NCERT Class 10th Social Science History Notes Chapter 4 औद्योगीकरण का युग
इस अध्याय मे हम पूर्व औद्योगीकरण, औद्योगीकरण की गति, श्रमिकों का जीवन, भारत में कपड़ा उद्योग, औद्योगीकरण की अनूठी बात आदि के बारे में विस्तार से पड़ेगे।
औद्योगीकरण का युग
औद्योगीकरण का युग :-
जिस युग में हस्तनिर्मित वस्तुओं के स्थान पर मशीनों द्वारा उत्पादन होने लगा तथा फैक्ट्रियों और तकनीक का विकास हुआ, उसे औद्योगीकरण का युग कहा जाता है।
इस युग में समाज का स्वरूप खेतिहर (कृषि आधारित) समाज से बदलकर औद्योगिक समाज में परिवर्तित हो गया। लगभग 1760 से 1840 ई. तक के काल को औद्योगीकरण का युग माना जाता है। यह काल मानव इतिहास में एक क्रांतिकारी परिवर्तन लेकर आया।
औद्योगिक क्रांति से पूर्व (आदि-औद्योगीकरण) :-
- यह व्यवस्था फैक्ट्री आधारित नहीं थी।
- उत्पादन पर व्यापारिक गिल्ड्स का नियंत्रण होता था।
- वस्तुओं का निर्माण गाँवों में किसानों और दस्तकारों द्वारा किया जाता था।
- उत्पादन कार्य घरों में होता था, न कि कारखानों में।
- गाँवों और शहरों के बीच घनिष्ठ आर्थिक संबंध बने हुए थे।
- इतिहासकार इस अवस्था को आदि-औद्योगीकरण कहते हैं।
यूरोप में औद्योगीकरण :-
- यूरोप में फैक्ट्रियों का निर्माण और उदय हुआ।
- औद्योगिक परिवर्तन की गति तेज हो गई।
- उत्पादन में हाथ के श्रम के साथ मशीनों का प्रयोग होने लगा।
- भाप शक्ति का व्यापक उपयोग किया गया।
- मजदूरों की स्थिति दयनीय थी – कम मजदूरी, लंबे कार्य घंटे और असुरक्षित कार्यस्थल।
उपनिवेशों में औद्योगीकरण ( उदाहरण – भारत) :-
- भारत को पहले भारतीय कपड़ों के युग के लिए जाना जाता था।
- 18वीं शताब्दी में भारतीय बुनकरों की स्थिति कमजोर होती गई।
- भारत में धीरे-धीरे फैक्ट्रियों का उदय हुआ।
- भारतीय औद्योगिक विकास का स्वरूप यूरोप से भिन्न था।
- भारत कच्चे माल का स्रोत और तैयार वस्तुओं का बाजार बन गया।
प्राच्य :-
प्राच्य उन देशों को कहा जाता है जो भूमध्य सागर के पूर्व में स्थित हैं। सामान्यतः यह शब्द एशिया के देशों के लिए प्रयोग किया जाता है। पश्चिमी नज़रिये में प्राच्य क्षेत्रों को पूर्व-आधुनिक, पारंपरिक तथा रहस्यमय माना जाता था।
स्टेपलर :-
स्टेपलर वह व्यक्ति होता है जो ऊन के रेशों को उनकी गुणवत्ता के अनुसार छाँटने या ‘स्टेपल’ करने का कार्य करता है।
फुलर :-
फुलर वह व्यक्ति होता है जो कपड़े को ‘फुल’ करता है, अर्थात् चुन्नटों के सहारे कपड़े को समेटकर उसे मोटा और मजबूत बनाता है।
कार्डिंग :-
कार्डिंग वह प्रक्रिया है जिसमें कपास या ऊन जैसे रेशों को साफ़ कर, सीधा करके और सुलझाकर उन्हें कताई के लिए तैयार किया जाता है।
स्पिनिंग जेनी :-
स्पिनिंग जेनी का आविष्कार जेम्स हरग्रीव्ज़ ने 1764 ई. में किया। इस मशीन ने कताई की प्रक्रिया को तेज़ कर दिया और मज़दूरों की आवश्यकता घटा दी। इस मशीन में एक ही पहिया घुमाने वाला एक मज़दूर एक साथ कई तकलियों को चला सकता था, जिससे एक समय में कई धागे बनाए जाने लगे।
जॉबर :-
जॉबर वह व्यक्ति होता था जो मज़दूरों की भर्ती करता था और उन्हें काम दिलाता था। अलग-अलग क्षेत्रों में इन्हें ‘सरदार’, ‘मिस्त्री’ आदि नामों से भी जाना जाता था। जॉबर मज़दूरों और फैक्ट्री मालिकों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाता था।
फ़्लाई शटल :-
फ़्लाई शटल रस्सियों और पुलियों के माध्यम से चलने वाला एक यांत्रिक औज़ार था, जिसका उपयोग बुनाई के लिए किया जाता था। यह क्षैतिज धागे (बाना / weft) को लम्बवत् धागों (ताना / warp) के बीच तेज़ी से पिरो देता था। फ़्लाई शटल के आविष्कार से बुनकरों को बड़े करघे चलाने और चौड़ी अरज का कपड़ा बनाने में काफ़ी सहायता मिली।
आदि-औद्योगीकरण :-
आदि-औद्योगीकरण वह अवस्था थी जो फैक्ट्रियों की स्थापना से पहले अस्तित्व में थी। यह प्रक्रिया 17वीं और 18वीं शताब्दी में देखने को मिलती है।
इस काल में बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाता था, परंतु यह उत्पादन फैक्ट्रियों में न होकर कारीगरों के घरों और गाँवों में होता था। यह उत्पादन मुख्य रूप से अंतर्राष्ट्रीय बाजारों के लिए किया जाता था।
इतिहासकार इस चरण को आदि-औद्योगीकरण कहते हैं।
आदि-औद्योगीकरण क्यों शुरू हुआ? (कारण)
🔸 वैश्विक माँग में वृद्धि :- विश्व व्यापार के विस्तार और उपनिवेशों की स्थापना के कारण अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में वस्तुओं की माँग तेज़ी से बढ़ी। इस बढ़ी हुई माँग को पूरा करने के लिए उत्पादन के नए तरीकों की आवश्यकता पड़ी।
🔹 सौदागर गाँवों की ओर क्यों गए? शहरों में उत्पादन क्यों कठिन था?
- शहरों में शक्तिशाली गिल्ड्स मौजूद थे।
- गिल्ड्स कारीगरों के संगठन थे जो प्रशिक्षण देते, उत्पादन और कीमतों पर नियंत्रण रखते और नए लोगों को व्यवसाय में प्रवेश से रोकते थे।
- शासकों ने भी गिल्ड्स को उत्पादन का एकाधिकार (मोनोपोली) दे रखा था।
- परिणामस्वरूप नए व्यापारी शहरों में अपना कारोबार नहीं शुरू कर सके और उन्होंने गाँवों की ओर रुख किया।
🔹 गाँवों में किसानों ने काम क्यों स्वीकार किया? गाँवों में उत्पादन क्यों बढ़ा?
- उस समय खुले खेत समाप्त हो रहे थे और साझा जमीनों (कॉमन्स) की बाड़ाबंदी की जा रही थी।
- छोटे किसान और काश्तकार पहले साझा जमीन से गुज़ारा करते थे।
- अब उनकी आमदनी घट रही थी वे आमदनी के नए साधन खोज रहे थे।
🔹 सौदागरों से किसानों को क्या लाभ हुआ?
- सौदागरों ने उत्पादन के लिए पेशगी रकम दी।
- किसान गाँव में रहकर काम कर सकते थे, खेती भी कर सकते थे।
- आदि-औद्योगिक उत्पादन से खेती से घटती आय को सहारा मिला और पूरे परिवार के श्रम का उपयोग हुआ।
आदि-औद्योगिक व्यवस्था कैसे काम करती थी?
🔸 (उदाहरण: कपड़ा उद्योग)
आदि-औद्योगिक व्यवस्था एक व्यापक व्यापारिक नेटवर्क थी, जिस पर शहरी सौदागरों का पूरा नियंत्रण होता था। उत्पादन फैक्ट्रियों में नहीं, बल्कि गाँवों में रहने वाले कारीगरों द्वारा किया जाता था।
🔹 इंग्लैंड में कपड़ा उत्पादन की चरणबद्ध प्रक्रिया :-
- व्यापारी स्टेपलर से ऊन खरीदता था।
- यह ऊन गाँवों में रहने वाले सूत कातने वालों के पास भेजी जाती थी।
- तैयार धागा बुनकरों को दिया जाता था।
- बुना हुआ कच्चा कपड़ा फुलर्ज़ के पास भेजा जाता था, जहाँ उसे धोकर और मोटा किया जाता था।
- इसके बाद कपड़ा रंगसाज़ों के पास रंगाई के लिए जाता था।
- कपड़े की अंतिम फिनिशिंग का कार्य लंदन में होता था, जो एक प्रमुख फिनिशिंग सेंटर बन गया था।
- अंत में, निर्यातक व्यापारी तैयार कपड़े को अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में बेच देता था।
🔸 श्रम का पैमाना :- एक सौदागर उत्पादन के हर चरण में 20-25 मजदूरों से काम लेता था। इस तरह, एक कपड़ा सौदागर के लिए सैकड़ों ग्रामीण मजदूर काम करते थे।
कारखानों का उदय :-
- विश्व में सबसे पहले कारखाने 1730 के दशक में इंग्लैंड में खुले।
- लेकिन कारखानों की संख्या में तेज़ वृद्धि अठारहवीं सदी के अंत में हुई।
- उन्नीसवीं सदी की शुरुआत तक कारखाने इंग्लैंड के भूदृश्य (लैंडस्केप) का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए।
🔹 कपास – नए युग का प्रतीक :-
- इस नए पुग का पहला प्रतीक कपास था। अर्थात, कपास नए औद्योगिक युग का पहला और सबसे महत्वपूर्ण उद्योग बना।
- उन्नीसवीं सदी के अंत तक कपास उत्पादन में भारी वृद्धि हुई।
- 1760 में ब्रिटेन 25 लाख पौंड कच्चा कपास आयात करता था।
- 1787 तक यह बढ़कर 220 लाख पौंड हो गया।
कारखाना प्रणाली के लाभ (मालिक के दृष्टिकोण से): :-
कारखाना प्रणाली से मालिकों को यह सुविधाएँ मिलीं:
- सारी उत्पादन प्रक्रियाएँ एक ही छत के नीचे, एक ही मालिक के नियंत्रण में होने लगी ।
- निगरानी: उत्पादन प्रक्रिया पर पूरी नज़र रखना संभव हुआ।
- गुणवत्ता नियंत्रण: उत्पाद की गुणवत्ता पर ध्यान देना और उसे बनाए रखना आसान हुआ।
- श्रमिक नियंत्रण: मज़दूरों पर नियंत्रण और अनुशासन बनाए रखना संभव हुआ।
नोट: ये सारे काम जब उत्पादन गाँवों में होता था, तब संभव नहीं थे।
कारखानों का प्रभाव :-
- नए कारखाने विशाल और प्रभावशाली थे।
- नई प्रौद्योगिकी इतनी शक्तिशाली और ‘जादुई’ लगती थी कि लोगों की आँखें चौंधिया जाती थीं।
- लोगों का सारा ध्यान कारखानों पर केंद्रित हो गया।
- लोग यह भूल गए कि गलियों, छोटे वर्कशॉप्स और घरों में अब भी उत्पादन जारी था।
औद्योगिक परिवर्तन की रफ्तार :-
इतिहासकारों ने औद्योगिक बदलाव की गति को समझाने के लिए चार महत्वपूर्ण बिंदु बताए हैं:
🔹 1. प्रमुख उद्योग: कपास से लोहा और स्टील तक :-
🔸 प्रथम चरण (1840 के दशक तक) :- सूती और कपास उद्योग ब्रिटेन के सबसे फलते-फूलते उद्योग थे। 1840 के दशक तक कपास उद्योग औद्योगीकरण के पहले चरण का सबसे बड़ा उद्योग बन चुका था।
🔸 बाद का चरण (1840/1860 के दशक के बाद) :- उसके उपनिवेशों में रेलवे के विस्तार के कारण लोहा और स्टील उद्योग सबसे आगे निकल गया।
🔸 तुलना :- 1873 तक ब्रिटेन के लोहा और स्टील निर्यात का मूल्य लगभग 7.7 करोड़ पौंड हो गया, जो कपास निर्यात के मूल्य से दोगुना था।
🔹 2. पारंपरिक और गैर-मशीनी उद्योगों की भूमिका :-
- नए कारखाने, पुराने घरेलू उद्योगों को पूरी तरह खत्म नहीं कर पाए थे।
- 19वीं सदी के अंत तक भी, कुल मजदूरों का केवल 20 प्रतिशत हिस्सा ही आधुनिक कारखानों में काम करता था।
- कपड़ा उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा अभी भी कारखानों के बजाय घरेलू इकाइयों में ही तैयार हो रहा था।
🔹 3. छोटे और साधारण आविष्कार :-
- ‘परंपरागत’ उद्योगों (जैसे खाद्य प्रसंस्करण, बर्तन बनाना, काँच का काम, फर्नीचर) में भी तरक्की हो रही थी।
- इनमें विकास का कारण बड़े आविष्कार नहीं, बल्कि छोटे और साधारण सुधार थे। यानी गैर-मशीनी क्षेत्रों में भी बदलाव आ रहा था।
🔹 4. प्रौद्योगिकीय बदलाव बहुत धीमे थे :-
प्रौद्योगिकीय बदलावों की गति धीमी थी और वे औद्योगिक भूदृश्य पर नाटकीय तेज़ी से नहीं फैले। इसके कारण थे:
- लागत: नई मशीनें बहुत महँगी थीं।
- जोखिम: व्यापारी और उद्योगपति निवेश करने में बहुत हिचकिचाते थे।
- समस्याएँ: मशीनें अक्सर खराब हो जाती थीं और उनकी मरम्मत लागत अधिक थी।
- वास्तविक प्रदर्शन: मशीनें अविष्कारकों के दावों जितनी कारगर नहीं थीं।
भाप इंजन का धीमा प्रसार का उदाहरण (बहुत महत्वपूर्ण) :-
इस स्थिति को भाप इंजन के उदाहरण से समझा जा सकता है।
- जेम्स वॉट ने 1771 में न्यूकॉमेन के इंजन में सुधार कर नया मॉडल बनाया और पेटेंट कराया।
- मैथ्यू बूल्टन ने इसका उत्पादन शुरू किया, लेकिन सालों तक खरीदार नहीं मिले।
- 19वीं सदी की शुरुआत तक का आँकड़ा: पूरे इंग्लैंड में सिर्फ 321 भाप इंजन थे।
- इनमें से 80 सूती उद्योगों में,
- 9 ऊन उद्योगों में और शेष खनन,
- नहर निर्माण व लौह कार्यों में उपयोग हो रहे थे।
🔸 निष्कर्ष :- इससे पता चलता है कि भाप जैसी शक्तिशाली तकनीक को भी उद्योगपतियों ने बहुत हिचकिचाकर और धीरे-धीरे ही अपनाया।
हाथ का श्रम और वाष्प शक्ति :-
विक्टोरिया कालीन ब्रिटेन में मशीनों का सीमित उपयोग के कारण :-
विक्टोरिया कालीन ब्रिटेन (19वीं सदी) में उद्योगपतियों द्वारा मशीनों की जगह मजदूरों को प्राथमिकता देने के चार मुख्य कारण थे:
🔹 1. श्रमिकों की अधिकता और कम वेतन :-
- विक्टोरिया कालीन ब्रिटेन में गरीब किसान और बेरोज़गार बड़ी संख्या में काम की तलाश में शहरों की ओर जाते थे।
- श्रमिकों की बहुतायत के कारण मज़दूरी दरें गिर गईं, इसलिए उद्योगपतियों को मज़दूरों की लागत की चिंता नहीं थी।
🔸 नतीजा :- चूंकि सस्ते मजदूर आसानी से मिल रहे थे, इसलिए उद्योगपति मशीनों पर भारी निवेश (खर्चा) नहीं करना चाहते थे।
🔹 2. मौसमी माँग :-
कई उद्योगों में मजदूरों की माँग मौसम के साथ घटती-बढ़ती थी। ऐसे में मशीनें खरीदना लाभदायक नहीं था।
🔸 उदाहरण :-
- गैसघर और शराबखाने: यहाँ सर्दियों/जाड़ों के दौरान ज्यादा काम होता था।
- बुक बाइंडर और प्रिंटर: क्रिसमस के समय इनकी माँग बढ़ जाती थी।
- बंदरगाह: जहाजों की मरम्मत और सजावट का काम भी जाड़ों में अधिक होता था।
🔸 फायदा :- ऐसे उद्योगों में मशीनों की बजाय मज़दूर रखना सुविधाजनक था।
🔹 3. बाजार की माँग: विविधता और गुणवत्ता :-
- मशीनों की सीमा :- वे केवल बड़े पैमाने पर एक जैसी (मानक) चीजें बना सकती थीं।
- उपभोक्ता की माँग :- बाजार में बारीक डिजाइन, विशेष आकार और उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों की माँग थी। ये केवल कुशल मानव श्रम से ही बन सकते थे।
- उदाहरण :- 19वीं सदी के मध्य में ब्रिटेन में 500 प्रकार के हथौड़े और 45 प्रकार की कुल्हाड़ियाँ बनाई जा रही थीं।
🔹 4. उच्च वर्ग की पसंद और ‘परिष्कार’ :-
- विक्टोरिया कालीन ब्रिटेन में कुलीन वर्ग और पूँजीपति वर्ग हाथ से बनी वस्तुओं को परिष्कार और सुरुचि का प्रतीक मानता था।
- कारण :- हाथ से बनी चीजें एक-एक करके बनाई जाती थीं, उनका डिजाइन बेहतर होता था और उनकी फिनिशिंग अच्छी होती थी।
- मशीन से बने उत्पाद ज़्यादातर उपनिवेशों में निर्यात कर दिए जाते थे।
19वीं शताब्दी में यूरोप के उद्योगपति मशीनों की अपेक्षा हाथ के श्रम को अधिक क्यों पसंद करते थे? (In short)
🔸 मानव श्रम की प्रचुरता :- ब्रिटेन में गरीब किसान और बेरोज़गार बड़ी संख्या में उपलब्ध थे, इसलिए उद्योगपतियों को श्रमिकों की कोई कमी नहीं थी।
🔸 मशीनों में अधिक पूँजी निवेश :- मशीनें महँगी थीं, जल्दी खराब हो जाती थीं और उनकी मरम्मत पर भी अधिक खर्च आता था, इसलिए उद्योगपति उन्हें लगाने से बचते थे।
🔸 मौसमी उद्योगों की आवश्यकता :- कई उद्योगों में काम मौसम के अनुसार घटता-बढ़ता था। ऐसे उद्योगों में स्थायी मशीनों की बजाय मज़दूरों से काम करवाना अधिक सुविधाजनक था।
🔸 हस्तकौशल पर आधारित उत्पादों की माँग :- बाज़ार में बारीक डिज़ाइन और विशेष आकारों वाली वस्तुओं की माँग रहती थी, जिन्हें केवल मानवीय कौशल से ही बनाया जा सकता था।
औद्योगीकरण का मजदूरों के जीवन पर प्रभाव (इंग्लैंड में मजदूरों का जीवन) :-
कुल मिलाकर मजदूरों का जीवन दयनीय था ।
- नौकरियों की खबर मिलते ही सैकड़ों लोग गाँवों से शहरों की ओर चले आते थे।
- नौकरी मिलने की संभावना रिश्तेदारी, दोस्ती और सामाजिक संपर्कों पर निर्भर करती थी; जिनके पास संपर्क नहीं थे, उन्हें लंबा इंतज़ार करना पड़ता था।
- बेरोज़गार लोग पुलों के नीचे, रैनबसेरों या निर्धन कानून विभाग द्वारा चलाए गए अस्थायी आश्रयों में रहते थे।
- कई उद्योगों में काम मौसमी था। काम का मौसम खत्म होते ही मज़दूर फिर बेरोज़गार हो जाते थे।
- कुछ मज़दूर जाड़ों के बाद गाँव लौट जाते थे, जबकि अधिकतर शहरों में ही छोटा-मोटा काम खोजते थे, जो आसान नहीं था।
🔹 वेतन और ‘वास्तविक आय’ :-
- उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में वेतन कुछ बढ़ा, लेकिन महँगाई और उतार-चढ़ाव के कारण मज़दूरों की हालत में खास सुधार नहीं हुआ।
- युद्धों के दौरान कीमतें बढ़ीं, जिससे मज़दूरों की वास्तविक आय घट गई।
- मज़दूरों की औसत आय इस पर निर्भर करती थी कि उन्हें साल में कितने दिन काम मिला।
- उन्नीसवीं सदी के मध्य में लगभग 10% शहरी आबादी अत्यंत गरीब थी; 1830 के दशक की मंदी में बेरोज़गारी 35–75% तक पहुँच गई।
1840 के बाद रोजगार के नए अवसर :-
- 1840 के दशक के बाद शहरों में निर्माण कार्य तेज़ हुए।
- नए काम: सड़कें चौड़ी करना, रेलवे स्टेशन बनाना, रेलवे लाइनों का विस्तार, सुरंगें बनाना, सीवर और निकासी व्यवस्था, नदी तटबंध।
- परिवहन उद्योग में 1840 के दशक में मजदूरों की संख्या दोगुनी अगले 30 वर्षों में फिर दोगुनी हो गई।
भारतीय कपड़े का युग (औपनिवेशिक भारत में कपड़ा व्यापार का पतन) :-
🔹 मशीन उद्योग से पहले का युग (मशीन युग से पहले भारतीय कपड़ा व्यापार की प्रधानता) :-
- मशीन उद्योगों के युग से पहले अंतर्राष्ट्रीय कपड़ा बाज़ार में भारत के रेशमी और सूती वस्त्रों का वर्चस्व था।
- कई देशों में मोटा कपास पैदा होता था, लेकिन भारत में महीन किस्म का कपास उगाया जाता था, जिससे उत्कृष्ट कपड़े बनते थे।
- आर्मीनियन और फ़ारसी सौदागर पंजाब से अफगानिस्तान, पूर्वी फ़ारस और मध्य एशिया होते हुए भारतीय वस्त्र ले जाते थे।
- सूरत (गुजरात), मछलीपटनम (कोरोमंडल तट) और हुगली (बंगाल) प्रमुख बंदरगाह थे।
- ब्रिटिश शासन से पहले, व्यापार पूरी तरह भारतीय व्यापारियों और बैंकरों के नियंत्रण में था।
- दो प्रकार के व्यापारी थे आपूर्ति सौदागर तथा निर्यात सौदागर:
- आपूर्ति सौदागर बुनकरों को पेशगी देते, तैयार कपड़ा खरीदते और बंदरगाहों तक पहुँचाते थे।
- बंदरगाहों पर बड़े जहाज़ मालिक और निर्यातकों के दलाल कीमत पर मोल-भाव कर आपूर्ति सौदागरों से माल खरीदते थे।
🔹 मशीन उद्योग के बाद का युग (1750 के बाद पतन) :-
- 1750 के दशक तक भारतीय सौदागरों के नियंत्रण वाला यह नेटवर्क टूटने लगा।
- यूरोपीय कंपनियों ने स्थानीय दरबारों से रियायतें लेकर व्यापार पर एकाधिकार हासिल कर लिया।
- सूरत और हुगली जैसे पुराने बंदरगाहों से निर्यात में तेज़ गिरावट आई।
- सूरत से व्यापार का मूल्य 17वीं सदी के अंत में 1.6 करोड़ रुपये से घटकर 1740 के दशक में 30 लाख रुपये रह गया।
- बंबई ( मुंबई ) तथा कलकता कलकत्ता एक नए बंदरगाह के रूप में उभरे ।
- नए बंदरगाहों से व्यापार यूरोपीय कंपनियों और यूरोपीय जहाज़ों के नियंत्रण में होने लगा।
- कई बहुत से पुराने व्यापारिक घराने समाप्त हो गए; जो बचे, उन्हें यूरोपीय कंपनियों के नियंत्रित नेटवर्क में काम करना पड़ा।
बुनकरों का क्या हुआ? ( ईस्ट इंडिया कंपनी का नियंत्रण और भारतीय बुनकरों पर प्रभाव )
🔸 शुरुआती स्थिति :-
ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा सत्ता स्थापित करने से पहले बुनकर बेहतर स्थिति में थे क्योंकि उनका उत्पाद खरीदने वाले बहुत खरीदार थे तथा वे मोल भाव करके सबसे अधिक कीमत देने वाले को अपना सामान बेच सकते थे। भारतीय कपड़े की यूरोप में भारी माँग थी, इसलिए निर्यात में गिरावट नहीं आई।
🔹 ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा राजनीतिक सत्ता स्थापित करने के बाद बुनकरों की स्थिति (1760 के बाद) :-
🔸 सत्ता मिलने के बाद कंपनी की नई व्यवस्था (नियंत्रण के उपाय) :-
जैसे ही कंपनी ने बंगाल और कर्नाटक में राजनीतिक सत्ता हासिल की, उसने व्यापार पर एकाधिकार (Monopoly) जमाने के लिए दो मुख्य कदम उठाए:
🔸 कदम 1: गुमाश्ताओं की नियुक्ति :-
- कंपनी ने पुराने व्यापारियों और दलालों को हटाने की कोशिश की।
- बुनकरों पर सीधा नियंत्रण करने के लिए वेतनभोगी कर्मचारी नियुक्त किए गए इन्हें गुमाश्ता कहा जाता था।
- गुमाश्ताओं के कार्य :- बुनकरों पर निगरानी रखना, माल इकट्ठा करना और कपड़े की गुणवत्ता जाँच करना।
🔸 कदम 2: बुनकरों पर प्रतिबंध और पेशगी प्रणाली :-
- बुनकरों को कच्चा माल खरीदने के लिए कर्जा दिया जाने लगा। जिसे पेशगी रकम कहा गया।
- शर्त :- पेशगी लेने वाले बुनकर केवल कंपनी को ही अपना कपड़ा बेच सकते थे। दूसरे खरीदारों के साथ व्यापार प्रतिबंधित था।
बुनकरों की प्रतिक्रिया और जीवन में परिवर्तन :-
🔹 बुनकरों पर प्रभाव :-
🔸 प्रारंभिक प्रतिक्रिया :- अधिक आय की आशा में कई बुनकरों ने पेशगी स्वीकार की। उन्होंने अपनी छोटी जमीनें भाड़े पर दे दीं और पूरे परिवार (बच्चे, औरतें) को पूरे समय बुनाई में लगा दिया।
🔸 बाद की हकीकत :- कम कीमत, बंधन और दमन।
- कंपनी द्वारा दी गई कीमत बहुत कम थी।
- नए गुमाश्ता बाहरी लोग थे। उनका गाँवों से कोई पुराना सामाजिक संबंध नहीं था।
- वे घमंडी थे और वे सिपाहियों के साथ आते, देरी पर बुनकरों को पीटते और कोड़े मारते थे।
🔹 बुनकरों की प्रतिक्रिया :-
शोषण से तंग आकर बुनकरों ने कंपनी के दमन के विरोध में विभिन्न तरीके अपनाए :-
- पलायन: कर्नाटक और बंगाल में बहुत से बुनकर अपना गाँव छोड़कर दूसरे गाँवों में चले गए।
- विद्रोह: कुछ जगहों पर बुनकरों ने स्थानीय व्यापारियों के साथ मिलकर कंपनी का खुला विरोध किया।
- असहयोग: बहुतों ने कर्ज़ा लौटाने से इनकार कर दिया, करघे बंद कर दिए और खेतों में मजदूरी करने लगे।
भारत में मैनचेस्टर का आगमन (उन्नीसवीं सदी में भारतीय कपड़ा उद्योग का पतन) :-
उन्नीसवीं सदी की शुरुआत से ही भारत से कपड़ों के निर्यात में कमी आने लगी । 1811-12 में भारत के कुल निर्यात में सूती माल का हिस्सा 33% था, जो 1850-51 तक गिरकर मात्र 3% रह गया।
🔹 गिरावट के मुख्य कारण :-
- इंग्लैंड के कपास उद्योगपतियों ने अपनी सरकार और ईस्ट इंडिया कंपनी पर दो तरह से दबाव डाला:
- ब्रिटेन में भारतीय कपड़ों पर भारी टैक्स लगा दिया गया ताकि मैनचेस्टर में बना कपड़ा बिना किसी प्रतिस्पर्धा के वहां बिक सके।
- ईस्ट इंडिया कंपनी पर दबाव डाला गया कि वह ब्रिटिश मशीनों से बने कपड़ों को भारतीय बाजारों में बेचे।
🔹 परिणाम: बाज़ार का पलटाव :-
- उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में ब्रिटेन के वस्त्र निर्यात में तेज़ वृद्धि हुई।
- 18वीं सदी के अंत में भारत में ब्रिटिश कपड़ों का आयात लगभग नहीं के बराबर था।
- 1850 तक: यह भारत के कुल आयात का 31% हो गया।
- 1870 तक: यह 50% से अधिक हो गया।
मैनचेस्टर के आगमन से भारतीय बुनकरों पर प्रभाव :-
19 वीं सदी के आते आते बुनकरों के सामने नई समस्याओं का जन्म हुआ।
🔸 (i) निर्यात बाज़ार ढह गया :- बाहरी देशों को होने वाला निर्यात बंद हो गया।
🔸 (ii) स्थानीय बाज़ार सिकुड़ गया :- स्थानीय बाजारों में मैनचेस्टर के मशीनी कपड़ों की भरमार हो गई। ये कपड़े हाथ से बने कपड़ों की तुलना में बहुत सस्ते थे, जिनसे बुनकर मुकाबला नहीं कर सके।
🔸 (iii) 1860 के दशक की नई समस्या :- कच्ची कपास की कमी :- अमेरिकी गृहयुद्ध के कारण अमेरिका से कपास की आपूर्ति रुकी।ब्रिटेन ने भारत से कच्चे कपास का आयात बढ़ा दिया। → कीमतें बढ़ीं → भारतीय बुनकरों को महँगी कपास खरीदनी पड़ी।
🔸 (iv) भारतीय कारखानों का उदय :- 19वीं सदी के अंत में भारत में भी कारखाने खुलने लगे और बाज़ार मशीनी माल से भर गया, जिससे हस्तकरघा उद्योग और कमजोर हो गया।
🔹 निष्कर्ष :-
- भारतीय कपड़ा उद्योग का पतन ब्रिटिश नीतियों का परिणाम था।
- आयात शुल्क, मशीन उद्योग और औपनिवेशिक नियंत्रण ने बुनकरों की आजीविका छीन ली।
भारत में प्रारंभिक उद्योग और उद्यमी :-
भारत में कारखानों की शुरुआत :-
बंबई में पहली कपड़ा मिल 1854 में लगी और दो साल बाद उसमें उत्पादन होने लगा। 1862 तक वहाँ ऐसी चार मिलें काम कर रही थीं।
- बंगाल: 1855 में पहली जूट मिल खुली (दूसरी 1862 में)।
- कानपुर: 1860 के दशक में एल्गिन मिल की शुरुआत हुई।
- अहमदाबाद: 1861 में पहली सूती मिल चालू हुई।
- मद्रास (चेन्नई): 1874 में पहली कताई और बुनाई मिल खुली।
भारत में उद्योग लगाने वाले प्रारंभिक उद्यमी कौन थे?
कई व्यावसायिक समूहों की जड़ें चीन के साथ व्यापार में थीं (अफ़ीम–चाय व्यापार)। भारतीय व्यापारी पूँजी उपलब्ध कराते, आपूर्ति सुनिश्चित करते और माल जहाज़ों से भेजते थे। व्यापार से पूँजी बनाकर कुछ ने उद्योगों में निवेश किया।
🔸 प्रमुख नाम :-
- द्वारकानाथ टैगोर (बंगाल): 1830-40 के दशक में 6 संयुक्त उद्यम कंपनियाँ लगाईं।
- डिनशॉ पेटिट: बंबई के प्रमुख पारसी उद्योगपति।
- जमशेदजी नुसरवानजी टाटा: चीन व इंग्लैंड से जुड़े व्यापार से पूँजी।
- सेठ हुकुमचंद: 1917 में कलकत्ता में पहली भारतीय जूट मिल लगाई।
- जी.डी. बिड़ला: इनके पूर्वजों ने भी चीन के साथ व्यापार से पूँजी जमा की थी।
🔸 अन्य पूँजी स्रोत :- मद्रास के कुछ सौदागर बर्मा, अन्य मध्य-पूर्व व पूर्वी अफ्रीका से जुड़े थे। कुछ व्यापारी घरेलू व्यापार (सूद पर पैसा, हुंडी, माल ढुलाई) से पूँजी जुटाते थे और बाद में फैक्ट्रियाँ लगाईं।
भारत में फैक्ट्री मजदूर की उत्पत्ति और स्थिति :-
भारत में फैक्ट्री मज़दूर कहाँ से आए?
1901 में भारतीय फैक्ट्रियों में 5,84,000 मज़दूर थे, जो 1946 तक बढ़कर 24,36,000 हो गए।
- अधिकांश औद्योगिक क्षेत्रों में मज़दूर आसपास के जिलों से आते थे।
- अधिकांशतः वे किसान तथा कारीगर जिन्हे गाँव में काम नहीं मिलता था ।
- उदाहरण के लिए :-
- बंबई के सूती कपड़ा मिल में काम करने वाले ज्यादा मजदूर पास के रत्नागिरी जिले से आते थे ।
- कानपुर की मिलों में मज़दूर पास के गाँवों से आते थे।
- उदाहरण के लिए :-
- दूर-दराज़ से मजदूरों का आना :-
- बाद में जब काम की खबरें फैलीं, तो दूर के इलाकों से भी लोग आने लगे।
- उदाहरण: संयुक्त प्रांत (UP) के लोग बंबई की कपड़ा मिलों और कलकत्ता की जूट मिलों में पहुँचे।
🔸 गाँव–शहर का आवागमन :- मजदूर अपने गाँवों से जुड़े रहते थे। वे फसल कटाई या त्योहारों के समय अक्सर गाँव लौट जाते थे। इससे पता चलता है कि फैक्ट्री मजदूरों का गाँव से रिश्ता बना हुआ था।
नौकरी पाने की चुनौती :-
हालाँकि माँग बढ़ रही थी, लेकिन रोजगार चाहने वालों की संख्या हमेशा अधिक रहती थी। मिलों में आम लोगों का प्रवेश निषिद्ध था।
मजदूरों की भर्ती के लिए उद्योगपति जॉबर रखते थे।
🔹 जॉबर कौन था?
उद्योगपति नए मजदूरों की भर्ती के लिए एक ‘जॉबर’ रखते थे। वह मिल का कोई पुराना और विश्वसनीय कर्मचारी होता था।
🔸 जॉबर के कार्य :-
- अपने गाँव से लोगों को शहर लाना।
- उन्हें नौकरी का भरोसा देना।
- उन्हें शहर में बसने और मुसीबत में पैसों की मदद करना।
🔸 जॉबर का शक्ति का दुरुपयोग :- धीरे-धीरे जॉबर बहुत शक्तिशाली हो गए। वे मदद के बदले मजदूरों से पैसे और तोहफों की माँग करने लगे और उनकी जिंदगी को नियंत्रित करने लगे।
औद्योगिक विकास का अनूठापन :-
यूरोपीय एजेंसियों के उद्योग :-
यूरोपीय प्रबंधकीय एजेंसियाँ (Managing Agencies) केवल उन्हीं उत्पादों में निवेश करती थीं जिनकी यूरोप में माँग थी।
- प्रमुख क्षेत्र: चाय व कॉफी के बागान, खनन (कोयला), नील और जूट।
- लक्ष्य :- इनका मुख्य उद्देश्य भारत में बेचना नहीं, बल्कि निर्यात करना था।
भारतीय उद्योगपतियों की शुरुआत (प्रतिस्पर्धा से बचाव) :-
भारतीय व्यवसायियों ने शुरू में भारतीय बाजार में मैनचेस्टर के सीधे टक्कर से बचा।
- तरीका :- उन्होंने मोटा सूत (Yarn) बनाना शुरू किया।
- कारण :- भारत आने वाला ब्रिटिश धागा अच्छी किस्म का नहीं होता था।
- बाजार :- इस सूत को भारत के हथकरघा बुनकरों को दिया जाता था या चीन को निर्यात कर दिया जाता था।
बीसवीं सदी की शुरुआत में बदलाव :-
बीसवीं सदी की शुरुआत में दो प्रमुख घटनाओं ने भारतीय उद्योगों की दिशा बदल दी:
- स्वदेशी आंदोलन :- लोगों को विदेशी कपड़े का बहिष्कार करने के लिए प्रेरित किया। औद्योगिक समूह संगठित हुए और आयात शुल्क बढ़ाने की माँग की।
- चीन के बाजार में बदलाव :- भारतीय सूत का निर्यात चीन में चीनी और जापानी मिलों की प्रतिस्पर्धा से कम हो गया।
🔸 परिणाम :- भारतीय उद्योगपतियों ने धागा बनाने के बजाय अब कपड़ा बनाना शुरू कर दिया। 1900 से 1912 के बीच भारत में सूती कपड़े का उत्पादन दोगुना हो गया।
प्रथम विश्व युद्ध और औद्योगिक उछाल :-
पहले विश्व युद्ध (1914) ने औद्योगिक स्थिति पूरी तरह बदल दी।
🔸 कारण :- ब्रिटेन के कारखाने सेना के लिए युद्ध का सामान बनाने में व्यस्त हो गए, जिससे भारत में ब्रिटिश कपड़े का आयात अचानक गिर गया।
🔹 भारत पर असर :-
- मैनचेस्टर के कपड़े का आयात तेजी से घटा।
- भारतीय उद्योगपतियों को भारत का बाजार मिल गया।
- भारतीय कारखानों ने जूट की बोरियाँ, वर्दी, तंबू, जूते आदि बनाना शुरू किया।
🔹 उद्योग का विस्तार :-
- नए कारखाने लगे।
- पुराने कारखाने दो-तीन पालियों में चलने लगे।
- मजदूरों की संख्या बढ़ी और काम के घंटे बढ़ाए गए।
- औद्योगिक उत्पादन में तेज वृद्धि हुई।
युद्ध के बाद की स्थिति :-
- ब्रिटेन की कमजोरी :- अमेरिका, जर्मनी और जापान से प्रतिस्पर्धा, और आधुनिकीकरण न कर पाने के कारण ब्रिटेन कमजोर पड़ गया। कपास उत्पादन गिरा।
- मैनचेस्टर की वापसी नहीं हुई :- ब्रिटेन कभी भारतीय बाजार में पहले जैसी स्थिति हासिल नहीं कर पाया।
- भारतीय उद्योगपतियों का लाभ :- भारतीय उद्योगपतियों ने घरेलू बाजार पर कब्ज़ा कर लिया और अपनी स्थिति मजबूत बना ली।
20वीं सदी में हथकरघा :-
औद्योगीकरण के बावजूद हस्तउद्योगों का पुनरुत्थान :-
मशीनी कपड़ों की प्रतिस्पर्धा के बावजूद, 1900 से 1940 के बीच हथकरघा कपड़े का उत्पादन तीन गुना बढ़ा। इसके दो मुख्य कारण थे:
🔹 (i) तकनीकी सुधार: फ्लाई शटल :-
बुनकरों ने नई तकनीक अपनाई, बशर्ते वह सस्ती हो और उत्पादन बढ़ाए। (फ्लाई शटल)
- क्या था :- यह रस्सियों और पुलियों के ज़रिए चलने वाला एक यांत्रिक औजार था।
- फायदा :- इससे बुनकरों की काम करने की गति बढ़ गई, उत्पादन तेज हुआ और श्रम की बचत हुई।
- प्रसार :- 1941 तक: भारत के 35% से अधिक हथकरघों में फ्लाई शटल लगे थे। कुछ क्षेत्रों (त्रावणकोर, मद्रास, बंगाल आदि) में यह 70-80% तक पहुँच गया था।
🔹 (ii) विशेष बुनाई की ताकत :-
मिलें हाथ से बनी बारीक चीजों की नकल नहीं कर सकती थीं।
🔸 उदाहरण: बुने हुए बॉर्डर वाली बनारस की साड़ियाँ, बालूचरी साड़ियाँ और मद्रास की लुंगियाँ अकाल में भी बिकती रहीं।
शिल्पकारों का कठोर जीवन :-
- जीवन आसान नहीं था: इन शिल्पकारों को दिन-रात मेहनत करनी पड़ती थी।
- पारिवारिक श्रम: अक्सर पूरा परिवार (बच्चे, बूढ़े, महिलाएँ) उत्पादन में लगा रहता था।
- निष्कर्ष :- ये बुनकर ‘अतीत के अवशेष’ नहीं थे, बल्कि वे आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था का एक अनिवार्य हिस्सा थे।
विज्ञापन की भूमिका :-
- उद्देश्य :- नए उत्पादों के लिए नए उपभोक्ता पैदा करना और नई ज़रूरतें/इच्छाएँ जगाना।
- तरीका :- लोगों की सोच बदलकर उन्हें यह महसूस कराना कि उन्हें उस उत्पाद की ज़रूरत है।
- महत्व :- विज्ञापनों ने औद्योगीकरण की शुरुआत से ही बाज़ारों का विस्तार और नई उपभोक्ता संस्कृति बनाने में भूमिका निभाई।
उत्पाद लेबल :-
🔸 शुरुआत :- मैनचेस्टर के उद्योगपति कपड़े के बंडलों पर लेबल लगाने लगे।
🔸 लेबल के उद्देश्य :-
- पहचान: कंपनी का नाम और उत्पादन स्थान बताना।
- विश्वास जगाना: “मेड इन मैनचेस्टर” जैसे लेबल से गुणवत्ता का आश्वासन मिलता था और खरीदार का डर दूर होता था।
- आकर्षित करना: लेबलों पर सुंदर चित्र और छवियाँ बनाई जाती थीं।
लेबलों और कैलेंडरों में छवियों का उपयोग :-
🔹 A. देवी-देवताओं की छवियाँ :-
- लेबलों पर अक्सर भारतीय देवी-देवताओं की तस्वीरें होती थीं।
- उद्देश्य :- यह दिखाना कि ईश्वर भी उस उत्पाद को खरीदने की अनुमति देता है।
- कृष्ण या सरस्वती जैसी तस्वीरों से विदेशी उत्पाद भी भारतीयों को अपना-सा लगने लगता था।
🔹 B. कैलेंडरों के ज़रिए विज्ञापन :-
- उन्नीसवीं सदी के अंत में कंपनियों ने कैलेंडर छपवाने शुरू किए।
- अख़बार और पत्रिकाएँ सिर्फ़ पढ़े-लिखे लोग समझ सकते थे। लेकिन कैलेंडर अनपढ़ लोग भी समझ सकते थे।
- ये कैलेंडर चाय की दुकानों, दफ़्तरों, मध्यवर्गीय घरों में टाँगे जाते थे।
- पूरे साल लोग रोज़-रोज़ वही विज्ञापन देखते रहते थे।
- इनमें भी देवताओं की तस्वीरों का खूब उपयोग हुआ।
🔹 C. राजाओं और प्रतिष्ठित व्यक्तियों की तस्वीरें :-
- विज्ञापनों और कैलेंडरों में राजाओं, सम्राटों और नवाबों की तस्वीरें भी छपती थीं।
- संदेश यह होता था: अगर राजा इस चीज़ का इस्तेमाल करते हैं, तो उसकी गुणवत्ता पर शक नहीं किया जा सकता।
- इससे उत्पाद को सम्मान और विश्वसनीयता मिलती थी।
भारतीय विज्ञापन और राष्ट्रवाद :-
- रणनीति :- भारतीय निर्माताओं ने अपने विज्ञापनों में स्पष्ट राष्ट्रवादी संदेश शामिल किए।
- संदेश :- “अगर आप राष्ट्र की परवाह करते हैं, तो भारतीयों द्वारा बनाई गई चीजें (स्वदेशी) ही खरीदें।”
- उद्देश्य :- स्वदेशी आंदोर्लन को बढ़ावा देना और भारतीय उत्पादों के लिए भावनात्मक जुड़ाव पैदा करना। ओर विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार को बढ़ावा।