NCERT Class 10th Social Science History Notes Chapter 2 भारत में राष्ट्रवाद
इस अध्याय मे हम प्रथम विश्व युद्ध, खिलाफत, असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन, नमक सत्याग्रह, किसानों, श्रमिकों, आदिवासियों के आंदोलन आदि के बारे में विस्तार से पड़ेगे।
भारत में राष्ट्रवाद
भारत में राष्ट्रवाद ( समय के अनुसार एक नजर में ) :-
- 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम
- 1885 में कांग्रेस की स्थापना (बॉम्बे)
- 1905 बंगाल विभाजन + स्वदेशी आंदोलन
- 1906 मुस्लिम लीग की स्थापना
- 1907 कांग्रेस का नरम–गरम दल विभाजन
- 1915 गांधीजी की स्वदेश वापसी
- 1917–18 चंपारण, खेड़ा, अहमदाबाद सत्याग्रह
- 1919 रॉलेट एक्ट व जलियाँवाला बाग
- खिलाफत व असहयोग आंदोलन
- 1922 चौरी-चौरा
- 1925 काकोरी कांड
- 1928 साइमन कमीशन
- 1929 असेम्बली बम कांड
- 1930 दांडी मार्च व सविनय अवज्ञा
- 1931 भगत सिंह–सुखदेव–राजगुरु बलिदान
- 1932 पूना पैक्ट
- 1935 भारत शासन अधिनियम
- 1942 भारत छोड़ो आंदोलन
- 1946 कैबिनेट मिशन
- 15 अगस्त 1947 – भारत स्वतंत्र
राष्ट्रवाद का अर्थ :-
राष्ट्रवाद अपने राष्ट्र के प्रति प्रेम, एकता की भावना तथा समान राष्ट्रीय चेतना को कहते हैं। इसमें लोग समान ऐतिहासिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विरासत साझा करते हैं। कई बार लोग अलग-अलग भाषाई समूहों से संबंधित हो सकते हैं (जैसे भारत), लेकिन राष्ट्र के प्रति प्रेम उन्हें एक सूत्र में बाँधे रखता है।
जबरन भर्ती :-
जबरन भर्ती वह प्रक्रिया थी जिसमें अंग्रेज भारत के लोगों को उनकी इच्छा के विरुद्ध सेना में भर्ती कर लेती थी।
बहिष्कार :-
किसी व्यक्ति, समूह या शासन के साथ संपर्क रखने से इनकार करना या उसकी गतिविधियों में भाग न लेना तथा उसकी वस्तुओं की खरीद और उपयोग से इंकार करना बहिष्कार कहलाता है। यह सामान्यतः विरोध का एक तरीका होता है।
पिकेटिंग :-
पिकेटिंग विरोध या प्रदर्शन का एक ऐसा रूप है जिसमें लोग किसी दुकान, फैक्ट्री या दफ्तर के बाहर खड़े होकर वहाँ जाने का रास्ता रोकते हैं, ताकि लोग अंदर प्रवेश न करें।
बेगार :-
बेगार वह प्रथा थी जिसमें लोगों से बिना किसी पारिश्रमिक के जबरन काम करवाया जाता था।
गिरमिटिया मज़दूर :-
औपनिवेशिक शासन के दौरान बहुत से भारतीयों को काम के लिए फ़िजी, गयाना और वेस्टइंडीज जैसे देशों में ले जाया गया। इन्हें एक अनुबंध के तहत भेजा जाता था, जिसे ये मज़दूर ‘गिरमिट’ कहने लगे। इसी कारण इन्हें गिरमिटिया मज़दूर कहा गया। अंग्रेज़ी में इन्हें Indentured Labour कहा जाता है।
राष्ट्रवाद को जन्म देने वाले कारक :-
- यूरोप में राष्ट्रवाद का विकास मुख्यतः राष्ट्र-राज्यों के उदय से जुड़ा हुआ था।
- भारत और वियतनाम जैसे उपनिवेशों में राष्ट्रवाद का विकास उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों से जुड़ा रहा।
भारत में राष्ट्रवाद और उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष :-
- भारत में राष्ट्रवाद का विकास उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलन से जुड़ा था।
- ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष ने लोगों में एकता की भावना पैदा की।
- उत्पीड़न और दमन के साझा अनुभवों ने अलग-अलग समूहों को आपस में जोड़ा।
- सभी वर्गों पर उपनिवेशवाद का प्रभाव एक जैसा नहीं था।
- इसलिए आज़ादी के मायने भी सभी के लिए अलग-अलग थे।
प्रथम विश्वयुद्ध का भारत पर प्रभाव (1914-1918) :-
प्रथम विश्वयुद्ध ने भारत में एक ऐसी आर्थिक और राजनीतिक स्थिति पैदा कर दी, जिसने राष्ट्रवाद की आग में घी का काम किया। इसके मुख्य प्रभाव निम्नलिखित थे:
🔸 1. आर्थिक प्रभाव (महंगाई और टैक्स) :-
- युद्ध के कारण रक्षा खर्च बहुत बढ़ गया।
- खर्च पूरा करने के लिए करों में वृद्धि हुई, सीमा शुल्क बढ़ाया गया, आयकर शुरू किया गया।
- महँगाई तेज़ी से बढ़ी; 1913 से 1918 के बीच कीमतें लगभग दोगुनी हो गईं।
🔸 2. सामाजिक प्रभाव (जबरन भर्ती और अकाल) :-
- गाँवों से लोगों को जबरन सेना में भर्ती किया गया। इससे किसानों और ग्रामीण जनता में भारी असंतोष फैला।
- 1918–19 और 1920–21 में कई जगह फसलें खराब हो गईं जिससे खाद्य पदार्थों की भारी कमी हो गई।
- इसी समय फ्लू की महामारी फैल गई 1921 की जनगणना के अनुसार अकाल और महामारी से लगभग 120–130 लाख लोग मारे गए
सत्याग्रह का अर्थ :-
सत्य + आग्रह = सत्य पर दृढ़ रहना।
सत्याग्रह सत्य और अहिंसा पर आधारित एक ऐसा नया तरीका था, जिसके माध्यम से जन आंदोलन किया जाता था।
सत्याग्रह के मुख्य सिद्धांत :-
- सत्य की शक्ति पर विश्वास।
- अहिंसा पर आधारित संघर्ष।
- अन्याय के खिलाफ लड़ाई में शारीरिक बल का प्रयोग नहीं।
- प्रतिशोध और आक्रामकता से दूरी।
- अंततः सत्य की जीत होती है।
महात्मा गांधी के सत्याग्रह का अर्थ :-
सत्याग्रह सत्य की शक्ति पर आधारित था।
गांधीजी का मानना था कि यदि कोई व्यक्ति सही उद्देश्य के लिए संघर्ष कर रहा है, तो उसे अत्याचार करने वाले से लड़ने के लिए शारीरिक बल की आवश्यकता नहीं होती।
अहिंसा के माध्यम से सत्याग्रही नैतिक बल का उपयोग करके अन्याय के विरुद्ध संघर्ष कर सकता है और अंततः विजय प्राप्त कर सकता है।
सत्याग्रह की कार्य-पद्धति :-
अगर आपका उद्देश्य सच्चा है, यदि आपका संघर्ष अन्याय के खिलाफ है तो उत्पीड़क से लड़ने के लिए किसी शारीरिक बल की आवश्यकता नहीं है।
सत्याग्रही केवल अहिंसा के सहारे बिना किसी प्रतिशोध की भावना या आक्रमकता का सहारा लिए बिना भी सफल हो सकता है। उत्पीड़क की चेतना को झिझोड़कर उसे सच्चाई को स्वीकार करने तथा दमन का अंत करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।
भारत में प्रारंभिक सत्याग्रह आंदोलन :-
🔸 गांधीजी की वापसी :- महात्मा गांधी जनवरी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने ‘नस्लभेदी सरकार’ (काले-गोरे का भेदभाव) के खिलाफ सफलतापूर्वक आंदोलन चलाया था।
🔹 गांधीजी के शुरुआती तीन सफल सत्याग्रह (1917-1918) :-
भारत आने के बाद गांधीजी ने ज़मीनी हकीकत समझने के लिए देश का दौरा किया और तीन प्रमुख स्थानीय आंदोलनों का नेतृत्व किया:
| साल | स्थान | मुद्दा | परिणाम/उद्देश्य |
|---|---|---|---|
| 1917 | चंपारन (बिहार) | नील की खेती करने वाले किसानों का दमनकारी बागान व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष | किसानों को संगठित किया; ब्रिटिश सरकार को जाँच समिति बनाने पर मजबूर किया। |
| 1917 | खेड़ा (गुजरात) | फसल खराब + प्लेग के कारण किसान लगान नहीं दे पा रहे थे | लगान माफी की माँग; अंततः सरकार ने राहत दी। |
| 1918 | अहमदाबाद (गुजरात) | कपड़ा मिल मजदूरों की मजदूरी और काम की स्थिति का मुद्दा | मजदूरों की हड़ताल का नेतृत्व किया; मालिकों से समझौता कराया। |
सत्याग्रह आंदोलनों का महत्व :-
- गांधीजी ने स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा।
- आम लोगों (किसान, मजदूर) को संघर्ष में सीधे शामिल किया।
- सत्याग्रह की व्यावहारिक परीक्षण हुई और जनता में गांधीजी का विश्वास बढ़ा।
रॉलट एक्ट (1919) :-
1919 में ब्रिटिश सरकार ने रॉलट एक्ट प्रस्तावित किया। भारतीय सदस्यों के कड़े विरोध के बावजूद इसे इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल ने जल्दबाजी में पारित कर दिया।
🔸 रॉलट एक्ट का मुख्य प्रावधान :- राजनीतिक कैदियों को बिना मुकदमा चलाए दो साल तक जेल में बंद रखने का प्रावधान।
🔸 रॉलट एक्ट का उद्देश्य :- भारत में राजनीतिक गतिविधियों का दमन करने के लिए।
🔸रॉलट एक्ट अन्यायपूर्ण क्यों था :-
- भारतीयों की नागरिक आजादी पर प्रहार किया ।
- भारतीय सदस्यों की सहमति के बगैर पास किया गया ।
🔹 रॉलट एक्ट के परिणाम :-
🔸 गांधीजी की प्रतिक्रिया: गांधीजी ने इसे ‘अन्यायपूर्ण’ माना और 6 अप्रैल 1919 को एक राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान किया।
- विभिन्न शहरों में रैली जुलूसों का आयोजन किया गया।
- रेलवे वर्कशॉप्स में कामगार हड़ताल पर चले गए।
- दुकानें बंद हो गईं।
🔹 अंग्रेजों की प्रतिक्रिया :-
इससे अंग्रेज सरकार चिंतित हो गई, क्योंकि संचार व्यवस्था (रेलवे, टेलीग्राफ) ठप होने की आशंका थी। अंग्रेजों ने राष्ट्रवादियों पर दमन शुरू कर दिया।
🔸 सरकारी दमन और अमृतसर की घटनाएँ :-
- अमृतसर में बहुत सारे स्थानीय नेताओं को हिरासत में ले लिया गया।
- गांधीजी के दिल्ली में प्रवेश करने पर पाबंदी लगा दी गई।
- 10 अप्रैल 1919 को अमृतसर में एक शांतिपूर्ण जुलूस पर पुलिस ने गोली चला दी।
- 👉 इसके बाद जनता में गुस्सा भड़क उठा और:
- बैंकों, डाकघरों और रेलवे स्टेशनों पर हमले हुए।
- सरकार ने मार्शल लॉ लागू कर दिया।
- जनरल डायर ने अमृतसर की कमान संभाली।
जलियाँवाला बाग हत्याकांड (13 अप्रैल 1919) :-
- स्थान :- जलियाँवाला बाग, अमृतसर
- दिन :- 13 अप्रैल (वैसाखी का दिन)
- घटना :- अमृतसर में मार्शल लॉ लागू था। 13 अप्रैल को लोग वैसाखी मेले में शामिल होने और दमनकारी कानूनों का विरोध करने के लिए जमा हुए थे। यह मैदान चारों तरफ से बंद था।
- शहर से बाहर होने के कारण लोगों को मार्शल लॉ की जानकारी नहीं थी।
- जनरल डायर हथियारबंद सैनिकों के साथ वहां पहुँचा।
- जनरल डायर ने बाहर निकलने के सारे रास्ते बंद कर दिए और भीड़ पर अंधाधुंध गोलियाँ चलवा दीं।
- परिणाम :- सैकड़ों निर्दोष लोग मारे गए।
- कारण :- डायर ने कहा कि वह सत्याग्रहियों के जहन में दहशत और विस्मय का भाव पैदा करके ‘एक नैतिक प्रभाव’ उत्पन्न करना चाहता था।
जलियावाला बाग हत्याकांड का प्रभाव :-
🔹 हत्याकांड के बाद की स्थिति :-
जैसे-जैसे जलियाँवाला बाग की खबर फैली, उत्तर भारत के बहुत सारे शहरों में लोग सड़कों पर उतरने लगे। हड़तालें होने लगीं, लोग पुलिस से मोर्चा लेने लगे और सरकारी इमारतों पर हमला करने लगे।
🔹 सरकार का दमन :-
- सरकार ने इन कार्रवाइयों को निर्ममता से कुचलने का रास्ता अपनाया। सरकार द्वारा:
- लोगों को अपमानित किया गया।
- नाक रगड़ने और सड़क पर घिसटकर चलने को मजबूर किया गया।
- कोड़े मारे गए।
- गुजराँवाला (पंजाब) जैसे गाँवों पर बमबारी की गई।
🔸 गांधीजी ने आंदोलन वापस लिया :- हिंसा फैलते देख अप्रैल 1919 में आंदोलन समाप्त किया।
खिलाफत आंदोलन :-
पहले विश्वयुद्ध में ऑटोमन तुर्की की हार हो चुकी थी। इस आशय की अफवाहें फैली हुई थीं कि इस्लामिक विश्व के आध्यात्मिक नेता (खलीफ़ा) ऑटोमन सम्राट पर एक बहुत सख्त शांति संधि थोपी जाएगी।
खलीफा की तात्कालिक शक्तियों की रक्षा के लिए मार्च 1919 में बंबई में एक खिलाफत समिति का गठन किया गया था।
मोहम्मद अली और शौकत अली बंधुओं के साथ-साथ कई युवा मुस्लिम नेताओं ने इस मुद्दे पर संयुक्त जनकार्रवाई की संभावना तलाशने के लिए महात्मा गांधी के साथ चर्चा शुरू कर दी थी।
महात्मा गांधी ने खिलाफ़त का मुद्दा क्यों उठाया?
- रॉलेट सत्याग्रह की असफलता के बाद महात्मा गांधी एक अखिल भारतीय जन-आंदोलन खड़ा करना चाहते थे।
- उनका मानना था कि हिंदू–मुस्लिम एकता के बिना ऐसा आंदोलन संभव नहीं है।
- इसलिए उन्होंने खिलाफ़त आंदोलन का समर्थन किया, ताकि दोनों समुदायों को एक साझा मंच पर लाया जा सके।
असहयोग आंदोलन :-
कलकत्ता अधिवेशन (सितंबर 1920) :- गांधीजी ने कांग्रेस के अन्य नेताओं को मना लिया कि खिलाफत आंदोलन के समर्थन और स्वराज के लिए एक असहयोग आंदोलन शुरू किया जाना चाहिए।
🔹 असहयोग ही क्यों?
🔸 गांधीजी का तर्क :- महात्मा गांधी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक हिंद स्वराज (1909) में कहा कि भारत में ब्रिटिश शासन भारतीयों के सहयोग से ही स्थापित हुआ और उसी सहयोग से चल भी रहा है।
🔸 मूल विचार :- गांधीजी का विश्वास था कि अगर भारतीय अपना सहयोग वापस ले लें, तो एक साल के भीतर ब्रिटिश शासन ढह सकता है और स्वराज की स्थापना हो सकती है।
🔹 असहयोग आंदोलन की रणनीति :-
गांधीजी ने कहा कि असहयोग आंदोलन को चरणबद्ध तरीके से चलाया जाना चाहिए।
🔸 बहिष्कार के कदम :- सबसे पहले लोगों को सरकार द्वारा दी गई पदवियाँ लौटा देनी चाहिए और सरकारी नौकरियों, सेना, पुलिस, अदालतों, विधायी परिषदों, स्कूलों और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना चाहिए।
🔸 अगला कदम :- अगर सरकार दमन का रास्ता अपनाती है तो व्यापक सविनय अवज्ञा अभियान भी शुरू किया जाए।
👉 उद्देश्य था बिना हिंसा के ब्रिटिश शासन की नींव को कमजोर करना।
🔹 आंदोलन के लिए जनसमर्थन जुटाना :-
1920 की गर्मियों में गांधीजी और शौकत अली ने देशभर में यात्राएँ करके लोगों को समझाया और समर्थन माँगा।
🔹 असहयोग आंदोलन पर कांग्रेस में मतभेद :-
- कांग्रेस के कई नेता आंदोलन को लेकर सशंकित थे।
- कुछ नेता नवंबर 1920 के विधायी परिषद चुनावों के बहिष्कार के पक्ष में नहीं थे।
- उन्हें डर था कि आंदोलन से भीड़ हिंसक हो सकती है।
- सितंबर से दिसंबर 1920 तक कांग्रेस में समर्थकों और विरोधियों के बीच खींचतान चलती रही।
- अंततः दिसंबर 1920 के नागपुर अधिवेशन में असहयोग आंदोलन को आधिकारिक मंजूरी दे दी गई।
असहयोग–ख़िलाफ़त आंदोलन (जनवरी 1921) :-
आंदोलन जनवरी 1921 में शुरू हुआ। विभिन्न सामाजिक समूहों ने भाग लिया, पर प्रत्येक के स्वराज के अर्थ अलग-अलग थे।
शहरों में असहयोग–ख़िलाफ़त आंदोलन :-
आंदोलन की शुरुआत शहरी मध्यवर्ग की हिस्सेदारी के साथ हुई।
🔸 सामाजिक प्रभाव :-
- हजारों विद्यार्थियों ने स्कूल-कॉलेज छोड़ दिए।
- हेडमास्टरों और शिक्षकों ने इस्तीफे सौंप दिए।
- वकीलों ने मुक़दमे लड़ना बंद कर दिया।
- ज्यादातर प्रांतों में परिषद् चुनावों का बहिष्कार किया गया।
🔸 आर्थिक प्रभाव :-
असहयोग का सबसे बड़ा असर व्यापार पर दिखा, मुख्य गतिविधियाँ :-
- विदेशी सामानों का बहिष्कार
- शराब की दुकानों की पिकेटिंग
- विदेशी कपड़ों की होली जलाना
🔸 परिणाम :- 1921 से 1922 के बीच विदेशी कपड़ों का आयात आधा रह गया था। उसकी कीमत 102 करोड़ से घटकर 57 करोड़ रह गई।
🔸 स्वदेशी को बढ़ावा :-
- लोगों ने भारतीय कपड़े पहनना शुरू किया।
- भारतीय कपड़ा मिलों और हथकरघा उद्योग का उत्पादन बढ़ा।
शहरों में असहयोग आंदोलन का धीमा पड़ना :-
शुरुआती जोश के बाद शहरों में आंदोलन फीका पड़ने लगा, जिसके मुख्य कारण निम्नलिखित थे:
🔸 खादी की महंगाई :-
- खादी का कपड़ा मिलों में बने कपड़ों की तुलना में महँगा था।
- ग़रीब लोग लंबे समय तक मिल के कपड़ों का बहिष्कार नहीं कर सकते थे।
🔸 वैकल्पिक संस्थानों की कमी :-
- ब्रिटिश संस्थानों के बहिष्कार से व्यवहारिक कठिनाइयाँ पैदा हुईं।
- ब्रिटिश संस्थानों के स्थान पर वैकल्पिक भारतीय संस्थानों की स्थापना आवश्यक थी।
- वैकल्पिक संस्थानों की स्थापना की प्रक्रिया बहुत धीमी थी।
परिणामस्वरूप छात्र और शिक्षक वापस सरकारी स्कूलों में लौटने लगे। वकील भी दोबारा सरकारी अदालतों में काम करने लगे।
ग्रामीण इलाकों में विद्रोह (असहयोग आंदोलन) :-
असहयोग आंदोलन जब गांवों में पहुँचा, तो इसमें किसानों और आदिवासियों के अपने स्थानीय मुद्दे जुड़ गए।
🔹 A. अवध का किसान आंदोलन (उत्तर प्रदेश) :-
🔸 नेतृत्व :- संन्यासी बाबा रामचंद्र (जो पहले फिजी में गिरमिटिया मजदूर थे)।
🔸 विरोधी :- उनका आंदोलन तालुक़दारों और जमींदारों के खिलाफ था
🔸 मुद्दे :-
- ज़मींदारों/तालुकदारों द्वारा भारी लगान और विविध कर।
- बेगार (बिना पगार के ज़मींदारों के यहाँ काम करना।)।
- पट्टे की असुरक्षा: किसानों को उनकी ज़मीन से बार-बार हटा दिया जाता था ताकि वे उस पर अपना हक न जता सकें।
🔸 माँगें :-
- किसानों की माँग थी कि लगान कम किया जाए, बेगार खत्म हो और दमनकारी जमींदारों का सामाजिक बहिष्कार किया जाए।
- नाई-धोबी की सेवाओं से जमींदारों को वंचित करना (पंचायतों द्वारा नाई-धोबी बंद)।
🔸 अवध किसान सभा संगठन :-
- जून 1920: जवाहरलाल नेहरू ने गाँवों का दौरा किया।
- अक्टूबर 1920: अक्तूबर तक जवाहर लाल नेहरू, बाबा रामचंद्र तथा कुछ अन्य लोगों के नेतृत्व में अवध किसान सभा का गठन कर लिया गया।
- एक महीने में 300 से अधिक शाखाएँ बनीं।
🔸 असहयोग आंदोलन से जुड़ाव :-
- 1921 में कांग्रेस ने इस संघर्ष को असहयोग आंदोलन में शामिल करने की कोशिश की।
- परंतु आंदोलन का रूप बदलने लगा:
- ज़मींदारों/व्यापारियों के घरों पर हमले।
- बाजारों में लूट, अनाज के गोदामों पर कब्जा।
- स्थानीय नेताओं ने गांधीजी के नाम पर झूठा प्रचार किया कि “लगान माफ, ज़मीन गरीबों में बाँटी जाएगी।”
🔹 B. आदिवासी क्षेत्रों में गुरिल्ला आंदोलन (गूडेम पहाड़ियाँ) :-
🔸 समस्या :- अंग्रेज सरकार ने आदिवासियों को जंगलों में घुसने, पशु चराने और लकड़ी इकट्ठा करने से रोक दिया था। साथ ही, उनसे सड़क निर्माण के लिए बेगार (मुफ्त श्रम) कराया जा रहा था।
🔸 नेतृत्व :- अल्लूरी सीताराम राजू
🔸 गांधीजी से प्रेरणा पर विचित्र मिश्रण :-
- राजू गांधीजी की प्रशंसा करते थे और खादी पहनने, शराब छोड़ने को प्रोत्साहित करते थे।
- परंतु उनका मानना था: “स्वराज केवल बल प्रयोग (हिंसा) से ही मिल सकता है, अहिंसा से नहीं।”
🔸 तरीका :- आदिवासियों ने गुरिल्ला युद्ध (छिपकर हमला करना) अपनाया और पुलिस थानों पर हमले किए।
🔸 अंत: 1924 में राजू को फाँसी दी गई, पर वे लोकनायक बन गए।
🔸 नोट :- कांग्रेस ने अहिंसा के सिद्धांत पर कायम रहना चाहा। किसान हिंसा और गुरिल्ला युद्ध को स्वीकार नहीं किया।
असहयोग आंदोलन की समाप्ति :-
फरवरी 1922 में महात्मा गांधी ने आंदोलन वापस ले लिया क्योंकि चौरी चौरा में हिंसक घटना हो गई थी ।
चौरी–चौरा की घटना :-
- फरवरी 1922 में उत्तर प्रदेश के चौरी–चौरा कस्बे में एक हिंसक घटना घटी।
- असहयोग आंदोलन के दौरान प्रदर्शन कर रही भीड़ पर पुलिस ने गोली चलाई।
- इस घटना में भीड़ ने पुलिस थाने को जला दिया, जिससे कई पुलिसकर्मियों की मृत्यु हो गई।
- महात्मा गांधी अहिंसा के पक्षधर थे और वे आंदोलन को हिंसक नहीं होने देना चाहते थे।
- गांधीजी को लगा कि आंदोलन गलत दिशा में जा रहा है।
- इसलिए उन्होंने 1922 में असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया।
साइमन कमीशन (1927) और उसका विरोध :-
- 1927 में ब्रिटिश सरकार ने भारत के संवैधानिक सुधारों की जाँच के लिए साइमन कमीशन नियुक्त किया।
- इस कमीशन में कोई भी भारतीय सदस्य नहीं था, जिससे भारतीयों में रोष फैल गया।
- पूरे देश में “साइमन वापस जाओ” के नारे लगाए गए।
- कांग्रेस, मुस्लिम लीग और अन्य दलों ने इसका एकजुट होकर विरोध किया।
लाहौर अधिवेशन और पूर्ण स्वराज :-
- दिसंबर 1929 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन हुआ।
- इस अधिवेशन की अध्यक्षता जवाहरलाल नेहरू ने की।
- जहां पूर्ण स्वराज की माँग को औपचारिक रूप से स्वीकार किया गया।
- तय हुआ कि 26 जनवरी 1930 स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाएगा।
- लोगों ने पूर्ण स्वराज के लिए संघर्ष की शपथ ली।
- इसी निर्णय के बाद आगे चलकर सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ।
नमक यात्रा (दांडी मार्च) :-
🔹 नमक ही क्यों?
महात्मा गांधी ने देश को एकजुट करने के लिए नमक को चुना।
🔸 कारण :- नमक अमीर-गरीब सभी इस्तेमाल करते थे। यह भोजन का अनिवार्य हिस्सा था। नमक पर कर और उत्पादन पर सरकारी एकाधिकार को गांधीजी ने ब्रिटिश शासन का सबसे दमनकारी पहलू बताया।
🔸 अल्टीमेटम :- गांधीजी ने वायसराय इरविन को 11 मांगों वाला पत्र भेजा और 11 मार्च तक का समय दिया। मांगे न मानने पर सविनय अवज्ञा की चेतावनी दी।
🔹 दांडी मार्च :-
- 12 मार्च 1930 को महात्मा गांधी ने साबरमती आश्रम से दांडी मार्च शुरू किया।
- महात्मा गांधी ने अपने 78 विश्वस्त वॉलंटियरों के साथ नमक यात्रा शुरू कर दी।
- गांधीजी ने लगभग 240 मील (लगभग 390 किमी) की यात्रा पैदल तय की।
- गांधीजी की टोली ने 24 दिन तक हर रोज लगभग 10 मील का सफ़र तय किया।
- 6 अप्रैल 1930 को दांडी पहुँचकर उन्होंने नमक बनाकर कानून तोड़ा।
- इसके साथ ही सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत हुई।
सविनय अवज्ञा आंदोलन :-
- 1930 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ।
- इसका आरंभ दांडी मार्च और नमक कानून तोड़ने से हुआ।
- इस आंदोलन का उद्देश्य अन्यायपूर्ण ब्रिटिश कानूनों का शांतिपूर्ण उल्लंघन करना था।
- लोगों ने नमक बनाया, कर नहीं दिए और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया।
- महिलाओं, किसानों और मजदूरों ने बड़ी संख्या में भाग लिया।
- ब्रिटिश सरकार ने आंदोलनकारियों पर दमनकारी कार्रवाई की और कई नेताओं को जेल में डाला।
- 1931 के गांधी–इरविन समझौते के बाद आंदोलन को अस्थायी रूप से वापस ले लिया गया।
सविनय अवज्ञा आंदोलन की मुख्य घटनाएं :-
- देश के विभिन्न हिस्से में नमक कानून का उल्लंघन किया गया।
- आंदोलन फैला तो विदेशी कपड़ों का बहिष्कार किया जाने लगा।
- शराब की दुकानों की पिकेटिंग होने लगी।
- किसानों ने लगान और चौकीदारी कर चुकाने से इनकार कर दिया।
- गाँवों में तैनात कर्मचारी इस्तीफ़े देने लगे।
- बहुत सारे स्थानों पर जंगलों में रहने वाले वन क़ानूनों का उल्लंघन करने लगे।
- वे लकड़ी बीनने और मवेशियों को चराने के लिए आरक्षित वनों में घुसने लगे।
सविनय अवज्ञा आंदोलन में ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया :-
- ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए दमनकारी कदम उठाए।
- महात्मा गांधी सहित कई प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।
- शांतिपूर्ण सत्याग्रहियों पर हमले किए गए।
- महिलाओं और बच्चों को पीटा गया।
- लगभग 1 लाख लोगों को गिरफ्तार किया गया।
गांधी–इरविन समझौता (1931) :-
- यह समझौता मार्च 1931 में महात्मा गांधी और वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच हुआ।
- इस समझौते के तहत सविनय अवज्ञा आंदोलन को वापस ले लिया गया।
- सरकार ने राजनीतिक कैदियों को रिहा करने पर सहमति दी।
- इसके बदले गांधीजी ने द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने पर सहमति दी।
- दिसंबर 1931 में गांधीजी लंदन गए लेकिन वार्ता असफल रही।
सविनय अवज्ञा आंदोलन का दोबारा आरंभ और अंत :-
- भारत लौटने पर गांधीजी ने पाया कि सरकार ने नए सिरे से दमन शुरू कर दिया है।
- गफ्फार खान और जवाहरलाल नेहरू, दोनों जेल में थे।
- कांग्रेस को गैरक़ानूनी घोषित कर दिया गया था।
- सभाओं, प्रदर्शनों और बहिष्कार जैसी गतिविधियों को रोकने के लिए सख्त क़दम उठाए जा रहे थे।
- भारी आशंकाओं के बीच महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन दोबारा शुरू कर दिया।
- साल भर तक आंदोलन चला लेकिन 1934 तक आते-आते उसकी गति मंद पड़ने लगी थी।
सविनय अवज्ञा आंदोलन में विभिन्न सामाजिक वर्गों की भूमिका :-
- अमीर किसान – ऊँचे लगान और गिरती फसल कीमतों के विरोध में आंदोलन में सक्रिय रहे।
- गरीब किसान – ऊँचे लगान और ज़मींदारों को दिए जाने वाले भाड़े (किराए) के खिलाफ संघर्ष किया।
- व्यवसायी वर्ग – औपनिवेशिक व्यावसायिक नीतियों, विदेशी वस्तुओं के आयात और सरकारी नियंत्रण के विरोध में आंदोलन का समर्थन किया।
- महिलाएँ – महात्मा गांधी से प्रेरित होकर जुलूसों, पिकेटिंग और नमक सत्याग्रह में भाग लिया।
- मज़दूर वर्ग (कुछ स्थानों पर) – विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार को कम वेतन और खराब कार्यस्थितियों के विरोध से जोड़ा।
सविनय अवज्ञा आंदोलन असहयोग आंदोलन से कैसे अलग था :-
- असहयोग आंदोलन में लोगों ने केवल ब्रिटिश संस्थानों और वस्तुओं का बहिष्कार किया,
- जबकि सविनय अवज्ञा आंदोलन में अन्यायपूर्ण कानूनों को तोड़ा गया।
- असहयोग आंदोलन में लोग कानून का पालन करते हुए सहयोग नहीं करते थे,
- जबकि सविनय अवज्ञा आंदोलन में लोग जानबूझकर कानून का उल्लंघन करते थे (जैसे नमक कानून)।
- असहयोग आंदोलन में सरकारी स्कूल, कॉलेज, अदालतें छोड़ी गईं,
- जबकि सविनय अवज्ञा आंदोलन में कर न देना, नमक बनाना, जंगल कानून तोड़ना शामिल था।
- सविनय अवज्ञा आंदोलन में ग्रामीण जनता, किसान और महिलाएँ अधिक संख्या में शामिल हुईं।
सविनय अवज्ञा आंदोलन की सीमाएँ :-
अनुसूचित वर्ग की भागीदारी नहीं थी क्योंकि लंबे समय से कांग्रेस इनके हितों की अनदेखी कर रही थी।
मुस्लिम संगठनो द्वारा सविनय अवज्ञा के प्रति कोई खास उत्साह नही था क्योंकि 1920 के दशक में कई स्थानों पर हिंदू–मुस्लिम दंगे हुए। प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर कांग्रेस और मुस्लिम लीग में मतभेद बने रहे।
दोनो समुदायो के बीच संदेह और अविश्वास का माहौल बना हुआ था।
डॉ. अंबेडकर और पूना पैक्ट :-
- सभी सामाजिक समूह स्वराज की अमूर्त अवधारणा से समान रूप से प्रभावित नहीं थे।
- 1930 के बाद ‘अछूत’ समुदाय ने स्वयं को दलित या उत्पीड़ित वर्ग कहना शुरू किया।
- डॉ. भीमराव अंबेडकर ने 1930 में दलितों को दमित वर्ग एसोसिएशन के अंतर्गत संगठित किया।
- वे दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्रों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की माँग कर रहे थे।
- दूसरे गोलमेज सम्मेलन में इस मुद्दे पर उनका महात्मा गांधी से मतभेद हुआ।
- ब्रिटिश सरकार द्वारा अलग निर्वाचन क्षेत्र की माँग मान लेने पर गांधीजी ने आमरण अनशन शुरू कर दिया।
- गांधीजी का मानना था कि इससे समाज में दलितों का एकीकरण रुक जाएगा।
- अंततः सितंबर 1932 में पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर हुए।
इस समझौते के तहत दलितों (बाद में अनुसूचित जाति) को विधायी परिषदों में आरक्षित सीटें दी गईं, लेकिन अलग निर्वाचन क्षेत्र नहीं बनाए गए।
सामूहिक अपनेपन का भाव :-
वे कारक जिन्होंने भारतीय लोगों में सामूहिक अपनेपन की भावना को जगाया और सभी भारतीयों को एक किया—
🔸 1. चित्र और प्रतीक :-
- भारत माता की पहली प्रसिद्ध छवि अवनीन्द्रनाथ टैगोर ने 1905 में बनाई।
- इस छवि ने राष्ट्र को माँ के रूप में प्रस्तुत किया और लोगों में भावनात्मक जुड़ाव पैदा किया।
🔸 2. लोक कथाएँ :-
- राष्ट्रवादियों ने गाँव-गाँव घूमकर लोक कथाओं और लोकगीतों का संकलन किया।
- इन कथाओं ने भारत की परंपरागत संस्कृति को उजागर किया।
- इससे लोगों में राष्ट्रीय पहचान और अतीत के गौरव की भावना पैदा हुई।
🔸 3. राष्ट्रीय चिन्ह (झंडा) :-
- 1905 के स्वदेशी आंदोलन के दौरान बंगाल में पहला तिरंगा प्रयोग में आया।
- इसमें हरा, पीला और लाल रंग थे तथा 8 कमल बने थे।
- 1921 में महात्मा गांधी ने सफेद, हरा और लाल रंग का तिरंगा तैयार किया, जिसके बीच चरखा था।
🔸 4. इतिहास की पुनर्व्याख्या :-
- भारतीयों ने महसूस किया कि राष्ट्र के प्रति गर्व जगाने के लिए
- भारतीय इतिहास को औपनिवेशिक दृष्टि से अलग ढंग से पढ़ाया जाना चाहिए।
- इससे भारत के प्राचीन गौरव और उपलब्धियों पर ज़ोर दिया गया।
🔸 5. राष्ट्रवादी गीत – ‘वंदे मातरम्’ :-
- 1870 के दशक में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने ‘वंदे मातरम्’ की रचना की।
- यह गीत मातृभूमि की स्तुति करता था।
- बंगाल के स्वदेशी आंदोलन में यह गीत व्यापक रूप से गाया गया।