पाँच वर्गों में बँटे हुए हैं। प्रत्येक वर्ग का नामकरण उनके प्रथम वर्ण के आधार पर किया गया है। जैसे—

(2) अंतःस्थ व्यंजन — 'य, र, ल' और 'व' अंतःस्थ व्यंजन हैं । इनकी संख्या 4 है । ये स्वर और व्यंजन के बीच स्थित (अंतःस्थ ) हैं । इनका उच्चारण जीभ, तालु, दाँत और ओठों के परस्पर सटने से होता है, लेकिन कहीं भी पूर्ण स्पर्श नहीं होता । कुछ वैयाकरण 'य' और 'व' को 'अर्द्धस्वर' भी कहते हैं ।
(3) ऊष्म व्यंजन — 'श, ष, स' और 'ह' ऊष्म व्यंजन हैं । इनका उच्चारण रगड़ या घर्षण से उत्पन्न ऊष्म (गरम) वायु से होता है। इसलिए इन्हें ऊष्म व्यंजन कहते हैं । इनकी संख्या 4 है । इनके अलावा कुछ और व्यंजन ध्वनियाँ हैं जिनकी चर्चा आवश्यक है। जैसे—
(क) संयुक्त व्यंजन या संयुक्ताक्षर और (ख) द्विगुण व्यंजन ।
संयुक्त व्यंजन
'क्ष, त्र, ज्ञ' और 'श्र' मूल व्यंजन नहीं हैं । इनकी रचना दो व्यंजनों के मेल से हुई है । इसलिए इन्हें संयुक्त व्यंजन कहते हैं। जैसे—
क् + ष = क्ष
त् + र = त्र
ज् + ञ = ज्ञ
श् + र = श्र
द्विगुण व्यंजन
ड़ और ढ़— ये हिन्दी के अपने व्यंजन हैं । इनका प्रयोग संस्कृत में नहीं होता। ये 'ड' और 'ढ' के नीचे बिंदु देने से बनते हैं । इन्हें द्विगुण व्यंजन भी कहते हैं । इनका प्रयोग प्रायः अक्षरों के बीच या शब्द के अंत में होता है। जैसे—
पढ़ना, ओढ़ना, लड़का, सड़क आदि । — (अक्षरों के बीच में)
बाढ़, आषाढ़, कड़ी, हथकड़ी आदि । — ( शब्द का अंतिम अक्षर)
(अपवाद : मेढक, औढर आदि)
नोट — ( 1 ) किसी मूल शब्द का पहला अक्षर यदि 'ढ' हो, तो यह (ढ) प्रायः बिन्दुरहित आता है । जैसे—
ढकनी, ढाल, ढाँचा, ढोंग, ढोलक, ढाई, ढकना आदि ।
अब, इन्हें पढ़ें और समझें: ढाई — पढ़ाई; ढकना — उढ़कना ।
(2) 'ड़' या 'ढ़' किसी अक्षर के साथ शुद्ध रूप या हल् रूप (ड्, द्) में संयुक्त नहीं होता ।
वर्णों के उच्चारण-स्थान
किसी भी वर्ण के उच्चारण के लिए मुख के विभिन्न भागों का सहारा लेना पड़ता है। मुख के जिस भाग (अवयव) से वर्ण का उच्चारण किया जाता है, वह भाग उस वर्ण का उच्चारण-स्थान कहलाता है । ये मुख्यतः छह हैं—
(1) कंठ, (2) तालु, (3) मूर्द्धा (तालु का ऊपरी भाग), (4) दंत (दाँत), (5) ओष्ठ (ओंठ) और (6) नासिका (नाक)।
नीचे के चित्र द्वारा इसे अच्छी तरह समझा जा सकता है—

उच्चारण-स्थान के आधार पर वर्णों के भेद
1. कंठ्य : जिनका उच्चारण कंठ से हो, कंठ्य वर्ण हैं । जैसे—
अ, आ, क-वर्ग, विसर्ग तथा ह ।
2. तालव्य : जिनका उच्चारण तालु से हो, तालव्य वर्ण हैं। जैसे—
इ, ई, च-वर्ग, य तथा श।
3. मूर्द्धन्य: जिनका उच्चारण-स्थान मूर्द्धा हो, मूर्द्धन्य वर्ण हैं । जैसे—
ऋ, ट-वर्ग, र तथा ष।
4. दंत्य : जिनका उच्चारण दाँत के स्पर्श से हो, दंत्य वर्ण हैं । जैसे—
त-वर्ग, ल और स ।
5. ओष्ठ्य : जिनका उच्चारण ओष्ठ के स्पर्श से हो, ओष्ठ्य वर्ण हैं। जैसे—
उ, ऊ और प-वर्ग ।
6. अनुनासिक : जो मुख के भाग (दाँत, ओंठ आदि) और नाक की सहायता से उच्चरित हों, अनुनासिक वर्ण हैं । जैसे—
पंचमाक्षर (ङ, ञ, ण, न, म), अनुस्वार और चन्द्रबिंदु |
7. कंठ-तालव्यः जो कंठ और तालु से उच्चरित हों, कंठ-तालव्य वर्ण हैं। जैसे—
ए तथा ऐ ।
8. कंठौष्ठ्य : जो कंठ और ओष्ठ से उच्चरित हों, कंठौष्ठ्य वर्ण हैं । जैसे—
ओ तथा औ ।
9. दंतौष्ठ्य : जो दाँत और ओष्ठ से उच्चरित हो, दंतौष्ठ्य वर्ण है। जैसे—
व ।
उपर्युक्त बातों को निम्नलिखित तालिका द्वारा समझें—

प्रयत्न के आधार पर व्यंजनों के भेद
व्यंजनों के उच्चारण के समय स्वरतंत्री में श्वास कंपन, श्वास- वायु (प्राण) की मात्रा तथा मुख के विभिन्न अवयवों द्वारा श्वास के अवरोध की प्रक्रिया को 'प्रयत्न' कहते हैं । दूसरे शब्दों में, ध्वनियों के उच्चारण में श्वासवायु, जिह्वा और अन्य अवयव मिलकर जो यत्न करते हैं, उसे 'प्रयत्न' कहते हैं।
स्वरतंत्री में श्वास-कंपन के आधार पर व्यंजन-भेद :
स्वरतंत्री में श्वास कंपन के आधार पर व्यंजन वर्णों के दो भेद हैं—
(1) घोष या सघोष और (2) अघोष ।
(1) घोष या सघोष — जिन व्यंजन वर्णों (ध्वनियों) के उच्चारण में श्वास के कारण कंपन होता है उन्हें घोष या सघोष कहते हैं। जैसे—
सभी वर्गों के तीसरे, चौथे और पाँचवें व्यंजन — (ग, घ, ङ, ज, झ, ञ, ड, ढ, ण, द, ध, न, ब, भ, म) और ड़, ढ़, य, र, ल, व, ह।
नोट — सभी स्वर सघोष होते हैं ।
(2) अघोष — जिन व्यंजन वर्णों (ध्वनियों) के उच्चारण में सिर्फ श्वास का प्रयोग होता है और स्वरतंत्री में कंपन नहीं होता उन्हें अघोष कहते हैं । जैसे—
सभी वर्गों के पहले और दूसरे व्यंजन — (क, ख, च, छ, ट, ठ, त, थ, प, फ) तथा श, ष, स ।
श्वास-वायु (प्राण) की मात्रा के आधार पर व्यंजन-भेद :
श्वास- वायु की मात्रा के आधार पर व्यंजन वर्णों के दो भेद हैं—
(1) अल्पप्राण और (2) महाप्राण ।
(1) अल्पप्राण — जिन व्यंजन ध्वनियों के उच्चारण में श्वास- वायु (प्राण) कम (अल्प) मात्रा में बाहर निकलती है उन्हें अल्पप्राण व्यंजन कहते हैं। जैसे—
प्रत्येक वर्ग के पहले, तीसरे और पाँचवें वर्ण— (क, ग, ङ, च, ज, ञ, ट, ड, ण, त, द, न, प, ब, म) तथा ड़, य, र, ल, व।
(2) महाप्राण — जिन व्यंजन ध्वनियों के उच्चारण में श्वास-वायु अधिक (महा) मात्रा में बाहर निकलती है उन्हें महाप्राण व्यंजन कहते हैं । जैसे—
प्रत्येक वर्ग के दूसरे तथा चौथे वर्ण– (ख, घ, छ, झ, ठ, ढ, थ, ध, फ, भ) तथा ढ़, श, ष, स, ह ।
व्यंजन-गुच्छ एवं द्वित्व
व्यंजन-गुच्छ— यदि किसी शब्द में दो-तीन व्यंजन लगातार हों और उनके बीच कोई स्वर न हो, तो उस व्यंजन-समूह को व्यंजन-गुच्छ कहते हैं। जैसे—
अच्छा, क्यारी, क्लेश, स्फूर्ति, स्पष्ट, स्वप्न, मत्स्य, उज्ज्वल आदि ।
उदाहरण :

द्वित्व— यदि दो समान व्यंजनों के बीच कोई स्वर न हो, तो वह व्यंजनगुच्छ द्वित्व कहलाता है । जैसे—
(अड्डा/अड्डा); (पट्टी / पट्टी); (कुत्ता / कुत्ता) आदि ।
उपर्युक्त शब्दों में मोटे अक्षर प्रत्येक शब्द में दो-दो बार आए हैं। इन्हें ही ‘द्वित्व' कहते हैं ।
नोट — (1) वर्गीय व्यंजन के दूसरे अथवा चौथे वर्ण को द्वित्व (दो बार ) के रूप में नहीं लिखा जाता । जैसे—
ख्ख, घ्घ, छ्छ, झ्झ, ठ्ठ, ढ्ढ, थ्थ आदि ।
उदाहरण :
अशुद्ध — मख्खन, बघ्घी, मछ्छर, झझ्झर, चिठ्ठी, बुढ्ढा, पथ्थर आदि ।
शुद्ध — मक्खन, बग्घी, मच्छर, झज्झर, चिट्ठी, बुड्ढा, पत्थर आदि । (2) किसी भी शब्द के शुरू में द्वित्व का प्रयोग नहीं होता है।
अनुस्वार-पंचमाक्षर तथा विसर्ग
ङ्, ञ्, ण्, न् और म् — ये अनुनासिक व्यंजन हैं । इन्हें ‘पंचमाक्षर’ भी कहते हैं। ये जब अपने वर्ग के व्यंजन से हल् रूप में जुड़ते हैं, तब लेखन - सुविधा हेतु इन्हें अनुस्वार ( ं) में बदल दिया जाता है । जैसे—
क-वर्ग के साथ (ङ्) — अङ्क/अङ्क = अंक । पङ्ख/पंख = पंख |
च-वर्ग के साथ (ञ्) — पञ्च=पंच । पञ्छी = पंछी । झञ्झट = झंझट ।
ट-वर्ग के साथ (ण्) — घण्टा = घंटा । कण्ठ = कंठ । दण्ड = दंड ।
त-वर्ग के साथ (न्) — पन्त = पंत । पन्थ = पंथ । बन्द = बंद ।
प-वर्ग के साथ (म्) — कम्प = कंप | अम्बा = अंबा । दम्भ = दंभ ।
नोट— (1) अनुस्वार का प्रयोग ज्यादा प्रचलित एवं मान्य है । फिर भी आप किसी व्यंजन के साथ पंचमाक्षर संयुक्त करना चाहते हों, तो वर्ग का हमेशा खयाल रखें। एक वर्ग के साथ दूसरे वर्ग के पंचमाक्षर को संयुक्त न करें। जैसे—
(अञ्क/अण्क/अन्क), (डन्डा/डडा) आदि लिखना गलत है।
(2) लेकिन किसी शब्द में दो भिन्न पंचमाक्षर या किसी पंचमाक्षर का द्वित्व हो, तो अनुस्वार का प्रयोग न करें । उसमें पंचमाक्षर का प्रयोग करें । जैसे—
वाङ्मय, जन्म, निम्न, मृण्मय आदि । — ( भिन्न पंचमाक्षर)
उन्नति, सम्मति, अक्षुण्ण आदि । — (द्वित्व पंचमाक्षर)
(3) जिन शब्दों के पहले सम् उपसर्ग लगता है, वहाँ ‘म्’ के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग करें। जैसे—
सम् + यम = संयम
सम् + लाप = संलाप
सम् + शय = संशय
सम् + रक्षण = संरक्षण
सम् + वाद = संवाद
सम् + सार = संसार
विसर्ग ( : ) — अनुस्वार ( ं ) की तरह विसर्ग को भी अयोगवाह कहा जाता है। इसका उच्चारण 'ह' - जैसा है। जैसे—
अतः, स्वतः, प्रातः, प्रायः, पयःपान, मुख्यतः आदि ।
अनुतान (Intonation)
जब कोई व्यक्ति कुछ बोलता है, तब वह यों ही धाराप्रवाह बोलता नहीं जाता, बल्कि किसी शब्द या वाक्य को बोलते समय अपने भावों (सुख, दुःख, आश्चर्य, खीझ आदि) के अनुरूप शब्द- ध्वनि को ऊपर-नीचे उतारता चढ़ाता है । इसी उतार-चढ़ाव या आरोह-अवरोह अथवा ऊँची-नीची स्वर (ध्वनि) लहरी को 'सुर-लहर' या सुर का अनुतान कहते हैं। जैसे—
'अच्छा' शब्द को विभिन्न अनुतानों में इस तरह बोला जा सकता, है —
अच्छा। — सामान्य कथन (अनुतान समान है ।)
अच्छा? — प्रश्नवाचक (अनुतान जोरदार है ।)
अच्छा! — आश्चर्य (अनुतान अंत में लंबा है ।)
इसी प्रकार वाक्य में भी भावानुसार अनुतान का प्रभाव देखा जाता है। जैसे—
वह जा रहा है। (अनुतान सभी शब्दों में समान है ।)
वह जा रहा है ? (अनुतान बीच में उठता है और अंत में गिरता है।)
वह जा रहा है ! (अनुतान अंत में उठकर लंबा हो जाता है ।)
बलाघात
बल + आघात से बना है— बलाघात । शब्द उच्चारण के समय किसी वर्ण पर बल देना, बलाघात या स्वराघात कहलाता है । इसके मुख्यतः दो भेद हैं—
(1) वर्ण या अक्षर-बलाघात और (2) शब्द- बलाघात ।
(1) वर्ण या अक्षर-बलाघात— किसी खास वर्ण या अक्षर पर पड़नेवाले बलाघात को वर्ण या अक्षर - बलाघात कहते हैं । जैसे—
(क) चला (वह स्कूल से चला) — 'च' पर विशेष बल है ।
(ख) चला (तू गाड़ी चला) — 'ला' पर विशेष बल है ।
(2) शब्द-बलाघात — वाक्य में प्रयुक्त किसी खास शब्द पर विशेष बल देना, शब्द-बलाघात कहलाता है। जैसे—
(क) तुम नहीं पढ़ोगे । — (किसी भी शब्द पर विशेष बल नहीं)
(ख) तुम नहीं पढ़ोगे ? — ('नहीं' शब्द पर विशेष बल)
वर्ण, ध्वनि, लिपि और अक्षर में अंतर
वर्ण और ध्वनि— कभी-कभी वर्ण के लिए ध्वनि या ध्वनि के लिए वर्ण शब्द का प्रयोग होता है, फिर भी दोनों में निम्नलिखित अंतर हैं—
1. “मुख के विभिन्न भागों (अवयवों) या उच्चारण-स्थान से जो वर्ण या वर्णों के समूह उच्चरित होते हैं उन्हें ध्वनि कहते हैं ।" यह मुख द्वारा उच्चरित होती है और कान द्वारा सुनी जाती है । लेकिन, वर्ण किसी संकेत द्वारा हाथ से लिखा या यंत्र द्वारा छापा जाता है ।
2. मौखिक भाषा की सबसे छोटी इकाई 'ध्वनि' है और लिखित भाषा की सबसे छोटी इकाई 'वर्ण' ।
3. कभी-कभी ध्वनि समान होते हुए भी उसके अर्थ और लिपि में अंतर होता है । जैसे—हिन्दी की 'आई' ध्वनि और अँगरेजी की 'I' ध्वनि में ध्वनिगत समानता है, लेकिन अर्थ और लिपि में अंतर है ।
लिपि— भाषा के मुख्यतः दो रूप हैं— मौखिक और लिखित । मौखिक भाषा में ध्वनियाँ मुख द्वारा उच्चरित होती हैं । यदि उन उच्चरित ध्वनियों को किसी चिह्न या संकेत द्वारा मूर्त रूप दिया जाए, तो वह लिखित भाषा (लिखित रूप) 'लिपि' कहलाएगी । अर्थात्, “भाषा-ध्वनियों को लिखकर प्रकट करने हेतु निश्चित किए गए संकेतों या चिह्नों को लिपि कहते हैं ।”
हिन्दी जिस लिपि में लिखी जाती है उसे 'देवनागरी' कहते हैं । इसमें संस्कृत, मराठी और नेपाली भाषाएँ भी लिखी जाती हैं। पंजाबी भाषा 'गुरुमुखी' में तथा अँगरेजी 'रोमन लिपि में लिखी जाती है। उर्दू और कश्मीरी की लिपि 'फारसी' कहलाती है । अब कुछ प्रमुख भाषाओं की लिपियों को देखें—

वर्ण और अक्षर — कुछ वैयाकरण के अनुसार जिसका क्षर न हो वह 'अक्षर' है । जैसे—
अ, आ, क्, ख् आदि । अर्थात् — वर्ण ही अक्षर है ।
लेकिन, कुछ वैयाकरण के मतानुसार दोनों में अंतर है। उनका मत है कि स्वर या स्वरसहित व्यंजन 'अक्षर' है । जैसे—
अ, आ, क, ख, खे, गै, ती आदि ।
उनके अनुसार, ‘लड़का' शब्द में तीन अक्षर हैं— ल + ड़ + का। लेकिन, इसमें वर्णों की संख्या छह है— ल् + अ + ड् + अ + क् + आ ।
अभ्यास
1. वर्ण या मूल ध्वनि किसे कहते हैं ? इसे समझाकर लिखें ।
2. वर्णमाला किसे कहते हैं ? हिन्दी वर्णमाला में वर्णों की संख्या कितनी है ?
3. वर्ण के कितने भेद हैं ? इनके नाम लिखें ।
4. ह्रस्व स्वर और दीर्घ स्वर किसे कहते हैं ? सोदाहरण स्पष्ट करें ।
5. सजातीय स्वर और विजातीय स्वर किसे कहते हैं ? समझाकर लिखें ।
6. उच्चारण स्थान के आधार पर वर्णों के कितने भेद हैं ? इनके नाम लिखें ।
7. प्रयत्न के आधार पर व्यंजनों के कितने भेद हैं ? इनके नाम लिखें ।
8. स्वरतंत्री में श्वास-कंपन के आधार पर व्यंजन के कितने भेद हैं ?
9. व्यंजन वर्ण किसे कहते हैं ? मूल व्यंजन वर्णों की संख्या कितनी है ?
10. व्यंजन वर्ण के कितने भेद हैं ? इनके नाम लिखें ।
11. स्पर्श व्यंजन किसे कहते हैं ? इनकी संख्या कितनी है ?
12. अंतःस्थ व्यंजन और ऊष्म व्यंजन में कौन-कौन से वर्ण आते हैं?
13. संयुक्त व्यंजन किसे कहते हैं ? ये कौन-कौन से हैं ?
14. द्विगुण व्यंजन किसे कहते हैं ? ये कौन-कौन से हैं ?
15. वर्णों के उच्चारण-स्थान से क्या समझते हैं ? इनमें मुख्य कौन-कौन से हैं ?
16. श्वास-वायु (प्राण) की मात्रा के आधार पर व्यंजन वर्णों के नाम लिखें ।
17. लिपि किसे कहते हैं ? हिन्दी और संस्कृत किस लिपि में लिखी जाती हैं ?
18. अक्षर किसे कहते हैं ? 'लड़का' शब्द में कितने अक्षर हैं ?
19. निम्नलिखित वाक्यों के रिक्त स्थानों में उपयुक्त शब्द लिखें—
(क) वर्ण उस मूल ध्वनि को कहते हैं, जिसके खंड या टुकड़े ...... I
(ख) वर्ण के दो भेद हैं, स्वर वर्ण और ....... I
(ग) उच्चारण में लगनेवाले समय के आधार पर स्वर वर्ण के मुख्यतः दो भेद हैं, ह्रस्व स्वर और ..... I(घ) स्वर के संकेत - चिह्न को ....... कहते हैं।(ङ) स्वर वर्ण की सहायता से जिस वर्ण का उच्चारण होता है उसे ....... कहते हैं(च) य, र, ल और व ....... व्यंजन हैं ।(छ) क्ष, त्र, ज्ञ और श्र ...... व्यंजन हैं।(ज) उच्चारण-स्थान मुख्यतः ....... हैं ।
(झ) यदि किसी शब्द में दो-तीन व्यंजन लगातार हों और उनके बीच कोई स्वर न हो, तो उस व्यंजन-समूह को ....... कहते हैं ।
(ञ) भाषा-ध्वनियों को लिखकर प्रकट करने हेतु निश्चित किए गए संकेतों या चिह्नों को ...... कहते हैं ।(ट) 'व' का उच्चारण ......... से होता है।(ठ) पंचमाक्षर, अनुस्वार और चन्द्रबिंदु का उच्चारण ........ से होता है।(ड) उ, ऊ तथा प-वर्ग का उच्चारण ....... से होता है।(ढ) कंठ से ........ का उच्चारण होता है ।(ण) तालु से ....... का उच्चारण होता है ।(त) मूर्द्धा से ....... का उच्चारण होता है(थ) त-वर्ग, ल और स का उच्चारण ....... से होता है।(द) स्वरतंत्री में श्वास- कंपन के आधार पर व्यंजन के दो भेद हैं— ........ और ........ ।(ध) श्वास-वायु की मात्रा के आधार पर व्यंजन के दो भेद हैं— ........ और ........ ।
20. सही कथन के सामने (✓) और गलत के सामने (x) चिह्न लगाएँ—
(क) वर्ण मूल ध्वनि को कहते हैं ।(ख) वर्गों के क्रमबद्ध समूह को वर्णमाला कहते हैं । [ ](ग) जाति के आधार पर स्वर के तीन भेद हैं । [ ](घ) स्वर के ग्यारह संकेत चिह्न (मात्रा) हैं । [ ](ङ) मूल व्यंजन वर्णों की संख्या 25 है । [ ](च) ड़ और ढ़ हिन्दी के अपने व्यंजन हैं । [ ](छ) ए और ऐ का उच्चारण कंठ और तालु से होता है । [ ](ज) ओ तथा औ का उच्चारण दाँत और ओंठ से होता है । [ ](झ) ङ्, ञ्, ण्, न् और म् को पंचमाक्षर कहते हैं । [ ](ञ) पंजाबी भाषा रोमन लिपि में लिखी जाती है । [ ]
21. इनमें से ह्रस्व, दीर्घ और संयुक्त स्वरों को चुनकर लिखें—
अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ I
22. इनमें से स्पर्श, अंतःस्थ, ऊष्म, संयुक्त और द्विगुण व्यंजनों को चुनकर लिखें—
क, च, य, श, ज्ञ, ड़, ट, त, ढ़, ष, र, क्ष, त्र, श्र, स, ह, ल, व, प, फ ।
23. इन ध्वनियों को मिलाकर लिखें—
(क) क् + ऋ + ष् + इ = ...........(ख) म् + इ + ठ् + आ + इ + य् + आँ = ...........(ग) ख् + उ + श् + अ + ब् + ऊ = ...........(घ) प् + ऐ + स् + ए = ...........(ङ) प् + औ + ध् + ओं = ...........
24. जिसका विनाश न हो उसे क्या कहते हैं ?
(i) लिपि(ii) अचल(iii) अगोचर(iv) अक्षर
25. व्यंजन वर्णों की संख्या कितनी है ?
(i) 33(ii) 20(iii) 25(iv) 42
26. 'क' वर्ण का उच्चारण-स्थान है :
(i) कंठ(ii) तालु(iii) दंत(iv) मूर्द्धा
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