NCERT Class 10th Social Science Geography Notes Chapter 5 खनिज तथा ऊर्जा संसाधन

 इस अध्याय मे हम खनिज, खनिजों की उपलब्धता, खनिजों का वर्गीकरण, धात्विक खनिज, लौह खनिज, अलौह खनिज, अधात्विक खनिज, खनिजों का संरक्षण, उर्जा संसाधन, परम्परागत उर्जा के स्रोत, गैर – परम्परागत उर्जा के स्रोत, उर्जा संसाधनों का संरक्षण आदि के बारे में विस्तार से पड़ेगे।

खनिज तथा ऊर्जा संसाधन

खनिज :-

खनिज प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले वे पदार्थ हैं जिनकी निश्चित रासायनिक एवं आंतरिक संरचना होती है। खनिजों के भौतिक गुण निश्चित होते हैं और ये मानव जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।

🔸 उदाहरण :- खनिज कठोर हीरे से लेकर नरम चूना तक, किसी भी रूप में हो सकते हैं।

खनिजों का निर्माण :-

खनिजों का निर्माण उस समय की भौतिक परिस्थितियाँ (तापमान, दबाव) और रासायनिक परिस्थितियाँ पर निर्भर करता है। इन्हीं परिस्थितियों के आधार पर विभिन्न प्रकार के खनिजों का निर्माण होता है।

चट्टानों और खनिजों का संबंध :-

चट्टानें खनिजों के समरूप तत्त्वों के यौगिक हैं। कुछ चट्टानें जैसे चूना पत्थर केवल एक ही खनिज से बनी हैं; लेकिन अधिकतर चट्टानें विभिन्न अनुपातों के अनेक खनिजों का योग हैं।

वैसे तो 2000 से अधिक खनिजों की पहचान हो चुकी है, लेकिन अधिकांश चट्टानों में केवल कुछ ही प्रमुख खनिज पाए जाते हैं।

मानव जीवन में खनिजों का महत्व :-

  • खनिज मानव जीवन का अत्यंत आवश्यक भाग हैं।
  • दैनिक जीवन में काम आने वाली छोटी से छोटी वस्तु जैसे सुई से लेकर बड़े जहाज तक खनिजों से ही बनाए जाते हैं।
  • इमारतें, पुल, सड़कें आदि के निर्माण में खनिजों का उपयोग होता है।
  • हमारे भोजन में भी कई प्रकार के खनिज पाए जाते हैं जो शरीर के लिए आवश्यक होते हैं।
  • मशीनें, औज़ार, बर्तन और परिवहन के साधन जैसे रेल, कार आदि खनिजों से ही बनाए जाते हैं।

खनिजों के भौतिक गुण :-

खनिजों में निम्नलिखित गुण पाए जाते हैं:

  • रंग
  • कठोरता
  • चमक
  • घनत्व
  • क्रिस्टल का आकार/संरचना

🔸 नोट :- भू-वैज्ञानिक इन्हीं गुणों के आधार पर खनिजों का वर्गीकरण करते हैं।

खनिजों का वर्गीकरण :-

सामान्य व वाणिज्यिक (व्यापारिक) उद्देश्य हेतु खनिज निम्न प्रकार से वर्गीकृत किये जाते हैं :-

  1. धात्विक,
  2. अधात्विक
  3. ऊर्जा खनिज

1. धात्विक खनिज :-

वे खनिज जिनसे धातुओं का अंश होता है, धात्विक खनिज कहलाते हैं। ये प्रायः कठोर होते हैं और इनमें चमक पाई जाती है।

इन्हें आगे तीन भागों में बाँटा जा सकता है:

  1. लौह धातु :- जिनमें लोहे का अंश होता है। उदाहरण: लौह अयस्क, मैंगनीज, निकिल और कोबाल्ट।
  2. अलौह धातु :- जिनमें लोहे का अंश नहीं होता। उदाहरण: तांबा, सीसा, जस्ता और बॉक्साइट।
  3. बहुमूल्य खनिज :- जो बहुत कीमती होते हैं। उदाहरण: सोना, चाँदी और प्लैटिनम।

2. अधात्विक खनिज :-

वे खनिज जिनसे धातु नहीं पाई जाती, अधात्विक खनिज कहलाते हैं। इनका उपयोग सीमेंट, काँच, उर्वरक आदि के निर्माण में होता है। उदाहरण: चूना पत्थर, अभ्रक, जिप्सम।

3. ऊर्जा खनिज :-

वे खनिज जिनसे ऊर्जा प्राप्त होती है, ऊर्जा खनिज कहलाते हैं। इनका उपयोग उद्योगों, परिवहन और बिजली उत्पादन में होता है। उदाहरण: कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस।

अयस्क क्या है?

खनिज सामान्यतः अयस्कों में पाए जाते हैं। अयस्क वह पदार्थ है जिसमें किसी खनिज का पर्याप्त मात्रा में संचयन हो। खनन तभी आर्थिक रूप से उपयोगी होता है जब अयस्क में खनिज पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो।

खनन :-

पृथ्वी के गर्भ से धातुओं, अयस्कों तथा अन्य उपयोगी खनिजों को बाहर निकालने की प्रक्रिया को खनन कहते हैं।

खनन उद्योग को घातक उद्योग क्यों कहा जाता है ?

इस उद्योग से श्रमिकों के स्वास्थ्य और पर्यावरण पर बहुत खराब प्रभाव पड़ता है।

🔹 खनन के दुष्प्रभाव :-

🔸 खनन श्रमिकों पर स्वास्थ्य संबंधी जोखिम :-

  • खदानों में काम करने वाले श्रमिक लगातार धूल और हानिकारक धुएँ में साँस लेने के कारण फेफड़ों से संबंधित रोगों से ग्रस्त हो जाते हैं।
  • खदानों की छत गिरना, जलप्लावित होना तथा कोयला खदानों में आग लगना जैसे खतरे सदैव बने रहते हैं।

🔸 खनन का पर्यावरण पर प्रभाव :-

  • खनन क्षेत्रों में जल स्रोत प्रदूषित हो जाते हैं, जिससे पीने के पानी की समस्या उत्पन्न होती है।
  • खनन के बाद अवशिष्ट पदार्थों और खनिज तरल के ढेर के कारण भूमि और मिट्टी की गुणवत्ता नष्ट होती है।
  • ये अवशिष्ट नदियों और नालों में बहकर उन्हें प्रदूषित करते हैं तथा पर्यावरण को गंभीर क्षति पहुँचती है।

खनिजों की प्राप्ति के प्रमुख स्थल :-

खनिज मुख्यतः निम्न शैल समूहों से प्राप्त होते हैं—

🔸 (क) आग्नेय एवं कायांतरित चट्टानें :-

  • स्थान :- इन चट्टानों में खनिज दरारों, जोड़ों और भ्रंशों में पाए जाते हैं।
  • रूप :- छोटे जमाव शिराओं के रूप में तथा बड़े जमाव परतों के रूप में मिलते हैं।
  • निर्माण :- ये खनिज तरल या गैसीय अवस्था में दरारों से ऊपर आते हैं और ठंडे होकर जम जाते हैं।
  • मुख्य खनिज :- जस्ता, ताँबा, सीसा जैसे धात्विक खनिज इसी प्रकार प्राप्त होते हैं।

🔸 (ख) अवसादी चट्टानें :-

  • स्थान :- अनेक खनिज अवसादी चट्टानों की परतों में पाए जाते हैं।
  • निर्माण प्रक्रिया :- इनका निर्माण क्षैतिज परतों में निक्षेपण, संचयन व जमाव का परिणाम है।
    • निक्षेपण एवं दाब: लंबे समय तक अधिक ऊष्मा और दबाव से कोयला व कुछ लौह अयस्क बनते हैं।
    • वाष्पीकरण: शुष्क प्रदेशों में वाष्पीकरण से जिप्सम, पोटाश, नमक, सोडियम जैसे खनिज बनते हैं।

🔸 (ग) अपघटन द्वारा निर्माण :-

  • निर्माण प्रक्रिया :- खनिजों के निर्माण की एक अन्य विधि धरातलीय चट्टानों का अपघटन है। चट्टानों के घुलनशील तत्त्वों के अपरदन के पश्चात् अयस्क वाली अवशिष्ट चट्टानें रह जाती हैं।
  • उदाहरण :- बॉक्साइट का निर्माण इसी प्रकार होता है।

🔸 (घ) प्लेसर निक्षेप :-

  • स्थान :- पहाड़ियों के आधार और घाटी की रेत में पाए जाते हैं।
  • विशेषता :- ये खनिज भारी व कठोर होते हैं, जो पानी द्वारा बहाकर लाए जाते हैं और एकत्र हो जाते हैं।
  • मुख्य खनिज :- इनमें सोना, चाँदी, टिन व प्लेटिनम जैसे खनिज मिलते हैं।

🔸 (ङ) महासागरीय संसाधन :-

  • महासागरीय जल में अनेक खनिज घुले रहते हैं, पर अधिकांश बहुत फैले होने के कारण निकालना महँगा है।
  • फिर भी प्राप्त किए जाने वाले खनिज :-
    • समुद्री जल में नमक, मैगनीशियम और ब्रोमाइन पाए जाते हैं।
    • महासागर की तली में मैंगनीज ग्रंथिकाएँ पाई जाती हैं।

भारत में खनिज संसाधनों का वितरण :-

भारत अच्छे और विविध प्रकार के खनिज संसाधनों से सम्पन्न है। लेकिन खनिजों का वितरण असमान है। यानी कहीं बहुत ज़्यादा खनिज हैं और कहीं बिल्कुल नहीं।

🔸 भारत में खनिज वितरण में असमानता के कारण :- खनिजों के वितरण में यह अंतर भू-गर्भिक संरचना और उनके बनने के समय व प्रक्रियाओं की भिन्नता के कारण है।

खनिज वितरण के प्रमुख क्षेत्र :-

  • प्रायद्वीपीय पठार :- प्रायद्वीपीय चट्टानों में कोयला, धात्विक खनिज, अभ्रक तथा अनेक अधात्विक खनिजों के प्रमुख भंडार पाए जाते हैं।
  • गुजरात और असम :- प्रायद्वीप के पश्चिमी और पूर्वी किनारों पर, विशेष रूप से गुजरात और असम की तलछटी चट्टानों में, खनिज तेल के प्रमुख निक्षेप स्थित हैं।
  • राजस्थान :- राजस्थान में प्रायद्वीपीय शैल क्रम के साथ अनेक अलौह खनिज पाए जाते हैं। जैसे: ताँबा, सीसा, जस्ता आदि।
  • उत्तरी भारत के मैदान :- उत्तरी भारत के विस्तृत जलोढ़ मैदान आर्थिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण खनिजों से लगभग विहीन हैं।

खदान का निर्माण :-

जब कई विकल्पों में से किसी एक खनिज निक्षेप का चयन हो जाता है, तब वह खनिज निक्षेप या भंडार एक खदान में परिवर्तित हो जाता है।

खनिज भंडार से खदान बनने की शर्तें :-

किसी खनिज जमाव का आर्थिक दृष्टि से खनन योग्य (व्यवहार्य) होना निम्न बातों पर निर्भर करता है:

  • अयस्क में खनिज की सांद्रता (कितनी शुद्धता से मिल रहा है)।
  • उत्खनन (खनन) की सुगमता (निकालना कितना आसान/महँगा है)।
  • बाजार की निकटता (परिवहन लागत कम हो)।

लौह खनिज क्या हैं?

जिन खनिजों में लौह पाया जाता है, उन्हें लौह खनिज कहते हैं। ये धात्विक खनिजों की श्रेणी में आते हैं।

🔸लौह खनिज का महत्व :-

  • लौह खनिज धात्विक खनिजों के कुल उत्पादन मूल्य के तीन चौथाई भाग का योगदान करते हैं।
  • ये धातु शोधन उद्योगों के विकास को मजबूत आधार प्रदान करते हैं।

भारत में लौह खनिज :-

  • भारत इन खनिजों में स्वयं संपन्न है।
  • यह अपनी घरेलू औद्योगिक माँग को पूरा करने के बाद बड़ी मात्रा में इनका निर्यात भी करता है।
  • इससे देश को विदेशी मुद्रा की प्राप्ति होती है।

लौह अयस्क :-

लौह अयस्क एक आधारभूत खनिज है। इसे औद्योगिक विकास की रीढ़ कहा जाता है। भारत में लौह अयस्क के विपुल संसाधन विद्यमान हैं। भारत उच्च कोटि के लोहांशयुक्त लौह अयस्क में धनी है।

🔹 लौह अयस्क के प्रमुख प्रकार :-

भारत में मुख्य रूप से दो प्रकार के उच्च कोटि के लौह अयस्क मिलते हैं:

🔸 (क) मैग्नेटाइट :- मैग्नेटाइट सर्वोत्तम प्रकार का लौह अयस्क है, जिसमें लगभग 70 प्रतिशत लोहांश पाया जाता है। इसमें उत्कृष्ट चुंबकीय गुण होते हैं, जिसके कारण यह विद्युत उद्योगों में विशेष रूप से उपयोगी है।

🔸 (ख) हेमेटाइट :- हेमेटाइट सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण औद्योगिक लौह अयस्क है और इसका उपयोग सबसे अधिक मात्रा में किया जाता है। यद्यपि इसमें लोहांश की मात्रा मैग्नेटाइट की तुलना में कम होती है, फिर भी इसमें लगभग 50 से 60 प्रतिशत लोहांश पाया जाता है।

🔹 भारत में लौह अयस्क का उत्पादन (2024-25) :-

वित्त वर्ष 2024-25 में भारत में लौह अयस्क का उत्पादन लगभग 289 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) रहा, जो पिछले वर्ष (277 MMT) की तुलना में लगभग 4.3% अधिक है। यह नए रिकॉर्ड स्तर पर उत्पादन का संकेत देता है।

🔸 भारत में लौह अयस्क उत्पादन के मुख्य प्रदेश हैं :- ओडिशा, छत्तीसगढ़, कर्नाटक तथा झारखंड से प्राप्त हुआ, ये राज्य देश के कुल उत्पादन में सबसे बड़ा योगदान देते हैं।

भारत में लौह अयस्क की प्रमुख पेटियाँ :-

  • (i) ओडिशा–झारखंड पेटी
  • (ii) दुर्ग–बस्तर–चन्द्रपुर पेटी
  • (iii) बल्लारि–चित्रदुर्ग, चिक्कमंगलूरु–तुमकूरु पेटी
  • (iv) महाराष्ट्र–गोआ पेटी

🔹 (i) ओडिशा–झारखंड पेटी :-

  • इस पेटी में उच्च कोटि का हेमेटाइट लौह अयस्क पाया जाता है।
    • ओडिशा :- ओडिशा के मयूरभंज तथा केंदूझर जिलों में स्थित बादाम पहाड़ खदानों से लौह अयस्क निकाला जाता है।
    • झारखंड :- झारखंड के सिंहभूम जिले में गुआ तथा नोआमुंडी से भी हेमेटाइट अयस्क का खनन किया जाता है।

🔹 (ii) दुर्ग–बस्तर–चन्द्रपुर पेटी :-

  • क्षेत्र :- यह पेटी छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र राज्यों में विस्तृत है।
  • प्रमुख स्थल :- छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में स्थित बेलाडिला पहाड़ी श्रृंखलाओं में अति उत्तम कोटि का हेमेटाइट लौह अयस्क पाया जाता है।
  • विशेषता :- यहाँ इस गुणवत्ता के लौह अयस्क के 14 प्रमुख जमाव मिलते हैं, जिनमें इस्पात निर्माण के लिए उत्कृष्ट भौतिक गुण विद्यमान हैं।
  • निर्यात :- इन खदानों से प्राप्त लौह अयस्क का निर्यात विशाखापट्टनम् पत्तन के माध्यम से जापान और दक्षिण कोरिया को किया जाता है।

🔹 (iii) बल्लारि–चित्रदुर्ग, चिक्कमंगलूरु–तुमकूरु पेटी :-

  • क्षेत्र :- यह पेटी कर्नाटक में स्थित है और यहाँ लौह अयस्क के बड़े भंडार पाए जाते हैं।
  • प्रमुख स्थल :- पश्चिमी घाट में स्थित कुद्रेमुख की खदानें शत-प्रतिशत निर्यात इकाई हैं।
  • विशेषता :- यह एक 100% निर्यात इकाई है। कुद्रेमुख निक्षेपों को संसार के सबसे बड़े लौह अयस्क निक्षेपों में गिना जाता है।
  • परिवहन :- यहाँ से लौह अयस्क कर्दम रूप में पाइपलाइन द्वारा मंगलूरु पत्तन के निकट भेजा जाता है।

🔹 (iv) महाराष्ट्र–गोआ पेटी :-

  • क्षेत्र :- यह पेटी गोआ तथा महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में स्थित है।
  • गुणवत्ता :- अयस्क उतनी उच्च कोटि का नहीं है।
  • उपयोग :- इसका कुशलतापूर्वक दोहन किया जाता है।
  • निर्यात :- इस पेटी से प्राप्त लौह अयस्क का निर्यात मरमागाओ पत्तन से किया जाता है।

मैंगनीज :-

  • मैंगनीज एक महत्त्वपूर्ण खनिज है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से इस्पात के विनिर्माण में किया जाता है।
  • लगभग एक टन इस्पात बनाने में 10 किलोग्राम मैंगनीज की आवश्यकता होती है।
  • इसके अतिरिक्त मैंगनीज का प्रयोग ब्लीचिंग पाउडर, कीटनाशक दवाओं तथा पेंट के निर्माण में भी किया जाता है।
  • इस प्रकार मैंगनीज उद्योगों के लिए एक अत्यंत उपयोगी खनिज है।

अलौह खनिज क्या हैं?

जिन खनिजों में लौह (Iron) नहीं पाया जाता, उन्हें अलौह खनिज कहते हैं। उदाहरण: ताँबा (Copper), बॉक्साइट (Bauxite), सीसा (Lead), सोना (Gold) आदि।

🔸 औद्योगिक महत्व :- ये धातु शोधन, इंजीनियरिंग, विद्युत व इलेक्ट्रॉनिक उद्योगों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

भारत में अलौह खनिजों की स्थिति :-

  • भारत में अलौह खनिजों का भंडार और उत्पादन संतोषजनक नहीं है (अर्थात आत्मनिर्भर नहीं)।
  • परिणामस्वरूप, देश को इन खनिजों की आवश्यकता पूर्ति के लिए आयात पर निर्भर रहना पड़ता है।

ताँबा :-

भारत में ताँबे के भंडार और उत्पादन अपेक्षाकृत कम हैं।

🔸 भौतिक गुण :- ताँबा घातवर्ध्य, तन्य तथा उत्तम ताप एवं विद्युत सुचालक होता है।

🔸 उपयोग :- इसका उपयोग मुख्यतः बिजली के तार, इलेक्ट्रॉनिक्स तथा रसायन उद्योग में किया जाता है।

🔸 उत्पादक क्षेत्र :-

  • मध्य प्रदेश की बालाघाट खदानें देश के लगभग 52% ताँबे का उत्पादन करती हैं।
  • झारखंड का सिंहभूम जिला ताँबे का प्रमुख उत्पादक क्षेत्र है।
  • राजस्थान की खेतड़ी खदानें भी ताँबे के लिए प्रसिद्ध रही हैं।

बॉक्साइट :-

बॉक्साइट एल्यूमिनियम का प्रमुख अयस्क है, जिससे सर्वाधिक मात्रा में एल्यूमिना प्राप्त किया जाता है।

🔸 दिखावट :- बॉक्साइट का रूप क्ले (Clay) जैसा होता है।

🔸 निर्माण :- इसका निर्माण एल्यूमिनियम सिलिकेटों से समृद्ध चट्टानों के विघटन (अपघटन) से होता है।

🔸 भारत में प्रमुख भंडार क्षेत्र :-

  • भारत में बॉक्साइट के प्रमुख निक्षेप अमरकंटक पठार, मैकाल पहाड़ियाँ तथा बिलासपुर–कटनी पठारी क्षेत्र में पाए जाते हैं।
  • ओडिशा भारत का सबसे बड़ा बॉक्साइट उत्पादक राज्य है (2018–19)।
  • ओडिशा के कोरापुट जिले में स्थित पंचपतमाली निक्षेप देश के सबसे महत्त्वपूर्ण बॉक्साइट निक्षेप हैं।

🔸 एल्यूमिनियम के गुण व महत्व :- एल्यूमिनियम एक महत्त्वपूर्ण धातु है क्योंकि यह लोहे जितनी मजबूत, अत्यधिक हल्की, उत्तम सुचालक, तथा अत्यधिक घातवर्ध्य होती है।

अभ्रक :-

अभ्रक एक ऐसा खनिज है जो प्लेटों अथवा पत्रण क्रम में पाया जाता है। यह चादरों में आसानी से विभाजित हो जाता है। इसकी परतें अत्यंत महीन होती हैं; लगभग 1000 परतें कुछ सेंटीमीटर ऊँचाई में समाहित हो सकती हैं।

🔸 अभ्रक का रंग :- अभ्रक पारदर्शी, काला, हरा, लाल, पीला या भूरा रंग का हो सकता है।

🔸 अभ्रक के विशेष गुण व उपयोग :-

  • गुण :- अभ्रक में सर्वोच्च परावैद्युत शक्ति, ऊर्जा हास का निम्न गुणांक, विंसवाहन के गुण और उच्च बोल्टेज की प्रतिरोधिता पाई जाती है।
  • उपयोग :- इन्हीं गुणों के कारण अभ्रक विद्युत एवं इलेक्ट्रॉनिक उद्योगों के लिए एक अपरिहार्य खनिज है।

🔸 भारत में अभ्रक का वितरण (प्रमुख पेटियाँ) :-

  • अभ्रक के प्रमुख निक्षेप छोटानागपुर पठार के उत्तरी किनारों पर पाए जाते हैं।
  • झारखंड–बिहार की कोडरमा–गया–हजारीबाग पेटी देश की अग्रणी अभ्रक उत्पादक पेटी है।
  • राजस्थान में अजमेर के आसपास के क्षेत्र प्रमुख उत्पादक हैं।
  • आंध्र प्रदेश की नेल्लोर अभ्रक पेटी भी एक महत्त्वपूर्ण उत्पादक क्षेत्र है।

चूना पत्थर :-

  • चूना पत्थर मुख्यतः कैल्शियम कार्बोनेट तथा मैगनीशियम कार्बोनेट से बनी चट्टानों में पाया जाता है।
  • यह अधिकांशतः अवसादी चट्टानों में पाया जाने वाला खनिज है।
  • चूना पत्थर सीमेंट उद्योग का आधारभूत कच्चा माल है।
  • इसका उपयोग लौह-प्रगलन की भट्टियों में भी अनिवार्य रूप से किया जाता है।

खनिज संसाधनों का संरक्षण क्यों आवश्यक है ?

खनिज संसाधनों का संरक्षण आवश्यक हैं क्योंकि :-

  • हमारी अर्थव्यवस्था (उद्योग, कृषि) खनिजों पर भारी निर्भर है।
  • खनन योग्य खनिज भू-पर्पटी का लगभग 1% ही होते हैं,
    • इसलिए इनकी मात्रा सीमित है इसीलिए यह अनवीकरणीय हैं।
  • उनके निर्माण में लाखों वर्ष लगते हैं, पर हम उनका बहुत तेजी से उपभोग कर रहे हैं।
  • खनिजों के निर्माण की भू-गर्भिक प्रक्रियाएँ अत्यंत धीमी होती हैं, जबकि उनका उपभोग बहुत तेज़ है।
  • समृद्ध खनिज भंडार देश की अत्यंत मूल्यवान संपत्ति हैं, पर सीमित हैं।

खनिज संसाधनों के संरक्षण के उपाय :-

  • खनिज संसाधनों का सुनियोजित और सतत् उपयोग किया जाना चाहिए।
  • खनन एवं परिष्करण के दौरान इन पदार्थों की बर्बादी कम हो।
  • निम्न कोटि के अयस्कों के उपयोग हेतु उन्नत प्रौद्योगिकी का विकास आवश्यक है।
  • धातुओं का पुनः चक्रण और रद्दी धातुओं का प्रयोग बढ़ाया जाए।
  • जहाँ संभव हो, विकल्पों का उपयोग किया जाए।

ऊर्जा संसाधन :-

ऊर्जा हमारे जीवन की बुनियादी ज़रूरत है। खाना पकाने में, रोशनी व ताप के लिए, गाड़ियों के संचालन तथा उद्योगों में मशीनों के संचालन में ऊर्जा की आवश्यकता होती है। ऊर्जा हमारे दैनिक जीवन तथा औद्योगिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।

ऊर्जा के स्रोत :-

ऊर्जा मुख्य रूप से इन ईंधन खनिजों से प्राप्त की जाती है:

  • जीवाश्म ईंधन: कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस।
  • परमाणु ईंधन: यूरेनियम और थोरियम।
  • विद्युत: जल विद्युत (बहते पानी से) और ताप विद्युत (कोयले या गैस से)।

ऊर्जा संसाधनों का वर्गीकरण :-

ऊर्जा संसाधनों को परंपरागत तथा गैर-परंपरागत साधनों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

  • परंपरागत स्रोत :- लकड़ी, उपले, कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, विद्युत (जल व ताप विद्युत)।
  • गैर-परंपरागत :- सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, भू-तापीय ऊर्जा, बायोगैस, परमाणु ऊर्जा।

परंपरागत एवं गैर-परंपरागत ऊर्जा साधनों में अंतर :-

परंपरागत साधनगैर-परंपरागत साधन
जो ऊर्जा स्रोत लंबे समय से उपयोग में हैंजो आधुनिक तकनीक पर आधारित हैं
ये स्रोत प्रायः सीमित और समाप्त होने वाले होते हैंये प्रायः नवीकरणीय (Renewable) होते हैं
इनसे प्रदूषण अधिक होता हैये कम प्रदूषण फैलाते हैं
उदाहरण: कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, जल एवं ताप विद्युत, लकड़ी, उपलेउदाहरण: सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, बायोगैस, परमाणु ऊर्जा

परंपरागत ऊर्जा के स्रोत :-

कोयला :-

कोयला भारत में प्रचुर मात्रा में पाया जाने वाला जीवाश्म ईंधन है। यह देश की ऊर्जा आवश्यकताओं का एक प्रमुख स्रोत है। कोयले का उपयोग विद्युत उत्पादन, उद्योगों तथा घरेलू कार्यों के लिए किया जाता है। भारत अपनी वाणिज्यिक ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मुख्यतः कोयले पर ही निर्भर है।

🔸 कोयले की भौतिक प्रकृति :-

  • यह एक स्थूल (भारी व आयतन में बड़ा) पदार्थ है।
  • प्रयोग के बाद इसका भार कम हो जाता है क्योंकि यह राख में बदल जाता है।

🔸 कोयले का निर्माण :- कोयले का निर्माण पादप पदार्थों के लाखों वर्षों तक अधिक दबाव और ताप में संपीडन से हुआ है।

कोयले के प्रकार :-

संपीडन की मात्रा, गहराई और समय के आधार पर कोयला विभिन्न रूपों में पाया जाता है—

🔸 पीट :- दलदलों में क्षय होते पादपों से पीट उत्पन्न होता है। इसमें कार्बन की मात्रा कम, नमी अधिक तथा ताप क्षमता कम होती है।

🔸 लिग्नाइट :- यह निम्न कोटि का भूरा कोयला होता है। यह मुलायम और अधिक नमीयुक्त होता है। इसके प्रमुख भंडार तमिलनाडु के नैवेली क्षेत्र में हैं और इसका उपयोग विद्युत उत्पादन में किया जाता है।

🔸 बिटुमिनस कोयला :- गहराई में दबे तथा अधिक तापमान से प्रभावित कोयले को बिटुमिनस कोयला कहा जाता है। यह सबसे अधिक वाणिज्यिक रूप से प्रयुक्त कोयला है। धातुशोधन में प्रयुक्त उच्च श्रेणी का बिटुमिनस कोयला लोहे के प्रगलन में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

🔸 एंथ्रेसाइट :- यह सर्वोत्तम गुणवत्ता वाला कठोर कोयला है।

भारत में कोयले का वितरण :-

भारत में कोयला मुख्यतः दो भूगर्भिक युगों के शैल क्रम में पाया जाता है—

🔸 (i) गोंडवाना शैल क्रम (लगभग 200 लाख वर्ष से अधिक पुराना) :- यह धातुशोधन कोयला प्रदान करता है। इसके प्रमुख क्षेत्र—

  • दामोदर घाटी (पश्चिम बंगाल और झारखंड)
  • झरिया, रानीगंज, बोकारो
  • गोदावरी, महानदी, सोन और वर्धा नदी घाटियाँ

🔸 (ii) टरशियरी निक्षेप (लगभग 55 मिलियन वर्ष पुराने) :- ये कोयला क्षेत्र उत्तर-पूर्वी भारत में पाए जाते हैं—

  • मेघालय
  • असम
  • अरुणाचल प्रदेश
  • नागालैंड

पेट्रोलियम :-

कोयले के बाद पेट्रोलियम भारत में ऊर्जा का दूसरा प्रमुख साधन है। यह ताप व प्रकाश के लिए ईंधन, मशीनों के स्नेहक, तथा अनेक विनिर्माण उद्योगों के कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त होता है।

🔸 तेल शोधन शालाएँ (रिफाइनरी) :- तेल शोधन शालाएँ संश्लेषित वस्त्र, उर्वरक और रासायनिक उद्योगों के लिए एक नोडीय बिंदु का कार्य करती हैं।

🔸 पेट्रोलियम का भूगर्भिक संरचना एवं ट्रैप प्रणाली :-

  • भारत में अधिकांश पेट्रोलियम टरशियरी युग की शैल संरचनाओं में पाया जाता है।
  • यह वलन, अपनति, गुंबद तथा भ्रंश ट्रैप में फँसा होता है, जिन्हें तेल ट्रैप कहते हैं।
  • पेट्रोलियम प्रायः संरक्ष चूना पत्थर या बालुपत्थर की परतों में पाया जाता है, जिनसे तेल प्रवाहित हो सकता है।
  • ऊपर की असरंध्र चट्टानें तेल को ऊपर उठने या नीचे रिसने से रोकती हैं।
  • प्राकृतिक गैस, हल्की होने के कारण, प्रायः खनिज तेल के ऊपर पाई जाती है।

🔸 भारत के प्रमुख पेट्रोलियम उत्पादक क्षेत्र—

  • मुम्बई हाई: यह भारत का सबसे बड़ा अपतटीय तेल क्षेत्र है।
  • गुजरात: यहाँ का सबसे महत्वपूर्ण तेल क्षेत्र अंकलेश्वर है।
  • असम: यह भारत का सबसे पुराना तेल उत्पादक राज्य है। इसके मुख्य क्षेत्र हैं— डिगबोई, नहरकटिया और मोरन।

प्राकृतिक गैस :-

प्राकृतिक गैस प्रायः पेट्रोलियम के भंडारों के साथ पाई जाती है। जब कच्चे तेल को सतह पर लाया जाता है, तब यह मुक्त हो जाती है। यह एक स्वच्छ और कुशल ईंधन है, जिसका उपयोग घरेलू तथा औद्योगिक दोनों क्षेत्रों में किया जाता है।

🔸 प्राकृतिक गैस के उपयोग :-

  • बिजली उत्पादन में ईंधन के रूप में
  • उद्योगों में हीटिंग के उद्देश्य के लिए
  • रासायनिक, पेट्रोकेमिकल और उर्वरक उद्योगों में कच्चे माल के रूप में
  • परिवहन ईंधन के रूप में (CNG)
  • खाना पकाने के ईंधन के रूप में (PNG)

🔸 भारत में प्राकृतिक गैस के भंडार :-

  • पश्चिमी तट: मुंबई हाई (सबसे बड़ा), खंभात की खाड़ी (गुजरात) के क्षेत्र
  • पूर्वी तट: कृष्णा-गोदावरी बेसिन में नए भंडार खोजे गए हैं।

हजीरा-विजयपुर-जगदीशपुर (HVJ) :-

गेल द्वारा निर्मित हजीरा–विजयपुर–जगदीशपुर (HVJ) क्रॉस-कंट्री गैस पाइपलाइन (लगभग 1700 किमी) ने मुंबई हाई और बसीन गैस क्षेत्रों को पश्चिमी व उत्तरी भारत के उर्वरक, बिजली और औद्योगिक परिसरों से जोड़ा।

विद्युत :-

आधुनिक विश्व में विद्युत का उपयोग अत्यंत व्यापक है। किसी देश में प्रति व्यक्ति विद्युत उपभोग को उसके विकास का महत्त्वपूर्ण सूचक माना जाता है। एक बार विद्युत उत्पन्न हो जाने पर वह हर जगह समान होती है।

विद्युत उत्पादन के प्रमुख प्रकार :-

🔸 (क) जल विद्युत :-

  • तेज़ बहते जल से हाइड्रो-टरबाइन चलाकर विद्युत उत्पन्न की जाती है।
  • यह एक नवीकरणीय ऊर्जा संसाधन है।
  • यह प्रदूषण मुक्त होती है।
  • भारत में अनेक बहु-उद्देशीय परियोजनाएँ जल विद्युत उत्पन्न करती हैं, जैसे—
    • भाखड़ा नांगल परियोजना
    • दामोदर घाटी निगम
    • कोपिली जलविद्युत परियोजना

🔸 (ख) ताप विद्युत :-

  • कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जैसे ईंधनों को जलाकर टरबाइन चलाकर विद्युत उत्पन्न की जाती है।
  • ताप विद्युत गृह अनवीकरणीय जीवाश्म ईंधनों पर आधारित होते हैं।
  • भारत में विद्युत उत्पादन का एक बड़ा भाग ताप विद्युत से प्राप्त होता है।

तापीय एवं जल विद्युत ऊर्जा में अंतर :-

तापीय विद्युतजल विद्युत ऊर्जा
यह विद्युत कोयला, पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस के प्रयोग से उत्पन्न की जाती है।यह विद्युत गिरते हुए जल की शक्ति से टरबाइन चलाकर उत्पन्न की जाती है।
यह प्रदूषण युक्त होती है।यह प्रदूषण रहित होती है।
यह स्थायी स्रोत नहीं है।यह एक स्थायी स्रोत है।
यह अनवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों पर आधारित है।यह नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत (जल) पर आधारित है।
भारत में 280 से अधिक ताप विद्युत केंद्र हैं।भारत में अनेक बहुउद्देशीय जल विद्युत परियोजनाएँ हैं।
उदाहरण: तलचेर, पांकी, नामरूप, उरण, नैवेलीउदाहरण: भाखड़ा नांगल परियोजना, दामोदर घाटी निगम, कोपिली जलविद्युत परियोजना

गैर-परंपरागत ऊर्जा के साधन :-

🔹 गैर-परंपरागत ऊर्जा क्या है?

जो ऊर्जा स्रोत नवीकरणीय होते हैं तथा पर्यावरण को कम नुकसान पहुँचाते हैं, उन्हें गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोत कहा जाता है।

🔹 गैर-परंपरागत ऊर्जा की आवश्यकता क्यों है?

ऊर्जा की बढ़ती माँग के कारण देश कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्मी ईंधनों पर अत्यधिक निर्भर हो गया है।

🔸 चुनौतियाँ :-

  • बढ़ती कीमतें और संभावित कमी।
  • ऊर्जा सुरक्षा में अनिश्चितता।
  • राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि पर नकारात्मक प्रभाव।
  • गंभीर पर्यावरणीय समस्याएँ (वायु प्रदूषण, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन)।

इन समस्याओं के समाधान के लिए नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों का उपयोग आवश्यक है।

गैर-परंपरागत ऊर्जा के लाभ :-

  • ये ऊर्जा स्रोत नवीकरणीय होते हैं।
  • इनसे प्रदूषण कम होता है।
  • ये देश की ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ाते हैं।
  • जीवाश्मी ईंधनों पर निर्भरता कम करते हैं।
  • दीर्घकाल में किफायती सिद्ध होते हैं।

गैर-परंपरागत ऊर्जा के प्रमुख साधन :-

  • सौर ऊर्जा
  • पवन ऊर्जा
  • ज्वारीय ऊर्जा
  • जैविक ऊर्जा (बायो-एनर्जी)
  • अवशिष्ट पदार्थ जनित ऊर्जा (बायोगैस आदि)

परमाणु अथवा आणविक ऊर्जा :-

🔸 यह ऊर्जा कैसे प्राप्त होती है?

  • परमाणु अथवा आणविक ऊर्जा अणुओं की संरचना में परिवर्तन से प्राप्त की जाती है।
  • जब यह परिवर्तन होता है, तो अधिक मात्रा में ऊर्जा ऊष्मा के रूप में विमुक्त होती है।
  • इसी ऊष्मा का उपयोग करके पानी से भाप बनाई जाती है और टरबाइन चलाकर विद्युत ऊर्जा उत्पन्न की जाती है।

🔸 परमाणु ऊर्जा के लिए आवश्यक खनिज :- परमाणु ऊर्जा के उत्पादन में मुख्यतः यूरेनियम और थोरियम का प्रयोग होता है।

🔹 भारत में परमाणु खनिजों का वितरण :-

  • भारत में यूरेनियम के भंडार झारखंड में पाए जाते हैं।
  • थोरियम के भंडार राजस्थान की अरावली पर्वत श्रृंखला में पाए जाते हैं।
  • केरल में मिलने वाली मोनाजाइट रेत में भी थोरियम की पर्याप्त मात्रा पाई जाती है।

सौर ऊर्जा :-

  • भारत एक उष्ण कटिबंधीय देश है, इसलिए यहाँ सौर ऊर्जा के असीम संभावनाएँ हैं।
  • फोटोवोल्टाइक प्रौद्योगिकी द्वारा सूर्य के प्रकाश को सीधे विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है।
  • इसके लिए सोलर पैनल का उपयोग किया जाता है।
  • भारत के ग्रामीण और सुदूर क्षेत्रों में सौर ऊर्जा तेजी से लोकप्रिय हो रही है।
  • देश के विभिन्न भागों में बड़े सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित किए जा रहे हैं।

🔹 सौर ऊर्जा के लाभ :-

  • यह एक नवीकरण योग्य और स्वच्छ ऊर्जा स्रोत है।
  • सौर ऊर्जा के प्रयोग से उपलों और लकड़ी पर निर्भरता कम होगी।
  • इससे पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा।
  • वनों का संरक्षण होगा।
  • लकड़ी व उपलों के कम उपयोग से कृषि के लिए गोबर खाद की उपलब्धता बढ़ेगी।

पवन ऊर्जा :-

  • भारत में पवन ऊर्जा के उत्पादन की अत्यधिक संभावनाएँ हैं।
  • पवन ऊर्जा एक नवीकरणीय एवं प्रदूषण रहित ऊर्जा स्रोत है।
  • भारत की सबसे विशाल पवन ऊर्जा पेटी तमिलनाडु में नागरकोइल से मदुरई तक फैली हुई है।
  • इसके अतिरिक्त आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, केरल, महाराष्ट्र तथा लक्षद्वीप में भी महत्त्वपूर्ण पवन ऊर्जा फार्म स्थापित हैं।
  • नागरकोइल और जैसलमेर पवन ऊर्जा के प्रभावी उपयोग के लिए प्रसिद्ध हैं।

🔹 पवन ऊर्जा के लाभ :-

  • पवन ऊर्जा एक नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है।
  • यह पर्यावरण-अनुकूल है और प्रदूषण नहीं फैलाती।
  • इसके उत्पादन में किसी ईंधन की आवश्यकता नहीं होती।
  • यह दीर्घकाल में किफायती ऊर्जा स्रोत है।
  • पवन ऊर्जा ग्रामीण एवं तटीय क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है।

बायोगैस :-

बायोगैस जैविक पदार्थों के अपघटन से बनने वाली गैस है। ग्रामीण क्षेत्रों में झाड़ियों, कृषि अपशिष्ट, पशुओं तथा मानव जनित अपशिष्ट से बायोगैस उत्पन्न की जाती है।

🔹 बायोगैस का उत्पादन :-

  • जैविक पदार्थों के अपघटन से बायोगैस बनती है।
  • इसकी तापीय क्षमता मिट्टी के तेल, उपलों और चारकोल की तुलना में अधिक होती है।
  • बायोगैस संयंत्र नगरपालिका, सहकारी तथा निजी स्तर पर लगाए जाते हैं।
  • पशुओं के गोबर से चलने वाले संयंत्र ग्रामीण भारत में ‘गोबर गैस प्लांट’ कहलाते हैं।

🔹 बायोगैस के लाभ :-

  • बायोगैस किसानों को दोहरा लाभ प्रदान करती है—
    • खाना पकाने और प्रकाश के लिए स्वच्छ ईंधन के रूप में
    • तथा उन्नत जैविक उर्वरक के रूप में
  • यह पशुओं के गोबर का सबसे दक्ष उपयोग है।
  • इससे उर्वरक की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।
  • उपलों और लकड़ी के प्रयोग में कमी आती है।
  • इसके परिणामस्वरूप वनों की कटाई कम होती है।
  • बायोगैस एक स्वच्छ, सस्ती और पर्यावरण-अनुकूल ऊर्जा स्रोत है।

ज्वारीय ऊर्जा :-

ज्वारीय ऊर्जा समुद्र में आने-जाने वाली ज्वार-भाटा की शक्ति से प्राप्त की जाती है। महासागरीय तरंगों का उपयोग विद्युत उत्पादन के लिए किया जा सकता है।

🔸 ज्वारीय ऊर्जा कैसे उत्पन्न होती है?

  • इसके लिए सँकरी खाड़ियों के आर-पार बाढ़ द्वार बनाकर बाँध बनाए जाते हैं।
  • उच्च ज्वार के समय समुद्र का पानी खाड़ी में भर जाता है और द्वार बंद कर दिए जाते हैं।
  • ज्वार उतरने पर बाँध में संचित जल को पाइपों द्वारा बाहर निकाला जाता है, जिससे टरबाइन घूमती है और विद्युत उत्पन्न होती है।
  • ज्वारीय ऊर्जा एक नवीकरणीय और प्रदूषण-रहित ऊर्जा स्रोत है।

🔹 भारत में ज्वारीय ऊर्जा की संभावनाएँ :-

भारत में ज्वारीय ऊर्जा के लिए आदर्श प्राकृतिक दशाएँ पाई जाती हैं, विशेषकर:

  • खंभात की खाड़ी
  • कच्छ की खाड़ी (गुजरात)
  • सुंदरवन क्षेत्र (पश्चिम बंगाल) — गंगा डेल्टा

भू-तापीय ऊर्जा :-

पृथ्वी के आंतरिक भागों की ऊष्मा से उत्पन्न की जाने वाली ऊर्जा को भू-तापीय ऊर्जा कहते हैं। गहराई बढ़ने के साथ पृथ्वी का तापमान बढ़ता जाता है, जिसे भू-तापीय प्रवणता कहते हैं।

🔸 भू-तापीय ऊर्जा कैसे उत्पन्न होती है?

  • जहाँ भू-तापीय प्रवणता अधिक होती है, वहाँ उथली गहराइयों पर भी उच्च तापमान पाया जाता है।
  • ऐसे क्षेत्रों में भूमिगत जल चट्टानों से ऊष्मा अवशोषित कर अत्यधिक तप्त हो जाता है।
  • सतह की ओर उठते समय यह जल भाप में परिवर्तित हो जाता है।
  • इसी भाप से टरबाइन चलाकर विद्युत ऊर्जा उत्पन्न की जाती है।
  • भू-तापीय ऊर्जा एक नवीकरणीय और पर्यावरण-अनुकूल ऊर्जा स्रोत है।

🔹 भारत में भू-तापीय ऊर्जा की संभावनाएँ :-

  • भारत में सैकड़ों गर्म पानी के चश्मे हैं, जिनका उपयोग विद्युत उत्पादन में किया जा सकता है।
  • भू-तापीय ऊर्जा के दोहन के लिए भारत में दो प्रायोगिक परियोजनाएँ शुरू की गई हैं—
    • मणिकरण के निकट पार्वती घाटी, हिमाचल प्रदेश
    • पूगा घाटी, लद्दाख

ऊर्जा का महत्व :-

  • आर्थिक विकास के लिए ऊर्जा एक आधारभूत आवश्यकता है।
  • कृषि, उद्योग, परिवहन, वाणिज्य तथा घरेलू क्षेत्रों में ऊर्जा का व्यापक उपयोग होता है।
  • स्वतंत्रता के बाद आर्थिक विकास योजनाओं के कारण ऊर्जा की माँग में निरंतर वृद्धि हुई है।

ऊर्जा संरक्षण की आवश्यकता क्यों है?

  • ऊर्जा संसाधन सीमित हैं, इसलिए उनके सतत् एवं पोषणीय उपयोग की आवश्यकता है।
  • ऊर्जा संरक्षण और नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों का बढ़ता उपयोग सतत् ऊर्जा विकास के दो प्रमुख आधार हैं।
  • वर्तमान में भारत विश्व के कम ऊर्जादक्ष देशों में शामिल है।
  • ऊर्जा के न्यायसंगत और विवेकपूर्ण उपयोग के लिए सावधानीपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।

ऊर्जा संरक्षण के उपाय :-

  • निजी वाहनों के स्थान पर सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करना।
  • उपयोग में न होने पर बिजली बंद रखना।
  • ऊर्जा-संरक्षण उपकरणों का प्रयोग करना।
  • गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोतों जैसे सौर, पवन, बायोगैस आदि को अपनाना।
  • अंततः यह कहा जा सकता है कि “ऊर्जा की बचत ही ऊर्जा का उत्पादन है।”
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