NCERT Class 10th Social Science History Notes Chapter 5 मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया
इस अध्याय मे हम शुरुआती छपी किताबें, यूरोप में मुद्रण का आना, मुद्रण क्रांति और उसका असर, भारत का मुद्रण संसार, धार्मिक सुधार और सार्वजनिक बहसें, प्रकाशन के नए रुप, प्रिंट और प्रतिबंधो आदि के बारे में विस्तार से पड़ेगे।
मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया
वेलम :-
जानवरों की खाल से बना उच्च गुणवत्ता का चर्म-पत्र, जिस पर छपाई से पहले किताबें और पांडुलिपियाँ लिखी जाती थीं।
प्लाटेन :-
लेटरप्रेस छपाई में प्लाटेन एक सपाट बोर्ड होता था, जिसके द्वारा काग़ज़ को टाइप के ऊपर दबाकर छाप ली जाती थी। प्रारंभ में यह बोर्ड लकड़ी (काठ) का होता था, बाद में इसे इस्पात (लोहे) से बनाया जाने लगा।
कम्पोज़ीटर :-
वह व्यक्ति जो छपाई के लिए अलग-अलग टाइपों को जोड़कर इबारत (पाठ) तैयार करता था।
गैली :-
एक धातु का फ्रेम या ट्रे, जिसमें टाइपों को क्रम से बिछाकर इबारत बनाई जाती थी।
गाथा-गीत :-
लोकगीत के रूप में प्रस्तुत एक ऐतिहासिक आख्यान, जिसे गाकर या सुनाकर लोगों तक पहुँचाया जाता था।
शराबघर :-
वह स्थान जहाँ लोग शराब पीने, भोजन करने, दोस्तों से मिलने और विचार-विमर्श के लिए एकत्र होते थे।
प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार :-
सोलहवीं सदी में यूरोप में रोमन कैथलिक चर्च की प्रथाओं के विरोध में चला धार्मिक सुधार आंदोलन। मार्टिन लूथर इसके प्रमुख सुधारकों में से एक थे। इस आंदोलन के परिणामस्वरूप कैथलिक ईसाई मत के विरोध में कई धाराएँ निकलीं।
इन्क्वीजीशन (धर्म-अदालत) :-
रोमन कैथलिक की वह संस्था जो विधर्मियों की पहचान करती थी और उन्हें सज़ा देने का कार्य करती थी।
धर्म-विरोधी :-
वह व्यक्ति या विचार जो चर्च की मान्यताओं और आधिकारिक धर्म-विश्वासों से असहमत हो। मध्यकाल में चर्च विधर्मियों और धर्म-विरोधी विचारों के प्रति बहुत सख़्त था, क्योंकि वह मानता था कि लोगों की आस्था और विश्वास पर केवल उसका ही अधिकार है।
संप्रदाय :-
किसी धर्म के भीतर बना हुआ उप-समूह, जिसकी अपनी विशिष्ट मान्यताएँ और प्रथाएँ होती हैं।
पंचांग :-
एक वार्षिक प्रकाशन, जिसमें चाँद और सूरज की गति, तिथियाँ, ज्वार-भाटा, पर्व-त्योहार तथा लोगों के दैनिक जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियाँ दी जाती हैं।
चैपबुक / गुटका :-
पॉकेट बुक के आकार की किताबों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द। इन्हें आमतौर पर फेरीवाले बेचते थे। ये सोलहवीं सदी की मुद्रण क्रांति के समय से लोकप्रिय हुए।
फ़तवा :-
इस्लामी क़ानून (शरीअत) के किसी प्रश्न या असमंजस की स्थिति में, इस्लामी क़ानून के विद्वान, सामान्यतः मुफ़्ती, द्वारा दी जाने वाली वैधानिक धार्मिक राय या घोषणा।
मुद्रण तकनीक की शुरुआत :-
- मुद्रण की सबसे पहली तकनीक चीन, जापान और कोरिया में विकसित हुई।
- शुरुआती छपाई हाथ से की जाती थी।
- लगभग 594 ईस्वी से चीन में काठ (लकड़ी) के ब्लॉक पर स्याही लगाकर काग़ज़ पर रगड़कर किताबें छापी जाती थीं।
- इस तकनीक को वुडब्लॉक प्रिंटिंग कहा जाता है।
पुस्तक निर्माण की शैली (पारंपरिक चीनी किताबें) :-
चीनी काग़ज़ पतला और छिद्रित होता था। इसलिए काग़ज़ के दोनों तरफ छपाई संभव नहीं थी। किताबें ‘एकॉर्डियन शैली’ में बनाई जाती थीं: काग़ज़ को मोड़ा जाता था ओर फिर किनारों से सिल दिया जाता था।
सुलेख (खुशनवीसी) :-
किताबों की हस्तलिपि दक्ष सुलेखक (खुशखत) तैयार करते थे। किताबों को हाथ से सुंदर और कलात्मक ढंग से लिखने वाले विशेषज्ञों को सुलेखक या खुशखत कहा जाता था। किताबों की लिखावट बहुत सुंदर होती थी। वे हाथ से साफ़, सुंदर और कलात्मक अक्षरों में लिखते थे।
उस समय किस तरह की किताबें छापी जाती थीं?
चीनी राजतंत्र के दौर में मुख्यतः ये किताबें छापी जाती थीं:
- कन्फ्यूशियस ग्रंथ और नैतिक दर्शन से जुड़ी पुस्तकें
- सिविल सर्विस परीक्षा के लिए पाठ्य-पुस्तकें, प्रश्न-संग्रह और गाइड
- कानून, प्रशासन और इतिहास से संबंधित ग्रंथ
- कैलेंडर, पंचांग और कुछ धार्मिक ग्रंथ
उन्हें कौन पढ़ता था?
इन मुद्रित पुस्तकों को मुख्य रूप से विद्वान वर्ग (Scholar-Officials), सिविल सर्विस परीक्षा के उम्मीदवार, प्रशासनिक अधिकारी और शिक्षित अभिजात वर्ग पढ़ता था।
👉 आम जनता तक इन पुस्तकों की पहुँच बहुत सीमित थी।
मुद्रण का सबसे बड़ा उत्पादक: चीनी राजतंत्र :-
- लंबे समय तक चीनी राजतंत्र मुद्रित सामग्री का सबसे बड़ा उत्पादक था।
- सिविल सेवा परीक्षाओं के लिए बड़ी संख्या में किताबें छपवाई जाती थीं।
- 16वीं सदी में परीक्षार्थियों की संख्या बढ़ी, तो छपी किताबों की संख्या भी बढ़ गई।
17वीं सदी में बदलाव: बदलती मुद्रण संस्कृति :-
जैसे-जैसे चीन में शहरी संस्कृति विकसित हुई, छपाई के इस्तेमाल में विविधता आई:
- व्यापारी अब अपने कारोबार की जानकारी रखने के लिए मुद्रित सामग्री का प्रयोग करने लगे।
- पढ़ना अब केवल अधिकारियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक मनोरंजन (शगल) बन गया।
- लोगों को काल्पनिक कहानियाँ, कविताएँ, आत्मकथाएँ, नाटक पसंद आने लगे।
🔸 महिलाओं की भूमिका :- अमीर महिलाओं ने न केवल पढ़ना शुरू किया, बल्कि कुछ महिलाओं ने अपनी कविताएँ और नाटक भी छपवाए।
19वीं सदी के अंत में बदलाव: नई मुद्रण तकनीक का आगमन :-
- पश्चिमी शक्तियों के आगमन के साथ पश्चिमी मुद्रण तकनीक और मशीनी प्रेस का आयात हुआ।
- हाथ की छपाई का स्थान मशीनी (यांत्रिक) छपाई ने ले लिया।
- पश्चिमी शैली के स्कूलों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए शंघाई प्रिंट-संस्कृति का नया केंद्र बन गया।
जापान में मुद्रण संस्कृति :-
🔸 जापान में छपाई की शुरुआत :- 768–770 ईस्वी के आसपास चीनी बौद्ध प्रचारक छपाई की तकनीक जापान लाए। इस तकनीक का उपयोग मुख्य रूप से बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए किया गया।
🔸 जापान की सबसे पुरानी मुद्रित पुस्तक :- जापान की सबसे पुरानी, 868 ई. में छपी, पुस्तक डायमंड सूत्र है, जिसमें पाठ के साथ-साथ काठ पर खुदे चित्र हैं।
🔸 मुद्रण के विविध प्रयोग :- मध्यकालीन जापान में छपाई केवल किताबों तक सीमित नहीं थी, इसका उपयोग निम्नलिखित चीजों पर भी होता था:
- कपड़ों पर।
- ताश के पत्तों पर।
- काग़ज़ के नोटों पर।
🔸 मध्यकालीन जापान में छपाई :- मध्यकालीन जापान में कवि भी छपते थे और गद्यकार भी, और किताबें सस्ती और सुलभ थीं।
🔸 मुद्रित सामग्री के प्रकार :- पुस्तकालय और दुकानें विभिन्न विषयों की किताबों से भरी थीं, जैसे:
- महिलाओं से संबंधित पुस्तकें।
- संगीत के साज़ों के बारे में।
- हिसाब-किताब, चाय अनुष्ठान, फूलसाज़ी।
- शिष्टाचार और रसोई की किताबें।
यूरोप में मुद्रण तकनीक का विकास :-
सिल्क रूट के माध्यम से ग्याहरवीं शताब्दी में चीनी कागज़ यूरोप पहुँचा। कागज़ के आने से पांडुलिपियों का उत्पादन आसान हुआ, जिन्हें मुंशी या कातिब सावधानी से हाथ से लिखते थे।
🔹 मार्को पोलो का योगदान (1295 ई.) :-
- 1295 ई. में मार्को पोलो चीन से लकड़ी के ब्लॉक (तख्ती) से छपाई की तकनीक का ज्ञान लेकर इटली लौटा।
- इस तकनीक ने यूरोप में तख्ती की छपाई को शुरू किया और वहाँ तेज़ी से फैल गई।
शुरुआती मुद्रित किताबों के पाठक :-
- कुलीन वर्ग और धार्मिक संस्थाएँ (भिक्षु संघ) छपी किताबों को सस्ती और अश्लील मानते थे।
- वे महँगे चर्मपत्र (vellum) पर ही बनाई गई किताबें पसंद करते थे।
- व्यापारी और विश्वविद्यालय के छात्र सस्ती छपी किताबें खरीदने लगे।
🔹 माँग बढ़ना और हस्तलिपि उद्योग :-
- किताबों की माँग बढ़ने लगी। यूरोप-भर के पुस्तक विक्रेता किताबें दूसरे देशों में निर्यात करने लगे।
- अलग-अलग जगहों पर पुस्तक मेले लगने लगे।
हस्तलिखित पांडुलिपियों का उत्पादन :-
- बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए हस्तलिखित पांडुलिपियों के नए तरीके अपनाए गए।
- किताबों की माँग बढ़ी तो पुस्तक विक्रेताओं ने भी सुलेखक (कातिब) रखने शुरू किए।
- सामान्यतः एक विक्रेता के यहाँ लगभग 50 कातिब काम करते थे।
हस्तलिखित पांडुलिपियों की सीमाएँ :-
- हाथ से लिखी किताबें (पांडुलिपियाँ) बढ़ती माँग को पूरा करने में असमर्थ थीं क्योंकि:
- हाथ से लिखी पांडुलिपियाँ बनाना महँगा, समय लेने वाला और मेहनत भरा काम था।
- पांडुलिपियाँ नाज़ुक होती थीं, उन्हें ले जाना और सुरक्षित रखना मुश्किल था।
- इसलिए इनका चलन बहुत कम था।
🔸 परिणाम :- 15वीं सदी की शुरुआत तक यूरोप में लकड़ी के ब्लॉक से कपड़े, ताश के पत्ते, धार्मिक चित्र और छोटी टिप्पणियाँ छापी जाने लगीं।
🔸 नोट :- लेकिन किताबों की बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए यह तकनीक भी पर्याप्त तेज़ और सस्ती नहीं थी।
नई मुद्रण तकनीक (प्रिंटिंग प्रेस) :-
किताबों की तेज़ और सस्ती छपाई के लिए वुडब्लॉक तकनीक भी काफी नहीं थी। इस ज़रूरत ने एक नए आविष्कार को जन्म दिया:
- 1430 के दशक में जर्मनी के स्ट्रैसबर्ग निवासी योहान गुटेन्बर्ग ने अंततः दुनिया की पहली प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार किया।
- यह तकनीक तेज़, सस्ती और क्रांतिकारी साबित हुई, जिसने यूरोप में मुद्रण क्रांति की शुरुआत की।
योहान गुटेन्बर्ग और प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार :-
🔹 गुटेन्बर्ग की पृष्ठभूमि और कौशल :-
- योहान गुटेन्बर्ग एक व्यापारी के पुत्र थे और एक बड़ी कृषि रियासत में पले-बढ़े।
- बचपन से ही तेल व जैतून पेरने की प्रेस मशीनों से परिचित थे।
- उन्होंने पत्थर पर पॉलिश करना, सुनारी और शीशा गढ़ने का कौशल सीखा।
- इन्हीं अनुभवों का उपयोग करके उन्होंने नए मुद्रण यंत्र का आविष्कार किया।
🔹 प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार :-
- गुटेन्बर्ग ने अपने अनुभव और ज्ञान को जोड़कर नई मुद्रण तकनीक विकसित की।
- जैतून प्रेस ही प्रिंटिंग प्रेस का मॉडल बना।
- साँचों (moulds) का उपयोग करके धातु के अक्षर बनाए गए।
- 1448 ई. तक उन्होंने अपना प्रिंटिंग प्रेस पूरी तरह तैयार कर लिया।
🔹 पहली मुद्रित पुस्तक :-
- गुटेन्बर्ग द्वारा छापी गई पहली पुस्तक बाइबिल थी।
- लगभग 180 प्रतियाँ बनाने में तीन वर्ष लगे, जो उस समय के हिसाब से बहुत तेज़ था।
गुटेन्बर्ग की प्रिंटिंग प्रेस द्वारा छापी गई प्रारंभिक मुद्रित पुस्तकों की विशेषताएँ :-
- शुरू में छपी किताबें हस्तलिखित पांडुलिपियों जैसी ही दिखती थीं।
- धातु के अक्षर हाथ की सजावटी लिखावट की नकल करते थे।
- हाशिये पर फूल-पत्तियों की डिज़ाइन बनाई जाती थी और चित्र हाथ से रंगे जाते थे।
- अमीर ग्राहक अपनी पसंद के डिज़ाइन और चित्रकार चुनकर किताब को सजवा सकते थे।
मुद्रण क्रांति (छापेखानों का प्रसार (1450–1550)) :-
- 1450-1550 के बीच यूरोप के अधिकांश देशों में छापेखाने स्थापित हो गए।
- जर्मन मुद्रक अन्य देशों में जाकर नए छापेखाने खोलते थे।
- पुस्तक उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई:
- 15वीं सदी के उत्तरार्ध में यूरोप में लगभग 2 करोड़ मुद्रित किताबें उपलब्ध थीं।
- 16वीं सदी तक यह संख्या बढ़कर 20 करोड़ हो गई।
🔸 क्रांति का आधार :- हाथ की छपाई से मशीनी छपाई की ओर जाने के इसी बदलाव को ‘मुद्रण क्रांति’ कहा जाता है।
मुद्रण क्रांति का असर :-
हाथ से छपाई के स्थान पर यांत्रिक मुद्रण के आगमन ने ही मुद्रण क्रांति को संभव बनाया। इससे:
- छापेखाने के आविष्कार से एक नया पाठक वर्ग विकसित हुआ।
- छपाई में लगने वाली लागत और श्रम कम हो गए।
- किताबों का मूल्य घट गया, जिससे वे अधिक सुलभ हो गईं।
- बाज़ार किताबों से भर गया और पाठकों की संख्या लगातार बढ़ने लगी।
- मुद्रण क्रांति के कारण जो जनता पहले केवल श्रोता थी, वह पाठक में बदल गई।
- अब किताबें समाज के व्यापक तबकों—विद्यार्थियों, कारीगरों और आम लोगों—तक पहुँचने लगीं।
छापेखाने के प्रभाव :-
छापेखाने के आने से:
- किताबों की कीमत कम हो गई।
- किताब छापने में लगने वाला समय और श्रम घट गया।
- बड़ी संख्या में किताबें छापना आसान हो गया।
- बाज़ार किताबों से भर गए।
- इससे एक नया और बड़ा पाठक वर्ग पैदा हुआ।
मुद्रण क्रांति के बौद्धिक और धार्मिक प्रभाव :-
🔹 विचारों और बहस पर प्रभाव :-
छापेखाने के आने से विचारों के व्यापक प्रचार और बहस के रास्ते खुले। जो लोग स्थापित सत्ता या चर्च के विचारों से असहमत थे, वे अपने विचार छापकर जनता तक पहुँचा सकते थे और लोगों को नया सोचने के लिए प्रेरित कर सकते थे।
🔹 मुद्रित किताबों को लेकर डर और विरोध :-
सभी लोग मुद्रित पुस्तकों से खुश नहीं थे।
हालाँकि, कई धर्मगुरुओं, शासकों और लेखकों को डर था कि अगर छपे शब्द पर नियंत्रण न रहा, तो बाग़ी और अधार्मिक विचार फैलेंगे और ‘मूल्यवान’ साहित्य की सत्ता कमज़ोर हो जाएगी। इसी से नए छपे साहित्य की आलोचना शुरू हुई।
🔹 धर्म के क्षेत्र में प्रभाव: धर्मसुधार आंदोलन :-
- धर्म के क्षेत्र में इसका गहरा प्रभाव पड़ा। मार्टिन लूथर ने रोमन कैथलिक चर्च की कुरीतियों के विरोध में अपनी 95 स्थापनाएँ लिखीं।
- इसकी एक छपी प्रति विटेनबर्ग के गिरजाघर के दरवाज़े पर टाँगी गई।
- लूथर ने चर्च को शास्त्रार्थ (बहस) की चुनौती दी।
- लूथर के लेख बड़ी संख्या में छपे और पढ़े जाने लगे।
🔸 परिणामस्वरूप :-
- इससे चर्च में विभाजन हुआ और प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार की शुरुआत हुई।
- मार्टिन लूथर द्वारा अनूदित न्यू टेस्टामेंट की कुछ ही हफ़्तों में 5000 प्रतियाँ बिक गईं।
- तीन महीने के भीतर दूसरा संस्करण निकालना पड़ा।
- मार्टिन लूथर ने कहा: “मुद्रण ईश्वर की दी हुई महानतम देन है, सबसे बड़ा तोहफ़ा।”
🔹 ऐतिहासिक महत्व :-
- कई इतिहासकारों का मानना है कि छपाई ने एक नया बौद्धिक माहौल बनाया।
- इसने धर्म-सुधार आंदोलन के नए विचारों को दूर-दूर तक फैलाने में मदद की।
18वीं सदी: सूचना और ज्ञान का नया युग :-
पत्रिकाओं और अखबारों का उदय :-
- 18वीं सदी के आरंभ से पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू हुआ।
- इनमें समसामयिक घटनाओं की खबरें और मनोरंजन दोनों शामिल होते थे।
- अखबारों और पत्रों में प्रकाशित होने वाली सामग्री:
- युद्ध और व्यापार से जुड़ी जानकारी, दूर देशों की खबरें इत्यादि।
विज्ञान और दर्शन का प्रसार :-
- वैज्ञानिक और दार्शनिक अब आम जनता की पहुँच में आ गए।
- प्राचीन और मध्यकालीन ग्रंथों का संकलन व प्रकाशन हुआ।
- नक्शों और वैज्ञानिक खाकों (रेखाचित्रों) को बड़ी मात्रा में छापा गया।
- वैज्ञानिकों जैसे आइज़क न्यूटन ने अपने आविष्कार प्रकाशित करना शुरू किया।
- इसके लिए विज्ञान-समझ रखने वाला एक बड़ा पाठक वर्ग पहले से ही तैयार था।
🔹 दार्शनिकों की लोकप्रियता :-
- इसी तरह टॉमस पेन, वॉल्तेयर, ज्याँ जाक रूसो जैसे दार्शनिकों की किताबें भी भारी मात्रा में छपीं और व्यापक रूप से पढ़ी गईं।
- उनके विज्ञान, तर्क और विवेकवाद पर आधारित विचार लोकप्रिय साहित्य में भी स्थान पाने लगे।
मुद्रण संस्कृति और फ्रांसीसी क्रांति का संबंध :-
कई इतिहासकारों का मानना है कि मुद्रण संस्कृति ने फ्रांसीसी क्रांति के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ तैयार कीं। इनके बीच संबंध को समझने के लिए तीन मुख्य तर्क दिए जाते हैं।
🔹 पहला तर्क – ज्ञानोदय के विचारों का प्रसार :-
मुद्रण ने वॉल्तेयर, रूसो जैसे ज्ञानोदय चिंतकों के विचारों को फैलाया। उनकेइन विचारों ने परंपरा, अंधविश्वास और निरंकुश सत्ता की आलोचना की तथा विवेक और तर्क पर आधारित समाज की वकालत की।
इससे चर्च और राज्य की निरंकुश सत्ता पर प्रहार हुआ, जिससे परंपरागत सामाजिक व्यवस्था कमज़ोर हुई। पाठकों में आलोचनात्मक, प्रश्न करने वाली और तार्किक दृष्टि विकसित हुई।
🔹 दूसरा तर्क – संवाद और वाद-विवाद की नई संस्कृति :-
छपाई ने वाद-विवाद और संवाद की नई संस्कृति को जन्म दिया। लोग पुराने मूल्यों, संस्थाओं और नियमों पर खुलकर बहस करने लगे।
इस ‘पब्लिक’ ने धर्म और सत्ता को प्रश्नांकित करना सीखा, जिससे सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन के विचार विकसित हुए।
🔹 तीसरा तर्क – राजशाही-विरोधी साहित्य :-
1780 के दशक तक राजशाही का मज़ाक उड़ाने वाला व्यंग्यात्मक साहित्य, कार्टून और कैरिकेचर फैल चुका था। इनमें राजतंत्र को विलासी और जनता को पीड़ित दिखाया गया, जिससे राजशाही के प्रति असंतोष बढ़ा और लोगों को उसके खिलाफ भड़काने में मदद मिली।
इन तर्कों को कैसे समझें? – एक सावधानीपूर्ण दृष्टिकोण :-
- यह सच है कि मुद्रण ने विचारों के प्रसार में मदद की।
- लेकिन यह भी सच है कि लोग हर छपी चीज़ से सीधे प्रभावित नहीं होते थे।
- वे कुछ विचार स्वीकार करते थे, कुछ को नकारते थे और कुछ की अपनी तरह से व्याख्या करते थे।
- इसलिए, मुद्रण ने लोगों के दिमाग को सीधे नहीं बदला, लेकिन अलग तरह से सोचने की संभावनाएँ ज़रूर खोलीं।
उन्नीसवीं सदी में मुद्रण संस्कृति का विस्तार :-
बाल-साहित्य का उदय :-
- प्राथमिक शिक्षा के अनिवार्य होने से बच्चे एक महत्वपूर्ण पाठक वर्ग बन गए।
- प्रकाशन उद्योग के लिए पाठ्यपुस्तकों का उत्पादन महत्वपूर्ण हुआ।
- 1857 में फ्रांस में केवल बाल-पुस्तकें छापने के लिए एक विशेष प्रेस स्थापित किया गया।
- इसमें पुरानी और नई परी कथाओं और लोककथाओं का प्रकाशन हुआ।
- जर्मनी के ग्रिम बंधुओं ने ग्रामीण लोककथाएँ एकत्र कीं और 1812 में एक संकलन प्रकाशित किया।
- बच्चों के लिए अनुपयुक्त या अश्लील मानी जाने वाली सामग्री को संस्करण से हटा दिया गया।
- इस प्रक्रिया में लोककथाओं का रूप परिवर्तित हुआ – वे दर्ज तो हुईं, पर बदल भी गईं।
महिलाएँ: पाठिका और लेखिका के रूप में :-
- महिलाएँ पाठिका और लेखिका के रूप में अधिक महत्वपूर्ण हो गईं।
- पेनी मैगज़ीन (सस्ती पत्रिकाएँ) विशेष रूप से महिलाओं के लिए प्रकाशित होने लगीं।
- इनके अलावा सही चाल-चलन, गृहस्थी सिखाने वाली निर्देशिकाएँ भी लोकप्रिय थीं।
- उन्नीसवीं सदी के उपन्यासों का एक प्रमुख पाठक वर्ग महिलाएँ थीं।
- प्रमुख लेखिकाएँ जैसे जेन ऑस्टिन, ब्रॉन्ट बहनें, जॉर्ज इलियट सामने आईं।
🔸 उनके लेखन से नई नारी की छवि उभरी :-
- मजबूत व्यक्तित्व
- गहरी समझदारी
- स्वतंत्र बुद्धि और इच्छाशक्ति
किराए के पुस्तकालय और श्रमिक वर्ग :-
- 17वीं सदी से ही किराए पर किताब देने वाले पुस्तकालय अस्तित्व में थे।
- 19वीं सदी के इंग्लैंड में इन पुस्तकालयों का उपयोग सफेद-कॉलर कर्मचारियों, शिल्पकारों और निम्न वर्ग के शिक्षण के लिए किया गया।
- कार्यदिवस छोटे होने से मजदूरों को स्व-सुधार और आत्म-अभिव्यक्ति का समय मिला।
- उन्होंने बड़ी संख्या में राजनीतिक पर्चे और आत्मकथाएँ लिखीं।
19वीं और 20वीं सदी में मुद्रण तकनीक का विकास और उसका प्रभाव :-
प्रेस तकनीक में क्रांतिकारी सुधार :-
- 18वीं सदी के अंत तक धातु के प्रेस का निर्माण शुरू हुआ।
- 19वीं सदी के मध्य में रिचर्ड एम. हो ने शक्ति-चालित बेलनाकार प्रेस को विकसित किया, जिससे प्रति घंटे लगभग 8000 शीट छापी जा सकती थीं।
- सदी के अंत तक ऑफसेट प्रेस आया, जिससे एक साथ छह रंगों की छपाई संभव हुई।
- 20वीं सदी की शुरुआत में बिजली से चलने वाले प्रेस, बेहतर प्लेटें, स्वचालित पेपर-रील और रंगों के लिए फोटो-विद्युतीय नियंत्रण विकसित हुए, जिससे छपाई तेज़ और आकर्षक हो गई।
- इन तकनीकी सुधारों से छपे पन्नों का रंग-रूप पूरी तरह बदल गया।
बिक्री और बेचने के नये तरीके :-
- मुद्रकों और प्रकाशकों ने नई बिक्री रणनीतियाँ अपनाईं।
- उन्नीसवीं सदी की पत्रिकाओं ने उपन्यासों को धारावाहिक छापा जिससे उपन्यास लिखने की एक खास शैली विकसित हुई।
- इंग्लैंड में 1920 के दशक में लोकप्रिय किताबें एक सस्ती श्रृंखला-शिलिंग श्रृंखला के तहत छापी गईं।
- किताबों की जिल्द का आवरण या डस्ट कवर भी बीसवीं सदी की तकनीकी नवइयत है।
- 1930 की आर्थिक मंदी के बाद पाठकों की सुविधा के लिए सस्ते पेपरबैक (अजिल्द) संस्करण प्रकाशित किए गए।
- इससे पुस्तकों की पहुँच और व्यापक पाठक वर्ग तक बढ़ी।
भारत में पांडुलिपियों की परंपरा (छपाई से पहले का दौर) :-
भारत में संस्कृत, अरबी, फ़ारसी और क्षेत्रीय भाषाओं में हस्तलिखित पांडुलिपियों की लंबी परंपरा थी। यह परंपरा बहुत पुरानी और समृद्ध थी।
🔹 पांडुलिपियाँ कैसे बनाई जाती थीं :-
पांडुलिपियाँ ताड़ के पत्तों या हाथ से बने काग़ज़ पर नक़ल कर बनाई जाती थीं। कभी-कभी तो पन्नों पर बेहतरीन तसवीरें भी बनाई जाती थीं। फिर उन्हें उम्र बढ़ाने के ख़याल से तख्तियों की जिल्द में या सिलकर बाँध दिया जाता था।
19वीं सदी के अंत तक, छपाई आने के बाद भी, पांडुलिपियों का निर्माण जारी रहा।
🔹 पांडुलिपियों की सीमाएँ :-
- पांडुलिपियाँ नाजुक और महँगी होती थीं।
- उन्हें बहुत सावधानी से संभालना पड़ता था।
- लिपियों की विविधता और लिखावट के अलग-अलग तरीकों के कारण उन्हें पढ़ना आसान नहीं था।
- इन कारणों से उनका दैनिक या व्यापक उपयोग सीमित था।
भारत में मुद्रण प्रेस का आरंभिक इतिहास :-
🔸 भारत में प्रिंटिंग प्रेस की शुरुआत :- भारत में प्रिंटिंग प्रेस सर्वप्रथम 16वीं सदी में गोवा में पुर्तगाली धर्म-प्रचारकों के साथ आया।
- जेसुइट पुजारियों ने कोंकणी भाषा सीखी और अनेक पुस्तिकाएँ छापीं।
- 1674 तक कोंकणी और कन्नड़ भाषाओं में लगभग 50 पुस्तकें छप चुकी थीं।
- 1579 में कैथोलिक पुजारियों ने कोचीन में पहली तमिल पुस्तक छापी।
- 1713 में उन्होंने ही पहली मलयालम पुस्तक छापी।
- डच प्रोटेस्टेंट धर्म-प्रचारकों ने 32 तमिल पुस्तकें छापीं, जिनमें अनेक पुरानी पुस्तकों के अनुवाद थे।
जेम्स ऑगस्टस हिक्की और स्वतंत्र पत्रकारिता का आरंभ :-
- 1780 में जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने ‘बंगाल गज़ट’ नामक एक साप्ताहिक पत्रिका शुरू की।
- इसे ‘हर किसी के लिए खुली, किसी के प्रभाव में न रहने वाली व्यावसायिक पत्रिका’ के रूप में परिभाषित किया गया।
- यह औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्र निजी अंग्रेज़ी उद्यम थी।
- हिक्की दास-व्यापार से जुड़े विज्ञापन भी छापता था।
- साथ ही, वह अंग्रेज़ अधिकारियों के बारे में गपशप और आलोचना भी प्रकाशित करता था।
🔹 औपनिवेशिक सरकार की प्रतिक्रिया :-
इससे नाराज़ होकर गवर्नर जेनरल वॉरेन हेस्टिंग्स ने हिक्की पर मुक़दमा कर दिया, और ऐसे सरकारी आश्रय-प्राप्त अख़बारों के प्रकाशन को प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया जो औपनिवेशिक राज की छवि पर होते हमलों से इसकी रक्षा कर सकें।
भारतीयों द्वारा अख़बारों की शुरुआत :-
- 18वीं सदी के अंत तक कई पत्र-पत्रिकाएँ छपने लगीं।
- कुछ भारतीयों ने भी अपने अख़बार शुरू किए।
- ऐसे प्रयासों में शुरुआती उदाहरण गंगाधर भट्टाचार्य द्वारा प्रकाशित बंगाल गजट।
- गंगाधर भट्टाचार्य राजा राममोहन राय के करीबी सहयोगी थे।
19वीं सदी में भारत में मुद्रण और धार्मिक बहसें :-
बंगाल में धर्म और समाज सुधार की बहस :-
बंगाल में विधवा दाह (सती प्रथा), एकेश्वरवाद, ब्राह्मणवाद, मूर्ति पूजा जैसे मुद्दों पर समाज सुधारकों और रूढ़िवादियों के बीच तीखी बहस हुई।
🔸 प्रमुख अख़बार :-
- राजा राममोहन राय ने 1821 में ‘संवाद कौमुदी’ नामक अखबार प्रकाशित किया।
- रूढ़िवादियों ने ‘समाचार चंद्रिका’ के माध्यम से उनका विरोध किया।
- दो फ़ारसी अख़बार – ‘जाम-ए-जहाँ नामा’ और ‘शम्सुल अख़बार’ – भी 1882 में प्रकाशित हुए।
मुस्लिम समुदाय में प्रिंट का प्रभाव :-
उत्तर भारत में उलमा मुस्लिम राजवंशों के पतन को लेकर चितित थे। उन्हें डर था कि कहीं औपनिवेशिक शासक धर्मांतरण को बढ़ावा न दें, या मुस्लिम कानून न बदल डालें। इससे निपटने के लिए सस्ते लिथोग्राफी प्रेस का इस्तेमाल किया गया।
🔸 उन्होंने सस्ते लिथोग्राफ़ी प्रेस का उपयोग करके :-
- धार्मिक ग्रंथों के फ़ारसी/उर्दू अनुवाद छापे।
- धार्मिक अख़बार और गुटके (पुस्तिकाएँ) प्रकाशित किए।
- 1867 में स्थापित देवबंद सेमिनरी ने रोज़मर्रा के जीवन और इस्लामी सिद्धांतों पर हज़ारों फ़तवे जारी किए।
- पूरी 19वीं सदी में कई इस्लामी संप्रदाय और सेमिनरी उभरे, जिनकी धर्म को लेकर अलग-अलग व्याख्याएँ थीं।
हिंदू धर्मग्रंथों का प्रकाशन और प्रसार :-
- मुद्रण ने स्थानीय भाषाओं में धार्मिक शिक्षा को बढ़ावा दिया।
- तुलसीदास की ‘रामचरितमानस’ का पहला मुद्रित संस्करण 1810 में कलकत्ता से प्रकाशित हुआ।
- 19वीं सदी के मध्य तक सस्ते लिथोग्राफ़ी संस्करणों ने उत्तर भारत के बाजार को भर दिया।
- लखनऊ के नवल किशोर प्रेस और बंबई के श्री वेंकटेश्वर प्रेस जैसे प्रकाशनों ने अनगिनत धार्मिक पुस्तकें छापीं।
🔸 मुद्रित पुस्तकों की सुविधा :-
- आसानी से ले जाई जा सकती थीं।
- कहीं भी, कभी भी पढ़ी जा सकती थीं।
- अनपढ़ लोगों के समूह में सामूहिक पाठ के लिए उपयोगी थीं।
लेखन के नए रूप और उपन्यास का उदय :-
मुद्रण ने नए प्रकार के लेखन की माँग को जन्म दिया। नए पाठक अपनी जीवन की अनुभूतियों, संवेदनाओं और रिश्तों को छपे हुए में देखना चाहते थे।
🔹 उपन्यास का उदय :-
यह विधा यूरोप में विकसित हुई थी, लेकिन जल्द ही इसने भारतीय स्वरूप ले लिया। भारत में उपन्यास ने अपनी भारतीय शैली और भारतीय विषयवस्तु अपनाई। उपन्यासों ने पाठकों को अनुभव का नया संसार दिया, मानव जीवन की विविधता को समझने का अवसर दिया।
🔸 अन्य विधाएँ :- उपन्यास के अलावा गीत, कहानियाँ और सामाजिक-राजनीतिक लेख भी लोकप्रिय हुए। इन रचनाओं में आम इंसान की ज़िंदगी, उसकी भावनाएँ, और समाज-राजनीति के नियम उभरकर सामने आए।
नई दृश्य-संस्कृति (चित्र) का विकास :-
- 19वीं सदी के अंत तक केवल शब्द ही नहीं, बल्कि चित्र भी संचार का बड़ा माध्यम बन गए।
- 19वीं सदी के अंत तक नई दृश्य संस्कृति का उदय हुआ।
- छापेखानों की संख्या बढ़ने से चित्रों की कई प्रतियाँ आसानी से बनाई जाने लगीं।
- राजा रवि वर्मा जैसे चित्रकारों ने आम जनता के लिए सुलभ चित्र बनाए।
- लकड़ी की तख्ती पर नक्काशी करने वाले कारीगर अब प्रेस के पास दुकानें लगाने लगे और मुद्रकों से काम पाने लगे।
- सस्ती छपी तस्वीरें और कैलेंडर गरीब लोग भी खरीदकर अपने घरों और कार्यस्थलों में सजाने लगे।
- इन छपी छवियों ने आधुनिकता, परंपरा, धर्म, राजनीति और संस्कृति के लोकप्रिय विचारों को आकार देना शुरू किया।
कार्टून और कैरिकेचर का युग :-
- 1870 के दशक तक पत्र-पत्रिकाओं में कार्टून और कैरिकेचर प्रकाशित होने लगे।
- इनमें सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर टिप्पणी होती थी।
- कुछ कार्टून शिक्षित भारतीयों की पश्चिमी पोशाक और रुचियों का मज़ाक उड़ाते थे।
- कुछ में सामाजिक परिवर्तन के प्रति डर व्यक्त किया गया।
- साम्राज्यवादी व्यंग्य चित्र राष्ट्रवादियों का मज़ाक उड़ाते थे।
- वहीं राष्ट्रवादी भी साम्राज्यवादी सत्ता पर व्यंग्य करते थे।
मुद्रण संस्कृति और महिलाओं पर प्रभाव (19वीं-20वीं सदी) :-
- महिलाओं के जीवन और भावनाओं पर लिखे गए साहित्य से मध्यवर्गीय महिलाओं में पढ़ने की रुचि बढ़ी।
- उन्नीसवीं सदी के मध्य में उदार पिता और पति महिलाओं को घर पर पढ़ाने लगे और बाद में स्कूल भेजने लगे।
- कई पत्रिकाओं ने लेखिकाओं को स्थान दिया और नारी-शिक्षा की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।
🔸 परंपरावादी प्रतिरोध :-
- परंपरावादी हिंदू और मुस्लिम परिवारों में महिला शिक्षा का विरोध भी हुआ।
- कुछ महिलाओं ने विरोध के बावजूद गुप्त रूप से पढ़ना-लिखना सीखा।
🔸 महिलाएँ और आत्मकथाएँ :-
- राशसुन्दरी देवी ने छिपकर पढ़ना सीखा और आमार जीबन (1876) लिखी—यह बंगाली की पहली पूर्ण आत्मकथा थी।
- कैलाशबाशिनी देवी (1860 के दशक) ने महिलाओं के अनपढ़ रहने, घरेलू बंधन और उपेक्षा के अनुभवों पर लिखा।
- महाराष्ट्र में ताराबाई शिंदे और पंडिता रमाबाई ने उच्च जाति की महिलाओं की दुर्दशा पर लिखा।
- उर्दू, बंगाली, तमिल और मराठी में महिला-केंद्रित साहित्य पहले विकसित हुआ; हिंदी में गंभीर महिला लेखन 1870 के बाद शुरू हुआ।
🔸 अन्य क्षेत्रों में प्रवृत्तियाँ :-
- 20वीं सदी के आरंभ में महिलाओं द्वारा लिखी/संपादित पत्रिकाएँ लोकप्रिय हुईं—नारी-शिक्षा, विधवा-विवाह और राष्ट्रीय आंदोलन पर लेख छपे।
- पंजाब में खालसा ट्रैक्ट सोसायटी जैसी संस्थाओं ने महिलाओं के लिए सस्ती पुस्तिकाएँ प्रकाशित कीं।
- बंगाल में बटाला लोकप्रिय पुस्तकों का केंद्र बना; फेरीवाले घर-घर किताबें पहुँचाते थे, जिससे महिलाओं की पहुँच बढ़ी।
किताबों तक गरीबों की पहुँच :-
- 19वीं सदी के मद्रास शहरों में सस्ती किताबें चौराहों पर बिकती थीं, जिससे गरीब वर्ग भी उन्हें खरीद सकता था।
- बीसवीं सदी की शुरुआत से सार्वजनिक पुस्तकालय खुले, जिससे किताबों की पहुँच शहरों, कस्बों और कुछ संपन्न गाँवों तक बढ़ी।
- पुस्तकालय खोलना स्थानीय अमीरों के लिए प्रतिष्ठा का विषय बन गया।
मज़दूर वर्ग और मुद्रण :-
- कारखानों के मज़दूर, जो बहुत अधिक काम के बोझ से दबे थे, उन्होंने भी अपनी बात कहने के लिए कलम का सहारा लिया :
- कानपुर के मिल मजदूर काशीबाबा ने 1938 में ‘छोटे और बड़े सवाल’ लिखकर जातीय और वर्गीय शोषण के संबंध को समझाने की कोशिश की।
- सुदर्शन चक्र (उपनाम) नामक एक अन्य मिल मजदूर का लेखन ‘सच्ची कविताएँ’ नामक संग्रह में 1935-1955 के बीच प्रकाशित हुआ।
- बंगलौर और बंबई के मिल-मज़दूरों ने पुस्तकालय बनाए; समाज-सुधारकों ने इन्हें समर्थन दिया ताकि साक्षरता बढ़े, नशाखोरी घटे और राष्ट्रवाद का प्रसार हो।
औपनिवेशिक भारत में प्रेस पर नियंत्रण और संघर्ष :-
1798 से पहले ईस्ट इंडिया कंपनी मुद्रित सामग्री पर ज़्यादा सेंसरशिप नहीं लगाती थी। शुरू में नियंत्रण के क़दम उन अंग्रेज़ लेखकों/अख़बारों के ख़िलाफ़ उठे जो कंपनी के कुप्रशासन की आलोचना करते थे।
1820 के दशक तक कलकत्ता सर्वोच्च न्यायालय ने प्रेस की आज़ादी सीमित करने वाले क़ानून बनाए और कंपनी ने ब्रिटिश शासन समर्थक अख़बारों को बढ़ावा दिया।
1835 में गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिंक ने प्रेस क़ानूनों की समीक्षा की और टॉमस मैकॉले (उदारवादी अधिकारी) ने प्रेस की स्वतंत्रता बहाल करते हुए नए कानून बनाए।
1857 के विद्रोह के बाद सरकार का रवैया कड़ा हो गया; राष्ट्रवादी रुख अपनाने वाले देसी/भाषाई अख़बारों पर सख़्त नियंत्रण की माँग बढ़ी।
1878 में वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट लागू हुआ, जिससे सरकार को भाषाई प्रेस की सेंसरशिप, चेतावनी, जब्ती और मशीनें ज़ब्त करने का अधिकार मिला।
दमन के बावजूद राष्ट्रवादी अख़बार फैलते रहे। जब पंजाब के क्रांतिकारियों को 1907 में कालापानी भेजा गया तो बालगंगाधर तिलक ने अपने केसरी में उनके प्रति गहरी हमदर्दी जताई; परिणामस्वरूप 1908 में बालगंगाधर तिलक को गिरफ्तार किया गया, जिससे पूरे भारत में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए।