NCERT Class 10th Social Science History Notes Chapter 3 भूमंडलीकृत विश्व का बनना
इस अध्याय मे हम वैश्वीकरण की ऐतिहासिक प्रक्रिया, रेशम मार्ग, प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध, महामंदी, वैश्विक व भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव, ब्रेटन वुड्स व्यवस्था, आई.एम.एफ. और विश्व बैंक, नवस्वाधीन देशों की समस्याएँ, नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO) तथा आधुनिक वैश्वीकरण और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की भूमिका आदि के बारे में विस्तार से पड़ेगे।
भूमंडलीकृत विश्व का बनना
भूमंडलीकरण :-
भूमंडलीकरण वह प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत दुनिया के विभिन्न देश आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से एक-दूसरे से जुड़ते हैं। इसके माध्यम से वस्तुओं और सेवाओं, पूँजी तथा तकनीक का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आदान-प्रदान होता है। इससे देशों के बीच सूचना, ज्ञान और उत्पादन के साधनों का प्रवाह आसान हो जाता है।
वैश्वीकरण :-
वैश्वीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाएँ एक-दूसरे से जुड़ती हैं। इसके अंतर्गत वस्तुओं, सेवाओं, पूँजी और तकनीक का एक देश से दूसरे देश में प्रवाह होता है।
वैश्विक दुनिया के निर्माण को समझने के लिए हमें व्यापार के इतिहास, लोगों के प्रवासन, काम की तलाश तथा पूँजी की आवाजाही को समझना आवश्यक है।
वीटो “निषेधाधिकार” :-
इस अधिकार के सहारे एक ही सदस्य की असहमति किसी भी प्रस्ताव को खारिज करने का आधार बन जाती है।
आयात शुल्क (Tariff) :-
किसी दूसरे देश से आने वाली चीज़ों पर वसूल किया जाने वाला शुल्क को आयात शुल्क कहते हैं। यह कर या शुल्क उस जगह लिया जाता है जहाँ से वह चीज देश में आती है, यानी सीमा पर, बंदरगाह पर या हवाई अड्डे पर।
विनिमय दर :-
विनिमय दर वह व्यवस्था है जिसके माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को सुगम बनाने के लिए विभिन्न देशों की राष्ट्रीय मुद्राओं को एक-दूसरे से जोड़ा जाता है। मोटे तौर पर विनिमय दर दो प्रकार की होती है—
- स्थिर विनिमय दर
- लचीली या परिवर्तनशील विनिमय दर
1. स्थिर विनिमय दर :-
जब विनिमय दर स्थिर रहती है और उसमें होने वाले उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ता है, तो उसे स्थिर विनिमय दर कहा जाता है।
2. लचीली या परिवर्तनशील विनिमय दर :-
इस प्रकार की विनिमय दर विदेशी मुद्रा बाज़ार में विभिन्न मुद्राओं की माँग और आपूर्ति के आधार पर निर्धारित होती है और सिद्धांततः इसमें सरकार का हस्तक्षेप नहीं होता।
प्राचीन काल में संपर्क :-
इतिहास के हर दौर में मानव समुदाय एक-दूसरे के नज़दीक आते गए। यात्री, व्यापारी, पुजारी और तीर्थयात्री दूर-दूर तक यात्रा करते थे।
🔹 लोग क्यों यात्रा करते थे?
उनके यात्रा के कारण :-
- व्यापार के लिए
- काम की तलाश में
- ज्ञान और शिक्षा के लिए
- धार्मिक और आध्यात्मिक कारणों से
- अत्याचार और उत्पीड़न से बचने के लिए
🔹 यात्राओं के साथ क्या-क्या फैलता था?
🔸 यात्राओं के दौरान आदान-प्रदान :- जब लोग एक जगह से दूसरी जगह जाते थे, तो लोग अपने साथ सिर्फ सामान ही नहीं, बल्कि:
- पैसा
- मूल्य और परंपराएँ
- विचार और ज्ञान
- हुनर और तकनीक
- आविष्कार
- कीटाणु और बीमारियाँ
भी एक जगह से दूसरी जगह ले जाते थे।
रेशम मार्ग (सिल्क रूट) :-
यह प्राचीन काल में दुनिया के विभिन्न हिस्सों को जोड़ने वाला व्यापारिक एवं सांस्कृतिक मार्गों का जाल था। इन्हें सिल्क रूट कहा जाता है। इसके माध्यम से वस्तुओं के साथ-साथ विचारों, धर्मों और संस्कृतियों का भी आदान-प्रदान हुआ।
🔸 काल :- सिल्क मार्ग ईसा पूर्व (BCE) काल में शुरू हुए और लगभग 15वीं शताब्दी तक सक्रिय रहे।
🔸 नाम का महत्व :- ‘इन मार्गों का नाम चीन के रेशम (Silk) के कारण पड़ा, जो पश्चिमी देशों में बहुत मूल्यवान था।
🔸 सिल्क मार्गों का विस्तार और समय सीमा :-
- इतिहासकारों के अनुसार कई सिल्क मार्ग थे, कोई एक ही रास्ता नहीं। ये मार्ग स्थल और समुद्र, दोनों से होकर गुजरते थे।
- इन मार्गों ने एशिया के विभिन्न क्षेत्रों को आपस में जोड़ा तथा एशिया को यूरोप और उत्तरी अफ्रीका से जोड़ा।
🔹 सिल्क मार्गों से होने वाला व्यापार :-
🔸 एशिया से बाहर भेजी जाने वाली वस्तुएँ:
- चीनी रेशम
- चीनी पॉटरी (मिट्टी के बर्तन)
- भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के कपड़े
- मसाले
🔸 यूरोप से एशिया आने वाली वस्तुएँ:
- सोना
- चाँदी
- अन्य कीमती धातुएँ
👉 इस तरह यह मार्ग दोनों दिशाओं में व्यापार को बढ़ावा देता था।
रेशम मार्ग (सिल्क रूट) द्वारा सांस्कृतिक और धार्मिक आदान-प्रदान :-
सिल्क मार्ग सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं थे। इनके माध्यम से धर्म, विचार और संस्कृति भी फैली।
🔸 उदाहरण (धर्मों का प्रसार) :-
- ईसाई धर्म: शुरुआती ईसाई मिशनरी इसी रास्ते से एशिया आए।
- इस्लाम: कुछ सदी बाद मुस्लिम धर्मोपदेशक भी इसी रास्ते से दुनिया में फैले
- बौद्ध धर्म: पूर्वी भारत में उपजा बौद्ध धर्म सिल्क मार्ग की विविध शाखाओं से ही कई दिशाओं में फैल चुका था।
रेशम मार्ग की विशेषताएँ — in short :-
- यह प्राचीन व्यापारिक और सांस्कृतिक मार्गों का जाल था।
- इसमें स्थलीय और समुद्री, दोनों प्रकार के मार्ग शामिल थे।
- इसने एशिया को यूरोप और उत्तरी अफ्रीका से जोड़ा।
- इसके माध्यम से रेशम, मसाले, बहुमूल्य पत्थर आदि का व्यापार होता था।
- वस्तुओं के साथ-साथ धर्म, संस्कृति और विचारों का भी आदान-प्रदान हुआ।
- यह मार्ग ईसा पूर्व काल से 15वीं शताब्दी तक सक्रिय रहा।
भोजन की यात्रा: दूर देशों का सांस्कृतिक लेन-देन :-
भोजन से जुड़े सांस्कृतिक आदान-प्रदान :-
- खाद्य पदार्थ दूर-दूर के देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान के अच्छे उदाहरण हैं।
- जब भी व्यापारी और मुसाफिर किसी नए देश में जाते थे, जाने-अनजाने वहाँ नयी फ़सलों के बीज बो आते थे।
- इसी तरह दुनिया के कई हिस्सों में एक जैसे खाद्य पदार्थ पाए जाते हैं।
🔹 ‘झटपट तैयार’ भोजन के उदाहरण (स्पैघेत्ती और नूडल्स) :-
- माना जाता है कि नूडल्स चीन से पश्चिम की ओर पहुँचे और स्पेगेटी का रूप लिया।
- एक अन्य मत – पास्ता 5वीं शताब्दी में अरब यात्रियों के माध्यम से सिसिली (इटली) पहुँचा।
- इसी प्रकार के खाद्य भारत व जापान में भी मिलते हैं, जिससे उनकी उत्पत्ति स्पष्ट नहीं है।
🔸 निष्कर्ष :- आधुनिक काल से पहले भी दूर देशों के बीच सांस्कृतिक लेन-देन चल रहा था।
अमेरिका से प्राप्त नई खाद्य फसलें :-
- लगभग 500 साल पहले हमारे पूर्वजों को कई खाद्य पदार्थों का ज्ञान नहीं था, जैसे:
- आलू, सोया, मूँगफली, मक्का, टमाटर, मिर्च, शकरकंद आदि।
- ये सभी अमेरिका (उत्तरी व दक्षिणी अमेरिका, कैरीबियन) से आए।
- ये सभी खाद्य पदार्थ यूरोप और एशिया में तब पहुँचे जब Christopher Columbus गलती से उन नए महाद्वीपों तक पहुँच गया जिन्हें बाद में America कहा गया।
- हमारे बहुत सारे खाद्य पदार्थ अमेरिका के मूल निवासियों यानी अमेरिकन इंडियनों से हमारे पास आए हैं।
नई फसलों का समाज पर प्रभाव :-
कई बार नयी फ़सलों के आने से जीवन में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ आ जाता था।
- (क) आलू का प्रभाव :- आलू के आने से यूरोप के गरीबों का भोजन बेहतर हुआ और लोगों की औसत आयु बढ़ी।
- (ख) आयरलैंड का आलू अकाल :- आयरलैंड के गरीब किसान आलू पर बहुत अधिक निर्भर हो गए थे।
- 1840 के दशक में आलू की फ़सल में बीमारी फैल गईऔर लाखों लोग भुखमरी से मर गए।
👉 इससे पता चलता है कि नई फसलें जीवन बदल सकती हैं, लेकिन अत्यधिक निर्भरता खतरनाक भी हो सकती है।
🔸 निष्कर्ष :- भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं है, बल्कि भोजन के माध्यम से भी वैश्वीकरण हुआ। खाद्य पदार्थों ने लोगों के जीवन, संस्कृति और इतिहास को गहराई से प्रभावित किया।
विजय, बीमारी और व्यापार :-
यूरोपीय खोजें और उनका प्रभाव :-
16वीं सदी में यूरोपीय नाविकों ने एशिया का समुद्री मार्ग ढूंढ लिया और पश्चिमी सागर को पार करते हुए अमेरिका तक जा पहुँचे। इससे पूर्व-आधुनिक विश्व एक छोटा और जुड़ा हुआ महसूस होने लगा।
🔹 हिंद महासागर का व्यापार :-
🔸 यूरोपियों के आने से पहले :- हिंद महासागर क्षेत्र में व्यापार, लोग, ज्ञान और परंपराएँ सदियों से घूम रही थीं। भारतीय उपमहाद्वीप इस पूरे नेटवर्क का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र था।
🔸 यूरोपियों के आने के बाद :- यूरोपीयों के आने से आवाजाही बढ़ी और व्यापारिक प्रवाह यूरोप की ओर मुड़ने लगा।
अमेरिका का दुनिया से जुड़ना :-
- सोलहवीं सदी से पहले अमेरिका का दुनिया से लगभग कोई संपर्क नहीं था।
- लेकिन इसके बाद वहाँ की विशाल भूमि, नई फसलें, खनिज संपदा ने पूरी दुनिया का जीवन बदल दिया।
🔸 चाँदी का प्रभाव :- आज के पेरू और मैक्सिको की खानों से निकली चाँदी ने यूरोप की संपत्ति बढ़ाई और पश्चिम एशिया के साथ व्यापार को तेज़ किया।
अमेरिका का उपनिवेशीकरण ‘जैविक युद्ध’ और अमेरिका पर विजय :-
16वीं सदी के मध्य तक पुर्तगाली और स्पेनिश सेनाओं ने अमेरिका को उपनिवेश बनाना शुरू कर दिया।
पुर्तगाली और स्पेनिश सेनाओं ने अमेरिका को जीतने के लिए केवल बंदूकों का इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि उनके पास एक घातक हथियार था— चेचक।
🔸 बीमारी: एक घातक हथियार :-
- यूरोपीयों के साथ चेचक जैसी बीमारियाँ अमेरिका पहुँचीं।
- अमेरिकी मूल निवासियों में इन बीमारियों के प्रति कोई रोग प्रतिरोधक क्षमता नहीं थी।
🔸 परिणाम :- पूरी की पूरी आबादियाँ नष्ट हो गईं यूरोपियों के लिए जीत आसान हो गई।
👉 बंदूकों से लड़ा जा सकता था, लेकिन बीमारियों से नहीं।
यूरोप से अमेरिका की ओर पलायन और गुलाम प्रथा :-
- 19वीं सदी तक यूरोप में गरीबी, भीड़, बीमारियाँ और धार्मिक उत्पीड़न था।
- हजारों लोग यूरोप से भागकर अमेरिका आने लगे।
- 18वीं सदी तक, अमेरिका में अफ्रीकी गुलामों के श्रम पर कपास और चीनी का उत्पादन यूरोपीय बाजारों के लिए किया जाने लगा।
विश्व व्यापार के केंद्र का स्थानांतरण :-
- 18वीं सदी के अंत तक भी चीन और भारत दुनिया के सबसे धनी देश माने जाते थे।
- लेकिन 15वीं सदी से ही चीन ने खुद को दुनिया से अलग-थलग करना शुरू कर दिया था।
- चीन की घटती भूमिका और अमेरिका के बढ़ते महत्व के कारण विश्व व्यापार का केंद्र पश्चिम (यूरोप) की ओर खिसक गया।
- यूरोप अब विश्व व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र बन गया।
उन्नीसवीं सदी (1815-1914) :-
- यह सदी आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और तकनीकी बदलावों की सदी थी।
- इन कारकों ने समाजों को बदल दिया और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को नए आकार दिए।
अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक विनिमय के प्रवाह :-
अर्थशास्त्रियों के अनुसार 19वीं सदी में वैश्विक अर्थव्यवस्था को तीन प्रमुख प्रवाहों के माध्यम से समझा जा सकता है:
🔸 (1) व्यापार का प्रवाह :-
- यह पहला और सबसे महत्वपूर्ण प्रवाह था।
- इसमें मुख्य रूप से कपड़ा, गेहूँ, अन्य कृषि और औद्योगिक वस्तुओं का व्यापार शामिल था।
- 👉 उस समय व्यापार ज़्यादातर वस्तुओं तक ही सीमित था।
🔸 (2) श्रम का प्रवाह (लोगों का प्रवास) :-
- लोग काम और रोज़गार की तलाश में एक देश से दूसरे देश जाते थे।
- इसमें शामिल थे मज़दूर, कारीगर, खेतिहर मजदूर।
🔸 (3) पूँजी का प्रवाह :-
- इसमें दूर-दराज के इलाकों में अल्पकालिक (कम समय) या दीर्घकालिक (लंबे समय) के लिए निवेश किया जाता था ताकि मुनाफा कमाया जा सके।
- इसमें उद्योगों, परिवहन, खानों आदि में निवेश शामिल था।
प्रवाहों के बीच संबंध और चुनौतियाँ :-
🔸 परस्पर जुड़ाव :- ये तीनों प्रवाह एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए थे। व्यापार बढ़ने पर पूँजी निवेश बढ़ता था और जहाँ निवेश होता था, वहाँ काम की तलाश में श्रमिक पहुँचते थे। ये सामूहिक रूप से लोगों के जीवन को प्रभावित करते थे।
🔸 बंदिशें :- ये तीनों प्रवाह हमेशा एक समान नहीं थे। अक्सर वस्तुओं और पूँजी की आवाजाही तो आसान थी, लेकिन श्रमिकों के आने-जाने पर सरकारें बहुत सारी शर्तें और पाबंदियाँ लगा देती थीं।
ब्रिटेन में खाद्य समस्या और ‘कॉर्न लॉ’ :-
- 19वीं सदी में ब्रिटेन की तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या के कारण खाद्य की माँग बढ़ गई।
- शहरीकरण और औद्योगीकरण ने इस माँग को और बढ़ाया।
कॉर्न लॉ :-
बड़े भूस्वामियों के दबाव में सरकार ने मक्का के आयात पर पाबंदी लगा दी थी। जिन कानूनों के तहत यह रोक लगी, उन्हें ‘कॉर्न लॉ’ कहा जाता था।
इससे भोजन और महँगा हो गया और उद्योगपति और शहरी लोग परेशान हो गए।
🔸 कॉर्न लॉ का खात्मा :- उद्योगपतियों और शहरी लोगों के दबाव में 1846 में कॉर्न लॉ हटा दिए गए।
कॉर्न लॉ हटने के परिणाम :-
- कॉर्न लॉ हटने के बाद सस्ते खाद्य पदार्थों का आयात शुरू हुआ।
- ब्रिटिश किसान सस्ते आयातित अनाज का मुकाबला नहीं कर सके।
- परिणामस्वरूप कई किसानों ने खेती छोड़ दी, बेरोज़गारी बढ़ी और लोग गाँवों से शहरों की ओर पलायन करने लगे।
- खाद्य कीमतें घटने से ब्रिटेन में उपभोग बढ़ा, जिससे आयात और अधिक बढ़ गया।
वैश्विक कृषि अर्थव्यवस्था का उदय (1890 तक) :-
ब्रिटेन की जरूरतों को पूरा करने के लिए दुनिया भर में बदलाव हुए:
- पूर्वी यूरोप, रूस, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में जंगलों को साफ कर खेती शुरू की गई।
- खेतों को बंदरगाहों से जोड़ने के लिए रेलवे बिछाई गई और नई गोदियाँ (Docks) बनाई गईं।
- इन कामों के लिए लंदन जैसे केंद्रों से पूँजी आई और अमेरिका व ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में मजदूरों की कमी को पूरा करने के लिए ‘श्रम का प्रवाह’ हुआ।
🔹 श्रम का विशाल प्रवाह :-
- 19वीं सदी में लगभग 5 करोड़ यूरोपीय अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जाकर बसे।
- दुनिया भर में लगभग 15 करोड़ लोगों ने रोज़गार के लिए प्रवास किया।
- 1890 तक एक वैश्विक कृषि अर्थव्यवस्था विकसित हो चुकी थी।
🔹 उत्पादन और परिवहन में बदलाव :-
- अब खाद्य पदार्थ हजारों मील दूर से आने लगे।
- किसानों की जगह औद्योगिक मज़दूरों ने खेती शुरू की।
- परिवहन के लिए रेलवे और समुद्री जहाज़ों का नेटवर्क बना।
- जहाज़ों पर कम वेतन वाले मज़दूर (दक्षिण यूरोप, एशिया, अफ्रीका, कैरीबियाई) काम करते थे।
🔹 भारत का उदाहरण – पंजाब :-
🔸 भारत में भी इसी तरह के बदलाव देखे गए: ब्रिटिश सरकार ने पंजाब के अर्ध-रेगिस्तानी इलाकों में नहरों का जाल बिछाया ताकि निर्यात के लिए गेहूँ और कपास उगाया जा सके। दूसरे इलाकों के लोगों को यहाँ लाकर बसाया गया, जिन्हें ‘केनाल कॉलोनी’ कहा जाता था।
व्यापार में भारी वृद्धि (1820-1914) :-
- इस दौरान विश्व व्यापार में 25 से 40 गुना की वृद्धि हुई।
- कुल व्यापार का 60% हिस्सा ‘प्राथमिक उत्पादों’ (गेहूँ, कपास, कोयला आदि) का था।
उन्नीसवीं सदी में तकनीक का योगदान :-
तकनीक क्यों महत्वपूर्ण थी?
इनके बिना वैश्विक व्यापार, परिवहन और संचार की कल्पना नहीं की जा सकती थी। रेलवे, भाप के जहाज़, टेलीग्राफ़ जैसी तकनीकों ने 19वीं सदी के परिवर्तनों को संभव बनाया।
🔹 प्रमुख तकनीकी आविष्कार :-
19वीं सदी के बदलावों के पीछे तीन मुख्य स्तंभ थे:
- रेलवे: भारी सामान को खेतों से बंदरगाहों तक तेज़ी से पहुँचाने के लिए।
- भाप के जहाज़: समुद्री यात्राओं को सुगम और सस्ता बनाने के लिए।
- टेलीग्राफ़: सूचनाओं और व्यापारिक सौदों को तेज़ी से एक देश से दूसरे देश भेजने के लिए।
तकनीक और औपनिवेशीकरण :-
- तकनीकी प्रगति केवल वैज्ञानिक खोजों का नतीजा नहीं थी।
- यह अक्सर सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक ज़रूरतों का परिणाम भी थी।
👉 औपनिवेशीकरण के कारण परिवहन और यातायात के साधनों में भारी सुधार किया गया।
परिवहन में सुधार :-
- तेज़ रफ्तार रेलगाड़ियाँ बनीं।
- रेल की बोगियों का भार कम किया गया।
- जलपोतों (जहाज़ों) का आकार बढ़ाया गया।
👉 उद्देश्य :- इन सब का उद्देश्य एक ही था— लागत कम करना और उत्पादों को दूर-दराज के बाज़ारों तक आसानी से पहुँचाना।
तकनीक के परिणाम :-
- वस्तुओं का तेज़ और सस्ता परिवहन संभव हुआ
- दूर-दराज़ के बाज़ार आपस में जुड़ गए
- वैश्विक व्यापार में तेज़ी आई
- खाद्य पदार्थ सस्ते हुए (जैसे मांस)
- गरीबों को बेहतर और विविध भोजन मिला
- जीवन-स्तर में सुधार हुआ
- उद्योगों को कच्चा माल और बाज़ार आसानी से मिले
- पलायन बढ़ा
- औपनिवेशिक विस्तार आसान हुआ
- सामाजिक अशांति घटी, राजनीतिक स्थिरता बढ़ी
अफ्रीका का बँटवारा :-
- अफ्रीका में देशों की सीमाएँ सीधी रेखाओं में खींची गईं, स्थानीय परिस्थितियों की अनदेखी हुई।
- 1885 में Berlin Conference में यूरोपीय शक्तियों ने अफ्रीका का बँटवारा किया।
अफ्रीका में यूरोपीय उपनिवेशवाद: चुनौती, अवसर और श्रमिक समस्या :-
🔹 अफ्रीका का पारंपरिक जीवन :-
- अफ्रीका में जमीन और पशुधन प्रचुर थे, जनसंख्या कम थी।
- अर्थव्यवस्था जमीन और पशुपालन पर आधारित थी।
- मुद्रा या वेतन-श्रम का चलन नहीं था।
- उपभोक्ता वस्तुएँ कम थीं, इसलिए पैसे की आवश्यकता कम थी।
🔹 यूरोपीय उपनिवेशवाद की चुनौती और अवसर :-
19वीं सदी के अंत में यूरोपीय शक्तियाँ अफ्रीका आईं क्योंकि:
🔸 यूरोपीय उद्देश्य :-
- अफ्रीका के विशाल भूक्षेत्र और खनिज संसाधनों पर कब्ज़ा करना।
- बागानी खेती और खनन करना।
❌ लेकिन समस्या यह थी कि अफ्रीकी लोग मज़दूरी करना नहीं चाहते थे।
🔹 अफ्रीकियों को मज़दूर बनाने के उपाय :-
- भारी कर लगाना – भारी कर लगाए गए जिन्हें चुकाने के लिए बागानों या खदानों में काम करना ज़रूरी था।
- उत्तराधिकार कानून बदलना – केवल एक सदस्य को पैतृक संपत्ति मिले, बाकी मजदूर बनें।
- मजदूरों को बाड़ों में कैद करना और आवाजाही पर रोक।
- बचे-खुचे मवेशियों पर कब्ज़ा करना – ताकि लोग काम करने को मजबूर हों।
रिंडरपेस्ट – एक विनाशकारी बीमारी :-
रिंडरपेस्ट मवेशियों में फैलने वाली प्लेग जैसी बेहद खतरनाक बीमारी थी। 1890 के दशक में यह बीमारी Africa में बहुत तेजी से फैल गई।
अफ्रीका में रिंडरपेस्ट नाम की बीमारी सबसे पहले 1880 के दशक के आखिरी सालों में दिखाई दी। यह बीमारी इतालवी सैनिकों के लिए एशिया से लाए गए मवेशियों के साथ पूर्वी अफ्रीका में आई।
- यह जंगल की आग की तरह फैली:
- 1892 तक → अटलांटिक तट तक पहुँची।
- 1897 तक → दक्षिणी अफ्रीका (केप) तक पहुँची।
- इस बीमारी से लगभग 90% मवेशी मर गए।
🔹 अफ्रीका पर रोग का आर्थिक असर :-
- मवेशियों के नष्ट होने से आजीविका के साधन समाप्त हो गए।
- अफ्रीकी समाज आर्थिक रूप से कमजोर हो गया।
रिंडरपेस्ट ने यूरोपीयों की मदद कैसे की?
- मवेशियों के नष्ट होने से अफ्रीकी आर्थिक रूप से कमजोर हुए।
- यूरोपीयों ने बचे हुए मवेशियों पर कब्ज़ा कर लिया।
- अफ्रीकी लोग वेतन-श्रम के लिए मजबूर हो गए।
- इससे यूरोपीयों को अफ्रीका पर पूर्ण नियंत्रण और शोषण का अवसर मिल गया।
भारत से अनुबंधित (गिरमिटिया) श्रमिकों का पलायन और वैश्वीकरण :-
अनुबंधित श्रमिक कौन थे?
19वीं सदी में भारत और चीन के लाखों मज़दूर बागानों, खदानों, रेलवे व सड़कों के निर्माण के लिए दूर देशों में ले जाए गए।
भारतीय श्रमिक एक विशेष अनुबंध (एग्रीमेंट) के तहत जाते थे।
🔸 अनुबंध की शर्त :- 5 साल बागान में काम करने पर स्वदेश लौटने का अधिकार।
इतिहासकार इस व्यवस्था को ‘नयी दास प्रथा’ भी कहते हैं।
श्रमिक कहाँ से आते थे?
🔸 मुख्य क्षेत्र: पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य भारत, तमिलनाडु के सूखाग्रस्त इलाके।
- कारण :-
- कुटीर उद्योगों का नष्ट होना।
- कर्ज और गरीबी।
- रोजगार की तलाश।
👉 मजबूरी में लोगों को घर-बार छोड़ना पड़ा।
मज़दूरों को कहाँ ले जाया गया?
भारतीय मजदूरों को मुख्य रूप से इन जगहों पर ले जाया जाता था:
- कैरीबियाई द्वीप: त्रिनिदाद, गुयाना, सुरीनाम। मॉरिशस, फ़िजी।
- तमिल श्रमिक: सीलोन (श्रीलंका), मलाया।
- भारत के भीतर: असम के चाय बागान।
भर्ती की शोषणपूर्ण प्रक्रिया :-
मजदूरों की भर्ती एजेंटों के जरिए होती थी जो कमीशन के लिए काम करते थे। वे कई तरह के झूठ बोलते थे:
- वे काम की परिस्थितियों और जगह के बारे में गलत जानकारी देते थे।
- कई मजदूरों को तो यह भी नहीं पता होता था कि उन्हें लंबी समुद्री यात्रा पर जाना है।
- राजी न होने वाले मजदूरों का कभी-कभी अपहरण तक कर लिया जाता था।
🔹 ‘नई दास प्रथा’ के रूप में :-
इस व्यवस्था को “नयी दास प्रथा” कहा गया।
काम की जगह पर पहुँचने के बाद मजदूरों को पता चलता था कि स्थितियाँ बहुत कठोर हैं और उनके पास कोई कानूनी अधिकार नहीं हैं।
🔹 लौटना या बस जाना :-
- अधिकांश श्रमिक अनुबंध समाप्ति के बाद वापस नहीं लौटे।
- वापस लौटे भी, तो अधिकांश फिर चले गए।
- इसीलिए कैरिबियन व अन्य देशों में भारतीय मूल के लोगों की बड़ी आबादी है।
अनुबंधित प्रथा का अंत :-
20वीं सदी की शुरुआत में भारतीय राष्ट्रवादियों ने इस प्रथा का विरोध किया।
🔸 परिणाम :- भारी विरोध और दबाव के कारण 1921 में इस प्रथा को आधिकारिक रूप से खत्म कर दिया गया।
लेकिन उनके वंशजों को दशकों तक “कुली” कहकर अपमानित किया गया।
विदेशों में भारतीय उद्यमी :-
शिकारीपूरी श्रॉफ और नट्टुकोट्टई चेट्टियार :-
ये उस समय के प्रमुख भारतीय बैंकर और व्यापारी समूह थे:
- कार्यक्षेत्र: ये मुख्य रूप से मध्य और दक्षिण-पूर्व एशिया में सक्रिय थे।
- भूमिका: ये उन फसलों के लिए कर्ज़ा देते थे जिनका निर्यात किया जाना होता था।
- पूँजी का स्रोत: ये या तो अपनी जमा-पूँजी का उपयोग करते थे या यूरोपीय बैंकों से कर्ज़ा लेकर आगे मज़दूरों/किसानों को देते थे।
- नेटवर्क: उनके पास दूर-दूर तक पैसे पहुँचाने की व्यवस्थित प्रणाली थी।
अफ्रीका और वैश्विक विस्तार में भारतीय व्यापारी :-
- यूरोपीय उपनिवेशवाद के साथ-साथ भारतीय व्यापारी और महाजन भी अफ्रीका पहुँचे।
- ये लोग व्यापार, साहूकारी, स्थानीय बाज़ार में सक्रिय हो गए।
🔹 हैदराबादी सिंधी व्यापारियों की सफलता :-
हैदराबादी सिंधी व्यापारी यूरोपीय उपनिवेशों से भी आगे तक फैल गए।
🔸 1860 के दशक से उनकी गतिविधियाँ :-
- दुनिया के विभिन्न बंदरगाहों पर बड़े-बड़े एम्पोरियम (दुकानें) खोले।
- इन दुकानों में स्थानीय और विदेशी आकर्षक सामान मिलते थे।
🔸 ग्राहक: मुख्य रूप से बढ़ती संख्या में यात्री और पर्यटक।
🔸 विकास का कारण :- उस समय सुरक्षित और आरामदायक जलपोतों के आने से सैलानियों की संख्या बढ़ रही थी, जिससे इनका कारोबार खूब फला-फूला।
भारतीय व्यापार, उपनिवेशवाद और वैश्विक व्यवस्था :-
भारतीय सूती वस्त्र उद्योग का पतन :-
- भारत से महीन कपड़े का निर्यात यूरोप को होता था।
- ब्रिटेन के औद्योगीकरण के बाद वहाँ कपड़ा उत्पादन बढ़ा।
- ब्रिटिश उद्योगपतियों के दबाव में भारतीय कपड़े पर आयात शुल्क (सीमा शुल्क) लगा दिया गया।
🔸 परिणाम :- भारतीय कपड़े का ब्रिटेन को निर्यात कम हो गया।
🔸 आँकड़ों में गिरावट :- सन् 1800 में भारत के कुल निर्यात में सूती कपड़े का हिस्सा 30% था, जो 1870 तक घटकर मात्र 3% रह गया।
🔸 अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा :- ब्रिटेन ने अन्य देशों में अपना कपड़ा बेचना शुरू किया। भारतीय कपड़े को वैश्विक बाजार में भी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा।
भारत के निर्यात पैटर्न में बदलाव :-
- जैसे-जैसे कपड़ों का निर्यात घटा, ब्रिटेन की जरूरतों को पूरा करने के लिए कच्चे माल का निर्यात बढ़ा:
- 1812 से 1871 के बीच कच्चे कपास का निर्यात 5% से बढ़कर 35% हो गया।
- कपड़ों की रँगाई के लिए नील का बड़े पैमाने पर निर्यात हुआ।
अफीम का व्यापार :- यह एक ‘त्रिकोणीय व्यापार’ था। ब्रिटेन भारत में अफीम उगवाता था, उसे चीन भेजता था और उसके बदले चीन से चाय और अन्य सामान खरीदता था।
ब्रिटेन का ‘व्यापार अधिशेष’ :-
- ब्रिटेन से भारत आने वाले माल की कीमत, भारत से ब्रिटेन जाने वाले माल से हमेशा ज्यादा होती थी।
- ब्रिटेन हमेशा भारत के साथ व्यापार में अधिशेष में रहता था (अर्थात उसे लाभ होता था)।
- ब्रिटेन इस लाभ का उपयोग अन्य देशों (जैसे चीन, अमेरिका) के साथ अपने व्यापार घाटे की भरपाई के लिए करता था।
- इस तरह भारत ने 19वीं सदी की वैश्विक अर्थव्यवस्था को संतुलित करने में ब्रिटेन की मदद की।
‘होम चार्जेज’ (देसी खर्चे) :-
भारत के साथ व्यापार अधिशेष से ब्रिटेन ने निम्नलिखित खर्चे वसूले:
- ब्रिटिश अधिकारियों और व्यापारियों द्वारा भारत से इंग्लैंड भेजी गई निजी रकम।
- भारत पर बाहरी कर्ज़ का ब्याज।
- भारत में सेवारत रहे ब्रिटिश अधिकारियों की पेंशन।
बहुपक्षीय बंदोबस्त :-
जब किसी देश के साथ हुए व्यापार घाटे की भरपाई किसी तीसरे देश के साथ व्यापार से प्राप्त लाभ के माध्यम से की जाती है, तो इसे बहुपक्षीय बंदोबस्त कहा जाता है।
प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) :-
यह युद्ध अगस्त 1914 में शुरू हुआ शुरुआत में सरकारों को लगा था कि युद्ध क्रिसमस तक खत्म हो जाएगा, लेकिन यह 4 साल से अधिक (1918 तक) चला।
इसमें दो प्रमुख गुट थे :-
- मित्र राष्ट्र: ब्रिटेन, फ्रांस और रूस (बाद में अमेरिका भी शामिल हुआ)।
- केंद्रीय शक्तियाँ: जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी और ऑटोमन तुर्की।
🔹 आधुनिक युद्ध के औज़ार :-
- यह पहला युद्ध था जिसमें आधुनिक उद्योगों में बनी हथियारों मशीनगन, टैंक, हवाई जहाज़, रासायनिक हथियार (जहरीली गैस) का बड़े पैमाने पर उपयोग।
- ये सभी औद्योगिक क्रांति की देन थे।
- दुनिया भर से लाखों सैनिकों की भर्ती की गई। उन्हें रेलगाड़ियों, विशाल जलपोतों से युद्ध मोर्चों तक पहुँचाया गया।
इस युद्ध में 90 लाख से अधिक लोग मारे गए और लगभग 2 करोड़ घायल हुए।
प्रथम विश्व युद्ध का सामाजिक और आर्थिक प्रभाव :-
युद्ध के कारण समाज और परिवारों का ढांचा पूरी तरह बदल गया:
- मरने वालों और घायलों में अधिकतर कामकाजी उम्र के लोग थे। जिससे यूरोप में कार्यशील जनसंख्या कम हो गई।
- घर के कमाने वाले सदस्यों के कम होने से परिवारों की आय गिर गई।
- युद्ध सामग्री के उत्पादन के लिए उद्योगों का पुनर्गठन किया गया।
- पूरे समाज को युद्ध की ज़रूरतों के अनुसार ढाल दिया गया।
- जब पुरुष मोर्चे पर गए महिलाओं को कारखानों और दफ्तरों में काम करना पड़ा।
🔹 वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव :-
- युद्ध के कारण शक्तिशाली देशों के बीच आर्थिक संबंध टूट गए।
- युद्ध के बाद देशों में बदले की भावना बढ़ गई।
- ब्रिटेन ने अमेरिकी बैंकों व जनता से भारी कर्ज़ लिया।
- परिणाम :- अमेरिका कर्ज़ लेने वाला नहीं बल्कि कर्ज़ देने वाला देश बन गया।
- युद्ध के बाद अमेरिका व उसके नागरिकों की विदेशी संपत्ति का मूल्य अमेरिका में विदेशी सरकारों/नागरिकों की संपत्ति से अधिक हो गया।
प्रथम विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन की आर्थिक हानि और चुनौतियाँ :-
- युद्ध से पहले ब्रिटेन विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था।
- युद्ध के बाद सबसे लंबे संकट का सामना करना पड़ा।
- युद्ध के दौरान भारत और जापान में उद्योगों का विकास हुआ।
- परिणाम :-
- ब्रिटेन के लिए भारतीय बाजार में पुरानी वर्चस्वशाली स्थिति प्राप्त करना मुश्किल हो गया।
- जापान से प्रतिस्पर्धा बढ़ गई।
- युद्ध के खर्चे की भरपाई के लिए ब्रिटेन ने अमेरिका से भारी कर्ज़ लिया।
- युद्ध के अंत तक ब्रिटेन भारी विदेशी कर्ज़ में डूब गया।
प्रथम विश्वयुद्ध के बाद आर्थिक उछाल और उसके बाद की मंदी :-
- युद्ध के दौरान अर्थव्यवस्था में तेज़ उछाल आया—माँग, उत्पादन और रोज़गार बढ़े।
- युद्ध समाप्त होने के बाद माँग घट गई, उत्पादन गिरा और बेरोज़गारी बढ़ गई।
- सरकार ने युद्ध से जुड़े खर्चों में कटौती की।
- इसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में रोज़गार समाप्त हो गए।
- 1921 तक ब्रिटेन में हर पाँच में से एक मज़दूर बेरोज़गार था।
- बेरोज़गारी, असुरक्षा और अनिश्चितता युद्धोत्तर जीवन का स्थायी हिस्सा बन गई।
प्रथम विश्वयुद्ध के बाद कृषि आधारित अर्थव्यवस्थाओं पर संकट (गेहूँ का उदाहरण) :-
युद्ध ने खेती-बाड़ी के वैश्विक संतुलन को भी बिगाड़ दिया:
- युद्ध से पहले :- पूर्वी यूरोप दुनिया को गेहूँ सप्लाई करने वाला सबसे बड़ा केंद्र था।
- युद्ध के दौरान :- पूर्वी यूरोप में सप्लाई ठप्प हुई, तो कनाडा, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में गेहूँ की पैदावार अचानक बढ़ गई।
- युद्ध के बाद :- जब पूर्वी यूरोप में फिर से पैदावार शुरू हुई, तो विश्व बाजार में गेहूँ की अधिक आपूर्ति हो गई।
🔸 परिणाम :- गेहूँ की कीमतें गिर गईं, किसानों की आमदनी कम हो गई और वे भारी कर्ज के जाल में फँस गए।
बृहत उत्पादन :-
🔹 हेनरी फोर्ड और असेंबली लाइन :-
कार निर्माता हेनरी फोर्ड ने शिकागो के एक बूचड़खाने में कन्वेयर बेल्ट की कार्यप्रणाली देखकर अपने कारखाने में ‘असेंबली लाइन’ की शुरुआत की।
🔸 कार्यप्रणाली :-
- हर मज़दूर कार के एक ही पुर्जे को बार-बार मशीनी ढंग से लगाता था।
- काम की गति कन्वेयर बेल्ट की रफ्तार से तय होती थी।
- मज़दूर:
- न रफ्तार कम कर सकता था
- न आराम कर सकता था
- न बातचीत कर सकता था
🔸 परिणाम :- इससे काम की रफ्तार बढ़ गई और समय व पैसे की बचत हुई। फोर्ड के कारखाने से हर 3 मिनट में एक कार (T-Model) तैयार होकर निकलने लगी। टी-मॉडल (Model T) बृहत उत्पादन से बनी पहली कार थी।
🔹 मज़दूरों पर प्रभाव और फोर्ड की प्रतिक्रिया :-
🔸 समस्याएँ :- असेंबली लाइन की तेज रफ्तार और थकान के कारण कई मजदूरों ने काम छोड़ दिया।
🔸 फोर्ड का समाधान (जनवरी 1914) :-
- वेतन दोगुना कर दिया – $5 प्रतिदिन।
- ट्रेड यूनियन गतिविधियों पर पाबंदी लगा दी।
- लागत पूरी करने के लिए असेंबली लाइन की गति बढ़ाई।
महामंदी क्या थी?
आर्थिक महामंदी की शुरुआत 1929 में हुई। इसका असर 1930 के दशक के मध्य तक बना रहा।
🔸 वैश्विक प्रभाव: इस दौरान दुनिया के ज़्यादातर हिस्सों में उत्पादन, रोज़गार, आय, व्यापार में भयानक गिरावट आई।
सबसे बुरा असर कृषि क्षेत्र पर पड़ा – खेतिहर उत्पादों की कीमतों में अधिक गिरावट।
महामंदी के मुख्य कारण :-
मंदी के पीछे दो सबसे बड़े कारण उत्तरदायी थे:
🔸 (1) कृषि में अति-उत्पादन :-
युद्ध के बाद कृषि उत्पादन बहुत बढ़ गया, जिससे कीमतें गिर गईं और किसानों की आय कम हो गई। आय बचाने के लिए किसानों ने और अधिक उत्पादन किया, परिणामस्वरूप बाज़ार में अनाज की भरमार हो गई, खरीदार नहीं मिले और उपज सड़ने लगी। इससे एक दुष्चक्र पैदा हो गया।
🔸 (2) अमेरिकी कर्ज़ और पूँजी का लौटना :-
1920 के दशक में कई देशों ने अमेरिका से कर्ज़ लेकर निवेश किया था। संकट के संकेत मिलते ही अमेरिकी निवेशकों ने पूँजी वापस खींच ली। 1928 के बाद अमेरिकी विदेशी कर्ज़ तेज़ी से घटा, जिससे उस पर निर्भर देशों की अर्थव्यवस्थाएँ संकट में आ गईं।
दुनिया पर महामंदी का असर (वैश्विक प्रभाव) :-
- अमेरिकी पूँजी वापस जाने से पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई।
- यूरोप में कई बड़े बैंक धराशायी हो गए और अनेक देशों की मुद्राओं का अवमूल्यन हुआ।
- ब्रिटेन का पाउंड भी इस संकट से प्रभावित हुआ।
- लैटिन अमेरिका तथा अन्य क्षेत्रों में कृषि और कच्चे मालों की कीमतें तेजी से गिरने लगीं।
- अमेरिकी सरकार ने अपनी अर्थव्यवस्था बचाने के लिए आयात शुल्क दो गुना कर दिया, जिससे विश्व व्यापार पूरी तरह ठप हो गया।
महामंदी का अमेरिका पर सबसे गहरा प्रभाव :-
- कीमतें गिरने और मंदी के डर से अमेरिकी बैंकों ने बैंकों ने कर्ज़ देना बंद कर दिया और पुराने कर्ज़ों की वसूली तेज़ कर दी।
- 1933 तक 4,000 से ज़्यादा बैंक बंद हो चुके थे।
- किसान फसल नहीं बेच पाए, कारोबार बंद हुए।
- जो लोग कार और घर किस्तों पर ले चुके थे, वे कर्ज़ नहीं चुका पाए।
- उनके मकान और गाड़ियाँ कुर्क कर ली गईं।
- करोड़ों लोग बेघर हो गए और काम की तलाश में भटकने लगे।
- 1929 से 1932 के बीच लगभग 1,10,000 कंपनियाँ दिवालिया हो गईं।
महामंदी का भारत पर प्रभाव :-
🔸 भारत पर तत्काल प्रभाव :-
- औपनिवेशिक भारत कृषि उत्पादों का निर्यातक और तैयार मालों का आयातक था, इसलिए मंदी का प्रभाव तुरंत पड़ा।
- 1928–1934 के बीच भारत का आयात–निर्यात लगभग आधा रह गया।
- अंतर्राष्ट्रीय कीमतों में गिरावट के कारण भारत में भी कीमतें गिरीं; गेहूँ की कीमत लगभग 50% घट गई।
🔸 किसानों और काश्तकारों पर सबसे बुरा असर :-
- मंदी का सबसे अधिक असर किसानों और काश्तकारों पर पड़ा, जबकि सरकार ने लगान में कोई छूट नहीं दी।
- विश्व बाज़ार के लिए उत्पादन करने वाले काश्तकार सबसे अधिक प्रभावित हुए।
- बंगाल के जूट (पटसन) उत्पादकों को भारी नुकसान हुआ; कच्चे पटसन की कीमतों में 60% से अधिक गिरावट आई।
- किसानों की बचत समाप्त हो गई, वे कर्ज़ में डूबते गए, ज़मीन गिरवी रखनी पड़ी और गहने बेचने पड़े।
- मंदी के दौरान भारत ने सोने का निर्यात किया, जिससे ब्रिटेन को लाभ हुआ, लेकिन भारतीय किसानों को नहीं।
🔸 राजनीतिक प्रभाव :-
- 1931 में मंदी चरम पर थी और ग्रामीण भारत में असंतोष फैल गया।
- इसी पृष्ठभूमि में महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया।
- आर्थिक संकट ने राजनीतिक आंदोलन को बल दिया।
🔸 शहरी भारत पर प्रभाव :-
- हालाँकि यह मंदी शहरी भारत के लिए उतनी गंभीर नहीं थी।
- निश्चित आय वाले ज़मींदार और वेतनभोगी मध्यम वर्ग अपेक्षाकृत सुरक्षित रहे।
- साथ ही, राष्ट्रवादी दबाव में सीमा शुल्क बढ़ाए गए, जिससे भारतीय उद्योगों को संरक्षण मिला और औद्योगिक निवेश में वृद्धि हुई।
द्वितीय विश्वयुद्ध (1939–1945) :-
प्रथम विश्वयुद्ध के केवल लगभग 20 साल बाद दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हो गया। यह युद्ध 1939 से 1945 तक (6 साल) चला और पूरी दुनिया दो गुटों में बँट गई थी:
- धुरी राष्ट्र: नात्सी जर्मनी, जापान, इटली।
- मित्र राष्ट्र: ब्रिटेन, सोवियत संघ, फ़्रांस, अमेरिका।
🔹 द्वितीय विश्व युद्ध के विनाशकारी परिणाम :-
- यह युद्ध छह वर्ष (1939–1945) तक चला और ज़मीन, हवा और समुद्र—तीनों मोर्चों पर लड़ा गया।
- इस युद्ध में लगभग 6 करोड़ लोगों की मृत्यु हुई, जो 1939 की वैश्विक जनसंख्या का करीब 3% थी।
- पहले के युद्धों की तुलना में इस बार नागरिकों की मृत्यु अधिक हुई।
- यूरोप और एशिया के बड़े हिस्से तबाह हो गए; कई शहर हवाई बमबारी से नष्ट हो गए।
- युद्ध ने भीषण आर्थिक और सामाजिक तबाही पैदा की, जिससे पुनर्निर्माण कठिन और लंबा हो गया।
🔹 युद्ध के बाद द्विध्रुवीय विश्व का निर्माण :-
युद्ध खत्म होने के बाद दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था पर दो महाशक्तियों का कब्ज़ा हो गया:
- संयुक्त राज्य अमेरिका का वर्चस्व :- युद्ध के बाद अमेरिका आर्थिक, राजनीतिक और सैन्य रूप से पश्चिमी दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरा।
- सोवियत संघ (USSR) का उदय :- साथ ही सोवियत संघ भी एक वर्चस्वशाली शक्ति के रूप में सामने आया।
- सोवियत जनता ने जर्मनी को हराने के लिए बहुत बड़ी कुर्बानी दी थी।
- महामंदी के दौर में भी सोवियत संघ ने तेज़ औद्योगीकरण कर खुद को विश्व शक्ति के रूप में स्थापित किया।
👉 इसी विभाजन से शीत युद्ध (Cold War) की पृष्ठभूमि तैयार हुई।
दो महायुद्धों के बाद सीखे गए आर्थिक सबक :-
🔸 1. पहला अहम सबक: व्यापक उपभोग और पूर्ण रोज़गार :-
- दो महायुद्धों के अनुभव से अर्थशास्त्रियों ने सीखा कि बृहत उत्पादन को टिकाए रखने के लिए व्यापक उपभोग ज़रूरी है।
- व्यापक उपभोग के लिए ऊँची और स्थिर आय आवश्यक है, जो पूर्ण रोज़गार से ही संभव है।
सरकार की भूमिका क्यों ज़रूरी मानी गई?
बाज़ार अकेले पूर्ण रोज़गार की गारंटी नहीं दे सकता; इसलिए कीमत, उत्पादन और रोज़गार में उतार-चढ़ाव नियंत्रित करने के लिए सरकारी हस्तक्षेप ज़रूरी माना गया।
🔸 2. दूसरा अहम सबक: सरकारी नियंत्रण :-
दूसरा सबक़ यह था कि पूर्ण रोज़गार के लक्ष्य के लिए सरकार के पास वस्तुओं, पूँजी और श्रम की आवाजाही को नियंत्रित करने की शक्ति होनी चाहिए।
ब्रेटन वुड्स सम्मेलन (जुलाई 1944) :-
- इन उद्देश्यों के साथ जुलाई 1944 में अमेरिका के Bretton Woods में अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक एवं वित्तीय सम्मेलन हुआ।
- सम्मेलन में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की स्थापना विदेश व्यापार के घाटे-लाभ से निपटने के लिए की गई।
- युद्धोत्तर पुनर्निर्माण हेतु विश्व बैंक बनाया गया।
ब्रेटन वुड्स व्यवस्था की कार्यप्रणाली :-
- IMF और विश्व बैंक को ब्रेटन वुड्स संस्थान कहा जाता है; दोनों ने 1947 से काम शुरू किया।
- पश्चिमी नियंत्रण :- इन संस्थानों की निर्णय प्रक्रिया पर पश्चिमी औद्योगिक देशों का प्रभुत्व रहा; United States को वीटो शक्ति प्राप्त थी।
- निश्चित विनिमय दर :- ब्रेटन वुड्स व्यवस्था निश्चित विनिमय दर पर आधारित थी—राष्ट्रीय मुद्राएँ डॉलर से बँधी थीं।
- डॉलर का मूल्य सोने से जुड़ा था: 1 डॉलर = 35 औंस सोना।
ब्रेटन वुड्स व्यवस्था के तहत वैश्विक आर्थिक उछाल (1950–1970) :-
- ब्रेटन वुड्स व्यवस्था ने पश्चिमी औद्योगिक देशों और जापान में तेज़ व्यापार व आय वृद्धि की शुरुआत की।
- 1950–1970 के बीच विश्व व्यापार की वार्षिक वृद्धि दर 8% से अधिक रही।
- इसी अवधि में वैश्विक आय ~5% की दर से बढ़ी और विकास अपेक्षाकृत स्थिर रहा।
- अधिकांश औद्योगिक देशों में बेरोज़गारी औसतन 5% से कम रही।
- इन दशकों में तकनीक और उद्यम का विश्वव्यापी प्रसार हुआ।
- विकासशील देशों ने विकसित देशों की बराबरी के लिए आधुनिक संयंत्रों और उपकरणों में भारी पूँजी निवेश किया।
ब्रेटन वुड्स संस्थानों की भूमिका और सीमाएँ :-
- IMF और विश्व बैंक का गठन औद्योगिक देशों की जरूरतों को पूरा करने के लिए किया गया था।
- ये संस्थान गरीबी और विकास की चुनौतियों से निपटने में अप्रभावी थे।
- 1950 के दशक के अंत में ये संस्थान विकासशील देशों पर अधिक ध्यान देने लगे।
नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO) :-
इन समस्याओं के समाधान के लिए विकासशील देशों ने New International Economic Order की माँग उठाई।
वे Group of 7 (G-7) के रूप में संगठित हुए।
🔹 NIEO के मुख्य लक्ष्य :-
NIEO के अंतर्गत विकासशील देशों की माँगें थीं:
- संसाधनों पर वास्तविक नियंत्रण।
- विकास के लिए अधिक सहायता।
- कच्चे माल के उचित दाम।
- विकसित देशों के बाजारों में तैयार माल की बेहतर पहुँच।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) का पलायन :-
- 1970 के दशक के आखिर से औद्योगिक देशों में बेरोजगारी बढ़ने लगी, जिसके कारण:
- बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपना उत्पादन ऐसे देशों में स्थानांतरित करना शुरू किया जहाँ वेतन कम थे।
- कम मज़दूरी वाले देशों में फैक्ट्री लगाने से उत्पादन की लागत कम हो गई और मुनाफा बढ़ गया।
चीन का उदय और नई आर्थिक नीतियां :-
- 1949 की क्रांति के बाद चीन विश्व अर्थव्यवस्था से कटा हुआ था, लेकिन नई आर्थिक नीतियों के बाद वह बड़ा केंद्र बनकर उभरा।
- चीन में कम वेतन और कम लागत के कारण विदेशी कंपनियों ने वहाँ जमकर निवेश किया। आज दुनिया भर के टीवी, मोबाइल और खिलौने चीन में बनने का यही मुख्य कारण है।
बदलता आर्थिक भूगोल :-
पिछले दो-तीन दशकों में दुनिया का नक्शा पूरी तरह बदल गया है:
- नए आर्थिक केंद्र: भारत, चीन और ब्राजील जैसे देशों में उद्योगों के आने से यहाँ की अर्थव्यवस्थाओं में भारी उछाल आया है।
- पूँजी का प्रवाह: अब व्यापार और पैसा केवल पश्चिम के देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह पूरी दुनिया में फैल चुका है।