NCERT Class 10th Social Science Geography Notes Chapter 3 जल संसाधन

 इस अध्याय मे हम जल, बाँध, बहु उद्देशीय परियोजनाएँ, वर्षा जल संग्रहण, टाँका आदि के बारे में विस्तार से पड़ेगे।

जल संसाधन

पृथ्वी पर जल का वितरण और भारत की जल स्थिति :-

पृथ्वी की सतह का लगभग 71% भाग जल से ढका है, परंतु इसका लगभग 97.5% भाग खारा जल है जो महासागरों में पाया जाता है। केवल 2.5% जल ही मीठा है, जिसमें से लगभग 68% ग्लेशियरों और बर्फ के रूप में जमा है।

नदियों, झीलों और भूजल के रूप में उपलब्ध मीठा पानी कुल जल का 1% से भी कम है और इसका वितरण अत्यंत असमान है।

भारत को विश्व की कुल वर्षा का लगभग 4% भाग प्राप्त होता है तथा प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष जल उपलब्धता के मामले में भारत का स्थान लगभग 133वाँ है।

जल दुर्लभता :-

जल दुर्लभता वह स्थिति है जब किसी स्थान पर उपयोग योग्य जल की मात्रा लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं होती।

🔸 सरल शब्दों में :- जल दुर्लभता का अर्थ है किसी क्षेत्र में जल की मांग की तुलना में उसकी उपलब्धता का कम होना।

जल दुर्लभता के कारण :-

🔸 A. प्राकृतिक कारण :-

  • वर्षा में वार्षिक और मौसमी बदलाव।
  • जल संसाधनों का असमान वितरण (समय और स्थान के अनुसार)

🔸 B. मानव निर्मित कारण (मुख्य कारण) :-

  • जल का अतिशोषण – अत्यधिक दोहन।
  • जल का अत्यधिक प्रयोग – बिना संरक्षण के उपयोग।
  • जल का असमान वितरण – समाज के विभिन्न वर्गों में असमान पहुँच।
  • बढ़ती जनसंख्या – जल की माँग में वृद्धि।

औद्योगीकरण तथा शहरीकरण जल दुर्लभता के लिए किस प्रकार उत्तरदायी हैं?

  • स्वतंत्रता के बाद भारत में तेज़ औद्योगीकरण और शहरीकरण हुआ।
  • बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बड़े उद्योगों की संख्या बढ़ने से अलवणीय जल संसाधनों पर दबाव बढ़ा।
  • उद्योगों को जल के साथ-साथ ऊर्जा की भी अत्यधिक आवश्यकता होती है, जिसकी पूर्ति आंशिक रूप से जल विद्युत से होती है।
  • शहरों की बढ़ती जनसंख्या और शहरी जीवन शैली के कारण जल और ऊर्जा की मांग में तीव्र वृद्धि हुई है।
  • शहरी कालोनियों में नलकूपों के व्यापक उपयोग से जल संसाधनों का अतिशोषण हो रहा है।

कृषि में जल उपयोग एवं जल दुर्लभता :-

  • बढ़ती जनसंख्या के कारण घरेलू उपयोग और कृषि दोनों के लिए जल की आवश्यकता बढ़ रही है।
  • अधिक अनाज उत्पादन के लिए सिंचित क्षेत्र का विस्तार किया जाता है।
  • सिंचित कृषि में जल का सबसे अधिक उपयोग होता है।
  • सिंचाई के लिए जल संसाधनों का अत्यधिक दोहन किया जा रहा है।
  • शुष्क ऋतु में खेती संभव बनाने के लिए भूजल पर निर्भरता बढ़ी है।

🔹 निजी कुएँ और नलकूपों का प्रभाव :-

कई किसान निजी कुओं और नलकूपों से सिंचाई कर उत्पादन बढ़ा रहे हैं।

🔸 इसके दुष्परिणाम :-

  • भौम जलस्तर नीचे गिरता है।
  • आम लोगों के लिए जल की उपलब्धता घटती है।
  • भोजन सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
  • लंबे समय में यह स्थिति असतत है।

जल दुर्लभता का गुणात्मक पहलू (जल प्रदूषण) :-

🔸 स्थिति :- ऐसा हो सकता है कि किसी क्षेत्र में पानी तो बहुत हो, लेकिन वह पीने लायक न हो। इसे जल की गुणात्मक कमी कहते हैं।

  • कारण :- जल प्रदूषण।
  • प्रदूषण के स्रोत :-
    • घरेलू और औद्योगिक अपशिष्ट
    • रसायन, कीटनाशक, कृषि उर्वरक
  • परिणाम :- प्रदूषित जल मानव उपयोग के लिए खतरनाक बन जाता है।

जल संरक्षण :-

जल संरक्षण का मतलब है जल का सावधानीपूर्वक और सीमित उपयोग।

जल संरक्षण की आवश्यकता – क्यों?

  • जल संसाधनों का संरक्षण और उचित प्रबंधन समय की मांग है।
  • इससे स्वास्थ्य संबंधी जोखिम, खाद्यान्न असुरक्षा और पारिस्थितिकी संकट से बचा जा सकता है।
  • जल संसाधनों के अतिशोषण और कुप्रबंधन से गंभीर पारिस्थितिकीय समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
  • जल संरक्षण से जल दुर्लभता कम होती है, कृषि और खाद्यान्न सुरक्षा बनी रहती है, पर्यावरण संतुलन बना रहता है।

जल जीवन मिशन (JJM) :-

भारत सरकार की महत्वपूर्ण पहल।

  • लक्ष्य :- प्रत्येक ग्रामीण परिवार को प्रति व्यक्ति 55 लीटर प्रतिदिन पीने का साफ़ पानी पाइप द्वारा उपलब्ध कराना।
  • उद्देश्य :- ग्रामीण जीवन की गुणवत्ता में सुधार।

जल प्रबंधन :-

जल प्रबंधन का अर्थ है जल संसाधनों की योजना बनाकर उनका उचित, कुशल तथा समान वितरण के साथ उपयोग करना।

पारंपरिक जल प्रबंधन तकनीकें :-

पुरातात्विक व ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि प्राचीन भारत में जल संरक्षण की उन्नत प्रणालियाँ मौजूद थीं:

  • पत्थर एवं मलबे से बने बाँध – छोटे जलाशय बनाना।
  • तालाब/झीलों के तटबंध – वर्षा जल को संग्रहित करना।
  • नहरें – दूर तक पानी पहुँचाने की व्यवस्था।

प्राचीन भारत में जलीय कृतियाँ :-

  • ईसा से एक शताब्दी पहले इलाहाबाद के नजदीक श्रिगंवेरा में गंगा नदी की बाढ़ के जल को संरक्षित करने के लिए एक उत्कृष्ट जल संग्रहण तंत्र बनाया गया था।
  • चन्द्रगुप्त मौर्य के समय बृहत् स्तर पर बाँध, झील और सिंचाई तंत्रों का निर्माण करवाया गया।
  • कलिंग (ओडिशा), नागार्जुनकोंडा (आंध्र प्रदेश) बेन्नूर (कर्नाटक) और कोल्हापुर (महाराष्ट्र) में उत्कृष्ट सिंचाई तंत्र होने के सबूत मिलते हैं
  • अपने समय की सबसे बड़ी कृत्रिम झीलों में से एक, भोपाल झील, 11वीं शताब्दी में बनाई गई।
  • 14वीं शताब्दी में इल्तुतमिश ने दिल्ली में सिरी फोर्ट क्षेत्र में जल की सप्लाई के लिए हौज खास (एक विशिष्ट तालाब) बनवाया।

आधुनिक भारत में जल प्रबंधन :-

  • प्राचीन परंपराओं को आधुनिक भारत में भी जारी रखा गया।
  • आज अधिकतर नदी बेसिनों में बड़े बाँध बनाए गए हैं।

बाँध :-

🔹 बाँध क्या है?

बाँध बहते हुए जल को रोकने, उसकी दिशा बदलने या उसका बहाव कम करने के लिए बनाई गई कृत्रिम अवरोधक संरचना है।

  • बाँध के कारण जलाशय, झील, जलभरण क्षेत्र का निर्माण होता है।
  • बाँध शब्द का अर्थ जलाशय से होता है, न कि केवल उसके ढाँचे से।

🔹 बाँध की संरचना की विशेषताएँ :-

  • अधिकांश बाँधों में एक ढलवाँ हिस्सा होता है।
  • इस भाग के ऊपर से या भीतर से जल रुक-रुक कर या लगातार बहता रहता है।
  • इससे जल का नियंत्रित निकास होता है।

बाँधों का वर्गीकरण :-

बाँधों को उनकी बनावट, सामग्री और ऊँचाई के आधार पर अलग-अलग वर्गों में बाँटा जा सकता है:

🔸 A. संरचना और प्रयुक्त पदार्थ के आधार पर :- संरचना और उनमें प्रयुक्त पदार्थों के आधार पर बाँधों को लकड़ी के बाँध, तटबंध बाँध या पक्का बाँध के अलावा कई उपवर्गों में बाँटा जा सकता है।

🔸 B. ऊँचाई के आधार पर :- ऊँचाई के अनुसार बाँधों को बड़े बाँध और मुख्य बाँध या नीचे बाँध, मध्यम बाँध और उच्च बाँधों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

बाँधों के उपयोग / महत्व :-

  • सिंचाई – कृषि के लिए जल उपलब्ध कराना।
  • जलविद्युत उत्पादन – पनबिजली के लिए।
  • पेयजल आपूर्ति – शहरों एवं गाँवों को पानी देना।
  • बाढ़ नियंत्रण – नदी के प्रवाह को नियमित करना।
  • मनोरंजन एवं पर्यटन – जलाशय क्षेत्र का उपयोग।

बाँधों को बहुउद्देशीय परियोजना क्यों कहा जाता हैं ?

जब एक ही बाँध का उपयोग कई उद्देश्यों के लिए किया जाता है, तो उसे बहुउद्देशीय परियोजना कहते हैं।

🔹 उदाहरण के साथ समझे :-

🔸 परम्परागत बाँध :- पहले बाँधों का उपयोग केवल सिंचाई के लिए किया जाता था।

🔸 आधुनिक बाँध (बहुउद्देशीय परियोजनाएँ) :- आज बाँधों का उपयोग विद्युत उत्पादन, घरेलू व औद्योगिक जल आपूर्ति, बाढ़ नियंत्रण, मनोरंजन, नौचालन और मत्स्य पालन के लिए भी होता है।

👉 इसी कारण इन्हें बहुउद्देशीय परियोजनाएँ कहा जाता है।

🔹 प्रमुख उदाहरण :-
  • भाखड़ा नांगल परियोजना (सतलुज-व्यास बेसिन): जल विद्युत और सिंचाई।
  • हीराकुड परियोजना (महानदी बेसिन): जल संरक्षण और बाढ़ नियंत्रण।

जवाहर लाल नेहरू ने ‘ बाँधों को आधुनिक भारत के मंदिर ‘ क्यों कहा है ?

जवाहरलाल नेहरू बाँधों को गर्व से “आधुनिक भारत के मंदिर” कहते थे।

🔸 कारण :- उनका मानना था कि ये परियोजनाएँ कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और उद्योगों को एक साथ जोड़कर देश का तेजी से विकास करेंगी।

बहुउद्देशीय परियोजनाओं के नकारात्मक प्रभाव :-

🔸 A. पर्यावरणीय प्रभाव :-

  • नदियों के प्राकृतिक बहाव में बाधा उत्पन्न होती है।
  • जलाशयों में अत्यधिक तलछट का जमाव होता है, जिससे बाढ़ नियंत्रण क्षमता घट जाती है।
  • जलीय जीवों का प्रवास और प्रजनन प्रभावित होता है।
  • बाढ़ मैदानों की वनस्पति और मिट्टियाँ जलमग्न होकर नष्ट हो जाती हैं।

🔸 B. सामाजिक-आर्थिक प्रभाव :-

  • कई बार बड़े बाँध बाढ़ नियंत्रण में असफल हो जाते हैं।
  • बाढ़ से जान-माल की हानि तथा मृदा अपरदन होता है।
  • उपजाऊ तलछट खेतों तक न पहुँचने से भूमि निम्नीकरण की समस्या बढ़ती है।
  • कुछ क्षेत्रों में भूकंप की संभावना बढ़ जाती है।
  • जल-जनित रोगों, प्रदूषण और कीट-रोगों में वृद्धि होती है।
  • सिंचाई के कारण जल-गहन फसलों की ओर झुकाव जिससे मृदाओं के लवणीकरण हो सकते हैं।

अत्यधिक सिंचाई के नकारात्मक प्रभाव :-

  • इससे मिट्टी के लवणीकरण जैसे बड़े पारिस्थितिक परिणाम हो सकते हैं।
  • मिट्टी की उर्वरता में कमी।
  • इससे पानी की कमी हो जाती है।

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) :-

🔸 उद्देश्य :- प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना देश के सभी कृषि खेतों के लिए सुरक्षात्मक सिंचाई के कुछ साधनों तक पहुँच सुनिश्चित करती है, जिससे वांछित ग्रामीण समृद्धि आती है।

🔸 प्रमुख लक्ष्य :-

  • हर खेत में पानी की वास्तविक उपलब्धता को बढ़ाना,
  • और सुनिश्चित सिंचाई (हर खेत को पानी) के तहत बुवाई योग्य क्षेत्र का विस्तार करना,
  • अपव्यय को कम करने और अवधि और सीमा दोनों में उपलब्धता बढ़ाने के लिए खेत में पानी के उपयोग की दक्षता में सुधार करना,
  • सिंचाई और अन्य जल बचत प्रौद्योगिकियाँ (प्रति बूंद अधिक फसल) और सतत जल संरक्षण प्रणालियों का अपनाना आदि।

वर्षा जल संग्रहण :-

वर्षा जल संग्रहण वह तकनीक है जिसमें वर्षा के जल को खाली स्थानों, छतों, टैंकों तथा बेकार पड़े कुओं में एकत्र किया जाता है ताकि बाद में घरेलू, कृषि या भूजल पुनर्भरण के लिए उसका उपयोग किया जा सके।

वर्षाजल संग्रहण का महत्व :-

  • बहुउद्देशीय परियोजनाओं के पर्यावरणीय और सामाजिक दुष्प्रभावों के कारण वर्षा जल संग्रहण को बेहतर विकल्प माना जाता है।
  • यह पर्यावरण-अनुकूल, कम लागत वाला, स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार अनुकूल तंत्र है।

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में वर्षाजल संग्रहण के तरीके :-

  • पश्चिमी हिमालय में ‘गुल’ या ‘कुल’ द्वारा नदी का जल खेतों तक पहुँचाया जाता था।
  • राजस्थान में छत वर्षा जल संग्रहण द्वारा पीने का पानी एकत्र किया जाता था।
  • पश्चिम बंगाल में बाढ़ जल वाहिकाओं से खेतों की सिंचाई होती थी।
  • शुष्क व अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में खेतों में गड्ढे बनाकर वर्षा जल संग्रह किया जाता था।
    • जैसलमेर में खादीन और अन्य क्षेत्रों में जोहड़ इसके उदाहरण हैं।

टाँका : राजस्थान की वर्षाजल संग्रहण की विशेष प्रणाली :-

  • राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों जैसे: बीकानेर, फलोदी और बाड़मेर में घरों में भूमिगत टैंक (टाँका) बनाए जाते थे।
  • टाँका छत वर्षा जल संग्रहण प्रणाली का अभिन्न हिस्सा होता था।
  • वर्षा का पहला जल सफाई के लिए छोड़ा जाता था, बाद का जल संग्रह किया जाता था।
  • टाँका में संग्रहित जल अगली वर्षा तक उपयोग किया जा सकता था।
  • यह जल ‘पालर पानी’ कहलाता है और शुद्ध माना जाता है।
  • टाँके के आसपास बने कमरे ठंडे रहते हैं, जिससे गर्मी में राहत मिलती है।

पालर पानी :-

वर्षा का पानी जो भूमिगत टैंकों में जमा होता है, पीने योग्य पानी है। इसे पालर पानी कहा जाता है।

🔹 राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों में पालर पानी का महत्व :-

  • यह पेयजल का मुख्य स्त्रोत है, जब अन्य सभी स्त्रोत सूख गए हों।
  • इसे पेयजल का शुद्धतम रूप माना जाता है।
  • गर्मियों में, ये टैंक भूमिगत कमरों और उनसे जुड़े कमरों को ठंडा, साफ रखते हैं।

छत वर्षा जल संग्रहण का आधुनिक उदाहरण : गंडाथूर गाँव :-

  • कर्नाटक के गंडाथूर गाँव में छत वर्षा जल संग्रहण सफलतापूर्वक अपनाया गया है।
  • लगभग 200 घरों में यह व्यवस्था है।
  • यहाँ 80% संग्रहण दक्षता है।
  • गाँव को “वर्षा जल संपन्न गाँव” कहा जाता है।
    • प्रत्येक घर लगभग 50,000 लीटर जल प्रति वर्ष संग्रह करता है।
    • पूरे गाँव द्वारा लगभग 10,00,000 लीटर जल प्रति वर्ष संग्रह।
Next Post Previous Post
हमसे जुड़ें
1