NCERT Class 10th Social Science Geography Notes Chapter 1 संसाधन एवं विकास
इस अध्याय मे हम संसाधन, संसाधनों का वर्गीकरण, संसाधनों का विकास, संसाधन नियोजन, भू – संसाधन, भारत में भू – उपयोग प्रारूप, भूमि निम्नीकरण और संरक्षण उपाय, मृदा संसाधन, मृदाओं का वर्गीकरण, मृदा अपरदन और संरक्षण आदि के बारे में विस्तार से पड़ेगे।
संसाधन एवं विकास
संसाधन :-
हमारे पर्यावरण में उपलब्ध प्रत्येक वस्तु जो हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने में प्रयुक्त की जा सकती है तथा जो तकनीकी रूप से सुलभ, आर्थिक रूप से संभाव्य और सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य हो, संसाधन कहलाती है।
संसाधन निर्माण की प्रक्रिया :-
संसाधनों का निर्माण निम्नलिखित तीन कारकों के आपसी अंतःसंबंध से होता है—
- प्रकृति – प्राकृतिक पदार्थ प्रदान करती है।
- प्रौद्योगिकी – इन पदार्थों को उपयोगी रूप में परिवर्तित करती है।
- संस्थाएँ – संसाधनों के उपयोग, नियंत्रण और विकास में सहायता करती हैं।
👉 मानव प्रकृति के साथ प्रौद्योगिकी का उपयोग कर आर्थिक विकास को गति देता है।
संसाधनों का वर्गीकरण :-
संसाधनों को उनकी प्रकृति और उपयोग के आधार पर 4 मुख्य भागों में बांटा गया है:
- उत्पत्ति के आधार पर – जैव और अजैव
- समाप्यता के आधार पर – नवीकरण योग्य और अनवीकरण योग्य
- स्वामित्व के आधार पर – व्यक्तिगत, सामुदायिक, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय
- विकास के स्तर के आधार पर – संभावी, विकसित, भंडार और संचित कोष
1. उत्पत्ति के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण :–
🔸 (i) जैव संसाधन :– वे संसाधन जो हमें जीवमंडल से प्राप्त होते हैं तथा जिनमें जीवन पाया जाता है, जैव संसाधन कहलाते हैं। उदाहरण – मनुष्य, पशु, पौधे, मत्स्य आदि।
🔸 (ii) अजैव संसाधन :– वे संसाधन जो निर्जीव पदार्थों से बने होते हैं तथा जिनमें जीवन नहीं होता, अजैव संसाधन कहलाते हैं। उदाहरण – चट्टानें, धातुएँ, खनिज आदि।
2. समाप्यता के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण :–
🔸 (i) नवीकरणीय संसाधन :– वे संसाधन जिन्हें प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा पुनः उत्पन्न या पुनः उपयोग योग्य बनाया जा सकता है, नवीकरणीय संसाधन कहलाते हैं। उदाहरण – सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल।
🔸 (ii) अनवीकरणीय संसाधन :– वे संसाधन जिनका भंडार सीमित होता है तथा जिन्हें एक बार उपयोग करने के बाद पुनः प्राप्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि इन्हें बनने में लाखों साल लगते हैं, अनवीकरणीय संसाधन कहलाते हैं। उदाहरण – जीवाश्म ईंधन (कोयला, पेट्रोलियम)।
3. स्वामित्व के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण :–
🔸 (i) व्यक्तिगत संसाधन :– वे संसाधन जिनका स्वामित्व निजी व्यक्तियों के पास होता है, व्यक्तिगत संसाधन कहलाते हैं। उदाहरण – किसी किसान की भूमि, मकान, कुआँ आदि।
🔸 (ii) सामुदायिक संसाधन :– वे संसाधन जिनका उपयोग समुदाय के सभी सदस्य करते हैं, सामुदायिक संसाधन कहलाते हैं। उदाहरण – श्मशान घाट, खेल का मैदान, सार्वजनिक पार्क।
🔸 (iii) राष्ट्रीय संसाधन :– वे सभी संसाधन जो किसी राष्ट्र की भौगोलिक सीमा के भीतर पाए जाते हैं तथा जिन पर सरकार का अधिकार होता है, राष्ट्रीय संसाधन कहलाते हैं। उदाहरण – नदियाँ, वन, खनिज, सड़कें।
🔸 (iv) अंतर्राष्ट्रीय संसाधन :– तट रेखा से 200 समुद्री मील की दूरी के बाद का खुला महासागरीय क्षेत्र। यहाँ किसी एक देश का अधिकार नहीं होता। ये अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की निगरानी में होते हैं और अंतर्राष्ट्रीय संसाधन कहलाते हैं। उदाहरण – समुद्र के संसाधन, अंटार्कटिका।
4. विकास के स्तर के आधार पर संसाधनों का वर्गीकरण :–
🔸 (i) संभावी संसाधन :– वे संसाधन जो किसी प्रदेश में विद्यमान तो होते हैं, परंतु वर्तमान में उनका उपयोग नहीं किया गया है, अर्थात जिनका उपयोग भविष्य में संभव है, संभावी संसाधन कहलाते हैं। उदाहरण – राजस्थान और गुजरात में पवन ऊर्जा की संभावना।
🔸 (ii) विकसित संसाधन :– वे संसाधन जिनके उपयोग की गुणवत्ता और मात्रा निर्धारित की जा चुकी है तथा जिनका वर्तमान में उपयोग हो रहा है, विकसित संसाधन कहलाते हैं। उदाहरण – कोयला, पेट्रोलियम।
🔸 (iii) भंडारित संसाधन :– वे संसाधन जो पर्यावरण में उपलब्ध हैं, लेकिन प्रौद्योगिकी के अभाव में मानव की पहुंच से बाहर हैं, भंडारित संसाधन कहलाते हैं। उदाहरण – हाइड्रोजन को ईंधन के रूप में इस्तेमाल करना।
🔸 (iv) संचित कोष संसाधन :– वे संसाधन जिन्हें वर्तमान तकनीकी ज्ञान से उपयोग में लाया जा सकता है, परंतु इनका उपयोग अभी प्रारंभ नहीं हुआ है, संचित संसाधन कहलाते हैं। उदाहरण – जलसमुद्र के पानी में घुला हुआ भारी हाइड्रोजन ।
संसाधनों का महत्व :-
- संसाधन मानव की मूल आवश्यकताओं जैसे भोजन, वस्त्र और आवास की पूर्ति करते हैं।
- संसाधन आर्थिक विकास और औद्योगिक प्रगति का आधार हैं।
- संसाधनों के माध्यम से रोज़गार के अवसर उत्पन्न होते हैं।
- संसाधन राष्ट्रीय विकास और आत्मनिर्भरता में सहायक होते हैं।
- संसाधनों का उचित और सतत उपयोग पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में मदद करता है।
- संसाधन मानव जीवन स्तर को ऊँचा उठाने में सहायक होते हैं।
संसाधनों के अंधाधुंध उपयोग से उत्पन्न समस्याएँ :-
पहले यह माना जाता था कि संसाधन प्रकृति की निःशुल्क देन हैं, इसी सोच के कारण मनुष्य ने संसाधनों का अंधाधुंध उपयोग किया। इससे तीन बड़ी समस्याएँ पैदा हो गई हैं:
🔸 (i) संसाधनों का ह्रास :- कुछ लालची व्यक्तियों और देशों की आवश्यकताओं की पूर्ति के कारण संसाधनों का तेजी से दोहन हुआ, जिससे कई संसाधन समाप्ति की ओर बढ़ रहे हैं।
🔸 (ii) समाज का बँटवारा :- संसाधन समाज के कुछ ही लोगों के हाथों में सिमट गए। संसाधनों का असमान वितरण होने के कारण समाज दो वर्गों में विभाजित हो गया है— संसाधन-संपन्न (अमीर) और संसाधन-विहीन (गरीब)।
🔸 (iii) वैश्विक संकट :- संसाधनों के अत्यधिक शोषण से कई पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हुईं, जैसे—
- भूमंडलीय तापन
- ओजोन परत का क्षय
- पर्यावरण प्रदूषण
- भूमि निम्नीकरण
👉 इन समस्याओं से मानव जीवन और पृथ्वी का संतुलन खतरे में है।
सतत् पोषणीय विकास :-
संसाधनों का ऐसा विकास जो पर्यावरण को बिना क्षति पहुँचाए किया जाए तथा जिसमें वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं की पूर्ति इस प्रकार हो कि भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं से समझौता न हो, सतत् पोषणीय विकास कहलाता हैं।
हमें संसाधनों के न्यायसंगत बँटवारे की आवश्यकता क्यों है?
- (i) मानव जीवन की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए :- न्यायसंगत वितरण से सभी लोगों की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति होती है और जीवन स्तर में सुधार होता है।
- (ii) सामाजिक एवं आर्थिक असमानता को कम करने के लिए :- यदि संसाधन कुछ ही लोगों तक सीमित रहें, तो समाज अमीर और गरीब वर्गों में बँट जाता है।
- (iii) विश्व शांति बनाए रखने के लिए :- संसाधनों की कमी के कारण देशों के बीच संघर्ष और युद्ध की संभावना बढ़ जाती है।
- (iv) पर्यावरण संतुलन एवं पृथ्वी को विनाश से बचाने के लिए :- अविवेकपूर्ण दोहन से संसाधनों का ह्रास और पर्यावरणीय संकट उत्पन्न होता है।
🔸 निष्कर्ष :- यदि संसाधनों का दोहन इसी प्रकार जारी रहा, तो मानव अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। अतः संसाधनों का योजनाबद्ध, न्यायसंगत और सतत उपयोग ही एकमात्र समाधान है।
रियो डी जेनेरो पृथ्वी सम्मेलन, 1992 :-
यह दुनिया का पहला अंतर्राष्ट्रीय पृथ्वी सम्मेलन था।
- कब और कहाँ: जून 1992 में, ब्राजील के शहर रियो डी जेनेरो में।
- कौन शामिल हुआ: 100 से अधिक देशों के राष्ट्राध्यक्ष।
- उद्देश्य: विश्व स्तर पर उभर रही पर्यावरण संरक्षणऔर सामाजिक-आर्थिक विकास से जुड़ी समस्याओं का समाधान खोजना।
रियो सम्मेलन की प्रमुख उपलब्धियाँ :-
- भूमंडलीय जलवायु परिवर्तन पर घोषणा
- जैविक विविधता संरक्षण पर घोषणा
- भूमंडलीय वन सिद्धांत पर सहमति
- एजेंडा 21 को स्वीकृति
👉 यह सम्मेलन पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम था।
एजेंडा 21 :-
यह एक घोषणा और कार्यसूची है। इसे 1992 में रियो डी जेनेरो में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण और विकास सम्मेलन के अंतर्गत राष्ट्राध्यक्षों द्वारा अपनाया गया।
🔸 एजेंडा 21 का उद्देश्य :-
- भूमंडलीय सतत् पोषणीय विकास को प्राप्त करना।
- तीन बड़ी चुनौतियों से निपटना: पर्यावरणीय क्षति, गरीबी, रोग
🔸 तरीका :- विश्व सहयोग, समान हित, पारस्परिक ज़रूरत और साझा जिम्मेदारी के आधार पर।
🔸 एजेंडा 21 की मुख्य विशेषताएँ :- इसका मुख्य सुझाव यह है कि सिर्फ केंद्र सरकार ही नहीं, बल्कि प्रत्येक स्थानीय निकाय (जैसे नगर पालिका, ग्राम पंचायत) अपना खुद का ‘स्थानीय एजेंडा 21’ तैयार करे ताकि छोटे स्तर पर भी बदलाव आए।
संसाधन नियोजन :–
संसाधन नियोजन से तात्पर्य ऐसे उपायों, तकनीकों एवं योजनाओं से है, जिनके द्वारा संसाधनों का उचित, न्यायसंगत और सतत उपयोग सुनिश्चित किया जा सके।
भारत में संसाधन क्यों ज़रूरी है? :-
भारत जैसे विशाल देश में संसाधनों की उपलब्धता में बहुत अधिक विविधता पाई जाती है। कुछ क्षेत्रों में एक प्रकार के संसाधन प्रचुर मात्रा में हैं, जबकि अन्य संसाधनों की वहाँ कमी है।
🔸 उदाहरण के लिए :-
- झारखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़: में खनिजों और कोयले के प्रचुर भंडार पाए जाते हैं।
- अरुणाचल प्रदेश: में जल संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं, लेकिन मूलभूत विकास की कमी है।
- राजस्थान: में पवन ऊर्जा, सौर ऊर्जा की बहुतायत है, लेकिन जल संसाधनों की कमी पाई जाती है।
- लद्दाख: यह ‘शीत मरुस्थल’ है जो सांस्कृतिक रूप से तो समृद्ध है, लेकिन यहाँ जल, बुनियादी ढांचा और खनिजों की कमी है।
👉 इसलिए भारत में संसाधन नियोजन अत्यंत आवश्यक है।
संतुलित संसाधन नियोजन की आवश्यकता :-
संसाधनों की असमान उपलब्धता के कारण राष्ट्रीय, प्रांतीय, प्रादेशिक और स्थानीय स्तर पर संतुलित संसाधन नियोजन आवश्यक है।
इससे :-
- क्षेत्रीय असमानता कम होगी।
- सभी क्षेत्रों का समान विकास संभव होगा।
- संसाधनों का संरक्षण भी किया जा सकेगा।
भारत में संसाधन नियोजन के सोपान :-
संसाधन नियोजन एक जटिल प्रक्रिया है, जिसे मुख्य रूप से तीन चरणों में पूरा किया जाता है:
- (1) देश के विभिन्न प्रदेशों में संसाधनों की पहचान कर उनकी तालिका बनाना। इस कार्य में क्षेत्रीय सर्वेक्षण, मानचित्र बनाना और संसाधनों का गुणात्मक एवं मात्रात्मक अनुमान लगाना व मापन करना है।
- (2) संसाधन विकास योजनाएँ लागू करने के लिए उपयुक्त प्रौद्योगिकी, कौशल और संस्थागत नियोजन ढाँचा तैयार करना।
- (3) संसाधन विकास योजनाओं और राष्ट्रीय विकास योजना में समन्वय स्थापित करना।
संसाधन संरक्षण का अर्थ :–
संसाधन किसी भी प्रकार के आर्थिक और सामाजिक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन संसाधनों का विवेकहीन उपभोग और अति उपयोग के कारण कई सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
👉 इन समस्याओं से बचने के लिए संसाधनों का संरक्षण आवश्यक है।
भू – संसाधन :-
भूमि एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है। हम भूमि पर रहते हैं और सभी आर्थिक गतिविधियाँ इसी पर होती हैं।
प्राकृतिक वनस्पति, वन्य जीवन, मानव जीवन, आर्थिक क्रियाएँ, परिवहन और संचार व्यवस्था – सब कुछ भूमि पर आधारित है। इसलिए भूमि एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है।
भारत में भूमि – संसाधन :-
भारत में भूमि पर विभिन्न प्रकार की भू-आकृतियाँ जैसे पर्वत, पठार, मैदान और द्वीप पाए जाते हैं, जो संसाधनों और विकास को प्रभावित करती हैं। भारत की भूमि एक जैसी नहीं है। इसे मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा जा सकता है:
- मैदान (Plains) :- लगभग 43 प्रतिशत भू-क्षेत्र मैदान हैं जो कृषि और उद्योग के विकास के लिए सुविधाजनक हैं।
- पर्वत (Mountains) :- पर्वत पूरे भू-क्षेत्र के 30 प्रतिशत भाग पर विस्तृत हैं। वे कुछ बारहमासी नदियों के प्रवाह को सुनिश्चित करते है, पर्यटन विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ प्रदान करता है और पारिस्थितिकी के लिए महत्त्वपूर्ण है।
- पठार (Plateaus) :- देश के क्षेत्रफल का लगभग 27 प्रतिशत हिस्सा पठारी क्षेत्र है। इस क्षेत्र में खनिजों, जीवाश्म ईंधन और वनों का अपार संचय कोष है।
भू-उपयोग :-
भूमि का उपयोग विभिन्न आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय उद्देश्यों के लिए किया जाता है। इसी उपयोग के आधार पर भूमि को अलग-अलग श्रेणियों में बाँटा जाता है।
भू-उपयोग के मुख्य प्रकार :-
🔸 1. वन भूमि :- वे क्षेत्र जो पेड़ों और प्राकृतिक वनस्पति से ढके हुए हैं।
🔸 2. कृषि के लिए अनुपलब्ध भूमि :- वह ज़मीन जिस पर खेती नहीं की जा सकती:
- (क) बंजर एवं कृषि अयोग्य भूमि :- ऐसी भूमि जहाँ खेती संभव नहीं होती। जैसे: चट्टानी क्षेत्र, मरुस्थलीय भूमि।
- (ख) गैर-कृषि प्रयोजनों में लगाई गई भूमि :- वह भूमि जो खेती के अलावा अन्य कार्यों में प्रयोग होती है, जैसे: इमारतें, सड़कें, उद्योग, रेलवे लाइन।
🔸 3. परती भूमि के अतिरिक्त अन्य कृषि अयोग्य भूमि :-
- (अ) स्थायी चरागाहें व अन्य गोचर भूमि – पशुओं के चरने की भूमि।
- (ब) विविध वृक्षों, वृक्ष फसलों, तथा उपवनों के अधीन भूमि (जो शुद्ध बोए गए क्षेत्र में शामिल नहीं है)
- (स) कृषि योग्य बंजर भूमि – जहाँ पिछले 5 वर्षों या अधिक समय से खेती नहीं हुई।
🔸 4. परती भूमि :- यह वह ज़मीन है जिसे मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बढ़ाने के लिए कुछ समय के लिए खाली छोड़ दिया जाता है:
- (क) वर्तमान परती :- जहाँ एक कृषि वर्ष या उससे कम समय से खेती न की गई हो।
- (ख) पुरातन परती (अन्य परती भूमि) :- जहाँ 1 से 5 कृषि वर्ष से खेती न की गई हो
🔸 5. शुद्ध (निवल) बोया गया क्षेत्र :-
- शुद्ध (निवल) बोया गया क्षेत्र :- वह भूमि जिस पर फसलें उगाई व काटी जाती हैं वह शुद्ध (निवल) बोया गया क्षेत्र कहलाता है।
- सकल कृषित क्षेत्र :- एक कृषि वर्ष में एक बार से अधिक बोए गए क्षेत्र को शुद्ध (निवल) बोए गए क्षेत्र में जोड़ दिया जाए तो वह सकल कृषित क्षेत्र कहलाता है।
भारत में भू-उपयोग को प्रभावित करने वाले तत्त्व :-
भारत में भू-उपयोग निम्न दो प्रकार के कारकों पर निर्भर करता है:
- भौतिक कारक :- भूमि की भौतिक बनावट (जैसे पर्वत, पठार या मैदान), जलवायु तथा मिट्टी के प्रकार भू-उपयोग को प्रभावित करते हैं।
- मानवीय कारक :- जनसंख्या घनत्व, प्रौद्योगिकी का स्तर तथा सांस्कृतिक परंपराएँ भी भू-उपयोग को निर्धारित करती हैं।
👉 इन सभी कारकों के संयुक्त प्रभाव से किसी क्षेत्र का भू-उपयोग निर्धारित होता है।
भूमि निम्नीकरण क्या है?
भूमि निम्नीकरण से आशय भूमि की उपजाऊ शक्ति में कमी से है, जिसके कारण भूमि कृषि, वनस्पति तथा अन्य उपयोगों के लिए कम उपयोगी हो जाती है।
यह समस्या भूमि के अत्यधिक दोहन, वनों की कटाई, अति-चराई, खनन गतिविधियों तथा गलत कृषि पद्धतियों के कारण उत्पन्न होती है।
भूमि निम्नीकरण के प्रमुख कारण :–
भूमि निम्नीकरण के लिए निम्नलिखित कारण मुख्य रूप से उत्तरदायी हैं—
- वनों की कटाई :– वनों की अंधाधुंध कटाई से मिट्टी का कटाव बढ़ता है और भूमि की उपजाऊ शक्ति घटती है।
- अति-चराई :– पशुओं द्वारा अत्यधिक चराई से मिट्टी की ऊपरी परत नष्ट हो जाती है।
- खनन गतिविधियाँ :– खनन से भूमि की प्राकृतिक संरचना बिगड़ जाती है और भूमि बंजर हो जाती है।
- अत्यधिक सिंचाई :– इससे जलभराव और लवणता की समस्या उत्पन्न होती है।
- रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अधिक प्रयोग :– इससे मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता कम हो जाती है।
- औद्योगिक अपशिष्ट और प्रदूषण :– कारखानों से निकलने वाले अपशिष्ट भूमि को प्रदूषित करते हैं।
भूमि निम्नीकरण के समाधान (उपाय) :–
- वनारोपण :– खाली एवं बंजर भूमि पर अधिक से अधिक पेड़ लगाकर मिट्टी के कटाव को रोका जाता है।
- रक्षक मेखला :– खेतों के किनारों पर पेड़ों की कतारें लगाई जाती हैं, जिससे तेज़ हवाओं द्वारा मिट्टी का कटाव रुकता है।
- चरागाह प्रबंधन :– पशुओं की अति-चराई पर नियंत्रण रखकर भूमि की उर्वरता बनाए रखी जाती है।
- रेतीले टीलों का स्थिरीकरण :– रेगिस्तानी क्षेत्रों में काँटेदार झाड़ियाँ और घास लगाकर मिट्टी को एक स्थान पर स्थिर किया जाता है।
- औद्योगिक उपचार :– कारखानों से निकलने वाले कचरे और अपशिष्ट जल को शुद्ध (filter) करके ही बाहर छोड़ा जाना चाहिए।
- खनन नियंत्रण :– खनन कार्य के बाद खदानों को भरकर भूमि को पुनः उपयोग योग्य बनाया जाना चाहिए।
मृदा संसाधन :-
मिट्टी (मृदा) सबसे महत्त्वपूर्ण नवीकरण योग्य प्राकृतिक संसाधन है। यह पौधों के विकास का माध्यम है और पृथ्वी पर विभिन्न जीवों का पोषण करती है। मृदा एक जीवंत तंत्र है, क्योंकि इसमें सूक्ष्म जीव पाए जाते हैं।
👉 हमारी कृषि, भोजन और जीवन सीधे मृदा पर निर्भर हैं।
मृदा का निर्माण :-
मिट्टी के निर्माण की प्रक्रिया अत्यंत धीमी होती है । इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि केवल कुछ सेंटीमीटर गहरी मृदा बनने में लाखों वर्ष लग जाते हैं।
मृदा बनने की प्रक्रिया में उच्चावच, जनक शैल अथवा संस्तर शैल, जलवायु, वनस्पति और अन्य जैव पदार्थ और समय मुख्य कारक हैं।
🔸 मृदा निर्माण में सहायक प्राकृतिक प्रक्रियाएँ :- प्रकृति के अनेकों तत्त्व जैसे तापमान परिवर्तन, बहते जल की क्रिया, पवन, हिमनदी और अपघटन क्रियाएँ आदि मृदा बनने की प्रक्रिया में योगदान देती हैं। इनसे चट्टानें टूटती हैं और मृदा का निर्माण होता है।
मृदा में होने वाले रासायनिक और जैविक परिवर्तन भी महत्त्वपूर्ण हैं।
मिट्टी की संरचना :-
मृदा दो प्रकार के पदार्थों से मिलकर बनती है: मृदा जैव (ह्यूमस) और अजैव दोनों प्रकार के पदार्थों से बनती है।
- जैव :- सड़े-गले कार्बनिक पदार्थ।
- अजैव :- चट्टानों के टुकड़े, खनिज, हवा और पानी।
भारत में मृदा के प्रमुख प्रकार :–
- जलोढ़ मृदा
- काली मृदा
- लाल एवं पीली मृदा
- लेटराइट मृदा
- मरुस्थलीय मृदा
- वन मृदा
जलोढ़ मृदा :-
- जलोढ़ मृदा भारत की सबसे विस्तृत और महत्त्वपूर्ण मृदा है।
- संपूर्ण उत्तरी मैदान जलोढ़ मृदा से बना है।
- यह मृदा सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी तंत्रों द्वारा लाए गए निक्षेपों से बनी है।
- एक संकरे गलियारे के माध्यम से यह राजस्थान और गुजरात तक फैली हुई है।
- पूर्वी तटीय मैदानों में महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों के डेल्टा क्षेत्र भी जलोढ़ मृदा से बने हैं।
🔹 जलोढ़ मृदा की संरचना और कणों का आकार :-
- जलोढ़ मृदा में रेत, सिल्ट और मृत्तिका विभिन्न अनुपातों में पाई जाती है।
- नदी के मुहाने से घाटी की ओर ऊपर जाने पर मृदा के कणों का आकार बढ़ता जाता है।
- नदी घाटी के ऊपरी भागों तथा पर्वतीय तलहटी (भाबर, तराई, द्वार, चो क्षेत्र) में मोटे कणों वाली मृदा पाई जाती है।
🔹 आयु के आधार पर जलोढ़ मृदा के प्रकार :-
जलोढ़ मृदा दो प्रकार की होती है:
- पुरानी जलोढ़ (बांगर) – इसमें कंकर ग्रंथियों की मात्रा अधिक होती है।
- नई जलोढ़ (खादर) – इसमें अधिक महीन कण पाए जाते हैं और यह अधिक उपजाऊ होती है।
🔹 जलोढ़ मृदा की उर्वरता और कृषि महत्त्व :-
- जलोढ़ मृदा अत्यंत उपजाऊ होती है।
- इसमें पोटाश, फास्फोरस और चूना पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है।
- यह चावल, गेहूँ, गन्ना, दलहन और अन्य अनाजों की खेती के लिए उपयुक्त है।
- अधिक उपजाऊ होने के कारण यहाँ गहन कृषि की जाती है और जनसंख्या घनत्व अधिक होता है।
🔹 शुष्क क्षेत्रों की जलोढ़ मृदा :-
- शुष्क क्षेत्रों की जलोढ़ मृदा अधिक क्षारीय होती है।
- उचित सिंचाई और उपचार से इन मृदाओं की उपज क्षमता बढ़ाई जा सकती है।
काली मृदा :-
- काली मृदा का रंग काला होता है, इसलिए इसे रेगर मृदा भी कहा जाता है।
- यह मृदा कपास की खेती के लिए अत्यंत उपयुक्त होती है, इसलिए इसे काली कपास मृदा भी कहते हैं।
🔹 काली मृदा की उत्पत्ति :-
काली मृदा का निर्माण जलवायु और लावा जनक शैलों (बेसाल्ट) से हुआ है।
🔹 काली मृदा का भौगोलिक विस्तार :-
- मुख्य क्षेत्र: यह मुख्य रूप से दक्कन पठार के उत्तर-पश्चिमी भागों में पाई जाती है।
- राज्य: महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, मालवा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ के पठारी भाग।
- दक्षिण-पूर्वी विस्तार: यह मृदा दक्षिण-पूर्व दिशा में गोदावरी नदी और कृष्णा नदी की घाटियों तक फैली हुई है।
🔹 काली मृदा की विशेषताएँ :-
- काली मृदा बहुत महीन कणों (मृत्तिका) से बनी होती है।
- इसमें नमी धारण करने की क्षमता बहुत अधिक होती है।
- इसमें कैल्शियम कार्बोनेट, मैग्नीशियम, पोटाश और चूना प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
- इसमें फास्फोरस की मात्रा कम होती है।
🔹 मौसमी व्यवहार :-
- गर्म और शुष्क मौसम में इसमें गहरी दरारें पड़ जाती हैं, जिससे मिट्टी का वायु संचार अच्छा होता है।
- गीली होने पर यह मृदा चिपचिपी हो जाती है, इसलिए इसे जोतना कठिन होता है।
- इसलिए काली मृदा की जुताई मानसून की पहली बौछार के साथ शुरू की जाती है।
लाल एवं पीली मृदा :-
- लाल मृदा का विकास कम वर्षा वाले क्षेत्रों में रवेदार आग्नेय चट्टानों पर हुआ है।
- यह मृदा मुख्य रूप से दक्कन पठार के पूर्वी और दक्षिणी भागों में पाई जाती है।
🔹 लाल और पीली मृदा का विस्तार :-
लाल और पीली मृदाएँ निम्न क्षेत्रों में पाई जाती हैं:
- ओडिशा
- छत्तीसगढ़
- मध्य गंगा मैदान का दक्षिणी छोर
- पश्चिमी घाट के पहाड़ी क्षेत्र
🔹 लाल और पीली रंग का कारण :-
- इन मृदाओं का लाल रंग:
- 👉 रवेदार आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों में लौह धातु के प्रसार के कारण होता है।
- इन मृदाओं का पीला रंग:
- 👉 इनमें जलयोजन की प्रक्रिया के कारण होता है।
लेटराइट मृदा :-
- लेटराइट शब्द ग्रीक भाषा के शब्द ‘Later’ से लिया गया है, जिसका अर्थ है ईंट।
- इस मृदा से ईंटें बनाई जा सकती हैं, इसलिए इसका यह नाम पड़ा।
- लेटराइट मृदा का निर्माण होता है उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्णकटिबंधीय जलवायु में जहाँ आर्द्र और शुष्क ऋतुएँ बारी-बारी से आती हैं।
- यह मृदा अत्यधिक वर्षा के कारण निक्षालन का परिणाम होती है।
- लेटराइट मृदा अधिकतर गहरी तथा अम्लीय (pH<6.0) होती है।
- इसमें पौधों के आवश्यक पोषक तत्त्वों की कमी पाई जाती है।
🔹 लेटराइट मृदा का वितरण (भारत में) :-
यह मृदा मुख्यतः निम्न क्षेत्रों में पाई जाती है—
- दक्षिणी भारत
- महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट क्षेत्र
- ओडिशा
- पश्चिम बंगाल के कुछ भाग
- उत्तर–पूर्वी भारत
🔹 लेटराइट मृदा में ह्यूमस की मात्रा :-
- जहाँ पर्णपाती एवं सदाबहार वन पाए जाते हैं, वहाँ लेटराइट मृदा में ह्यूमस की मात्रा अधिक होती है।
- लेकिन विरल वनस्पति और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में इसमें ह्यूमस कम पाया जाता है।
🔹 लेटराइट मृदा की समस्याएँ :-
स्थलरूप के अनुसार इन मृदाओं में अपरदन और भूमि निम्नीकरण की संभावना अधिक होती है।
🔹 लेटराइट मृदा का कृषि उपयोग :-
- उचित मृदा संरक्षण तकनीकों को अपनाकर इस मृदा पर सफल खेती की जा सकती है।
- कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में चाय और कॉफी की खेती की जाती है।
- तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल की लाल लेटराइट मृदा काजू की खेती के लिए उपयुक्त होती है।
मरुस्थलीय मृदा :-
- मरुस्थलीय मृदाओं का रंग सामान्यतः लाल और भूरा होता है।
- ये मृदाएँ प्रायः रेतीली और लवणीय होती हैं।
- कुछ क्षेत्रों में नमक की मात्रा बहुत अधिक होती है, इसलिए झीलों से जल का वाष्पीकरण करके खाने का नमक बनाया जाता है।
🔹 जलवायु का प्रभाव :-
- शुष्क जलवायु और उच्च तापमान के कारण वाष्पीकरण की दर अधिक होती है
- मृदा में नमी और ह्यूमस की मात्रा कम पाई जाती है।
🔹 मरुस्थलीय मृदा की आंतरिक संरचना :-
- मृदा की सतह के नीचे कैल्शियम की मात्रा बढ़ती जाती है।
- निचली परतों में चूने के कंकर (कैल्शियम कार्बोनेट) की कठोर परत बन जाती है।
- इससे जल का अंतःस्यंदन बाधित हो जाता है।
🔹 मरुस्थलीय मृदा का कृषि उपयोग :-
- प्राकृतिक रूप से यह मृदा कम उपजाऊ होती है।
- लेकिन उचित सिंचाई द्वारा इस मृदा को कृषि योग्य बनाया जा सकता है।
- इसका उदाहरण पश्चिमी राजस्थान में देखने को मिलता है।
वन मृदा :-
- वन मृदाएँ सामान्यतः पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाती हैं।
- ये वे क्षेत्र होते हैं जहाँ पर्याप्त वर्षा और वनस्पति उपलब्ध होती है।
- भारत में इन मृदाओं का प्रमुख विस्तार हिमालय तथा अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में है।
🔸 वन मृदा की बनावट :- नदी घाटियों में ये मृदाएँ दोमट और सिल्टदार होती है परंतु ऊपरी ढालों पर इनका गठन मोटे कणों का होता है।
🔹 वन मृदा की विशेषताएँ :-
- हिमालय के हिमाच्छादित क्षेत्रों में इन मृदाओं का अधिक अपरदन होता है।
- ये मृदाएँ प्रायः अम्लीय तथा ह्यूमस रहित होती हैं।
- नदी घाटियों के निचले क्षेत्रों, विशेषकर नदी सोपानों और जलोढ़ पंखों, आदि में ये मृदाएँ उपजाऊ होती हैं।
मृदा अपरदन क्या है?
मिट्टी के ऊपरी कटाव और उसके बहाव की प्रक्रिया को मृदा अपरदन कहते हैं। वैसे तो मिट्टी का बनना और कटना साथ-साथ चलता है, लेकिन मानवीय गलतियों से यह संतुलन बिगड़ गया है।
मृदा अपरदन के कारण :-
- प्राकृतिक कारण :- पवन, हिमनदी और बहता जल।
- मानवीय कारण :- पेड़ों की कटाई (वनोन्मूलन), अति पशुचारण, निर्माण कार्य, खनन, कृषि की गलत विधियाँ।
मृदा अपरदन के प्रकार :-
🔸 (i) अवनलिका अपरदन :- बहता जल मृत्तिकायुक्त मृदा को काटकर गहरी नालियाँ बना देता है। ऐसी भूमि जोतने योग्य नहीं रहती, इसे उत्खात भूमि कहते हैं।
👉 चंबल बेसिन में इसे खड्ड भूमि कहते हैं।
🔸 (ii) चादर अपरदन :- जब जल ढाल के साथ बहते हुए ऊपरी मृदा की परत को बहा ले जाता है।
🔸 (iii) पवन अपरदन :- पवन द्वारा मैदानों या ढालों से मृदा उड़ाकर ले जाना।
🔸 (iv) कृषि से संबंधित अपरदन :- ढाल पर ऊपर से नीचे हल चलाने से जल तेजी से बहता है और अपरदन बढ़ता है।
मृदा संरक्षण के उपाय :-
- समोच्च जुताई :- ढाल पर समोच्च रेखाओं के समानांतर हल चलाना, जिससे जल बहाव की गति कम होती है।
- सोपान कृषि :- ढाल वाली भूमि पर सीढ़ीनुमा खेत बनाकर अपरदन नियंत्रित किया जाता है। यह पश्चिमी और मध्य हिमालय में प्रचलित।
- पट्टी कृषि :- बड़े खेतों को पट्टियों में बाँटकर बीच-बीच में घास उगाई जाती है, जिससे पवन की शक्ति कम होती है।
- रक्षक मेखला :- पेड़ों की कतारें लगाकर पवन की गति कम की जाती है। यह पश्चिमी भारत में रेत के टीलों के स्थिरीकरण में सहायक।