NCERT Class 10th Social Science Geography Notes Chapter 6 विनिर्माण उद्योग
इस अध्याय मे हम विनिर्माण, राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में उद्योग का योगदान, उद्योग का वर्गीकरण, कृषि आधारित उद्योग, वस्त्र उद्योग, सूती वस्त्र, पटसन उद्योग, चीनी उद्योग, खनिज आधारित उद्योग, लौह और इस्पात उद्योग, एल्यूमिनियम प्रगलन, रासायनिक उद्योग, उर्वरक उद्योग, सीमेंट उद्योग, ऑटोमोबाइल उद्योग, सूचना प्रौद्योगिकी और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग, औद्योगिक प्रदूषण आदि के बारे में विस्तार से पड़ेगे।
विनिर्माण उद्योग
विनिर्माण :-
जब कच्चे माल को मशीनों, मानव श्रम, शक्ति और तकनीक की मदद से मूल्यवान वस्तुओं में बदला जाता है, तो इस प्रक्रिया को विनिर्माण कहते हैं।
🔸 उदाहरण :-
- गन्ने (कच्चा माल) से चीनी बनाना।
- लौह अयस्क से लोहा और इस्पात बनाना।
- लकड़ी से कागज या फर्नीचर बनाना।
- बॉक्साइट से एल्युमीनियम बनाना।
अर्थव्यवस्था में विनिर्माण का स्थान (द्वितीयक क्षेत्रक) :-
अर्थव्यवस्था के तीन मुख्य क्षेत्र होते हैं। विनिर्माण द्वितीयक कार्यों के अंतर्गत आता है। इनमें लोग कच्चे माल को परिष्कृत (तैयार) वस्तुओं में बदलते हैं।
🔸 इसमें शामिल उद्योग :-
- स्टील उद्योग
- कार निर्माण
- कपड़ा उद्योग
- बेकरी उत्पाद
- पेय पदार्थ उद्योग
विनिर्माण का महत्त्व :-
विनिर्माण उद्योग किसी भी देश के आर्थिक विकास की रीढ़ माने जाते हैं। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
- कृषि के आधुनिकीकरण में सहायक :- उद्योग कृषि के लिए मशीनें, उर्वरक, कीटनाशक आदि उपलब्ध कराते हैं, जिससे कृषि उत्पादन बढ़ता है।
- रोजगार के अवसर :- उद्योग द्वितीयक (उत्पादन) एवं तृतीयक (सेवाओं) क्षेत्रों में रोजगार देकर कृषि पर निर्भरता कम करते हैं। जिससे बेरोजगारी कम होती है।
- गरीबी व बेरोजगारी में कमी :- औद्योगिक विकास गरीबी उन्मूलन और बेरोजगारी कम करने में मदद करता है।
- क्षेत्रीय असमानताओं में कमी :- पिछड़े व जनजातीय क्षेत्रों में उद्योग लगाने से संतुलित विकास होता है।
- विदेशी मुद्रा अर्जन :- निर्मित वस्तुओं का निर्यात व्यापार बढ़ाता है और देश में विदेशी मुद्रा लाता है।
- मूल्यवर्धन :- विकसित देश वही हैं जो कच्चे माल को अधिक मूल्यवान तैयार माल में बदलते हैं। विनिर्माण से वस्तुओं का मूल्य बढ़ता है।
उद्योग की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारक :-
उद्योगों की अवस्थिति दो प्रकार के कारकों से प्रभावित होती है:
🔸 (i) भौतिक कारक :-
- भूमि – उद्योग स्थापित करने के लिए उपयुक्त व सस्ती भूमि
- कच्चे माल की उपलब्धता
- शक्ति के साधन – बिजली, कोयला आदि
- अनुकूल जलवायु
🔸 (ii) मानवीय कारक :-
- श्रम
- पूँजी
- बाज़ार
- परिवहन और संचार
- बैंकिंग और बीमा सुविधाएँ
- आधारभूत संरचना
- उद्यमी
- सरकारी नीतियाँ
उद्योगों का वर्गीकरण :-
उद्योगों को निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है-
🔹 1. प्रयुक्त कच्चे माल के स्रोत के आधार पर :-
🔸 (i) कृषि आधारित उद्योग :- ये उद्योग कृषि से प्राप्त कच्चे माल पर निर्भर होते हैं। उदाहरण: सूती वस्त्र, ऊनी वस्त्र, रेशम, पटसन, चीनी, रबर, चाय, कॉफी, वनस्पति तेल उद्योग।
🔸 (ii) खनिज आधारित उद्योग :- ये उद्योग खनिजों से प्राप्त कच्चे माल का उपयोग करते हैं। उदाहरण: लोहा-इस्पात, सीमेंट, एल्यूमिनियम, मशीन एवं औज़ार, पेट्रो-रसायन उद्योग।
🔹 2. प्रमुख भूमिका के आधार पर :-
🔸 (i) आधारभूत उद्योग :- जिनके उपादन वा कच्चे माल पर दूसरे उद्योग निर्भर हैं। उदाहरण: लोहा एवं इस्पात उद्योग, ताँबा प्रगलन उद्योग, एल्यूमिनियम प्रगलन उद्योग।
🔸 (ii) उपभोक्ता उद्योग :- जो सीधे उपभोक्ताओं के उपयोग हेतु वस्तुएँ बनाते हैं। उदाहरण: चीनी, दंतमंजन, कागज़, पंखे, सिलाई मशीन।
🔹 3. पूँजी निवेश के आधार पर :-
- (i) लघु उद्योग :- कम पूँजी निवेश और छोटे स्तर पर संचालित उद्योग।
- (ii) बृहत उद्योग :- अधिक पूँजी निवेश और बड़े स्तर पर संचालित उद्योग।
🔹 4. स्वामित्व के आधार पर :-
🔸 (i) सार्वजनिक क्षेत्र उद्योग :- सार्वजनिक क्षेत्र में लगे, सरकारी एजेंसियों द्वारा प्रबंधित तथा सरकार द्वारा संचालित उद्योग। उदाहरण: भारत हैवी इलैक्ट्रिकल लिमिटेड (BHEL) तथा स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) आदि।
🔸 (ii) निजी क्षेत्र उद्योग :- निजी व्यक्तियों या कंपनियों के स्वामित्व वाले उद्योग। उदाहरण: टिस्को, बजाज ऑटो लिमिटेड, डाबर उद्योग आदि।
🔸 (iii) संयुक्त क्षेत्र उद्योग :- वैसे उद्योग जो राज्य सरकार और निजी क्षेत्र के संयुक्त प्रयास से चलाये जाते हैं। उदाहरण: ऑयल इंडिया लिमिटेड (OIL) ।
🔸 (iv) सहकारी क्षेत्र उद्योग :- उत्पादकों/श्रमिकों के संयुक्त स्वामित्व वाले उद्योग। उदाहरण: महाराष्ट्र के चीनी उद्योग, केरल के नारियल पर आधारित उद्योग।
🔹 5. कच्चे एवं तैयार माल के भार के आधार पर :-
🔸 (i) भारी उद्योग :- भारी कच्चे माल का उपयोग करते हैं। उदाहरण: लोहा-इस्पात, सीमेंट।
🔸 (ii) हल्के उद्योग :- हल्के कच्चे माल से हल्के उत्पाद बनाते हैं। उदाहरण: विद्युत उपकरण उद्योग, इलेक्ट्रॉनिक उद्योग।
कृषि आधारित उद्योग :-
कृषि आधारित उद्योग वे उद्योग होते हैं जो कृषि से प्राप्त कच्चे माल का उपयोग करके तैयार वस्तुओं का उत्पादन करते हैं। सूती वस्त्र, पटसन, रेशम, ऊनी वस्त्र, चीनी तथा वनस्पति तेल आदि उद्योग कृषि से प्राप्त कच्चे माल पर आधारित हैं।
वस्त्र उद्योग :-
भारतीय अर्थव्यवस्था में वस्त्र उद्योग का विशेष स्थान है। इसका औद्योगिक उत्पादन, रोजगार और निर्यात में बड़ा योगदान है। यह उद्योग कच्चे माल से लेकर तैयार वस्त्र तक की पूरी उत्पादन श्रृंखला में लगभग आत्मनिर्भर है।
सूती वस्त्र उद्योग :-
🔹 सूती वस्त्र उद्योग का इतिहास :-
- प्राचीन भारत में सूती वस्त्र हाथ से कताई और हथकरघा तकनीक से बनाए जाते थे।
- अठारहवीं शताब्दी के बाद विद्युतीय करघों का उपयोग प्रारंभ हुआ।
- औपनिवेशिक काल में भारतीय हस्तशिल्प उद्योगों को भारी क्षति हुई।
- कारण: क्योंकि वे इंग्लैंड के मशीन निर्मित वस्त्रों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सके।
- पहला सफल सूती वस्त्र कारखाना :- भारत का पहला सफल सूती वस्त्र मिल 1854 में मुंबई में स्थापित किया गया।
- विकास :- दो विश्व युद्धों के दौरान जब इंग्लैंड में कपड़े की कमी हुई, तो भारतीय वस्त्र उद्योग को बहुत बढ़ावा मिला।
सूती वस्त्र उद्योगों का स्थानीयकरण :-
आरंभिक विकास महाराष्ट्र और गुजरात तक सीमित था। इसके पीछे ये मुख्य कारण थे:
- कपास की उपलब्धता
- पत्तनों (Ports) की निकटता
- परिवहन सुविधा
- बड़ा बाजार
- सस्ता एवं उपलब्ध श्रम
- नमीयुक्त जलवायु
सूती वस्त्र उद्योग का कृषि और अन्य उद्योगों से संबंध :-
यह उद्योग केवल कपड़ा नहीं बनाता, बल्कि लाखों लोगों को रोजगार देता है:
🔸 कृषि संबंध :- इस उद्योग का कृषि से निकट का संबंध है और कृषकों, कपास चुनने वालों, गाँठ बनाने वालों, कताई करने वालों, रंगाई करने वालों. डिजाइन बनाने वालों, पैकेट बनाने वालों और सिलाई करने वालों को यह जीविका प्रदान करता है।
🔸 अन्य उद्योगों को बढ़ावा :- इस उद्योग के कारण रसायन रंजक मिल स्टोर तथा पैकेजिंग सामग्री और इंजीनियरिंग उद्योग की माँग बढ़ती है फलस्वरूप इन उद्योगों का विकास होता है।
पटसन उद्योग :-
भारत पटसन तथा पटसन निर्मित वस्तुओं का सबसे बड़ा उत्पादक है तथा बांग्लादेश के बाद दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक है। भारत के अधिकांश पटसन उद्योग पश्चिम बंगाल में हुगली नदी के तट पर केंद्रित हैं।
🔹 पटसन उद्योग का इतिहास :-
🔸 पहली मिल :- भारत का पहला पटसन मिल 1855 में रिशरा (कोलकाता के निकट) में स्थापित किया गया।
🔸 विभाजन का प्रभाव (1947) :- विभाजन (1947) के बाद अधिकांश जूट मिलें भारत में रहीं, जबकि लगभग तीन-चौथाई जूट उत्पादक क्षेत्र पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में चले गए।
पटसन उद्योग का हुगली नदी तट पर स्थानीयकरण के कारण :-
अधिकांश पटसन मिलें पश्चिम बंगाल में हुगली नदी के किनारे एक संकरी पट्टी (98 किमी लंबी और 3 किमी चौड़ी) में स्थित हैं। हुगली नदी तट पर इनके स्थित होने के निम्न कारण हैं:
- पटसन उत्पादक क्षेत्रों की निकटता
- सस्ता एवं सुविधाजनक जल परिवहन
- सड़क, रेल और जल परिवहन का विकसित जाल
- जूट प्रसंस्करण हेतु प्रचुर जल की उपलब्धता
- सस्ता एवं पर्याप्त श्रम
- कोलकाता का बड़ा बाजार एवं निर्यात पत्तन
- बैंकिंग एवं बीमा सुविधाएँ
चीनी उद्योग :-
भारत का चीनी उत्पादन में विश्व में दूसरा स्थान है, जबकि गुड़ एवं खांडसारी के उत्पादन में भारत का प्रथम स्थान है।
🔸 कच्चा माल और उसकी विशेषता :- चीनी उद्योग का कच्चा माल गन्ना होता है, जो भारी होता है तथा लंबे परिवहन में इसकी सूक्रोस मात्रा घट जाती है। इसलिए चीनी मिलें प्रायः गन्ना उत्पादक क्षेत्रों के निकट स्थापित की जाती हैं।
🔸 चीनी मिलों का वितरण :- भारत में चीनी मिलें मुख्यतः उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, गुजरात, पंजाब, हरियाणा तथा मध्य प्रदेश में स्थित हैं।
चीनी मिलों का 60 प्रतिशत उत्तर प्रदेश तथा बिहार में है।
🔹 दक्षिणी व पश्चिमी राज्यों में चीनी उद्योग की वृद्धि के कारण :-
पिछले वर्षों में चीनी उद्योग का विकास दक्षिणी एवं पश्चिमी राज्यों, विशेषकर महाराष्ट्र, में अधिक हुआ है क्योंकि:
- यहाँ के गन्ने में अधिक सूक्रोस मात्रा होती है।
- अनुकूल जलवायु उपलब्ध है।
- सहकारी समितियाँ सफल रही हैं।
खनिज आधारित उद्योग :-
वे उद्योग जो खनिज व धातुओं को कच्चे माल के रूप में प्रयोग करते हैं, खनिज आधारित उद्योग कहलाते हैं। लोहा-इस्पात, सीमेंट, एल्यूमिनियम, ताँबा प्रगलन, मशीन एवं औज़ार तथा पेट्रो-रसायन उद्योग खनिज आधारित उद्योगों के प्रमुख उदाहरण हैं।
लोहा तथा इस्पात उद्योग :-
लोहा तथा इस्पात उद्योग एक आधारभूत उद्योग है क्योंकि अनेक अन्य उद्योग इसकी मशीनरी और उत्पादों पर निर्भर करते हैं।
🔸 इस्पात के उपयोग :- इंजीनियरिंग वस्तुएँ, निर्माण सामग्री, रक्षा उपकरण, वैज्ञानिक एवं चिकित्सा उपकरण तथा विभिन्न उपभोक्ता वस्तुओं के निर्माण में इस्पात का व्यापक उपयोग होता है।
इस्पात के उत्पादन और खपत को किसी देश के आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण मापदंड माना जाता है।
🔹 इस्पात के लिए कच्चे माल का अनुपात :-
इस्पात बनाने के लिए कच्चे माल को एक निश्चित अनुपात में मिलाया जाता है:
- लौह अयस्क : 4 भाग
- कोकिंग कोल : 2 भाग
- चूना पत्थर : 1 भाग
इनका अनुपात लगभग 4 : 2 : 1 होता है।
इस्पात को कठोर बनाने हेतु मैंगनीज की भी आवश्यकता होती है।
🔹 इस्पात उद्योग की आदर्श स्थापना के लिए शर्तें :-
एक आदर्श इस्पात कारखाना वहाँ होना चाहिए जहाँ:
- कच्चा माल आसानी से और कम कीमत पर उपलब्ध हो।
- बिजली और पानी की निरंतर आपूर्ति हो।
- तैयार माल को बाजार तक पहुँचाने के लिए सक्षम परिवहन तंत्र (रेलवे और सड़क) मौजूद हो।
🔹 भारत में लोहा तथा इस्पात उद्योग का वितरण :-
भारत में अधिकांश लोहा तथा इस्पात उद्योग छोटानागपुर पठार क्षेत्र में केंद्रित हैं क्योंकि यहाँ:
- लौह अयस्क की प्रचुर उपलब्धता
- कोयला क्षेत्रों की निकटता
- सस्ता श्रम
- विकसित परिवहन सुविधा
- विशाल बाजार
जैसे अनुकूल कारक मौजूद हैं।
लोहा एवं इस्पात उद्योग को आधारभूत उद्योग कहे जाने के कारण :-
लोहा एवं इस्पात उद्योग को आधारभूत उद्योग कहा जाता है क्योंकि:
- इसके उत्पादों पर अनेक अन्य उद्योग निर्भर करते हैं।
- यह विभिन्न उद्योगों को मशीनरी, उपकरण तथा संरचनात्मक सामग्री प्रदान करता है।
- भारी, मध्यम तथा हल्के उद्योगों के विकास में यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- किसी देश की औद्योगिक प्रगति का स्तर इस्पात के उत्पादन एवं खपत से आँका जाता है।
लोहा और इस्पात उद्योग को भारी उद्योग कहे जाने के कारण :-
यह एक भारी उद्योग (Heavy Industry) है क्योंकि इसमें प्रयुक्त कच्चा माल तथा तैयार उत्पाद दोनों ही भारी और स्थूल होते हैं, जिससे परिवहन लागत अधिक होती है।
एल्यूमिनियम प्रगलन उद्योग :-
एल्यूमिनियम प्रगलन भारत का दूसरा सर्वाधिक महत्वपूर्ण धातु शोधन उद्योग है।
🔸 एल्यूमिनियम के प्रमुख गुण :- एल्यूमिनियम एक हल्की, जंग-अवरोधी, ऊष्मा का सुचालक और लचीली धातु है। इसे अन्य धातुओं के साथ मिलाकर अधिक कठोर बनाया जा सकता है।
🔸 एल्यूमिनियम के उपयोग :- एल्यूमिनियम का उपयोग हवाई जहाज निर्माण, बर्तन, तार तथा विद्युत उपकरणों में व्यापक रूप से किया जाता है। यह कई उद्योगों में इस्पात, ताँबा, जस्ता और सीसे के विकल्प के रूप में भी प्रयुक्त होता है।
🔸 एल्यूमिनियम बनाने के लिए कच्चा माल और प्रक्रिया :-
- बॉक्साइट :- इस उद्योग का प्रमुख कच्चा माल बॉक्साइट है, जो भारी एवं गहरे लाल रंग की चट्टान के रूप में पाया जाता है।
- प्रक्रिया :- बॉक्साइट से पहले ‘एल्युमिना’ निकाला जाता है और फिर बिजली की मदद से ‘एल्युमीनियम’ बनाया जाता है।
- बॉक्साइट (कच्चा माल)→ रसायन उपचार → एल्यूमिना → विद्युत अपघटन → एल्यूमिनियम धातु
🔸 भारत में एल्यूमिनियम प्रगलन :- भारत में एल्यूमिनियम प्रगलन संयंत्र मुख्यतः ओडिशा, पश्चिम बंगाल, केरल, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में स्थित हैं।
🔸 एल्यूमिनियम प्रगलन उद्योग स्थापना की मुख्य आवश्यकताएँ :- इस उद्योग की स्थापना की दो महत्त्वपूर्ण आवश्यकताएँ हैं- नियमित ऊर्जा की पूर्ति तथा कम कीमत पर कच्चे माल की सुनिश्चित उपलब्धता।
रसायन उद्योग :-
भारत में रसायन उद्योग तेजी से विकसित हो रहा है। इसका योगदान सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 3 प्रतिशत है। यह उद्योग एशिया का तीसरा बड़ा तथा विश्व में आकार की दृष्टि से प्रमुख उद्योगों में से एक है। इसमें लघु एवं बृहत दोनों प्रकार की इकाइयाँ शामिल हैं। अकार्बनिक तथा कार्बनिक दोनों क्षेत्रों में तीव्र वृद्धि हुई है।
🔹 रसायन उद्योग के क्षेत्र :-
रसायन उद्योग को मुख्य रूप से दो भागों में बाँटा गया है:
🔸 (i) कार्बनिक रसायन :- इसमें मुख्य रूप से पेट्रोरसायन शामिल हैं। प्रमुख उत्पाद: कृत्रिम वस्त्र, कृत्रिम रबर, प्लास्टिक, रंजक और दवाइयाँ।
🔸 (ii) अकार्बनिक रसायन :- इसमें वे रसायन आते हैं जिनमें कार्बन का उपयोग मुख्य घटक के रूप में नहीं होता। प्रमुख रसायन: सल्फ्यूरिक अम्ल, नाइट्रिक अम्ल, क्षार, सोडा ऐश और कास्टिक सोडा।
🔹 रसायनों से बनने वाले उत्पाद :-
- औद्योगिक उपयोग :-
- प्लास्टिक
- सिंथेटिक फाइबर
- पेंट / रंग
- रबर
- कृषि उपयोग :-
- उर्वरक
- कीटनाशक
- खरपतवार नाशक
- उपभोक्ता वस्तुएँ :-
- साबुन
- डिटर्जेंट
- दवाइयाँ
- सौंदर्य प्रसाधन
उर्वरक उद्योग :-
उर्वरक उद्योग कृषि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह उद्योग मुख्यतः नाइट्रोजनी, फास्फेटिक तथा मिश्रित उर्वरकों का उत्पादन करता है।
🔸 मुख्य उर्वरक प्रकार :-
- नाइट्रोजनी उर्वरक – प्रमुख उत्पाद: यूरिया
- फास्फेटिक उर्वरक – प्रमुख उत्पाद: डी.ए.पी. (DAP)
- मिश्रित उर्वरक – नाइट्रोजन (N), फास्फेट (P) एवं पोटाश (K) युक्त
🔸 प्रमुख उत्पादक राज्य :- गुजरात, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, पंजाब और केरल राज्य कुल उर्वरक उत्पादन का लगभग 50 प्रतिशत उत्पादन करते हैं।
🔸 अन्य उत्पादक क्षेत्र :- अन्य महत्त्वपूर्ण उत्पादक राज्य आंध्र प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान, बिहार, महाराष्ट्र, असम, पश्चिम बंगाल, गोआ, दिल्ली, मध्य प्रदेश तथा कर्नाटक हैं।
🔹 पोटाश का आयात क्यों?
भारत में पोटाश पूर्णतः आयात किया जाता है क्योंकि देश में इसके पर्याप्त भंडार उपलब्ध नहीं हैं।
सीमेंट उद्योग :-
सीमेंट उद्योग निर्माण कार्यों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। घर, कारखाने, पुल, सड़कें, हवाई अड्डे और बाँध आदि के निर्माण में सीमेंट का व्यापक उपयोग होता है।
🔸 इतिहास :- भारत का पहला सीमेंट कारखाना 1904 में चेन्नई में स्थापित किया गया। स्वतंत्रता के बाद इस उद्योग का तीव्र प्रसार हुआ।
🔸 सीमेंट बनाने की लिए आवश्यक कच्चा माल :- यह एक भारी उद्योग है क्योंकि इसमें भारी एवं स्थूल कच्चे माल की आवश्यकता होती है:
- चूना पत्थर
- सिलिका
- जिप्सम
🔸 ऊर्जा एवं परिवहन की आवश्यकता :- इसके अलावा, कारखानों को चलाने के लिए कोयला और विद्युत ऊर्जा की निरंतर आवश्यकता होती है। तैयार सीमेंट को बाजार तक पहुँचाने हेतु सड़क एवं रेल मार्ग आवश्यक है।
मोटरगाड़ी उद्योग :-
मोटरगाड़ी उद्योग भारत के प्रमुख उपभोक्ता उद्योगों में से एक है। यह यात्रियों और सामान के तीव्र, सुगम एवं लचीले परिवहन का साधन उपलब्ध कराता है।
🔸 वाहनों के प्रकार :- भारत में इस उद्योग के अंतर्गत ट्रक, बसें, कारें, मोटर साइकिल, स्कूटर, तिपहिया तथा बहुउपयोगी वाहन निर्मित किए जाते हैं।
🔸 उदारीकरण के बाद विकास :- उदारीकरण के पश्चात् वाहनों की माँग और बाज़ार में तेज़ वृद्धि हुई, जिससे विशेष रूप से कार, दोपहिया और तिपहिया वाहनों के उत्पादन में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई।
🔸 मोटरगाड़ी उद्योग के प्रमुख केंद्र :- यह उद्योग दिल्ली, गुड़गाँव, मुंबई, पुणे, चेन्नई, कोलकाता, लखनऊ, इंदौर, हैदराबाद, जमशेदपुर तथा बेंगलूरु के आस पास स्थित हैं।
सूचना प्रौद्योगिकी एवं इलेक्ट्रॉनिक उद्योग :-
यह उद्योग आधुनिक भारत के सबसे तीव्र गति से बढ़ते उद्योगों में से एक है। यह उद्योग आधुनिक संचार, सूचना प्रसंस्करण और तकनीकी विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
🔸 इलेक्ट्रॉनिक उद्योग के उत्पाद :-
इलेक्ट्रॉनिक उद्योग के अंतर्गत ट्रांजिस्टर से लेकर टेलीविजन, टेलीफोन, सेल्यूलर उपकरण, टेलीफोन एक्सचेंज, राडार, कंप्यूटर तथा दूरसंचार उपकरण जैसे अनेक उत्पाद निर्मित किए जाते हैं।
🔸 प्रमुख इलेक्ट्रॉनिक उत्पादक केंद्र :-
बेंगलुरु भारत की इलेक्ट्रॉनिक राजधानी के रूप में विकसित हुआ है। इसके अतिरिक्त मुंबई, दिल्ली, हैदराबाद, पुणे, चेन्नई, कोलकाता तथा लखनऊ भी इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के प्रमुख केंद्र हैं।
इस उद्योग का अधिक संकेंद्रण मुख्यतः बेंगलुरु, नोएडा, मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद और पुणे में देखा जाता है।
🔹 सूचना प्रौद्योगिकी (IT) उद्योग का महत्त्व :-
भारत में सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग की सफलता का मुख्य कारण हार्डवेयर एवं सॉफ़्टवेयर का निरंतर विकास है। यह उद्योग सेवाओं, रोजगार और निर्यात में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
उद्योगों से होने वाले प्रदूषण :-
उद्योग मुख्यतः चार प्रकार के प्रदूषण के लिए उत्तरदायी है:
- वायु प्रदूषण
- जल प्रदूषण
- भूमि (मृदा) प्रदूषण
- ध्वनि प्रदूषण
1. वायु प्रदूषण :-
वायु प्रदूषण का मुख्य कारण वातावरण में सल्फर डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड तथा अन्य विषैली गैसों की अधिक मात्रा है। वायु में उपस्थित निलंबित कण जैसे धूल, धुआँ, कुहासा और स्प्रे भी प्रदूषण फैलाते हैं।
🔸 मुख्य स्रोत (प्रमुख प्रदूषणकारी उद्योग) :- रसायन उद्योग, कागज़ उद्योग, ईंट भट्टे, तेल शोधनशालाएँ, प्रगलन उद्योग, जीवाश्म ईंधन दहन।
🔸 दुष्प्रभाव :- मानव स्वास्थ्य, पशु-पक्षी, वनस्पति एवं भवनों पर हानिकारक प्रभाव होते हैं।
2. जल प्रदूषण :-
जब उद्योग अपने कार्बनिक एवं अकार्बनिक अपशिष्ट जल स्रोतों में छोड़ते हैं, तब जल प्रदूषण होता है।
🔸 मुख्य प्रदूषणकारी उद्योग :- जल प्रदूषण के प्रमुख कारक कागज, लुग्दी, रसायन, वस्त्र, तथा रंगाई उद्योग, तेल शोधन शालाएँ, चमड़ा उद्योग तथा इलैक्ट्रोप्लेटिंग उद्योग हैं।
🔸 हानिकारक पदार्थ :- ये उद्योग रंग, अपमार्जक, अम्ल, लवण तथा भारी धातुएँ जैसे सौसा, पारा, कीटनाशक, उर्वरक, कार्बन, प्लास्टिक और रबर सहित कृत्रिम रसायन आदि जल में वाहित करते हैं।
🔸 भारत के मुख्य औद्योगिक अपशिष्ट :- भारत के मुख्य अपशिष्ट पदाथों में फ्लाई एश, फोस्फो जिप्सम तथा लोहा-इस्पात की अशुद्धियाँ है।
तापीय प्रदूषण :-
कारखानों एवं ताप विद्युत गृहों से निकला गर्म जल जब सीधे नदियों/तालाबों में छोड़ा जाता है, तो तापीय प्रदूषण होता है। इससे जल में ऑक्सीजन की मात्रा घट जाती है।
3. भूमि प्रदूषण :-
- औद्योगिक अपशिष्ट एवं ठोस कचरे के कारण भूमि प्रदूषण होता है।
- मुख्य कारण :- औद्योगिक कचरा, हानिकारक रसायन, काँच, प्लास्टिक, पैकिंग सामग्री
- 👉 इससे मृदा की उर्वरता घटती है तथा प्रदूषक भूमिगत जल तक पहुँच जाते हैं।
4. ध्वनि प्रदूषण :-
अनचाही एवं तेज़ ध्वनि से ध्वनि प्रदूषण होता है।
🔸 मुख्य स्रोत :- औद्योगिक तथा निर्माण कार्य, कारखानों के उपकरण, जेनरेटर, लकड़ी चीरने के कारखाने, गैस यांत्रिकी तथा विद्युत ड्रिल भी अधिक ध्वनि उत्पन्न करते हैं।
🔸 दुष्प्रभाव :- ध्वनि प्रदूषण से खिन्नता, मानसिक तनाव, श्रवण शक्ति में कमी, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग उत्पन्न होते हैं।
जल प्रदूषण रोकने के उपाय :-
कारखानों से निकलने वाले अपशिष्ट जल से जल प्रदूषण गंभीर समस्या बन जाती है। स्वच्छ जल को औद्योगिक प्रदूषण से बचाने के लिए निम्न उपाय अपनाए जा सकते हैं:
- जल का न्यूनतम उपयोग एवं पुनर्चक्रण :- उद्योगों में विभिन्न प्रक्रियाओं में जल का कम से कम उपयोग किया जाना चाहिए तथा जल का पुनर्चक्रण कर दो या अधिक बार उपयोग करना चाहिए।
- वर्षा जल संग्रहण :- जल की आवश्यकता की पूर्ति के लिए वर्षा जल का संग्रहण किया जाना चाहिए।
- अपशिष्ट जल का शोधन :- नदियों एवं तालाबों में गर्म जल तथा अपशिष्ट पदार्थों को छोड़ने से पहले उनका शोधन अनिवार्य होना चाहिए।
औद्योगिक अपशिष्ट का शोधन :-
औद्योगिक अपशिष्ट का शोधन तीन चरणों में किया जा सकता है –
- प्राथमिक शोधन :- यांत्रिक विधियों द्वारा अपशिष्ट की छँटाई, तलछट जमाव आदि।
- द्वितीयक शोधन :- जैविक प्रक्रियाओं द्वारा शोधन।
- तृतीयक शोधन :- रासायनिक, जैविक एवं भौतिक प्रक्रियाओं द्वारा जल को पुनः उपयोग योग्य बनाना।
औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण के उपाय :-
- भूमिगत जल के संरक्षण के लिए उद्योगों द्वारा इसके अत्यधिक उपयोग पर कानूनी नियंत्रण आवश्यक है।
- वायु प्रदूषण को कम करने के लिए कारखानों में ऊँची चिमनियाँ, इलेक्ट्रोस्टैटिक अवक्षेपक तथा स्क्रबर जैसे उपकरणों का उपयोग किया जाना चाहिए।
- प्रदूषण घटाने हेतु कोयले के स्थान पर स्वच्छ ईंधन जैसे तेल एवं गैस का प्रयोग किया जाना चाहिए।
- ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए मशीनों एवं जेनरेटरों में साइलेंसर लगाए जाने चाहिए तथा कम शोर उत्पन्न करने वाली मशीनों का उपयोग करना चाहिए।
- पर्यावरण संरक्षण के लिए ऊर्जा-सक्षम तकनीकों को अपनाना आवश्यक है, जिससे ऊर्जा की बचत हो और प्रदूषण कम हो।