NCERT Class 10th Social Science Geography Notes Chapter 2 वन एवं वन्य जीव संसाधन
इस अध्याय मे हम भारत में वनस्पतिजात और प्राणीजात, जातियों का वर्गीकरण , भारत में वन एवं वन्यजीवन का संरक्षण, वन एवं वन्यजीवन के प्रकार और वितरण, समुदाय और वन संरक्षण आदि के बारे में विस्तार से पड़ेगे।
वन एवं वन्य जीव संसाधन
जैव-विविधता :-
पृथ्वी पर सूक्ष्म जीवाणुओं से लेकर बड़े जीवों जैसे विशालकाय वटवृक्ष, हाथियों और ब्लू व्हेल तक अनेक प्रकार के जीव पाए जाते हैं। इन सभी जीवों की प्रजातियों तथा उनके बीच पाए जाने वाले अंतर के सामूहिक रूप को जैव-विविधता कहा जाता है।
पारिस्थितिकी तंत्र :-
मानव और अन्य जीव मिलकर एक जटिल जाल बनाते हैं जिसे पारिस्थितिकी तंत्र कहा जाता है। इसमें पौधे, पशु, सूक्ष्मजीव तथा अजैव घटक जैसे वायु, जल और मृदा शामिल होते हैं।
हम मनुष्य इस तंत्र का सिर्फ एक हिस्सा हैं और अपने अस्तित्व के लिए इसके विभिन्न तत्त्वों पर निर्भर करते हैं। उदाहरणतया :-
- वायु – साँस लेने के लिए
- जल – पीने और दैनिक जीवन के लिए
- मृदा – फसल और भोजन उत्पादन के लिए
इन सभी का पुनः सृजन पौधों, पशुओं और सूक्ष्मजीवों द्वारा होता है।
प्राकृतिक वनस्पति :-
प्राकृतिक रूप से स्वयं उगने व पनपने वाले पादप समूह को प्राकृतिक वनस्पति कहते हैं। इसे अक्षत वनस्पति भी कहा जाता है।
स्थानिक या स्वदेशी पादप प्रजातियाँ :-
जो पादप प्रजातियाँ किसी विशेष क्षेत्र में प्राकृतिक रूप से पाई जाती हैं और उसी क्षेत्र तक सीमित होती हैं, उन्हें स्थानिक या स्वदेशी पादप प्रजातियाँ कहते हैं।
प्रजातियों का वर्गीकरण :-
अंतर्राष्ट्रीय प्राकृतिक संरक्षण संघ (IUCN) के अनुसार प्रजातियों को निम्नलिखित श्रेणियों में बाँटा गया है:
- सामान्य जातियाँ :- वे जातियाँ जिनकी संख्या जीवित रहने के लिए पर्याप्त मानी जाती है। उदाहरण: पशु, साल, चीड़, कृंतक (रोडेंट्स)।
- लुप्त जातियाँ :- वे जातियाँ जो अपने प्राकृतिक आवासों में खोज करने पर नहीं पाई जातीं। उदाहरण: एशियाई चीता, गुलाबी सिर वाली बत्तख।
- सुभेद्य जातियाँ :- वे जातियाँ जिनकी संख्या घट रही है और यदि संरक्षण नहीं किया गया तो वे संकटग्रस्त हो सकती हैं। उदाहरण: नीली भेड़, एशियाई हाथी।
- संकटग्रस्त जातियाँ :- वे जातियाँ जिनके लुप्त होने का गंभीर खतरा है। उदाहरण: काला हिरण, मगरमच्छ, संगाई।
- दुर्लभ जातियाँ :- वे जातियाँ जिनकी संख्या बहुत कम होती है और जो भविष्य में संकटग्रस्त हो सकती हैं। उदाहरण – हिमालची भूरे भालू, ऐशियाई जंगली भैसे, रेगिस्तानी लोमड़ी आदि।
- स्थानिक जातियाँ :- वे जातियाँ जो केवल किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र में पाई जाती हैं। उदाहरण: अंडमानी टील, निकोबारी कबूतर, अंडमानी जंगली सुअर, अरुणाचल प्रदेश का मिथुन।
वन्यजीव :-
वन्यजीव वे जीव हैं जो अपने प्राकृतिक पर्यावरण में स्वतंत्र रूप से रहते हैं।
फ्लोरा और फौना :-
- फ्लोरा :- किसी क्षेत्र या काल विशेष के पादप।
- फौना :- जंतुओं की प्रजातियां।
भारत में जैव-विविधता :-
- भारत विश्व के सबसे जैव-विविध देशों में से एक है।
- भारत में विश्व की कुल जैव उपजातियों का लगभग 8% भाग पाया जाता है।
- यह संख्या लगभग 16 लाख प्रजातियाँ है।
- अभी भी बहुत-सी प्रजातियाँ खोजी जानी बाकी हैं, जिनकी संख्या वर्तमान से 2–3 गुना अधिक हो सकती है।
भारत में वनस्पतिजात और प्राणिजात की समृद्धि :-
भारत अपने फ्लोरा में अति समृद्ध है। भारत में लगभग 47,000 पादप प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें लगभग 15,000 पुष्पीय पादप प्रजातियाँ हैं। इनमें से लगभग 5,150 पुष्पीय पादप प्रजातियाँ स्थानिक हैं।
भारत अपने प्राणिजात (फौना) में भी अति समृद्ध है। यहाँ 81,000 से अधिक प्राणि प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इनमें पक्षियों की 1200 से अधिक तथा मछलियों की 2500 से अधिक प्रजातियाँ शामिल हैं।
भारत में लुप्त प्रजातियाँ :-
भारत में लुप्त प्रजातियों के उदाहरण हैं— चीता, गुलाबी सिर वाली बत्तख, पहाड़ी कोयल, वन चित्तीदार उल्लू, तथा पादपों में मधुका इनसिगनिस (महुआ की जंगली किस्म) और हुबरड़िया हेप्टान्यूरोन (घास की प्रजाति) आदि।
लुप्त होने का खतरा झेल रही प्रजातियाँ :-
भारत में बड़े प्राणियों में स्तनधारियों की 79, पक्षियों की 44, सरीसृपों की 15 तथा जलस्थलचरों की 3 प्रजातियाँ लुप्त होने का खतरा झेल रही हैं। इसके अतिरिक्त लगभग 1500 पादप प्रजातियाँ भी संकटग्रस्त हैं।
संरक्षण क्यों जरूरी है?
वनों और वन्यजीवों का तेज़ी से ह्रास हो रहा है। संरक्षण से पारिस्थितिकी संतुलन बना रहता है तथा जल, वायु और मृदा जैसे जीवन-आधार संसाधन सुरक्षित रहते हैं। इसी कारण इनका संरक्षण अत्यंत आवश्यक हो गया है।
🔹 जैव-विविधता के संरक्षण का महत्त्व :-
- संरक्षण से पौधों और पशुओं की जींस विविधता सुरक्षित रहती है।
- इससे विभिन्न प्रजातियों में बेहतर जनन संभव होता है।
- खेती के लिए पारंपरिक फसलें और मछली पालन के लिए जलीय जैव-विविधता का होना अनिवार्य है।
भारत में संरक्षण के प्रमुख कदम :-
🔸 भारतीय वन्यजीव (रक्षण) अधिनियम, 1972 :- 1960–70 के दशक में पर्यावरणविदों ने राष्ट्रीय वन्यजीवन सुरक्षा कार्यक्रम की माँग की। इसके परिणामस्वरूप 1972 में भारतीय वन्यजीवन (रक्षण) अधिनियम लागू किया गया।
प्रावधान :- इस अधिनियम के अंतर्गत: वन्यजीव आवासों का कानूनी संरक्षण, शिकार पर प्रतिबंध, व्यापार पर रोक, संकटग्रस्त जातियों की सूची बनाना।
🔸 संरक्षित क्षेत्रों का निर्माण :- केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य स्थापित किए गए। इनका उद्देश्य संकटग्रस्त प्रजातियों का संरक्षण है।
🔸 विशेष प्रजाति संरक्षण परियोजनाएँ :- कुछ विशेष गंभीर रूप से संकटग्रस्त प्राणियों के लिए शुरू की गईं, जैसे: बाघ, एक सींग वाला गैंडा, कश्मीरी हिरण अथवा हंगुल (hangul), तीन प्रकार के मगरमच्छ – स्वच्छ जल मगरमच्छ, लवणीय जल मगरमच्छ और घड़ियाल, एशियाई शेर, और अन्य प्राणी।
🔸 शिकार एवं व्यापार पर प्रतिबंध :- कुछ समय पहले भारतीय हाथी, काला हिरण, चिंकारा, भारतीय गोडावन (bustard) और हिम तेंदुओं आदि के शिकार और व्यापार पर संपूर्ण अथवा आंशिक प्रतिबंध लगाकर कानूनी रक्षण दिया है
🔹 जैव-विविधता संरक्षण में परिवर्तन :-
- अब संरक्षण केवल कुछ प्रजातियों तक सीमित न होकर पूरी जैव-विविधता पर केंद्रित है। संरक्षण योजनाओं में कीटों को भी महत्त्व दिया गया है।
- 1980 और 1986 के अधिनियमों के अंतर्गत सैकड़ों तितलियाँ, पतंगे और भृंग, तथा एक ड्रैगनफ्लाई को संरक्षित प्रजातियों में शामिल किया गया।
- 1991 में पहली बार 6 पादप प्रजातियों को भी इस सूची में जोड़ा गया।
वन :-
वन प्राथमिक उत्पादक होते हैं क्योंकि पौधे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। सभी जीव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पौधों पर निर्भर होते हैं।
🔹 वनों का महत्त्व :-
- ये ऑक्सीजन प्रदान करते हैं।
- जल चक्र को नियंत्रित करते हैं।
- मृदा अपरदन को रोकते हैं।
- जैव-विविधता के संरक्षण में सहायक होते हैं।
वनों का वर्गीकरण :-
भारत में वनों का नियंत्रण मुख्य रूप से सरकार और वन विभाग के पास है। वनों को उनके संरक्षण के मूल्य और प्रबंधन के आधार पर तीन वर्गों में बाँटा गया है :-
🔸 (क) आरक्षित वन :- देश में आधे से अधिक वन क्षेत्र आरक्षित वन घोषित किए गए हैं। जहाँ तक वन और वन्य प्राणियों के संरक्षण की बात है, आरक्षित वनों को सर्वाधिक मूल्यवान माना जाता है।
🔸 (ख) रक्षित वन :- वन विभाग के अनुसार देश के कुल वन क्षेत्र का एक-तिहाई हिस्सा रक्षित है। इन वनों को और अधिक नष्ट होने से बचाने के लिए इनकी सुरक्षा की जाती है।
🔸 (ग) अवर्गीकृत वन :- अन्य सभी प्रकार के वन और बंजरभूमि जो सरकार, व्यक्तियों और समुदायों के स्वामित्व में होते हैं, अवर्गीकृत वन कहे जाते हैं।
स्थायी वन :-
आरक्षित और रक्षित वनों को ‘स्थायी वन’ भी कहा जाता है, जिनका रख-रखाव इमारती लकड़ी, अन्य वन पदार्थों और उनके बचाव के लिए किया जाता है।
भारत में वनों का राज्यवार वितरण :-
🔸 आरक्षित वनों का अधिक अनुपात :- मध्य प्रदेश में स्थायी (आरक्षित) वनों के अंतर्गत सर्वाधिक क्षेत्र है, जो प्रदेश के कुल वन क्षेत्र का लगभग 75 प्रतिशत है। इसके अतिरिक्त जम्मू और कश्मीर, आंध्र प्रदेश, उत्तराखण्ड, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल तथा महाराष्ट्र में कुल वनों का एक बड़ा भाग आरक्षित वन है।
🔸 रक्षित वनों का अधिक अनुपात :- बिहार, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, ओडिशा और राजस्थान में कुल वनों में रक्षित वनों का अनुपात अधिक है।
🔸 अवर्गीकृत वनों का अधिक अनुपात :- पूर्वोत्तर के सभी राज्यों तथा गुजरात में अधिकांश वन क्षेत्र अवर्गीकृत वन हैं, जो स्थानीय समुदायों के प्रबंधन में हैं।
वन क्षेत्र के घटने के कारण :-
- कृषि क्षेत्र का विस्तार
- बड़ी विकास परियोजनाएँ, जैसे रेलवे तथा नदी घाटी परियोजनाएँ
- खनन गतिविधियाँ
- पशुचारण एवं ईंधन के लिए लकड़ी की कटाई
- औपनिवेशिक वन नीति
भारत में वन संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भूमिका :-
भारत में वन केवल पेड़-पौधे नहीं हैं, बल्कि कई आदिवासी और स्थानीय समुदायों के घर भी हैं। इसीलिए, कई क्षेत्रों में स्थानीय समुदाय अपने आवासों के संरक्षण के लिए सरकार के साथ या स्वतंत्र रूप से कार्यरत हैं।
🔹 विशिष्ट उदाहरण :-
🔸 सरिस्का बाघ रिज़र्व, राजस्थान :- राजस्थान के सरिस्का बाघ रिज़र्व में ग्रामीणों ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत खनन कार्य बंद करवाने के लिए संघर्ष किया।
🔸 भैरोंदेव डाकव ‘सोंचुरी’, राजस्थान :- राजस्थान के अलवर जिले में 5 गाँवों के लोगों ने तो 1,200 हेक्टेयर वन भूमि भैरोंदेव डाकव ‘सोंचुरी’ घोषित कर दी जिसके अपने ही नियम कानून हैं; जो शिकार वर्जित करते हैं तथा बाहरी लोगों की घुसपैठ से यहाँ के वन्य जीवन को बचाते हैं।
🔸 चिपको आंदोलन, हिमालय :- हिमालय क्षेत्र में चिपको आंदोलन वन कटाई रोकने में सफल रहा। इसने यह भी दिखाया कि स्थानीय पौधों का उपयोग करके सामुदायिक वनीकरण सफल हो सकता है।
🔸 बीज बचाओ आंदोलन, टिहरी :- टिहरी में किसानों का बीज बचाओ आंदोलन और नवदानय ने दिखा दिया है कि रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग के बिना भी विविध फसल उत्पादन द्वारा आर्थिक रूप से व्यवहार्य कृषि उत्पादन संभव है।
संयुक्त वन प्रबंधन :-
भारत में संयुक्त वन प्रबंधन कार्यक्रम क्षरित वनों के प्रबंध और पुनर्निर्माण में स्थानीय समुदायों की भूमिका के महत्त्व को उजागर करते हैं।
🔸 शुरुआत :- औपचारिक रूप में इन कार्यक्रमों की शुरुआत 1988 में हुई जब ओडिशा राज्य ने संयुक्त वन प्रबंधन का पहला प्रस्ताव पास किया।
🔸 कार्यप्रणाली :- इसमें गाँव के स्तर पर संस्थाएँ बनाई जाती हैं, जहाँ ग्रामीण और वन विभाग मिलकर ‘क्षरित वनों’ को बचाने का काम करते हैं।
🔸 लाभ :- इसके बदले ये समुदाय मध्य स्तरीय लाभ जैसे गैर-इमारती वन उत्पादों के हकदारी होते हैं तथा सफल संरक्षण से प्राप्त इमारती लकड़ी लाभ में भी भागीदार होते हैं।