शब्द-रचना हिंदी व्याकरण: परिभाषा, प्रकार और उदाहरण सरल भाषा में

 

शब्द-रचना (WORD-FORMATION)

हिन्दी शब्दों की रचना मुख्यतः पाँच प्रकार से होती है, जैसे
(1) उपसर्ग जोड़कर अध + पका = अधपका ।
(2) प्रत्यय जोड़कर लड़ + आका = लड़ाका ।
(3) समास द्वारा राजा + महल = राजमहल ।
(4) संधि द्वारा रवि + इन्द्र = रवीन्द्र ।
(5) पुनरुक्ति या द्विरुक्ति द्वारा गाँव-गाँव, लाल-लाल आदि ।

उपसर्ग (Prefix)

परिभाषा— उपसर्ग वह शब्दांश है जो किसी शब्द के पहले जुड़कर एक नया शब्द बनाता है, जैसे—
'हार' का अर्थ होता है— पराजय या माला । यदि इसके पहले 'प्र', 'आ', 'उप' आदि उपसर्ग जोड़े जाएँ, तो नया शब्द बनेगा
प्र + हार = प्रहार (चोट पहुँचाना) 
उप + हार = उपहार (भेंट)
आ + हार = आहार (भोजन)

स्पष्ट है कि उपसर्ग जोड़ने से नए-नए शब्दों की उत्पत्ति होती है । हिन्दी में चार प्रकार के उपसर्ग प्रयुक्त होते हैं। ये हैं
(1) संस्कृत के उपसर्ग, (2) हिन्दी के उपसर्ग, (3) उर्दू के उपसर्ग (अरबी + फारसी) एवं (4) अँगरेजी के उपसर्ग ।

संस्कृत के उपसर्ग

उपसर्ग            अर्थ                              उपसर्ग लगे शब्द
अधि               ऊपर, ऊँचा, पर,              अधिराज, अधिकरण, अधिपति, अधिमास, अध्यक्ष
                     प्रधान, अधिक
अति               अधिकता, ज्यादती             अतिरिक्त, अतिशय, अत्यंत, अत्याचार
अनु                पीछे, सदृश, साथ,              अनुगामी, अनुसरण, अनुकाल, अनुकूल 
                     प्रत्येक, बारंबार                  अनुरूप, अनुकंपा, अनुभव
अप                उलटा, विरुद्ध, बुरा,           अपकार, अपमान, अपकर्म, अपकीर्ति, 
                     हीन, अधिक                      अपांग, अपकलंक, अपहरण
अपि               निकट, संबंध                     अपिधान, अपिकक्ष
अभि               सामने, बुरा, अधिक, दूर,     अभ्युत्थान, अभ्यागत, अभियुक्त, 
                     समीप, बारंबार, ऊपर          अभिलाषा, अभ्यास
अव                निश्चय, अनादर, व्याप्ति,        अवधारण, अवज्ञा, अवमान, अवतार, अवकाश
                     न्यूनता, गहराई
                 यह अर्थ में विशेषता लाता      आपात, आरोहण, आगमन, आदान, आचरण
                     है या विपरीत अर्थ देता है।
उत्/उद्           ऊपर, अतिक्रमण, उत्कर्ष,     उद्गमन, उत्तीर्ण, उद्गति, उद्देश्य, उच्चारण
                     प्राबल्य, विकास
उप                 समीपता, न्यूनता                   उपकार, उपगमन, उपनयन, उपमंत्री 
दुर्                 बुरा, निषेध, कठिन                दुरात्मा, दुर्बल, दुर्गम, दुर्लभ, दुराचार 
दुस्                 बुरा, कठिन                         दुष्कर्म, दुष्कर, दुःसाध्य
नि                  समूह, अत्यंत, आदेश             निगृहीत, निदेश, निपुण, निबंध, निपतित
निर्                बाहर, निषेध, रहित                निर्वास, निर्भय, निर्वाह, निर्दोष
निस्               बाहर, निषेध, रहित                निष्काम, निश्चल, निश्छल
प्र                   आगे, सामने, दूर                   प्रकृष्ट, प्रपौत्र, प्रभु, प्रसन्न
परा                उलटा/दूसरे का हित               पराक्रम, पराजय, पराजित
प्रति                विरुद्ध, सामने, बदले              प्रतिकूल, प्रत्यक्ष, प्रत्युपकार, प्रतिहिंसा, 
                      में, हर एक, समान                प्रत्येक, प्रतिदिन, प्रतिनिधि
परि                चारों ओर, अच्छी तरह,           परिभ्रमण, परिधि, परिपूर्ण, 
                       अतिशय, पूर्णता, नियम            परित्याग, परिहास, परिवाद
वि                  पृथक्ता, निषेध, भाग,              वियोग, विधवा, विक्रम, विक्रय, 
                     क्रम, विशेषता                        विभाग, विधा, विहीन, विज्ञान
सु                  सुन्दर, अच्छा, पूरी तरह,          सुकेशी, सुकर्म, सुगम, सुवास, 
                     आसानी से, अत्यधिक              सुगंधित, सुकर, सुलभ, सुदीर्घ
सम् (सं)          पूर्णता, सुन्दर                         संतुष्ट, संतोष, संस्कार, संभोग, संयोग, संग्रह

हिन्दी के उपसर्ग

उपसर्ग            अर्थ                              उपसर्ग लगे शब्द
               अभाव, दूषित                अकर्म, अन्याय, अचल, अभागा, अकाल
अध             आधा                           अधजला, अधपका, अधखिला, अधमरा, 
                                                     अधपई, अधसेरा, अधकचरा
अन             अभाव, निषेध                अनबन, अनजान, अनहोनी, अनमोल 
               निषेध, हीनता                औगुन, औघट, औढर, औसर
उन              एक कम                       उन्नीस, उनतीस, उनचालीस, उनचास
दु                बुरा, कम, हीन                दुकाल, दुबला
नि               निषेध, अभाव                  निकम्मा, निखरा, निहत्था, निडर, निधड़क
बिन             बिना, अभाव                   बिनकाम, बिनचखा, बिनजाना, बिनदेखा 
भर              पूरा                               भरपेट, भरपूर, भरसक, भरदिन
क, कु          बुरा, हीनता                     कपूत, कदर्थ, कुखेत, कुख्यात, कुढंग, कुपात्र
स, सु           के साथ, श्रेष्ठ                    सजीव, सपूत, सजग, सरस, सुडौल, सुपात्र

अरबी के उपसर्ग

उपसर्ग            अर्थ                              उपसर्ग लगे शब्द
अल्             निश्चित, यह कि                   अलगरज, अलबत्ता, अलमस्त
ऐन               ठीक, सटीक                      ऐन मौका, ऐनवक्त
गैर               निषेध, विरोध,                     गैरकानूनी, गैरमुमकिन, गैरमुनासिब,
                   विपरीत                             गैरवाजिब, गैरसरकारी, गैरहाजिर
फी               प्रत्येक, हर एक                   फीमर्द, फीरुपया, फीसदी
बिल             साथ                                  बिलकुल, बिलफेल
बिला            बिना                                  बिलादिमाग, बिलाशक
ला               बिना, नहीं                           लाइलाज, लाजवाब, लापरवाह, लावारिस

फारसी के उपसर्ग

उपसर्ग            अर्थ                              उपसर्ग लगे शब्द
                 साथ                              आगाह, आवारा
कम               थोड़ा, हीन                      कमअक्ल, कमउम्र, कमखयाल, कमजोर
खुश               अच्छा                            खुशकिस्मत, खुशखबरी, खुशनसीब, खुशबू
दर                 में                                  दरअसल, दरकार, दरमियान
ना                  नहीं, अभाव                    नाउम्मीद, नाचीज, नादान, नापसंद, नाराज 
नेक               अच्छा                             नेकनाम, नेकनीयत, नेकदिल, नेकबख्त 
                  से, साथ, अनुसार              बनाम, बदस्तूर
बद                बुरा                                बदकिस्मत, बदतमीज, बददुआ, बदनीयत, 
                                                         बदनाम, बदबू, बदहजमी
बर                बाहर, ऊपर                     बरखास्त, बरखिलाफ, बरदाश्त, बरबाद
बा                 साथ, वाला, पूर्ण                बाअदब, बाइज्जत, बाकलम, बाकायदा 
बे                  बिना, बगैर                       बेअक्ल, बेइज्जत, बेईमान, बेवफा
सर                सिर, मुख्य                       सरताज, सरदार, सरहद
हम                साथ, आपस में                 हमउम्र, हमदर्द, हमराह, हमसफर
हर                 प्रत्येक                            हरगिज, हरजाई, हरतरह, हररोज, हरेक

अँगरेजी के उपसर्ग

उपसर्ग            अर्थ                              उपसर्ग लगे शब्द
डबल            दुगना, दोहरा                डबल-रोटी, डबल-नाश्ता, डबल-फॉल्ट 
डिप्टी             उप                             डिप्टी-इंस्पेक्टर, डिप्टी-कमिश्नर
फुल              पूरा                            फुल-कुरता, फुल- स्वेटर, फुल-जूता 
सब               अवर, छोटा                 सब-इंस्पेक्टर, सब-ऑफिसर, सब-जज 
हाफ             आधा                          हाफ-कमीज, हाफ-कुरता, हाफ-शर्ट, हाफपैंट
हेड               मुख्य, प्रधान                 हेड-क्लर्क, हेड-मास्टर, हेड-पंडित, हेड-मौलवी

नोट : कुछ ऐसे भी शब्द हैं, जिनमें एक से अधिक उपसर्ग जुड़े होते हैं। ऐसा प्रायः संस्कृत के शब्दों में पाया जाता है, जैसे—
वि + आ + करण = व्याकरण
अभि + उत् + हार = अभ्युद्धार
दुर् + वि + अव + हार = दुर्व्यवहार
सम् + अभि + उत् + हार = समभ्युद्धार

अभ्यास

1. नए-नए शब्दों की रचना कैसे होती है ? इसे उदाहरण द्वारा स्पष्ट करें । 

2. उपसर्ग किसे कहते हैं ? इसे उदाहरणसहित समझाएँ । 

3. इन उपसर्गों से दो-दो शब्द बनाएँ—
अति, अ, गैर, नेक, डबल, उप, अनु, प्रति, आ, कु ।

4. दिए गए उपसर्गों में से सही उपसर्ग चुनकर खाली जगहों को भरें
अधि, अ, अल्, कम, हाफ, सब, बा, बिला, भर, सम्। 
(क) संस्कृत के उपसर्ग     — ...............................
(ख) हिन्दी के उपसर्ग       — ...............................
(ग) अरबी के उपसर्ग        — ...............................
(घ) फारसी के उपसर्ग      — ...............................
(ङ) अँगरेजी के उपसर्ग    — ...............................

5. इन शब्दों को उपसर्ग हटाकर लिखें
उद्गम, उपकार, दुरात्मा, निष्काम, संतुष्ट, अधपई, उन्नीस, कपूत, सजीव, अलमस्त, दरकार, नादान, बाअदब, हमदर्द, समालोचन ।

6. संस्कृत, हिन्दी, अरबी, फारसी एवं अँगरेजी के किन्हीं दो-दो उपसर्गों को लिखें ।

7. निम्नांकित शब्दों में कौन-कौन-से उपसर्ग जुड़े हैं, लिखें 

शब्द                     उपसर्ग
अपमान                ...............
आपात                  ...............
निबंध                   ...............
वियोग                   ...............
बिनकाम                ...............
अभिभावक            ...............
उच्चारण                ...............
सजीव                   ...............
खुशबू                   ...............
बदनाम                 ...............
डबल-फॉल्ट           ...............
पर्यावरण               ...............
आरक्षण                ...............
विशेष                   ...............

8. इन उपसर्गों का अर्थ लिखें—
अनु, अभि, दुस्, सम्, अध, औ, ऐन, फी, कम, दर, डबल, हेड। 

9. ‘अपकार' में प्रयुक्त उपसर्ग है
(i) अप 
(ii) कार
(iii) आप
(iv) कर

10. 'प्रतिकूल' शब्द में कौन-सा उपसर्ग प्रयुक्त है ? 
(i) प्र
(ii) परा 
(iii) परि 
(iv) प्रति

प्रत्यय (Suffix)

परिभाषा— प्रत्यय वह अंत में जुड़कर एक नया शब्दांश है, जो किसी धातु या अन्य शब्द के शब्द बनाता है, जैसे—
लड़ (धातु) + आका   (प्रत्यय) = लड़ाका ।
मनुष्य (संज्ञा) + ता     (प्रत्यय) = मनुष्यता ।

स्पष्ट है कि ‘प्रत्यय' धातु (क्रिया) या अन्य (संज्ञा, विशेषण आदि) शब्दों में जुड़ते हैं और फिर नए-नए शब्दों की रचना करते हैं । उपसर्ग और प्रत्यय में यही अंतर है कि जहाँ उपसर्ग शब्द के शुरू में जुड़ते हैं, वहीं प्रत्यय शब्द के अंत में ।

प्रत्यय के भेद

प्रत्यय दो प्रकार के होते हैं—
(1) कृत् प्रत्यय (Agentive)
(2) तद्धित प्रत्यय (Nominal)

1. कृत् प्रत्यय— धातु में जुड़नेवाले प्रत्यय को 'कृत् प्रत्यय' कहते हैं और इनसे बने शब्द को 'कृदंत', जैसे—
लड़ + आका (कृत् प्रत्यय) = लड़ाका (कृदंत)
कृत् प्रत्यय के जुड़ने से संज्ञा या विशेषण शब्दों की रचना होती है। 

सरलता से समझने के लिए कृत् प्रत्ययों को चार भागों में बाँटा जा सकता है—
(i) कर्तृवाचक, (ii) कर्मवाचक, (iii) करणवाचक और (iv) भाववाचक ।

(i) कर्तृवाचक कृत् प्रत्यय जिन प्रत्ययों के जुड़ने से बननेवाले शब्द क्रिया के करनेवाले कर्ता का बोध कराते हैं उन्हें कर्तृवाचक कृत् प्रत्यय कहते हैं। ये प्रत्यय हैं—

अंकू, अ, अक, अक्कड़, आऊ, आक, आका, आकू, आड़ी, आलू, इयल, इया, उक, ऊ, एरा, ओड़, ओड़ा, ओर, टा, ता, न, लू, वाला, वैया, हार आदि, जैसे—

धातु         प्रत्यय         शब्द (कृदंत)         क्रिया का कर्ता 
उड़          अंकू            उड़कू                   जो उड़ता है 
भूल          अक्कड़        भुलक्कड़              जो भूलता है 
खा           आऊ           खाऊ                    जो खाता है

स्पष्ट है कि अंकू, अक्कड़, आऊ आदि प्रत्ययों के धातु में जुड़ने से जो शब्द बने हैं, उनका अर्थ है— क्रिया को करनेवाला । इसलिए ऐसे प्रत्ययों को कर्तृवाचक कृत् प्रत्यय कहते हैं ।

(ii) कर्मवाचक कृत् प्रत्यय— जिन प्रत्ययों के जुड़ने से बननेवाले शब्द क्रिया के कर्म का बोध कराते हैं उन्हें कर्मवाचक कृत् प्रत्यय कहते हैं। ये प्रत्यय हैं—
अनीय, औना, ण्यत्, तव्य, त्र, ना, नी, य आदि, जैसे—

धातु          प्रत्यय         शब्द (कृदंत)         क्रिया का कर्म
स्मृ            अनीय         स्मरणीय                जिसे स्मरण किया जाए
खेल           औना          खिलौना                जिसे खेला जाए
कृ              तव्य           कर्तव्य                  जिसे किया जाए

स्पष्ट है कि अनीय, औना, तव्य आदि प्रत्ययों के धातु में जुड़ने से जो शब्द बने हैं— वे 'कर्म' के रूप में प्रयुक्त हुए हैं । अतः ऐसे प्रत्यय कर्मवाचक कृत् प्रत्यय कहलाते हैं।

(iii) करणवाचक कृत् प्रत्यय— जिन प्रत्ययों के जुड़ने से बननेवाले शब्द क्रिया के साधन (करण) का बोध कराते हैं उन्हें करणवाचक कृत् प्रत्यय कहते हैं। ये प्रत्यय हैं—
अन, आ, आनी, औटी, इत्र, ई, ऊ, न, ना, नी आदि, जैसे—

धातु          प्रत्यय         शब्द (कृदंत)         क्रिया का साधन
चर्             अन             चरण                   जिससे चला जाए 
झाड़                         झाडू                    जिससे झाड़ा जाए 
बेल                            बेलन                   जिससे बेला जाए

स्पष्ट है कि अन, ऊ, न आदि प्रत्ययों के धातु में जुड़ने से जो शब्द बने हैं—वे 'करण' के रूप में प्रयुक्त हुए हैं । अतः ऐसे प्रत्यय करणवाचक कृत् प्रत्यय कहलाते हैं ।

(iv) भाववाचक कृत् प्रत्यय— जिन प्रत्ययों के जुड़ने से भाववाचक संज्ञाएँ बनती हैं उन्हें भाववाचक कृत् प्रत्यय कहते हैं । ये प्रत्यय हैं
अंत, अ, आ, आई, आन, आप, आपा, आव, आवट, आवा, आहट, औता, औती, औनी, औवल, ई, क, त, ति, ती, न, नी आदि।

धातु          प्रत्यय         शब्द (कृदंत)        क्रिया की प्रक्रिया/भाव
पूज           आपा            पुजापा                पूजने की क्रिया/भाव
हँस                            हँसी                    हँसने की क्रिया/भाव
छाँट           नी               छँटनी                  छाँटने की क्रिया/भाव

स्पष्ट है कि आपा, ई, नी आदि प्रत्ययों के जुड़ने से जो शब्द बने हैं— उनसे क्रिया की प्रक्रिया या भाव व्यक्त होते हैं । दूसरे शब्दों में, इन प्रत्ययों से भाववाचक संज्ञाएँ बनती हैं 

2. तद्धित प्रत्यय— धातुओं को छोड़कर दूसरे शब्दों (संज्ञा, विशेषण आदि) में जुड़नेवाले प्रत्ययों को 'तद्धित प्रत्यय' एवं उनसे बननेवाले शब्दों को ‘तद्धितांत' कहा जाता है, जैसे—
पटना (संज्ञा) + इया (तद्धित प्रत्यय) = पटनिया (विशेषण) — तद्धितांत | 
लघु (विशेषण) + अ (तद्धित प्रत्यय) = लाघव (संज्ञा) — तद्धितांत । 
पीछे (अव्यय) + ला (तद्धित प्रत्यय) = पिछला (विशेषण) — तद्धितांत । 

स्पष्ट है कि तद्धित प्रत्यय—संज्ञा, विशेषण आदि शब्दों में लगते हैं और प्रायः संज्ञा या विशेषण बनाते हैं । दूसरी बात, कृत् प्रत्यय और तद्धित प्रत्यय में यही अंतर है कि जहाँ कृत् प्रत्यय सिर्फ धातुओं में लगते हैं, वहीं तद्धित प्रत्यय धातुओं को छोड़कर संज्ञा, विशेषण आदि शब्दों में लगते हैं।

तद्धित प्रत्यय के भेद

सभी तद्धित प्रत्ययों को चार भागों में बाँटा जा सकता है—
(i) संज्ञा से संज्ञा बनानेवाले तद्धित प्रत्यय 
(ii) विशेषण से संज्ञा बनानेवाले तद्धित प्रत्यय 
(iii) संज्ञा से विशेषण बनानेवाले तद्धित प्रत्यय 
(iv) क्रियाविशेषण से विशेषण बनानेवाले तद्धित प्रत्यय

(i) संज्ञा से संज्ञा बनानेवाले तद्धित प्रत्यय भी चार प्रकार के होते हैं—
(क) लघुतावाचक, (ख) भाववाचक, (ग) पेशा या जातिवाचक और (घ) संबंधवाचक या अपत्यवाचक |

(क) लघुतावाचक तद्धित प्रत्यय— इनसे छोटेपन या प्यार-दुलार का बोध होता है। ये प्रत्यय हैं—इया, ई, ड़ा, री आदि, जैसे— 

शब्द (संज्ञा)        प्रत्यय         तद्धितांत रूप (संज्ञा)
घंटा, रस्सा            ई             घंटी, रस्सी 
कोठा, छाता         री             कोठरी, छतरी

(ख) भाववाचक तद्धित प्रत्यय— इनसे भाववाचक संज्ञाएँ बनती हैं। ये प्रत्यय हैं—आई, इमा, ई, त, ता, त्व, पन, पा, स आदि, जैसे— 

शब्द (संज्ञा)        प्रत्यय         तद्धितांत रूप (संज्ञा)
खेत, दुश्मन                          खेती, दुश्मनी 
बच्चा, लड़का        पन              बचपन, लड़कपन

(ग) पेशा या जातिवाचक तद्धित प्रत्यय— इससे जीविका चलानेवाले का बोध होता है । ये प्रत्यय हैं—आर, एरा, क, कार, गर, दार, वाला, वान, हारा आदि, जैसे—

शब्द (संज्ञा)        प्रत्यय         तद्धितांत रूप (संज्ञा)
लिपि, लेख                          लिपिक, लेखक
जादू, सौदा            गर             जादूगर, सौदागर

(घ) संबंधवाचक या अपत्यवाचक तद्धित प्रत्यय— इन प्रत्ययों से बने शब्द संतान (अपत्य) के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं । वैदिक युग में ऐसे शब्दों का बहुत प्रचलन था, लेकिन ऐसे शब्द अब नहीं बन रहे हैं। ये प्रत्यय हैं—अ, इ, ए, य आदि, जैसे—

शब्द (संज्ञा)        प्रत्यय         तद्धितांत रूप (संज्ञा)
वसुदेव                              वासुदेव (वसुदेव की संतान) 
कुन्ती                  एय             कौन्तेय (कुन्ती की संतान)

कुछ और शब्द हैं, रघु — राघव, पाण्डु– पाण्डव; पृथा— पार्थ; सुमित्रा— सौमित्र; विनता—वैनतेय आदि।

(ii) विशेषण से संज्ञा बनानेवाले कुछ प्रत्यय ऐसे हैं, जो विशेषण शब्दों में लगकर भाववाचक संज्ञाएँ बनाते हैं । ऐसे भाववाचक प्रत्यय हैं— आई, आस, आहट, ई, ता, त्व, पन, पा आदि ।

शब्द (विशेषण)        प्रत्यय         तद्धितांत रूप (संज्ञा)
अच्छा, बुरा              आई             अच्छाई, बुराई
खुश, गरीब                               खुशी, गरीबी

(iii) संज्ञा से विशेषण बनानेवाले प्रत्यय चार प्रकार के होते हैं— 
(क) गुणवाचक, (ख) स्थानवाचक, (ग) रिश्ताबोधक और (घ) संबंधवाचक ।

(क) गुणवाचक तद्धित प्रत्यय— इनसे गुण, धर्म आदि बोध करानेवाले शब्द बनते हैं। ये प्रत्यय हैं—आ, ई, ईन, ईला आदि, जैसे— 

शब्द (संज्ञा)         प्रत्यय         तद्धितांत रूप (विशेषण)
नमक, शौक         ईन              नमकीन, शौकीन
काँटा, गाँठ           ईला             कँटीला, गठीला

(ख) स्थानवाचक तद्धित प्रत्यय— इन प्रत्ययों के लगने से स्थान से सम्बद्ध व्यक्ति या वस्तु का बोध होता है । ये प्रत्यय हैं—इया, ई, ऊ, एलू आदि, जैसे— 

शब्द (संज्ञा)                प्रत्यय        तद्धितांत रूप (विशेषण) 
कलकत्ता, पटना            इया           कलकतिया, पटनिया
लखनऊ, जापान                          लखनवी, जापानी

(ग) रिश्ताबोधक तद्धित प्रत्यय— इन प्रत्ययों के लगने से किसी-न-किसी रिश्ते का बोध होता है, जैसे—

शब्द (संज्ञा)        प्रत्यय            तद्धितांत रूप (विशेषण)
मामा                  एरा                ममेरा (मामा से उत्पन्न)
फूफा                  एरा                फुफेरा (फूफा से उत्पन्न)

(घ) संबंधवाचक तद्धित प्रत्यय— इन प्रत्ययों के लगने से व्यक्ति या वस्तु से संबंधित कुछ-न-कुछ संबंध ज्ञात होता है। ये प्रत्यय हैं—अ, आना, इक आदि।

शब्द (संज्ञा)        प्रत्यय            तद्धितांत रूप (विशेषण)
साल, मर्द            आना              सालाना, मर्दाना
धर्म, नीति            इक                धार्मिक, नैतिक

(iv) कुछ प्रत्यय क्रियाविशेषण में लगकर विशेषण भी बनाते हैं, जैसे— 

शब्द (क्रियाविशेषण)       प्रत्यय           तद्धितांत रूप (विशेषण) 
आगे, पीछे, नीचे               ला             अगला, पिछला, निचला

अभ्यास

1. उपसर्ग और प्रत्यय में क्या अंतर है ? इन्हें उदाहरण द्वारा स्पष्ट करें । 

2. कृत् प्रत्यय और तद्धित प्रत्यय में क्या अंतर है ? इन्हें सोदाहरण स्पष्ट करें । 

3. 'ता' प्रत्यय से पाँच शब्द बनाएँ ।

4. इन शब्दों को कृत् प्रत्यय हटाकर लिखें—
बिकाऊ, उड़ंकू, मिलावट, स्मरणीय, चरण, पुजापा

5. दिए गए शब्दों को तद्धित प्रत्यय हटाकर लिखें—
उपजाऊ, कोठरी, राष्ट्रीयता, बचपन, लिपिक, बुराई, गठीला।

6. इनसे संज्ञा-शब्दों की रचना करें—
उड़ना, कमाना, खेलना, छींकना, जमना, तोड़ना, देखना, सींचना, लिखना, अच्छा, आवश्यक, कठोर, गरम, चतुर, पागल, मधुर, राष्ट्रीय, सुंदर । 

7. इनसे विशेषण - शब्दों की रचना करें—
खेलना, गाना, अड़ना, पीना, घटना, सड़ना, हँसना, लड़ना, तैरना, अंग, अंक, उदय, कागज, इच्छा, खंडन, घाव, तालु, नमक, बर्फ ।

8. 'पाठिका' शब्द में कौन-सा प्रत्यय लगा हुआ है ? 
(i) आ 
(ii) का
(iii) ईका 
(iv) इका

9. ‘लचकीला' में प्रयुक्त प्रत्यय है
(i) लच
(ii) ला
(iii) कीला
(iv) ईला

संधि

संधि— दो अक्षरों के आपस में मिलने से उनके रूप और उच्चारण में जो परिवर्तन होता है उसे संधि कहते हैं, जैसे—
गण + ईश = गणेश — (अ + ई = ए) 

यहाँ ‘गण’ शब्द का 'अ' (अंतिम स्वर) एवं 'ईश' शब्द का 'ई' (पहला स्वर) दोनों स्वरों के मिलने से 'ए' स्वर की उत्पत्ति हुई, जिससे 'गणेश' शब्द बना। यह नया शब्द (गणेश) 'गण' और 'ईश' के उच्चारण एवं रूप से भिन्न है । यह भिन्नता या परिवर्तन संधि के कारण है।

जिन अक्षरों के बीच संधि हुई है यदि उन्हें संधि के पहलेवाले रूप में अलग-अलग करके रखा जाए, तो उसे 'संधि-विच्छेद' कहा जाएगा, जैसे—

संधि        विच्छेद-संधि
गणेश = गण + ईश
दिगम्बर = दिक् + अम्बर

संधि-भेद

संधि तीन प्रकार की होती है
(1) स्वर-संधि, (2) व्यंजन संधि और ( 3 ) विसर्ग संधि ।

स्वर-संधि

1. स्वर-संधि— दो स्वरों के आपस में मिलने से जो रूप-परिवर्तन होता है उसे स्वर-संधि कहते हैं, जैसे—
भाव + अर्थ = भावार्थ ।

यहाँ ‘भाव’ शब्द का अंतिम स्वर ‘अ’ (व = व् + अ) एवं ‘अर्थ’ शब्द का पहला स्वर ‘अ', दोनों स्वरों के मिलने (अ + अ) से 'आ' स्वर की उत्पत्ति हुई, जिससे 'भावार्थ' शब्द का निर्माण हुआ । स्वरों के ऐसे मेल को स्वर-संधि कहते हैं।

स्वर-संधि के भेद

स्वर-संधि के पाँच भेद
(i) दीर्घ-संधि, (ii) गुण-संधि, (iii) वृद्धि संधि, (iv) यण्-संधि और (v) अयादि-संधि ।

(i) दीर्घ- संधि— ह्रस्व स्वर ( अ, इ, उ) या दीर्घ स्वर (आ, ई, ऊ) के आपस में मिलने से यदि सवर्ण या उसी जाति के दीर्घ स्वर (आ, ई, ऊ) की उत्पत्ति हो, तो उसे दीर्घ-संधि कहेंगे, जैसे—

(क) अ + अ = आ — भाव + अर्थ = भावार्थ
अ + आ = आ — पुस्तक + आलय = पुस्तकालय
आ + आ = आ — परीक्षा + अर्थी = परीक्षार्थी
आ + अ = आ — प्रतीक्षा + आलय = प्रतीक्षालय

(ख) इ + इ = ई — कवि + इन्द्र = कवीन्द्र 
इ + ई = ई — गिरि + ईश = गिरीश
ई + इ = ई — मही + इन्द्र = महीन्द्र
ई + ई = ई — नदी + ईश = नदीश

(ग) उ + उ = ऊ — भानु + उदय = भानूदय
उ + ऊ = ऊ — अंबु + ऊर्मि = अंबूर्मि 
ऊ + उ = ऊ — वधू + उत्सव = वधूत्सव
ऊ + ऊ = ऊ — भू + ऊर्जा = भूर्जा

(ii) गुण-संधि— यदि 'अ' या 'आ' के बाद इ/ई, उ/ऊ अथवा ऋ स्वर आता है, तो दोनों के मिलने से क्रमशः 'ए', 'ओ' तथा ‘अर्’ हो जाते हैं। इसी को गुण-संधि कहते हैं, जैसे—

(क) अ + इ = ए — देव + इन्द्र = देवेन्द्र
अ + ई = ए — गण + ईश = गणेश
आ + इ = ए — यथा + इष्ट = यथेष्ट
आ + ई = ए — महा + ईश = महेश

(ख) आ + उ = ओ — ज्ञान + उदय = ज्ञानोदय
अ + ऊ = ओ — शीत + ऊष्म = शीतोष्म
आ + उ = ओ — महा + उत्सव = महोत्सव
आ + ऊ = ओ — गंगा + ऊर्मि = गंगोर्मि

(ग) अ + ऋ = अर् — सप्त + ऋषि = सप्तर्षि
आ + ऋ = अर् — महा + ऋषि = महर्षि

(iii) वृद्धि-संधि— यदि 'अ/आ' के बाद 'ए/ऐ' हो, तो 'ऐ' में और 'अ/ आ’ के बाद ‘ओ/औ' हो, तो 'औ' में बदलना वृद्धि-संधि कहलाती है, जैसे—

(क) अ + ए = ऐ — एक + एक = एकैक
आ + ए = ऐ — तथा + एव = तथैव

(ख) अ + ओ = औ — वन + ओषधि = वनौषधि
आ + ओ = औ — महा + ओषध = महौषध

(iv) यण्-संधि— यदि 'इ, ई, उ, ऊ' या 'ऋ' के बाद कोई भिन्न स्वर आए तो, 'इ/ई' का—' ‘य्’; ‘उ/ऊ' का— 'व्' और 'ऋ' का— 'र्' हो जाना यण्-संधि कहलाती है, जैसे— 

(क) इ + अ = य — यदि + अपि = यद्यपि 
इ + आ = या — इति + आदि = इत्यादि
ई + आ = या — नदी + आगम = नयागम 
इ + उ = यु उपरि + उक्त = उपर्युक्त
इ + ऊ = यू — वि + ऊह = व्यूह
इ + ए = ये — प्रति + एक = प्रत्येक

(ख) उ + अ = व — अनु + अय = अन्वय
उ + आ = वा — सु + आगत = स्वागत
उ + ए = वे — अनु + एषण = अन्वेषण
उ + इ = वि — अनु + इति = अन्विति

(ग) ऋ + आ = रा — पितृ + आदेश = पित्रादेश 

(v) अयादि-संधि— 'ए, ऐ, ओ' तथा 'औ' के बाद यदि कोई भिन्न स्वर आए, तो 'ए' का—‘अय्’, ‘ऐ' का—' -'आय्', 'ओ' का— ‘अव्’ तथा 'औ' का—'आव्’ हो जाना अयादि-संधि कहलाती है, जैसे— 

(क) ए + अ = अय — ने + अन = नयन
ऐ + अ = आय — गै + अक = गायक
ऐ + इ = आयि — नै + इका = नायिका

(ख) ओ + अ = अव — पो + अन = पवन 
ओ + इ = अवि — पो + इत्र = पवित्र

(ग) औ + अ = आव — पौ + अक = पावक
औ + इ = आवि — नौ + इक = नाविक

व्यंजन संधि

2. व्यंजन-संधि— यदि व्यंजन वर्ण के साथ व्यंजन वर्ण या स्वर वर्ण की संधि से व्यंजन में कोई विकार उत्पन्न हो, तो वह व्यंजन संधि कहलाती है, जैसे—
सत् + गति = सद्गति       [ व्यंजन वर्ण (त्) + व्यंजन वर्ण (ग)] 
वाक् + ईश = वागीश     [ व्यंजन वर्ण (क्) + स्वर वर्ण (ई)]

व्यंजन-संधि में अक्षरों के परिवर्तन इस प्रकार होते हैं—

(i) यदि क्, च्, ट्, त्, प् व्यंजन के बाद कोई स्वर हो या किसी वर्ग का तीसरा (ग, ज, ड, द, ब) या चौथा वर्ण (घ, झ, ढ, ध, भ) हो अथवा य, र, ल, व वर्णों में कोई एक हो, तो 'क्' का — ग्, 'च्’ का—ज्, ‘ट्’ का—ड्, 'त्' का—द् एवं 'प्' का —ब् हो जाता है । अर्थात्, तीसरा वर्ण आता है, जैसे

दिक् + अम्बर = दिगम्बर — (क् का—ग्) तीसरा
दिक् + गज = दिग्गज — (क् का—ग्) तीसरा
अच् + अन्त = अजन्त — (च् का—ज्) तीसरा
जगत् + आनंद = जगदानंद — (त् का—द्) तीसरा
षट् + दर्शन = षड्दर्शन — (ट् का—ड्) — तीसरा
सत् + बुद्धि = सद्बुद्धि — (त् का—द्) — तीसरा
अप् + ज = अब्ज — (प् का—ब्) — तीसरा

(ii) यदि क्, च्, ट्, त्, प् के बाद 'न' या 'म' आए, तो पहले वर्ण के स्थान पर उसी वर्ग का पंचमाक्षर शुद्ध रूप (ङ्, ञ्, ण्, न्, म्) में आता है, जैसे—

वाक् + मय = वाङ्मय — ('क्' के स्थान पर—'ङ्')
षट् + मास = षण्मास — ('ट्' के स्थान पर — 'ण्’')
जगत् + नाथ = जगन्नाथ — ('त्' के स्थान पर — 'न्')
अप् + मय = अम्मय — ('प्' के स्थान पर — 'म्')

(iii)यदि ‘त्’ या 'द्' के बाद कोई भी व्यंजन अक्षर (च, ज, ट, ड, द, न, ल) आए, तो उस आनेवाले व्यंजन के साथ वही व्यंजन उसमें हल् (शुद्ध व्यंजन) के रूप में एक और जुड़ जाता है तथा 'त्' या 'द्’ लुप्त हो जाता है, जैसे—

उत् + चारण = उच्चारण  ('च' के कारण एक और 'च्' जुड़ा)
शरद् + चन्द्र = शरच्चन्द्र — ('च' के कारण एक और 'च्' जुड़ा)
सत् + जन = सज्जन — ('ज' के कारण एक और 'ज्' जुड़ा)
विपद् + जाल = विपज्जाल — (‘ज' के कारण एक और 'ज्' जुड़ा)
तत् + टीका = तट्टीका — ('ट' के कारण एक और 'ट्' जुड़ा)
उत् + डयन =  उड्डयन — ('ड' के कारण एक और 'ड्' जुड़ा)
उत् + दाम = उद्दाम — ('द' के कारण एक और 'द्' जुड़ा)
जगत् + नाथ  = जगन्नाथ — (‘न' के कारण एक और 'न्' जुड़ा)
उत् + लास = उल्लास — ('ल' के कारण एक और 'ल्' जुड़ा) 

(iv)यदि ‘त्’ या 'द्' के बाद 'श्' हो, तो 'त्' या 'द्' का 'च्' और ‘श्' का— 'छ्' हो जाता है, जैसे—

उत् + शिष्ट = उच्छिष्ट — (‘त्’ का च्' और 'शि' का 'छि)
सत् + शास्त्र = सच्छास्त्र — (‘त्' का 'च्' और 'शा' का 'छा’) 

(v) यदि ‘त्’ या 'द्' के बाद 'ह' या 'घ्' हो, तो 'त्' या 'द्' के स्थान पर -'द्' और 'ह' के स्थान पर — 'ध्' हो जाता है। लेकिन 'घ्' का— 'घ्' ही रह जाता है, जैसे— 

उद् + हरण = उद्धरण — ('द्' का 'द्' और 'ह्' का ध्)
तत् + हित = तद्धित — (‘त्’ का ‘द्' और 'हि' का 'धि')
उत् + घाटन = उद्घाटन — (लेकिन, 'घ्' का 'घ्' ही रह गया) 

(vi) लेकिन, ‘त्/द्' के बाद यदि 'झ' हो, तो 'त्/द्' का— ‘ज्’ हो जाता है, जैसे—
उद् + झटिका = उज्झटिका — ('द्' का— 'ज्)

(vii) यदि ह्रस्व स्वर के बाद 'छ' आए, तो 'छ' 'च्छ' में बदल जाता है, जैसे—

छत्र + छाया = छत्रच्छाया — (अ + छा = अच्छा)
परि + छेद = परिच्छेद — (इ + छे = इच्छे)

(viii) यदि ‘ष्’ के बाद 'त' या 'थ' आए, तो 'त' का— 'ट' तथा 'थ' का— 'ठ' हो जाता है, जैसे— 

उत्कृष् + त = उत्कृष्ट — ('त' का 'ट’)
पृष् + थ = पृष्ठ — ('थ' का 'ठ')

(ix) यदि 'म्' के बाद अन्तःस्थ व्यंजन (य, र, ल, व) या ऊष्म व्यंजन (श, ष, स, ह) आए, तो 'म्' अनुस्वार ( ं) में बदल जाता है, जैसे—

सम् + योग = संयोग 
सम् + रक्षण = संरक्षण 
सम् + लाप = संलाप
सम् + शय = संशय 
सम् + सार = संसार  
सम् + हार = संहार  

नोट :
(क) यदि ‘म्’ के बाद कोई स्पर्श व्यंजन आए, तो 'म्' के बदले उसी वर्ग का पंचमाक्षर लिखा जा सकता है, जैसे—
सम् + कल्प = संकल्प/सङ्कल्प/सङ्कल्प
सम् + चय = संचय/सञ्चय/सञ्चय

(ख) यदि 'म्' के बाद 'म' हो, तो अनुस्वार न देकर द्वित्व का प्रयोग करें, जैसे
सम् + मति = सम्मति  ('संमति' लिखना गलत है ।)
सम् + मान = सम्मान  ('संमान' लिखना गलत है।)

विसर्ग-संधि

3. विसर्ग-संधि— विसर्ग के साथ स्वर अथवा व्यंजन की संधि, विसर्गसंधि कहलाती है, जैसे—

दुः + आत्मा = दुरात्मा — विसर्ग के साथ स्वर (: + आ)
दुः + गन्ध = दुर्गन्ध — विसर्ग के साथ व्यंजन (: + ग)

विसर्ग संधि के निम्नलिखित नियम हैं

(i) विसर्ग के पहले कोई स्वर ('अ' या 'आ' को छोड़कर) आए और विसर्ग के बाद कोई स्वर रहे अथवा वर्ग के तीसरे, चौथे, पाँचवें वर्ण अथवा ‘य, र, ल, व, ह' में से कोई हो, तो विसर्ग— 'र्' में बदल जाता है, जैसे

(क) निः + अर्थक = निरर्थक — (निः = न् + इ + :) 
दुः + आत्मा = दुरात्मा — (दुः = द् + उ + :)

(ख) निः + धन = निर्धन — (निः = निर्)
आशी: + वाद = आशीर्वाद — (शीः = शीर्)

(ग) विसर्ग के पहले 'अ' हो और उसके बाद यदि कोई स्वर हो, तो भी विसर्ग का 'र्' हो जाता है, जैसे—
पुनः + अवलोकन = पुनरावलोकन । पुनः + इच्छा = पुनरिच्छा ।

(ii) यदि विसर्ग के पहले ‘इ' या 'उ' हो, तो 'क', 'ख', 'प' या 'फ' के रहने पर विसर्ग का 'ष् ' हो जाता है, जैसे— 
दुः + कर्म = दुष्कर्म 
दुः + प्रकृति = दुष्प्रकृति 
निः + कपट = निष्कपट
निः + फल = निष्फल 

लेकिन, ‘दुः' के बाद 'ख' हो, तो विसर्ग ज्यों-का-त्यों रहता है, जैसे—
दुः + ख = दुःख

किंतु, 'अ' अथवा 'आ' के बाद विसर्ग हो और उसके बाद 'क, ख, प, फ´ आए, तो विसर्ग ज्यों-का-त्यों रह जाता है, जैसे
पयः + पान = पयः पान 
प्रातः + कमल = प्रातः कमल

(iii) यदि विसर्ग के पहले 'अ' हो और बाद में 'अ', वर्गीय व्यंजन के तीसरे, चौथे, पाँचवें अथवा 'य, र, ल, व, ह' में से कोई एक हो, तो विसर्ग—‘ओ' में बदल जाता है, जैसे— 
मनः + अनुकूल = मनोनुकूल 
अधः + गति = अधोगति 
पयः + धारा = पयोधारा 
मनः + चिकित्सक = मनोचिकित्सक 
मनः + योग = मनोयोग 
वयः + वृद्ध = वयोवृद्ध

(iv) विसर्ग के बाद 'च' या 'छ' हो तो विसर्ग— 'श्' में, 'ट' या 'ठ' हो, तो विसर्ग— 'ष् ' में और 'त' या 'थ' हो तो विसर्ग — 'स्' में बदल जाता है, जैसे
निः + चय = निश्चय — (: + च = श्च) 
निः + छल = निश्छल — (: + छ = श्छ) 
निः + ठुर = निष्ठुर — (: + ठु - ष्ठु) 
निः : + तार = : निस्तार — (: + ता = स्ता)

(v) विसर्ग के बाद 'श्', 'ष्' या 'स्' हो, तो विसर्ग ज्यों-का-त्यों रह जाता है अथवा उसके स्थान पर विसर्ग के आगेवाला वर्ण एक और हल् रूप में आ जाता है, जैसे
दुः + शासन = दुःशासन अथवा दुश्शासन
निः + संतान = निःसंतान अथवा निस्संतान

(vi) यदि 'अ' अथवा 'आ' के बाद विसर्ग हो और उसके बाद 'क, ख' अथवा 'प, फ’ आए, तो विसर्ग ज्यों-का-त्यों रह जाता है या कुछ शब्दों में यह विसर्ग 'स्' बन जाता है, जैसे—
रजः + कण = रजःकण
पयः + पान = पयःपान
पुरः + कार = पुरस्कार
भाः + पति = भास्पति

(vii) यदि रेफ (र्) के बाद 'र' हो, तो 'र्' लोप हो जाता है और उसके पूर्व का ह्रस्व — दीर्घ में बदल जाता है, जैसे— 
निर् + रस = नीरस 
निर् + रज = नीरज 
निर् + रोग = नीरोग 
निर् + रुज = नीरुज 

नोट — निर् में निहित 'र्' के बदले आप विसर्ग भी दे सकते हैं, जैसे— 
निः + रस = नीरस 
निः + रोग = नीरोग 

संधि - शब्दों की सूची

अंतःपुर = अंतः + पुर 
अजन्त = अच् + अन्त 
अतएव = तः + एव 
अत्यंत = अति + अंत 
अत्यधिक = अति + अधिक 
अत्याचार = अति + आचार 
अत्युत्तम = अति + उत्तम 
अधोगति = : + गति 
अन्यान्य = अन्य + अन्य 
अन्याय = अनि + आय 
अन्वय = अनु + अय 
अन्वेषण = अनु + एषण 
अभ्युदय = अभि + उदय
अभ्यागत =  अभि + आगत
अहंकार = अहम् + कार
आकृष्ट = आकृष् + त 
आविष्कार = आविः + कार
आशीर्वाद = आशीः + वाद   
इत्यादि = इति + आदि
उच्चारण = उत् + चारण
उज्ज्वल = उत् + ज्वल
उड्डयन = उत् + डयन
उदय = उत् + अय
उद्गम = उत् + गम
उद्गार = उत् + गार
उद्दंड = उत् + दंड
उद्धत = उत् + हत
उद्भव = उत् + भव
उद्विग्न = उत् + विग्न
उन्नति = उत् + नति
उन्मत्त = उत् + मत्त
उन्मुख = उत् + मुख
उपेक्षा = उप + इच्छा 
उमेश = उमा + ईश
उल्लेख = उत् + लेख 
किन्नर = किम् + नर
खगेन्द्र = खग + इन्द्र
गंगोर्मि = गंगा + ऊर्मि
गजानन = गज + आनन
गजेन्द्र = गज + इन्द्र
गजेश = गज + ईश
गायक = गै + अक
गायन = गै + अन
गायिका = गै + इका
गिरीश = गिरि + ईश
चन्द्राकार = चन्द्र + आकार 
चन्द्रोदय = चन्द्र + उदय
चिन्मय = चित् + मय
छात्रावास = छात्र + आवास
जगदानन्द = जगत् + आनन्द
जगन्नाथ = जगत् + नाथ
जन्मांतर = जन्म + अंतर
जन्मोत्सव = जन्म + उत्सव
जलाशय = जल + आशय
तट्टीका = तत् + टीका
तथापि = तथा + अपि
तथैव = तथा + एव
तद्धित = तत् + हित
तन्मय = तत् + मय
तपोवन = तपः + वन
तल्लीन = तत् + लीन
दावानल = दाव + अनल
दिगम्बर = दिक् + अम्बर
दिग्भ्रम = दिक् + भ्रम
दिव्यास्त्र = दिव्य + अस्त्र
दीक्षांत = दीक्षा + अंत
दीपावली = दीप + अवली
दीपोत्सव = दीप + उत्सव
दुर्जन = दु: + जन
दुश्शासन = दुः + शासन
दुष्कर = दुः + कर
देवर्षि = देव + ऋषि
देवालय = देव + आलय
देवेश देव + ईश
देशांतर = देश + अंतर
धर्माचार्य धर्म + आचार्य
धर्मात्मा = धर्म + आत्मा
धर्माधर्म = धर्म + अधर्म
धर्मान्ध धर्म + अन्ध
धर्मावतार = धर्म + अवतार
धर्मोपदेश = धर्म + उपदेश
नगेन्द्र = नग + इन्द्र.
नदीश = नदी + ईश
नमस्कार = नमः + कार
नमस्ते = नमः + ते
नयन = ने + अन
नरेन्द्र = नर + इन्द्र
नागेन्द्र = नाग + इन्द्र
नायक = नै + अक
नारायण = नार + अयन
नारीश्वर = नारी + ईश्वर
नाविक = नौ + इक
निरंतर = निः + अन्तर
निरक्षर = निः + अक्षर 
निरर्थक = निः + अर्थक 
निरहंकार = निर् + अहंकार 
निराहार = निः + आहार
निरुपाय = निः + उपाय
निर्जल = निः + जल
निर्धन = निः + धन
निर्भर = निः + भर
निश्चय = निः + चय
निश्छल = निः + छल
निष्कपट = निः + कपट 
निष्काम = निः + काम
निष्पाप = निः + पाप
निस्तार = निः + तार
निस्सहाय = निः + सहाय
नीरोग = निः + रोग
नीरस = निः + रस
नीलांबर = नील + अम्बर
न्यायाधीश = न्याय + अधीश
न्यायालय = न्याय + आलय
पंचानन = पंच + आनंन 
पंचामृत = पंच + अमृत
पतनोन्मुख = पतन + उन्मुख
पत्राचार = पत्र + आचार
पदाधिकारी = पद + अधिकारी
पदार्पण = पद + अर्पण
पदोन्नति = पद + उन्नति
पद्मासन = पद्म + आसन
पयः पान = पयः + पान
परंतु = परम् + तु
परमानंद = परम + आनंद
परमार्थ = परम + अर्थ
पराधीन = पर + अधीन
परार्थ = पर + अर्थ
परिणाम = परि + नाम
परिष्कार = परिः + कार
परीक्षा = परि + ईक्षा
परोपकार = पर + उपकार
पवन = पो + अन
पवित्र = पो + इत्र
पितृण = पितृ + ऋण
पित्राज्ञा = पितृ + आज्ञा
पीताम्बर = पीत + अम्बर
पुण्यात्मा = पुण्य + आत्मा
पुनरुक्ति = पुनः + उक्ति
पुनर्जन्म = पुनः + जन्म
पुरस्कार = पुरः + कार
पुरुषोत्तम = पुरुष + उत्तम
पुरोहित = पुरः + हित
प्रत्यक्ष = प्रति + अक्ष
प्रत्यय = प्रति + अय
प्रत्युत्तर = प्रति + उत्तर
प्रत्येक = प्रति + एक
प्रमाण = प्र + मान
प्राणाधार = प्राण + आधार
प्रातः काल = प्रातः + काल
पृष्ट = पृष् + त
पृष्ठ = पृष् + थ
प्रोत्साहन = प्र + उत्साहन
फलोदय = फल + उदय
ब्रह्मास्त्र = ब्रहम् + अस्त्र
भवन = भो + अन
भावावेश = भाव + आवेश
भावुक = भौ + उक
भास्कर = भाः + कर
भुजेन्द्र = भुज + इन्द्र
भूषण = भूष् + अन
भोजनालय = भोजन + आलय
मतानुसार = मत + अनुसार
मतैक्य = मत + ऐक्य
मदांध = मद + अंध
मदोन्मत्त = मद + उन्मत्त
मनोज = मनः + ज
मनोनुकूल = मनः + अनुकूल 
मनोबल = मनः + बल
मनोरथ = मनः + रथ
मनोविकार = मनः + विकार
मरणासन्न = मरण + आसन्न 
महर्षि = महा + ऋषि
महात्मा = महा + आत्मा
महाशय = महा + आशय 
महीन्द्र = मही + इन्द्र
महेन्द्र = महा + इन्द्र
महोत्सव = महा + उत्सव
महौषध = महा + ओषध
मातृण = मातृ + ऋण
मुनीन्द्र = मुनि + इन्द्र
मृण्मय = मृत् + मय
यथेष्ट = यथा + इष्ट
यथोचित = यथा + उचित
यद्यपि = यदि + अपि
यशोदा = यशः + दा
यशोधरा = यशः + धरा
युधिष्ठिर = युधि + स्थिर
योगेन्द्र = योग + इन्द्र
रजःकण = रजः + कण
रजनीश = रजनी + ईश
रमेश = रमा + ईश
राघवेन्द्र = राघव + इन्द्र
राजर्षि = राज + ऋषि
रामायण = राम + अयन
रामेश्वर = राम + ईश्वर
रुद्राक्ष = रुद्र + अक्ष
रेखांकित = रेखा + अंकित
लम्बोदर = लम्ब + उदर
लोकाचार = लोक + आचार
वंशानुक्रम = वंश + अनुक्रम
वंशानुगत = वंश + अनुगत
वनोत्सव = वन + उत्सव
वनौषधि = वन + ओषधि
वयोवृद्ध = वयः + वृद्ध
वहिष्कार = वहिः + कार
वाङ्मय = वाक् + मय
वागीश = वाक् + ईश
वाग्जाल = वाक् + जाल
वातानुकूल = वात + अनुकूल
विच्छेद = वि + छेद
विद्यालय = विद्या + आलय
वीरोचित = वीर + उचित
व्याकुल = वि + आकुल
व्यायाम = वि + आयाम
व्युत्पत्ति = वि + उत्पत्ति 
शंकर = शम् + कर 
शरणागत = शरण + आगत 
शस्त्रास्त्र = शस्त्र + अस्त्र
शिष्टाचार = शिष्ट + आचार
शुभारम्भ = शुभ + आरम्भ 
श्वेताम्बर = श्वेत + अम्बर 
षडानन = षट् + आनन 
षड्दर्शन = षट् + दर्शन 
षण्मार्ग = षट् + मार्ग 
षण्मास = षट् + मास 
षष्ठ = षष् + थ 
संकल्प = सम् + कल्प 
संगम = सम् + गम 
संगीत = सम् + गीत 
संतोष = सम् + तोष 
संधि = सम् + धि 
संन्यासी = सम् + न्यासी
संस्करण = सम् + करण
संस्कार = सम् + कार  
संस्कृति = सम् + कृति 
सज्जन = सत् + जन  
सत्याग्रह = सत्य + आग्रह 
सदाचार = सत् + आचार 
सदैव = सदा + एव 
सद्गुरु = सत् + गुरु 
सद्भाव = सत् + भाव 
सन्निहित = सम् + निहित 
सम्राट् = सम् + राट् 
सरोज = सरः + ज 
सरोवर = सरः + वर 
सर्वोत्तम = सर्व + उत्तम 
सर्वोदय = सर्व + उदय 
सावधान = स + अवधान 
सीमांत = सीमा + अंत 
सूर्योदय = सूर्य + उदय 
स्वार्थ = स्व + अर्थ 
हताश = हत + आश 
हितोपदेश = हित + उपदेश
हिमाचल = हिम + अचल   
हिमालय = हिम + आलय
हीनावस्था = हीन + अवस्था

अभ्यास

1. संधि और संधि-विच्छेद को समझाते हुए उदाहरण दें ।

2. संधि के कितने भेद हैं ? उदाहरण के साथ लिखें ।

3. स्वर-संधि की परिभाषा दें। इसके कितने भेद हैं ? प्रत्येक के एक-एक उदाहरण दें ।

4. व्यंजन-संधि से आप क्या समझते हैं ? इसके किन्हीं तीन नियमों को सोदाहरण लिखें ।

5. विसर्ग संधि किसे कहते हैं? इसके किन्हीं दो नियमों को सोदाहरण लिखें ।

6. दिए गए शब्दों का संधि-विच्छेद करें—
हिमालय, कवीन्द्र, भावार्थ, देवेन्द्र, ज्ञानोदय, एकैक, महौषध, अन्वय, पित्रादेश, नयन, पवन, पावक, षड्दर्शन, उच्छिष्ट, उद्धरण (उद्धरण), छत्रच्छाया, दुरात्मा, पृष्ठ, ऋण, प्रातः कमल, पुरस्कार, निश्चय, नीरोग 

7. निम्नांकित शब्दों की संधि करें
निः + रज, निः + संतान, मनः + योग, निः + त, सत् + शास्त्र, उत् + लास, अप् + मय, नौ + इक, गै + अक, तथा + एव, गंगा + + सिद्ध, सम् + सार, पृष् अप् + ज, जगत् + आनन्द, ऊर्मि, मही + इन्द्र |

8. दिए गए खाली जगहों में संधि-भेद लिखें :
(क) विद्या + आलय = विद्यालय            (दीर्घ-संधि)
(ख) गिरि + ईश = गिरीश                   (             )
(ग) जन्म + उत्सव = जन्मोत्सव             (             )
(घ) इति + आदि = इत्यादि                  (             )
(ङ) गै + इका = गायिका                    (             )
(च) षट् + मास = षण्मास                    (             )
(छ) सत् + शास्त्र = सच्छास्त्र                (             )
(ज) निः + धन = निर्धन                        (             )
(झ) निः + रोग = नीरोग                       (             )
(ञ) सम् + सार = संसार                      (             )

9. संधि के विभिन्न नियमों को ध्यान में रखकर रिक्त स्थानों की पूर्ति करें
(क) अ + अ = ..........
(ख) आ + आ = ..........
(ग) उ + इ = ..........
(घ) ए + अ = ..........
(ङ) अ + इ = ..........
(च) आ + ऋ = ..........
(छ) आ + ऊ = ..........
(ज) आ + ए = ..........
(झ) औ + अ = ..........
(ञ) ओ + इ = ..........

10. इन संधि-शब्दों के सही संधि-विच्छेद पर () का निशान लगाएँ
(क) षडानन = (षड + आनन), (षडा + नन), (षडा + आनन), (षट् + आनन) । 
(ख) गिरीश = (गिरि + ईश ), (गिरी + ईश ), (गिर + ईश), (गीरी + ईश) । 
(ग) महोत्सव = (महान् + उत्सव), (महा + उत्सव), (महो + उत्सव), (महा + ऊत्सव)। 
(घ) नीरज = (नी + रज), (नी: + रज), (निः + रज), (नि + रज)। 
(ङ) नाविक = (ना + विक), (न + आविक), (नौ + इक), (नाव + इक)। 

11. 'पवन' का संधि-विच्छेद क्या है ?
(i) प + वन 
(ii) पो + अन
(iii) पा + अन
(iv) पव + अन

समास

समास— दो या दो से अधिक पद जब अपने विभक्ति-चिह्न या अन्य शब्दों को छोड़कर एक पद हो जाते हैं, तब समास कहलाते हैं, जैसे— 
राजा की कन्या = राजकन्या ('की' विभक्ति लुप्त) 
भाई और बहन = भाई-बहन ('और' शब्द लुप्त)

ऐसे पदों में कभी पहला पद ( पूर्वपद) प्रधान होता है, तो कभी दूसरा पद (उत्तरपद) । कभी-कभी सभी पद प्रधान या गौण होते हैं । यहाँ 'राजकन्या' में उत्तरपद प्रधान है, अर्थात् लिंग, वचन और पुरुष 'कन्या' के अनुसार होंगे, जैसे—
राजकन्या आ रही है । (राजा नहीं आ रहा है, कन्या आ रही है ।) 

हाँ, एक बात और । यदि सामासिक शब्दों को तोड़कर उनका पूर्व रूप दिखलाया जाए, तो वह समास विग्रह कहलाएगा, जैसे— 
समस्त पद                             समास-विग्रह
राजमहल = राज + महल         — राजा का महल

समास के भेद

समास के मुख्यतः छह भेद हैं—
(1) तत्पुरुष, (2) कर्मधारय, (3) बहुव्रीहि, (4) अव्ययीभाव, (5) द्वंद्व और (6) द्विगु ।

1. तत्पुरुष समास जिस समास में अंतिम शब्द (उत्तरपद) प्रधान हो उसे तत्पुरुष समास कहते हैं, जैसे

(क) कर्म-तत्पुरुष ('को' चिह्न का लोप)

चिड़ीमार = चिड़ियों को मारनेवाला
जलधर = जल को धारण करनेवाला
गिरिधर = गिरि को धारण करनेवाला 
वंशीधर = वंशी को धारण करनेवाला
विषधर = विष को धारण करनेवाला 
सिरतोड़ = सिर को तोड़नेवाला
पाकेटमार = पाकेट को मारनेवाला
मनोहर = मन को हरनेवाला
भूधर = भू को धारण करनेवाला
गृहागत = गृह को आगत

(ख) करण-तत्पुरुष ('से' चिह्न का लोप)

रसभरा = रस से भरा 
देहचोर = देह से चोर
मुँहचोर = मुँह से चोर
धर्मांध = धर्म से अंधा 
मदांध = मद से अंधा
धर्मभीरु = धर्म से भीरु 
कामचोर = काम से चोर 
रोगपीड़ित = रोग से पीड़ित
जन्मांध = जन्म से अंधा
शोकग्रस्त = शोक से ग्रस्त

(ग) संप्रदान-तत्पुरुष ('के लिए' चिह्न का लोप)

न्यायालय = न्याय के लिए आलय 
शिवालय = शिव के लिए आलय
स्नानघर = स्नान के लिए घर
देशभक्ति = देश के लिए भक्ति
गोशाला = गाय के लिए शाला
देवालय = देव के लिए आलय
किताबघर = किताब के लिए घर
रसोईघर = रसोई के लिए घर
गुरुभक्ति = गुरु के लिए भक्ति
 पुत्रशोक = पुत्र के लिए शोक

(घ) अपादान-तत्पुरुष ('से' चिह्न का लोप)

धनहीन = धन से हीन
शक्तिहीन = शक्ति से हीन 
बलहीन = बल से हीन
पथभ्रष्ट = पथ से भ्रष्ट
पापमुक्त = पाप से मुक्त
नेत्रहीन = नेत्र से हीन 
अन्नहीन = अन्न से हीन  
पदच्युत = पद से च्युत  
ऋणमुक्त = ऋण से मुक्त  
बंधनमुक्त = बंधन से मुक्त

(ङ) संबंध-तत्पुरुष ('का', 'की' चिह्न का लोप)  

राजपुत्र = राजा का पुत्र 
कन्यादान = कन्या का दान
अन्नदान = अन्न का दान
सेनानायक = सेना का नायक
जननायक = जन का नायक
राजकन्या = राजा की कन्या  
श्रमदान = श्रम का दान 
भूदान = भू का दान  
देशसेवा = देश की सेवा  
गुरुसेवा = गुरु की सेवा

(च) अधिकरण-तत्पुरुष  ('में' चिह्न का लोप) 

नरोत्तम = नरों में उत्तम 
सर्वोत्तम = सब में उत्तम 
रणवीर = रण में वीर 
कविश्रेष्ठ = कवियों में श्रेष्ठ 
कुलश्रेष्ठ = कुल में श्रेष्ठ 
पुरुषोत्तम = पुरुषों में उत्तम 
दानवीर = दान में वीर 
मुनिश्रेष्ठ = मुनियों में श्रेष्ठ 
ध्यानमग्न = ध्यान में मग्न 
आनन्दमग्न = आनन्द में मग्न 

2. कर्मधारय समास— कर्ता-तत्पुरुष को ही कर्मधारय समास कहते हैं। इसमें प्रायः प्रथम पद विशेषण और दूसरा पद विशेष्य होता है, जैसे

वीरबाला             वीर बाला             वीर है जो बाला 
नीलकमल           नीला कमल          नीला है जो कमल
महाकाव्य            महान् काव्य         महान् है जो काव्य
महात्मा               महान् आत्मा         महान् है जो आत्मा
महावीर               महान् वीर            महान् है जो वीर

3. बहुव्रीहि समास— इसमें कोई भी पद प्रधान नहीं होता, बल्कि समस्त पदों से किसी अन्य शब्द का बोध होता है, जैसे—

दशानन  दश (दस) हैं आनन जिसके              (रावण का बोध)
लम्बोदर  लम्बा है उदर जिसका                    (गणेश का बोध)
वज्रदेह  वज्र है देह जिसकी                           (हनुमान् का बोध)
नीलकंठ  नीला है कंठ जिसका                      (भगवान् शिव का बोध)
वीणापाणि  वीणा है पाणि (हाथ) में जिसके        (सरस्वती का बोध)
चतुरानन — चार हैं आनन (मुख) जिसके             (ब्रह्मा का बोध)

4. अव्ययीभाव— इसका पहला पद अव्यय होता है और यह क्रियाविशेषण के रूप में प्रयुक्त होता है, जैसे—
वह प्रतिदिन आ रहा है । (प्रतिदिन  क्रियाविशेषण)
अकारण  बिना कारण के
प्रतिदिन — हर दिन
प्रतिमास — हर मास
बखूबी — खूबी के साथ
बेरहम — बिना रहम के
बेकाम — बिना काम का
बेफायदा  बिना फायदे का
यथाशक्ति — शक्ति भर
यथाशीघ्र  जितना शीघ्र हो
यथासंभव  जितना संभव हो

5. द्वंद्व समास— इसके सभी पद प्रधान होते हैं, जैसे—–
माता-पिता — माता और पिता
राधा-कृष्ण — राधा और कृष्ण
लोटा-डोरी — लोटा और डोरी 
सीता-राम — सीता और राम
राजा-रानी  राजा और रानी
पाप-पुण्य पाप या पुण्य
झूठ-सच झूठ या सच
अच्छा-बुरा — अच्छा या बुरा
लाभ-हानि  लाभ या हानि
यश-अपयश  यश या अपयश

6. द्विगु समास— इसका पूर्वपद संख्यावाचक विशेषण होता है । तत्पुरुष कर्मधारय समास की तरह ही इसका उत्तरपद प्रधान होता है, जैसे—
चौराहा चार राहों का समाहार
नवग्रह नौ ग्रहों का समाहार
पंचमुख पाँच मुखों का समाहार
छमाही छह माहों का समाहार
दोपहर दो पहरों का समाहार
त्रिकाल तीन कालों का समाहार
त्रिफला तीन फलों का समाहार

अभ्यास

1. समास की परिभाषा और इसके भेदों को उदाहरणसहित लिखें। 

2. तत्पुरुष समास किसे कहते हैं? उदाहरण द्वारा स्पष्ट करें ।

3. कर्मधारय और द्विगु समास में अंतर बताएँ और उदाहरण दें। 

4. अव्ययीभाव और बहुव्रीहि समासों के दो-दो उदाहरण लिखें । 

5. द्वंद्व समास को उदाहरण द्वारा स्पष्ट करें।

6. दिए गए शब्दों के समास-भेद लिखें—
चिड़ीमार, जलधर, देहचोर, शक्तिहीन, न्यायालय, अन्नदान, नरोत्तम, देशसेवा, वीरबाला, चतुरानन, दाल-रोटी, राधाकृष्ण।

7. नीचे दिए गए शब्दों को मिलाकर समास बनाएँ और इनके भेद लिखें
(क) भू (को) धारण करनेवाला         भूधर            (तत्पुरुष)
(ख) पाकेट (को) मारनेवाला           — ............       (..........)
(ग) नीला है जो कमल                   — ............       (..........)
(घ) धन से हीन                            — ............       (..........)
(ङ) देश की सेवा                         — ............       (..........)
(च) रस से भरा                            — ............       (..........)
(छ) कवियों में श्रेष्ठ                        — ............       (..........)
(ज) दस हैं आनन जिसके               — ............       (..........)
(झ) तीन कालों का समाहार            — ............       (..........)
(ञ) देश के लिए भक्ति                   — ............       (..........)

8. सही कथन के सामने () और गलत के सामने (x) का निशान लगाएँ—
(क) द्वंद्व समास के दोनों पद प्रधान होते हैं ।     [    ]
(ख) तत्पुरुष समास में पूर्वपद की प्रधानता रहती है।     [    ]
(ग) कर्मधारय समास में उत्तरपद की प्रधानता रहती है ।    [    ]
(घ) द्विगु समास में उत्तरपद प्रधान होता है ।     [    ]
(ङ) बहुव्रीहि समास में समस्तपद गौण होते हैं।     [    ]
(च) अव्ययीभाव का उत्तरपद अव्यय होता है।    [    ]

9. 'त्रिवेणी' किस समास के अंतर्गत आता है ? 
(i) द्वंद्व 
(ii) कर्मधारय 
(iii) बहुव्रीहि 
(iv) द्विगु 

10. ‘देवकन्या’ कौन-सा समास है ?
(i) कर्मधारय 
(ii) तत्पुरुष 
(iii) अव्ययीभाव 
(iv) द्वंद्व

11. निम्नलिखित में कौन-सा शब्द द्विगु समास है ?
(i) आजीवन 
(ii) भूदान   
(iii) सप्ताह 
(iv) पुरुषसिंह

पुनरुक्ति

पुनरुक्ति— पुनः + उक्ति से बना है— पुनरुक्ति । इसका अर्थ होता - आवृत्ति, पुनरावृत्ति या दोहराना । एक ही शब्द की जब दो बार पुनरावृत्ति की जाती है, तब उसे पुनरुक्ति या द्विरुक्ति कहते हैं। इसकी सहायता से हिन्दी में बहुत सारे शब्द बने हैं । 'पुनरुक्त' शब्द एक प्रकार से यौगिक शब्द होते हैं। इनमें कुछ शब्द सामासिक भी होते हैं । ऐसे शब्द मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं—
(1) पूर्ण पुनरुक्त
(2) अपूर्ण पुनरुक्त
(3) अनुकरणवाचक

1. पूर्ण पुनरुक्त शब्द— जब कोई शब्द एक ही साथ लगातार दो बार प्रयुक्त होता है, तब उसे पूर्ण पुनरुक्त शब्द कहते हैं, जैसे
कहाँ-कहाँ, कौड़ी - कौड़ी, कभी-कभी, जन-जन, जय-जय, घर-घर, चलते-चलते, बैठे-बैठे, आइए- आइए आदि ।

कभी-कभी ऐसे शब्दों की पुनरुक्ति के साथ-साथ उनके बीच में 'ही' का प्रयोग होता है, जैसे
दूध-ही-दूध, पानी-ही-पानी, साथ-ही-साथ, बातों ही बातों में आदि।

2. अपूर्ण पुनरुक्त शब्द— ऐसे शब्द दो सार्थक शब्दों के मेल से बनते हैं जिनमें कभी-कभी उत्तरपद निरर्थक होता है, फिर भी उत्तरपद पहले का समानुप्रास होता है, जैसे—
आमनेसामने, आसपास, उलटापुलटा, चालढाल, टालमटोल, देखभाल, पूछताछ आदि ।

3. अनुकरणवाचक शब्द— किसी वस्तु की वास्तविक अथवा कल्पित ध्वनि को ध्यान में रखकर जो शब्द कहे जाते हैं उन्हें अनुकरणवाचक शब्द कहते हैं, जैसे—
खटपट, गड़गड़ाहट, गुड़गुड़ाहट, गड़बड़, छमछम, दनादन, धड़ाधड़ आदि ।

पशु-पक्षियों की बोलियाँ या ध्वनियाँ

पशु-पक्षियों की बोलियाँ या वस्तुओं से निकली ध्वनियाँ प्रायः अनुकरणात्मक होती हैं । ऐसी बोलियाँ या ध्वनियाँ नीचे दी गई हैं
उल्लू — घुघुआता है । 
ऊँट — बलबलाता है। 
कबूतर — गुटरगूं करता/गुटरता है । 
कुत्ता — भूँकता है ।
कोयल — कूकती है।
कौआ — काँव-काँव करता है।
गदहा — रेंकता है।
गाय — रँभाती है।
घोड़ा — हिनहिनाता है । 
चिड़िया — चहचहाती है ।
चूहा — चें-चें करता है।
झींगुर — झंकारता है ।
तोता — टें-टें करता है।
पँडुकी — टुटरूँ-हूँ करती है । I
पपीहा — पीउ-पीउ करता है।
बकरा — बों-बों करता है।
बकरी — मिमियाती है।
बतख — कें-कें करती है।
बन्दर — किकियाता/किलकारता है। 
बाघ — गुर्राता है।
बिल्ली — म्याऊँ म्याऊँ करती है।
भालू — खो-खों करता है । 
भेड़ा — भें-भें करता है । 
भैंस — चुकरती है।
भौंरा — गुंजार / गुंजन करता है ।
मक्खियाँ — भिनभिनाती हैं । 
मुरगी — कुकड़ती है ।
मुरगा — कुकडूं-कूँ करता या बाँग देता है।
मेढक — टरटराता या टर्राता है।
मोर — कुहकता है।
शेर/सिंह — दहाड़ता है ।
साँड़ — डकारता है।
साँप — टिटकारता/फुफकारता है।
सियार — हुआँ-हुआँ करता है ।
सूअर — घुरघुराता है ।
हंस — कूजता है।
हाथी — चिंघाड़ता है।

अन्य वस्तुओं से निकली ध्वनियाँ

कपड़ा — फड़फड़ाता है। 
गोला — गोला धड़धड़ाता है। 
घड़ी — टिक-टिक करती है। 
चिता — चटचटाती/चट्-चट् करती है। 
चूड़ियाँ — खनखनाती हैं । 
जूता — मचमचाता है । 
दाँत — कटकटाते/सलसलाते हैं । 
दिल — धक्-धक् करता है । 
पत्ते — खड़कते हैं। 
पायल — छमछम करती है । 
बिजली — कड़कती, तड़कती या कौंधती है। 
मेघ — गरजता है । 
रुपए — खनकते या कड़कड़ाते हैं। 
शस्त्र — झनझनाते हैं। 
हवा — सनसनाती या साँय-साँय करती है।

अभ्यास

1. पुनरुक्त शब्द किसे कहते हैं ? इसे उदाहरण द्वारा स्पष्ट करें ।

2. पुनरुक्त शब्दों का निर्माण कैसे होता है ? इसे सोदाहरण स्पष्ट करें । 

3. दिए गए शब्दों का अलग-अलग वाक्य में प्रयोग करें—
गाँव-गाँव, छोटे-छोटे, कुछ-न-कुछ, हँसते-हँसते, अरे-अरे, ऊपर-ऊपर ।

4. सही कथन के सामने (✓) और गलत के सामने (x) का निशान लगाएँ— 
(क) पुनरुक्ति का अर्थ होता है— दोहराना ।     [    ]
(ख) 'जय जय', शब्द अपूर्ण पुनरुक्ति का उदाहरण है ।     [    ]
(ग) 'चालढाल' शब्द पूर्ण पुनरुक्ति का उदाहरण है ।    [    ]
(घ) 'छमछम' शब्द अनुकरणवाचक शब्द का उदाहरण है ।    [    ]

5. कोष्ठकों में दिए गए शब्दों से उपयुक्त शब्द चुनें और खाली जगहों को भरें
(क) कबूतर .......... है।             (घुघुआता, गुटरता)
(ख) कोयल .......... है।             (कूकती, भूँकता)
(ग) चिड़िया .......... है।             (हिनहिनाता, चहचहाती)
(घ) साँड़ .......... है।                 (डकारता, किकियाता)
(ङ) हाथी .......... है।                (चिंघाड़ता, डकारता)
(च) भेड़ा .......... करता है।        (भें-भें, टें-टें)
(छ) चूड़ियाँ .......... हैं ।             (फड़फड़ाता, खनखनाती)
(ज) दिल .......... है।                 (धड़कता, मचमचाता)
(झ) मेघ .......... है।                  (धड़कता, गरजता)
(ञ) रुपए .......... है।                (कड़कड़ाते, झनझनाते)

6. उपयुक्त बोलियाँ या ध्वनियाँ लिखकर इन वाक्यों को शुद्ध करें और पुनः लिखें—
(क) ऊँट हिनहिनाता है । 
(ख) तोता भूँकता है । 
(ग) चिड़िया कूकती है ।  
(घ) मुरगा पीउ-पीउ करता है । 
(ङ) बन्दर गरजता है । 
(च) भैंस भें- भें करती है। 
(छ) सिंह डकारता है ।
(ज) मक्खियाँ गुंजार करती हैं । 
(झ) जूते खनकते हैं । 
(ञ) घड़ी धक् धक् करती है।

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