NCERT Class 10th Social Science Geography Notes Chapter 4 कृषि
इस अध्याय मे हम कृषि, कृषि प्रक्रिया, कृषि प्रणाली, निर्वाह कृषि, गहन कृषि, वाणिज्यिक कृषि, रोपण कृषि, कृषि ऋतुएं, रबी, खरीफ, जायद, कृषि की मुख्य फसलें, चावल, गेहूँ, मोटे अनाज, दालें, चाय, कॉफी, गन्ना, तिलहन, कपास, जूट आदि के बारे में विस्तार से पड़ेगे।
कृषि
कृषि :-
कृषि एक प्राथमिक क्रिया है, जिसके अंतर्गत फसलों की खेती की जाती है। कृषि से हमें अधिकांश खाद्यान्न प्राप्त होते हैं और साथ ही यह कपास, जूट, गन्ना आदि जैसे कच्चे माल उद्योगों को उपलब्ध कराती है। इसके अतिरिक्त चाय, कॉफी, मसाले आदि कृषि उत्पादों का निर्यात भी किया जाता है।
कृषि की प्रक्रिया :-
- जुताई – खेत जोतना और मिट्टी को भुरभुरा करना
- बुवाई – बीज बोना
- सिंचाई – फसल को पानी देना
- निराई-गुड़ाई – खरपतवार (अनावश्यक घास) निकालना
- खाद व उर्वरक डालना – मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए
- कीटनाशकों का छिड़काव – कीटों से फसल की रक्षा हेतु
- कटाई – फसल पकने पर उसे काटना
- मड़ाई / दलाई – बालियों से दाने अलग करना
- भंडारण – अनाज को सुरक्षित रखना
भारत में कृषि का महत्व :-
🔸 (क) आर्थिक महत्व :-
- भारत की लगभग दो-तिहाई जनसंख्या प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है।
- कृषि एक प्राथमिक क्रिया है, जो देश के लिए अधिकांश खाद्यान्न उत्पन्न करती है।
- यह कपास, जूट, गन्ना, तिलहन आदि के रूप में उद्योगों को कच्चा माल प्रदान करती है।
- कृषि से राष्ट्रीय आय में महत्वपूर्ण योगदान मिलता है।
- चाय, कॉफी, मसाले जैसे कृषि उत्पादों का निर्यात कर विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है।
🔸 (ख) सामाजिक एवं सांस्कृतिक महत्व :-
- कृषि भारत की सबसे प्राचीन आर्थिक गतिविधि है।
- यह हजारों वर्षों से भारतीय जनसंख्या के जीवन-यापन का आधार रही है।
- भारत के अनेक त्योहार, रीति-रिवाज और परंपराएँ कृषि से जुड़ी हुई हैं, जैसे बैसाखी, पोंगल, ओणम आदि।
- ग्रामीण समाज की सामाजिक संरचना कृषि पर आधारित है।
कृषि पद्धतियों में बदलाव :-
कृषि भारत की सबसे पुरानी आर्थिक गतिविधि है। समय के साथ खेती करने के तरीकों में बड़े बदलाव आए हैं, जिसके मुख्य कारण हैं:
- भौतिक पर्यावरण: जलवायु, मिट्टी, भू-आकृति।
- प्रौद्योगिकी: नए औजार, सिंचाई के साधन, बीज।
- सामाजिक-सांस्कृतिक रीति-रिवाज: समाज की परंपराएँ और जरूरतें।
कृषि के प्रकार :-
भारत में खेती “जीवन निर्वाह” से लेकर “व्यापारिक” स्तर तक की जाती है। इसलिए भारत में कृषि को मुख्य रूप से निम्न प्रकारों में बाँटा गया है:
- (i) प्रारंभिक जीवन निर्वाह कृषि
- (ii) गहन जीवन निर्वाह कृषि
- (iii) वाणिज्यिक कृषि
(i) प्रारंभिक जीविका निर्वाह कृषि :-
यह कृषि का सबसे पुराना रूप है। प्रारंभिक जीविका निर्वाह कृषि भारत के कुछ भागों में आज भी की जाती है। इस प्रकार की कृषि भूमि के छोटे-छोटे टुकड़ों पर आदिम कृषि औजारों तथा परिवार या समुदाय के श्रम से की जाती है। इसका मुख्य उद्देश्य किसान और उसके परिवार का भरण-पोषण होता है।
🔸 प्रमुख विशेषताएँ :-
- प्रारंभिक जीविका निर्वाह कृषि छोटे-छोटे खेतों पर की जाती है।
- इसमें आदिम कृषि औजारों जैसे लकड़ी का हल, डाओ और खुदाई करने वाली छड़ी का प्रयोग किया जाता है।
- यह कृषि मुख्यतः परिवार अथवा समुदाय के श्रम से की जाती है।
- इस प्रकार की कृषि मानसून, मृदा की प्राकृतिक उर्वरता तथा फसल उगाने के लिए अनुकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
- इसमें उर्वरक और आधुनिक तकनीक का प्रयोग नहीं होता।
- इसलिए इस कृषि की उत्पादकता कम होती है।
प्रारंभिक जीविका निर्वाह कृषि की कार्य-प्रणाली: (“कर्तन दहन प्रणाली”) :-
इस कृषि पद्धति को कर्तन-दहन प्रणाली भी कहा जाता है। इसकी प्रक्रिया इस प्रकार है:
- किसान जंगल के एक हिस्से को काटकर और उसे जलाकर साफ करते हैं।
- राख को मिट्टी में मिलाकर अनाज और अन्य फसलें उगाई जाती हैं। राख मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती है।
- कुछ वर्षों बाद जब मिट्टी की उर्वरता कम हो जाती है, तो किसान दूसरे स्थान पर चले जाते हैं।
- कुछ समय बाद प्राकृतिक प्रक्रियाओं से पुरानी भूमि की उर्वरता पुनः बढ़ जाती है।
प्रारंभिक जीविका निर्वाह कृषि की सीमाएँ (कमियाँ) :-
- उत्पादकता बहुत कम होती है, क्योंकि इसमें आधुनिक तकनीक का प्रयोग नहीं किया जाता।
- आदिम कृषि औजारों जैसे लकड़ी के हल और डाओ का उपयोग किया जाता है।
- यह कृषि मानसून और प्राकृतिक परिस्थितियों पर अधिक निर्भर करती है।
- उर्वरक, कीटनाशक और सिंचाई सुविधाओं का अभाव होता है।
- भूमि के छोटे-छोटे टुकड़ों पर खेती होने से उत्पादन सीमित रहता है।
- कर्तन-दहन प्रणाली के कारण वनों की कटाई और मृदा क्षरण होता है।
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में इसके नाम :-
देश के विभिन्न भागों में इस प्रकार की कृषि को विभिन्न नामों से जाना जाता है।
- उत्तर-पूर्वी राज्यों असम, मेघालय, मिजोरम और नागालैंड में इसे ‘झूम’ कहा जाता है;
- मणिपुर में पामलू (pamlou) और
- छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले और अंडमान निकोबार द्वीप समूह में इसे ‘दीपा’ कहा जाता है।
(ii) गहन जीविका कृषि :-
यह खेती उन इलाकों में की जाती है जहाँ जनसंख्या बहुत घनी होती है और खेती के लिए जमीन सीमित होती है।
🔸 प्रमुख विशेषताएँ :-
- यह एक श्रम-गहन कृषि है।
- इसमें अधिक मात्रा में श्रम का प्रयोग किया जाता है।
- छोटी जमीन से ज्यादा फसल लेने के लिए जैव-रासायनिक निवेशों और सिंचाई का भारी मात्रा में उपयोग किया जाता है।
- जोत का आकार छोटा होता जाता है (जमीन का बँटवारा के कारण)।
- जोतें आर्थिक दृष्टि से अलाभप्रद हो जाती हैं।
(iii) वाणिज्यिक कृषि :-
वाणिज्यिक कृषि वह कृषि है जिसमें फसलें मुख्यतः बाजार में बेचने के लिए उगाई जाती हैं। इसका उद्देश्य लाभ कमाना होता है, न कि केवल आत्म-निर्भरता।
🔸 प्रमुख विशेषताएँ :-
- इसमें अधिक पैदावार देने वाले HYV बीजों, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों (Pesticides) का भारी उपयोग होता है।
- आधुनिक तकनीकों के कारण प्रति हेक्टेयर उत्पादन बहुत अधिक होता है।
🔸 वाणिज्यीकरण के स्तर में भिन्नता :–
- कृषि का वाणिज्यीकरण हर राज्य में समान नहीं है।
- उदाहरण के लिए हरियाणा और पंजाब में चावल वाणिज्य की एक फसल है परंतु ओडिशा में यह एक जीविका फसल है।
रोपण कृषि :-
रोपण कृषि, वाणिज्यिक कृषि का ही एक विशेष रूप है। इसमें एक ही फसल को बड़े क्षेत्र में उगाया जाता है।
🔸 प्रमुख विशेषताएँ :-
- एक बहुत बड़े क्षेत्र में केवल एक ही तरह की फसल बोई जाती है।
- अत्यधिक पूँजी और श्रम पर आधारित होती है।
- इसे कृषि और उद्योग के बीच का अंतरापृष्ठ कहा जाता है।
- संपूर्ण उत्पादन उद्योगों में कच्चे माल के रूप में प्रयोग होता है।
- चूँकि सारा उत्पादन बिक्री के लिए होता है, इसलिए अच्छे परिवहन, संचार के साधन और बाज़ार इसके विकास के लिए अनिवार्य हैं।
🔸 भारत की प्रमुख रोपण फसलें :- भारत में चाय, कॉफी, रबड़, गन्ना, केला इत्यादि महत्त्वपूर्ण रोपण फसले हैं। असम और उत्तरी बंगाल में चाय, कर्नाटक में कॉफी वहाँ की मुख्य रोपण फसलें हैं।
गहन निर्वाह खेती और वाणिज्यिक खेती के बीच अंतर :-
| गहन निर्वाह खेती | वाणिज्यिक खेती |
|---|---|
| भूमि जोत छोटी होती है | भूमि जोत बड़ी होती है |
| अधिक श्रम और सीमित पूँजी का प्रयोग | अधिक पूँजी और मशीनों का प्रयोग |
| पारंपरिक तथा कुछ आधुनिक तकनीकों का मिश्रित प्रयोग | पूरी तरह आधुनिक तकनीक और उपकरणों का प्रयोग |
| उत्पादन मुख्यतः स्थानीय उपभोग के लिए | उत्पादन मुख्यतः बाजार एवं निर्यात के लिए |
| एक वर्ष में दो या तीन फसलें उगाई जाती हैं | प्रायः एक ही फसल पर ध्यान |
| मुख्यतः खाद्य फसलें जैसे धान, गेहूँ | मुख्यतः नकदी फसलें जैसे गन्ना, चाय, कॉफी |
भारत की फसल ऋतुएँ :-
भारत में तीन प्रमुख फसल ऋतुएँ पाई जाती हैं:
- रबी
- खरीफ
- जायद
रबी फसलें (शीत ऋतु की फसलें) :-
- समय :- इन्हें अक्टूबर से दिसंबर के बीच बोया जाता है और अप्रैल से जून के बीच काटा जाता है।
- प्रमुख फसलें :- गेहूँ, जौ, मटर, चना और सरसों कुछ मुख्य रबी फसलें हैं।
- प्रमुख क्षेत्र :- उत्तर और उत्तर-पश्चिमी राज्य (पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश)।
🔸 सफलता के कारक :-
- शीत ऋतु में पश्चिमी विक्षोभों से होने वाली वर्षा फसलों के लिए लाभदायक होती है।
- हरित क्रांति की सफलता ने पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रबी फसलों का उत्पादन बढ़ाया।
खरीफ फसलें (वर्षा ऋतु की फसलें) :-
🔸 समय :- इन्हें मानसून के आगमन (जून-जुलाई) के साथ बोया जाता है और सितंबर-अक्टूबर में काट लिया जाता है।
🔸 प्रमुख फसलें :- इस ऋतु में बोई जाने वाली मुख्य फसलों में चावल, मक्का, ज्वार, बाजरा, तुर (अरहर), मूंग, उड़द, कपास, जूट, मूँगफली और सोयाबीन शामिल हैं।
🔸 प्रमुख क्षेत्र :- असम, पश्चिमी बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, केरल और महाराष्ट्र विशेषकर कोंकण तटीय क्षेत्रों, उत्तर प्रदेश और बिहार में की जाती है।
जायद फसलें (ग्रीष्म ऋतु की फसलें) :-
रबी और खरीफ फसल ऋतुओं के बीच ग्रीष्म ऋतु में बोई जाने वाली फसल को तायद कहा जाता है।
🔸 समय :- बुवाई: मार्च–अप्रैल, कटाई: जून (रबी और खरीफ के बीच)
🔸 प्रमुख फसलें :- जायद ऋतु में मुख्यत तरबूज, खरबूजे, खोरे, सब्जियों और चारे की फसलों की खेती की जाती है।
मुख्य फसलें :-
भारत में उगाई जाने वाली मुख्य फसलें चावल, गेहूँ, मोटे अनाज, दालें, चाय, कॉफी, गन्ना, तिलहन, कपास और जूट इत्यादि है।
भारत में उगाई जाने वाली मुख्य फसलें :-
चावल :-
चावल भारत में अधिकांश लोगों का प्रमुख खाद्यान्न है। भारत, चीन के बाद, विश्व का दूसरा सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश है। चावल एक खरीफ की फसल है।
- तापमान :- इसे उच्च तापमान की आवश्यकता होती है (25°C से अधिक)।
- आर्द्रता :- अधिक नमी और भारी वर्षा की जरूरत होती है।
- वर्षा :- 100 सेमी. से अधिक वार्षिक वर्षा।
कम वर्षा वाले क्षेत्रों में चावल की खेती सिंचाई की सहायता से की जाती है।
🔸 प्रमुख उत्पादक क्षेत्र :- चावल मुख्यतः उत्तर और उत्तर-पूर्वी मैदानों, तटीय क्षेत्रों तथा डेल्टाई प्रदेशों में उगाया जाता है।
🔸 कम वर्षा वाले लेकिन चावल उत्पादक क्षेत्र :- नहरों के जाल और नलकूपों की उपलब्धता के कारण पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कुछ कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी चावल की खेती संभव हो पाई है।
गेहूँ :-
गेहूँ भारत की दूसरी सबसे महत्त्वपूर्ण खाद्यान्न फसल है। यह मुख्यतः देश के उत्तर और उत्तर-पश्चिमी भागों में उगाई जाती है। गेहूँ एक रबी की फसल है।
🔸 जलवायु की आवश्यकताएँ :-
- तापमान: रबी की फसल को उगाने के लिए शीत ऋतु तथा पकने के समय खिली धूप की आवश्यकता होती है।
- वर्षा: इसे उगाने के लिए समान रूप से वितरित 50 से 75 सेमी. वार्षिक वर्षा की आवश्यकता होती है
🔸 मुख्य उत्पादक क्षेत्र :- भारत में गेहूँ उगाने वाले मुख्य रूप से दो बड़े क्षेत्र हैं:
- उत्तर-पश्चिम में गंगा-सतलुज का मैदान
- दक्कन का काली मिट्टी वाला प्रदेश
🔸 गेहूँ उत्पादन करने वाले प्रमुख राज्य हैं :- पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार तथा राजस्थान के कुछ भाग।
मोटे अनाज :-
- ज्वार, बाजरा और रागी भारत में उगाए जाने वाले प्रमुख मोटे अनाज हैं।
- पोषण संबंधी महत्व :- यद्यपि इन्हें मोटा अनाज कहा जाता है, परंतु इनमें पोषक तत्त्वों की मात्रा अधिक होती है।
- उदाहरण के लिए, रागी में लोहा, कैल्शियम, सूक्ष्म पोषक तत्त्व और भूसी प्रचुर मात्रा में पाई जाती है।
ज्वार :-
- क्षेत्रफल और उत्पादन की दृष्टि से ज्वार देश की तीसरी सबसे महत्त्वपूर्ण खाद्यान्न फसल है।
- यह मुख्यतः वर्षा पर निर्भर फसल है।
- अधिकतर आर्द्र क्षेत्रों में उगाए जाने के कारण इसके लिए सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है।
🔸 ज्वार के प्रमुख उत्पादक राज्य हैं— इसके प्रमुख उत्पादक राज्य महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश हैं।
बाजरा :-
- बाजरा बलुआ और उथली काली मिट्टी में अच्छी तरह उगाया जाता है।
- यह फसल कम वर्षा वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है।
- शुष्क और अर्ध-शुष्क जलवायु में उगाई जाती है।
🔸 बाजरा के प्रमुख उत्पादक राज्य हैं :- राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और हरियाणा।
रागी :-
- रागी शुष्क प्रदेशों की फसल है।
- यह कम वर्षा वाले क्षेत्रों में अच्छी तरह उगती है।
- यह लाल, काली, बलुआ, दोमट तथा उथली काली मिट्टी में अच्छी तरह उगाई जाती है।
🔸 रागी के प्रमुख उत्पादक राज्य हैं :- कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, सिक्किम, झारखंड और अरुणाचल प्रदेश।
मक्का :-
मक्का एक ऐसी फसल है जिसका प्रयोग खाद्यान्न और चारे, दोनों रूपों में किया जाता है। यह मुख्यतः एक खरीफ फसल है।
- तापमान :- मक्का को उगाने के लिए 21° से 27° सेल्सियस तापमान उपयुक्त होता है।
- मृदा प्रकार :- यह पुरानी जलोढ़ मिट्टी में अच्छी तरह उगाई जाती है।
- अपवाद :- बिहार जैसे कुछ राज्यों में इसे रबी की ऋतु में भी उगाया जाता है।
- उत्पादन वृद्धि के कारक :- उच्च पैदावार देने वाले बीज, उर्वरकों और सिंचाई जैसी आधुनिक प्रौद्योगिक निवेशों से मक्का का उत्पादन बढ़ा है।
- मक्का के प्रमुख उत्पादक राज्य हैं :- कर्नाटक, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना।
दालें :-
भारत दुनिया में दालों का सबसे बड़ा उत्पादक और सबसे बड़ा उपभोक्ता दोनों है। शाकाहारी भोजन में दालें प्रोटीन का प्रमुख स्रोत होती हैं।
🔸 भारत की प्रमुख दालें हैं :- तुर (अरहर), उड़द, मूग, मसूर, मटर और चना भारत की मुख्य दलहनी फसले हैं।
🔸 प्रमुख उत्पादक राज्य :- भारत में मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, और कर्नाटक दाल के मुख्य उत्पादक राज्य है।
🔸 दलों की विशेषताएँ :-
- दालों को कम नमी की आवश्यकता होती है।
- इन्हें शुष्क परिस्थितियों में भी उगाया जा सकता है।
- फलीदार फसलें होने के कारण अरहर को छोड़कर अन्य सभी दालें वायु से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती हैं।
- इसी कारण दालों को अन्य फसलों के साथ फसल चक्र में बोया जाता है।
खाद्यान्नों के अलावा अन्य खाद्य फसलें :-
गन्ना :-
गन्ना एक उष्ण एवं उपोष्ण कटिबंधीय फसल है। यह लंबी अवधि की फसल है (तैयार होने में लगभग एक वर्ष लगता है)। ब्राज़ील के बाद भारत गन्ने का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है।
🔸 उपयुक्त भौगोलिक दशाएँ :-
- इसे उगाने के लिए 21°–27° सेल्सियस तापमान उपयुक्त होता है।
- 75 से 100 सेमी. वार्षिक वर्षा वाली उष्ण एवं आर्द्र जलवायु इसकी खेती के लिए अनुकूल होती है।
- कम वर्षा वाले क्षेत्रों में सिंचाई की आवश्यकता होती है।
🔸 मिट्टी और श्रम :-
- गन्ना अनेक प्रकार की मिट्टियों में उगाया जा सकता है।
- बुआई से लेकर कटाई तक इसमें अधिक शारीरिक श्रम की आवश्यकता होती है।
🔸 उपयोग :- गन्ने से चीनी, गुड़, खांडसारी और शीरा जैसे निम्न उत्पाद बनाए जाते हैं।
🔸 प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्य :- उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र. कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, बिहार, पंजाब और हरियाणा गन्ना के मुख्य उत्पादक राज्य हैं।
तिलहन :-
- भारत वर्ष 2020 में चीन के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा तिलहन उत्पादक देश था।
- देश के कुल बोए गए क्षेत्र का लगभग 12% भाग तिलहन फसलों के अंतर्गत आता है।
🔸 भारत में उगाई जाने वाली प्रमुख तिलहन फसलें हैं :- मूँगफली, सरसों, नारियल, तिल, सोयाबीन, अरंडी, बिनौला, अलसी और सूरजमुखी।
🔸 उपयोग :-
- इनमें से अधिकांश तिलहन खाद्य तेल के रूप में प्रयोग किए जाते हैं।
- कुछ तिलहन साबुन, प्रसाधन (श्रृंगार का सामान) और उबटन उद्योग में कच्चे माल के रूप में भी प्रयोग किया जाता है।
मूँगफली: प्रमुख तिलहन :-
- मूँगफली एक खरीफ की फसल है।
- देश के कुल तिलहन उत्पादन का लगभग आधा भाग मूँगफली से प्राप्त होता है।
- गुजरात मूँगफली का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है।
- इसके अतिरिक्त राजस्थान और तमिलनाडु मूँगफली के अन्य मुख्य उत्पादक राज्य हैं (2019-20)।
फसल ऋतु के अनुसार तिलहन :-
- अलसी और सरसों रबी की फसलें हैं।
- तिल उत्तरी भारत में खरीफ की फसल है और दक्षिणी भारत में रबी की।
- अरंडी, खरीफ और रबी दोनों ही फसल ऋतुओं में बोया जाता है।
चाय :-
- चाय रोपण कृषि का एक प्रमुख उदाहरण है।
- यह एक महत्त्वपूर्ण पेय पदार्थ की फसल है।
- चाय की खेती को अंग्रेज़ भारत में लेकर आए थे।
- वर्तमान समय में अधिकांश चाय बागानों के मालिक भारतीय हैं।
🔸 चाय के लिए उपयुक्त जलवायु एवं मिट्टी की आवश्यकता :-
- चाय का पौधा उष्ण और उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु में अच्छी तरह उगता है।
- इसके लिए ह्यूमस और जीवांश युक्त गहरी मिट्टी उपयुक्त होती है।
- सुगम जल निकास वाले ढलवाँ क्षेत्र चाय की खेती के लिए अनुकूल होते हैं।
- चाय की झाड़ियों को उगाने के लिए वर्ष भर कोष्ण, नम और पालारहित जलवायु आवश्यक होती है।
- वर्ष भर समान रूप से होने वाली वर्षा चाय की कोमल पत्तियों के विकास में सहायक होती है।
🔸 श्रम :- चाय एक श्रम-सघन उद्योग है। इसके लिए प्रचुर मात्रा में सस्ता और कुशल श्रम चाहिए।
🔸 उत्पादन में भारत का स्थान :- सन् 2020 में भारत, चीन के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा चाय उत्पादक देश था।
🔸 भारत में प्रमुख चाय उत्पादक क्षेत्र :- चाय के मुख्य उत्पादक क्षेत्रों में असम, पश्चिमी बंगाल में दार्जिलिंग और जलपाईगुड़ी जिलों की पहाड़ियाँ, तमिलनाडु और केरल हैं।
🔸 अन्य चाय उत्पादक राज्य :- इनके अलावा हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, मेघालय, आंध्र प्रदेश और त्रिपुरा आदि राज्यों में भी चाय उगाई जाती है।
कॉफी :-
- भारतीय कॉफी अपनी उच्च गुणवत्ता के लिए विश्व-विख्यात है।
- भारत में मुख्यतः अरेबिका किस्म की कॉफी उगाई जाती है।
🔸 उत्पत्ति :-
- अरेबिका किस्म की कॉफी को प्रारम्भ में यमन से भारत लाया गया था।
- इस किस्म की कॉफी की विश्व भर में अधिक माँग है।
- भारत में कॉफी की खेती की शुरुआत बाबा बूदन पहाड़ियों से हुई।
- आज भी कॉफी की खेती मुख्यतः नीलगिरि की पहाड़ियों के आसपास की जाती है।
🔸 जलवायु और स्थल :- कॉफी की खेती के लिए उष्ण और आर्द्र जलवायु, पर्वतीय ढलान वाले क्षेत्र सबसे उपयुक्त माने जाते हैं।
🔸 कॉफी के प्रमुख उत्पादक राज्य हैं :- कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु।
बागवानी फसलें :-
- सन् 2020 में भारत का विश्व में फलों और सब्जियों के उत्पादन में दूसरा स्थान था, जो चीन के बाद है।
- भारत उष्ण और शीतोष्ण कटिबंधीय, दोनों प्रकार के फलों का प्रमुख उत्पादक देश है।
🔸 प्रमुख फल एवं उनके उत्पादक क्षेत्र :-
- आम — महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बंगाल
- संतरा — नागपुर (महाराष्ट्र) और चेरापूँजी (मेघालय)
- केला — केरल, मिजोरम, महाराष्ट्र और तमिलनाडु
- लीची — उत्तर प्रदेश और बिहार
- अनन्नास — मेघालय
- अंगूर — आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र
- सेब, नाशपाती, खूबानी और अखरोट — हिमाचल प्रदेश और जम्मू और कश्मीर
इन भारतीय फलों की विश्वभर में बहुत अधिक माँग है।
🔸 सब्ज़ी उत्पादन में भारत :- भारत का मटर फूलगोभी, प्याज, बंदगोभी, टमाटर, बैंगन और आलू उत्पादन में प्रमुख स्थान है।
अखाद्य फसलें :-
रबर :-
- रबर मूल रूप से भूमध्यरेखीय क्षेत्र की फसल है।
- विशेष परिस्थितियों में इसे उष्ण एवं उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में भी उगाया जाता है।
- रबर एक महत्त्वपूर्ण औद्योगिक कच्चा माल है, जिसका प्रयोग अनेक उद्योगों में किया जाता है।
🔸 जलवायु की आवश्यकताएँ :-
- रबर की खेती के लिए 200 सेमी. से अधिक वर्षा आवश्यक होती है।
- इसे 25° सेल्सियस से अधिक तापमान तथा नम एवं आर्द्र जलवायु की आवश्यकता होती है।
🔸 भारत में प्रमुख रबर उत्पादक क्षेत्र :- इसे मुख्य रूप से केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, अंडमान निकोबार द्वीप समूह और मेघालय में गारो पहाड़ियों में उगाया जाता है।
रेशेदार फसलें :-
🔸 भारत में उगाई जाने वाली मुख्य रेशेदार फसलें हैं :- कपास, जूट, सन और प्राकृतिक रेशम।
🔸 रेशे का स्रोत :-
- कपास, जूट और सन :- ये तीनों फसलें मिट्टी में उगाई जाती हैं और पौधों से रेशा प्राप्त होता है।
- प्राकृतिक रेशम :- यह रेशम के कीड़ों के कोकून से प्राप्त होता है।
🔸 रेशम उत्पादन :-
- रेशम के कीड़े मलबरी पेड़ की हरी पत्तियों पर पलते हैं।
- रेशम के कीड़ों के पालन की प्रक्रिया को रेशम उत्पादन कहा जाता है।
- रेशेदार फसलें वस्त्र उद्योग के लिए महत्त्वपूर्ण कच्चा माल प्रदान करती हैं।
कपास :-
- भारत को कपास के पौधे का मूल स्थान माना जाता है।
- कपास सूती वस्त्र उद्योग का प्रमुख कच्चा माल है।
- कपास उत्पादन में भारत का विश्व में चीन के बाद दूसरा स्थान है।
- कपास एक खरीफ की फसल है।
- इसे पककर तैयार होने में लगभग 6 से 8 महीने लगते हैं।
🔸 मिट्टी :- दक्कन पठार के शुष्कतर भागों की काली मिट्टी कपास की खेती के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है।
🔸 जलवायु की आवश्यकताएँ :-
- तापमान: अधिक (उष्ण जलवायु)
- वर्षा: हल्की वर्षा या सिंचाई
- पाला: लगभग 210 पाला-रहित दिन
- धूप: पकने के समय खिली हुई धूप
🔸 प्रमुख कपास उत्पादक राज्य :- महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश कपास के मुख्य उत्पादक राज्य हैं।
जूट :-
- जूट को “सुनहरा रेशा” कहा जाता है।
- यह भारत की एक महत्त्वपूर्ण रेशेदार फसल है।
🔸 मिट्टी और क्षेत्र और जलवायु की आवश्यकताएँ :-
- जूट की खेती बाढ़ के मैदानों में की जाती है।
- यह उत्तम जल-निकास वाली उर्वर मिट्टी में अच्छी तरह उगती है।
- हर वर्ष बाढ़ से आई नई जलोढ़ मिट्टी जूट की खेती के लिए लाभदायक होती है।
- जूट के विकास के समय उच्च तापमान की आवश्यकता होती है।
🔸 प्रमुख जूट उत्पादक राज्य :- पश्चिम बंगाल, बिहार, असम और ओडिशा तथा मेघालय जूट के मुख्य उत्पादक राज्य हैं।
🔸 उपयोग :- जूट से बोरियाँ, चटाइयाँ, रस्सियाँ, तंतु व धागे, गलीचे तथा अन्य हस्तशिल्प वस्तुएँ बनाई जाती हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्व :-
- भारत एक कृषि प्रधान देश है।
- देश की लगभग दो-तिहाई जनसंख्या अपनी आजीविका के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर करती है।
- कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का एक महत्त्वपूर्ण आधार है।
- कृषि का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में योगदान लगभग 16% से 18% के बीच है। (2024-25)।
- यह देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करती है।
- कृषि से उद्योगों को कच्चा माल (जैसे कपास, जूट, गन्ना) प्राप्त होता है।
- कृषि से रोज़गार के अवसर भी बड़े पैमाने पर सृजित होते हैं।
भारतीय कृषि के समक्ष चुनौतियाँ एवं सुधार :-
🔹 प्रमुख चुनौतियाँ :-
- भारत में कृषि हजारों वर्षों से की जा रही है, परंतु लंबे समय तक प्रौद्योगिकी और संस्थागत परिवर्तनों के अभाव में इसका विकास धीमा रहा।
- सिंचाई साधनों के विकास के बावजूद आज भी देश के बड़े भाग में किसान मानसून और मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता पर निर्भर हैं।
- तेजी से बढ़ती जनसंख्या के लिए पर्याप्त खाद्यान्न उत्पादन एक बड़ी चुनौती है।
- कृषि देश की 60% से अधिक जनसंख्या को आजीविका प्रदान करती है, इसलिए इसमें सुधार आवश्यक है।
🔹 स्वतंत्रता के बाद संस्थागत सुधार :-
- स्वतंत्रता के बाद जमींदारी प्रथा का उन्मूलन किया गया।
- जोतों की चकबंदी और सहकारिता को बढ़ावा दिया गया।
- प्रथम पंचवर्षीय योजना में भूमि सुधार को मुख्य लक्ष्य बनाया गया।
- पुश्तैनी अधिकारों के कारण भूमि छोटे-छोटे टुकड़ों में बँटती जा रही थी, जिससे चकबंदी आवश्यक हो गई।
- भूमि सुधार कानून तो बने, लेकिन उनका क्रियान्वयन प्रभावी नहीं रहा।
🔹 तकनीकी सुधार एवं कृषि क्रांतियाँ :-
- 1960–70 के दशकों में सरकार ने कई कृषि सुधार शुरू किए।
- हरित क्रांति — अधिक उपज देने वाली किस्में और पैकेज टेक्नोलॉजी पर आधारित।
- श्वेत क्रांति — दुग्ध उत्पादन में वृद्धि।
- इन सुधारों का लाभ कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित रहा।
भारत में किसानों के सामने चुनौतियाँ :-
- मानसून की अनिश्चितता :- समय पर और पर्याप्त वर्षा न होने से फसलें प्रभावित होती हैं।
- गरीबी और ऋण का दुश्चक्र :- कम आय के कारण किसान कर्ज़ में फँस जाते हैं।
- शहरों की ओर पलायन :- कृषि से कम लाभ मिलने पर लोग शहरों में काम की तलाश करते हैं।
- सरकारी सुविधाओं तक सीमित पहुँच :- सब्सिडी, बीमा और ऋण योजनाओं का पूरा लाभ नहीं मिल पाता।
- बिचौलियों का शोषण :- किसानों को फसलों का उचित मूल्य नहीं मिल पाता।
- अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा :- सस्ते आयात और वैश्विक बाजार के दबाव से किसान प्रभावित होते हैं।
सरकार द्वारा किसानों के हित में किए गए संस्थागत सुधार :-
🔹 (1980-1990 के दशक) :-
- व्यापक भूमि विकास कार्यक्रम शुरू किए गए।
- सूखा, बाढ़, चक्रवात, आग और बीमारी से फसलों की सुरक्षा हेतु फसल बीमा योजनाएँ शुरू की गईं।
- किसानों को कम ब्याज पर ऋण देने के लिए ग्रामीण बैंक, सहकारी समितियाँ और राष्ट्रीयकृत बैंक स्थापित किए गए।
- किसानों के लिए मौसम जानकारी हेतु आकाशवाणी और दूरदर्शन पर कृषि कार्यक्रम और बुलेटिन प्रसारित किए जाते हैं।
🔹 किसानों के लिए नई सुविधाएँ :-
- सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की घोषणा की जाती है ताकि किसानों को बिचौलियों से बचाया जा सके।
- किसानों को आसान ऋण सुविधा देने के लिए किसान क्रेडिट कार्ड योजना शुरू की गई।
- किसानों की सुरक्षा के लिए व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा योजना भी लागू की गई।