इस अध्याय मे हम राजनीतिक दल, राजनीतिक दल के कार्य, लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका, दलीय व्यवस्थाएँ, गठबंधन की सरकार, क्षेत्रीय दल, राष्ट्रीय दल आदि के बारे में विस्तार से पड़ेगे।
राजनीतिक दल
राजनीतिक दल :-
राजनीतिक दल लोगों का एक संगठित समूह होता है, जो चुनाव लड़ने और सरकार में राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने के उद्देश्य से कार्य करता है।
🔸 सरल शब्दों में :- राजनीतिक दल वे समूह हैं जो देश को चलाने के लिए चुनाव के माध्यम से सत्ता प्राप्त करना चाहते हैं।
🔸 कार्य :- समाज के सामूहिक हित को ध्यान में रखते हुए कुछ खास नीतियाँ और कार्यक्रम बनाता है।
किसी राजनीतिक दल की पहचान कैसे तय होती है?
किसी भी राजनीतिक दल की पहचान दो चीजों से होती है:
- उसकी नीतियाँ: वह किन मुद्दों पर बात करता है और क्या वादे करता है।
- उसका सामाजिक आधार: उसे किन वर्गों या समुदायों के लोगों का समर्थन प्राप्त है।
राजनीतिक दल के मुख्य अंग :-
किसी भी राजनीतिक दल को चलाने के लिए ये तीन हिस्से सबसे महत्वपूर्ण होते हैं:
- नेता – जो दल का मार्गदर्शन करते हैं और निर्णय लेते हैं।
- सक्रिय सदस्य – जो दल की गतिविधियों में भाग लेते हैं और संगठन को मजबूत करते हैं।
- अनुयायी / समर्थक – जो दल की नीतियों का समर्थन करते हैं और चुनावों में मदद करते हैं।
राजनीतिक दलों के कार्य :-
राजनीतिक दल लोकतंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनके मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं:
🔸 (i) चुनाव लड़ना :- राजनीतिक दल चुनावों में उम्मीदवार खड़े करते हैं। विभिन्न देशों में उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया अलग-अलग होती है।
🔸 (ii) नीतियाँ और कार्यक्रम बनाना :- दल अपनी नीतियाँ और कार्यक्रम जनता के सामने रखते हैं, जिनके आधार पर मतदाता निर्णय लेते हैं।
🔸 (iii) सरकार बनाना और चलाना :- बहुमत प्राप्त दल सरकार बनाते हैं और अपने कार्यक्रमों के अनुसार शासन चलाते हैं।
🔸 (iv) कानून निर्माण में भूमिका :- दल विधायिका में कानून बनाने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। अधिकतर सदस्य दल के निर्देशों का पालन करते हैं।
🔸 (v) विपक्ष की भूमिका :- चुनाव हारने वाले दल सरकार की नीतियों की आलोचना करते हैं और जनता के मुद्दे उठाते हैं।
🔸 (vi) जनमत निर्माण :- दल विभिन्न मुद्दों पर बहस कर जनता को जागरूक करते हैं और जनमत तैयार करते हैं।
🔸 (vii) जनता और सरकार के बीच कड़ी :- दल जनता की समस्याओं को सरकार तक पहुँचाते हैं और सरकारी योजनाओं की जानकारी देते हैं।
लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका के रूप में राजनीतिक दल :-
चुनाव हारने वाले दल विपक्ष की भूमिका निभाते हैं।
🔸 विपक्ष के कार्य :-
- सरकार की गलत नीतियों और असफलताओं की आलोचना करना।
- सरकार के सामने अपनी अलग राय और वैकल्पिक नीतियाँ रखना।
- सरकार के खिलाफ जनता को जागरूक और संगठित करना।
- यह जाँच करना कि सरकार लोकतांत्रिक तरीके से काम कर रही है या नहीं।
कानून निर्माण में राजनीतिक दलों की भूमिका :-
देश के लिए कानून बनाना संसद या विधानसभा का काम है, लेकिन इसमें राजनीतिक दलों की निर्णायक भूमिका होती है।
🔸 क्यों? क्योंकि विधायिका (संसद/विधानसभा) के अधिकतर सदस्य किसी न किसी राजनीतिक दल से होते हैं।
ये सदस्य अक्सर अपने दल के नेता के निर्देश पर ही कानूनों के पक्ष या विपक्ष में वोट करते हैं। इस तरह दल ही तय करते हैं कि कौन-सा कानून बनेगा और कैसे बनेगा।
हमें राजनीतिक दलों की ज़रूरत क्यों है?
आधुनिक लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की आवश्यकता :-
- राजनीतिक दलों के बिना आधुनिक लोकतंत्र सही ढंग से कार्य नहीं कर सकता।
- यदि राजनीतिक दल न हों, तो सभी उम्मीदवार निर्दलीय होंगे और कोई भी बड़े नीतिगत मुद्दों पर स्पष्ट चुनावी वादे नहीं कर पाएगा।
- ऐसी स्थिति में सरकार तो बन जाएगी, लेकिन वह मजबूत और उत्तरदायी नहीं होगी।
- निर्वाचित प्रतिनिधि केवल अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों तक सीमित रहेंगे और राष्ट्रीय स्तर पर कोई स्पष्ट नीति नहीं बनेगी।
- राजनीतिक दल बड़े और जटिल समाजों में विभिन्न विचारों और हितों को संगठित करने का कार्य करते हैं।
- दल प्रतिनिधियों को एकजुट कर सरकार बनाने, नीतियाँ तय करने और सरकार पर नियंत्रण रखने में मदद करते हैं।
- इस प्रकार राजनीतिक दल लोकतंत्र के सुचारु संचालन के लिए आवश्यक हैं।
लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की ज़रूरी भूमिकाएँ :-
राजनीतिक दल लोकतंत्र में कई महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाते हैं:
- विभिन्न विचारों को एक मंच पर लाते हैं – समाज के अलग-अलग विचारों और हितों को संगठित करते हैं।
- जिम्मेदार सरकार के गठन में मदद करते हैं – प्रतिनिधियों को एकजुट कर स्थिर सरकार बनाते हैं।
- नीतियाँ और कार्यक्रम तय करते हैं – सरकार को स्पष्ट दिशा और लक्ष्य प्रदान करते हैं।
- सरकार का समर्थन या विरोध करते हैं – सत्तारूढ़ दल शासन चलाता है, जबकि विपक्ष निगरानी करता है।
- सरकार पर अंकुश रखते हैं – गलत नीतियों और निर्णयों की आलोचना कर जवाबदेही सुनिश्चित करते हैं।
दलीय व्यवस्था के प्रकार :-
लोकतंत्र में मुख्यतः तीन प्रकार की दलीय व्यवस्थाएँ पाई जाती हैं:
🔸 1. एक-दलीय व्यवस्था :-
- कुछ देशों में केवल एक ही दल को सत्ता में रहने की अनुमति होती है।
- उदाहरण: चीन (कम्युनिस्ट पार्टी)।
- यह व्यवस्था लोकतांत्रिक नहीं मानी जाती क्योंकि इसमें राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और विकल्प नहीं होते।
🔸 2. दो-दलीय व्यवस्था :-
- सत्ता मुख्यतः दो प्रमुख दलों के बीच बदलती रहती है।
- अन्य दल मौजूद हो सकते हैं, पर बहुमत के दावेदार प्रायः दो ही दल होते हैं।
- उदाहरण: अमेरिका, ब्रिटेन।
🔸 3. बहु-दलीय व्यवस्था :-
- जब कई दल सत्ता के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं और गठबंधन बनाकर सरकार बना सकते हैं, तो उसे बहुदलीय व्यवस्था कहते हैं।
- उदाहरण: भारत।
- फायदा: इसमें समाज के विभिन्न हितों और विचारों को प्रतिनिधित्व मिलता है।
- नुकसान: यह कभी-कभी राजनीतिक अस्थिरता पैदा करती है।
🔸 गठबंधन :- जब कई दल मिलकर चुनाव लड़ते या सरकार बनाते हैं, तो इसे गठबंधन कहते हैं। उदाहरण: NDA, UPA, वाम मोर्चा।
कौन-सी व्यवस्था बेहतर है?
- किसी देश में दलीय व्यवस्था उसकी सामाजिक, ऐतिहासिक और राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
- कोई एक प्रणाली हर देश के लिए आदर्श नहीं होती।
भारत में बहुदलीय व्यवस्था क्यों?
- भारत एक विशाल और विविधताओं वाला देश है।
- यहाँ अलग-अलग भाषाएँ, धर्म, जातियाँ और क्षेत्र हैं।
- सिर्फ दो-तीन पार्टियाँ इतनी सारी सामाजिक और भौगोलिक विविधताओं का सही प्रतिनिधित्व नहीं कर सकतीं।
- इसलिए यहाँ बहुदलीय व्यवस्था उपयुक्त है।
कितने राजनीतिक दल होने चाहिए?
- कोई देश यह पहले से तय नहीं कर सकता कि वहाँ कितने राजनीतिक दल होंगे।
- दलीय व्यवस्था समय के साथ एक लंबे अंतराल में स्वाभाविक रूप से विकसित होती है।
- यह देश के समाज की प्रकृति, सामाजिक एवं धार्मिक विभाजनों पर निर्भर करती है।
- यह देश के राजनीतिक इतिहास और चुनाव प्रणाली से भी प्रभावित होती है।
- कोई एक प्रणाली हर देश के लिए आदर्श नहीं होती; हर देश अपनी परिस्थितियों के अनुसार व्यवस्था विकसित करता है।
भारत में राजनीतिक दलों के प्रकार :-
संघीय व्यवस्था वाले लोकतंत्रों में आमतौर पर दो तरह के दल होते हैं:
- क्षेत्रीय दल: वे दल जो केवल किसी एक राज्य या संघीय इकाई में सक्रिय होते हैं।
- राष्ट्रीय दल: वे दल जो कई राज्यों या पूरे देश में कार्य करते हैं।
मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल :-
भारत में प्रत्येक राजनीतिक दल को निर्वाचन आयोग में पंजीकरण कराना अनिवार्य होता है। निर्वाचन आयोग सभी दलों को समान मानता है, लेकिन बड़े और स्थापित दलों को कुछ विशेष सुविधाएँ देता है, जैसे—
- विशेष चुनाव चिह्न मिलता है
- अन्य सुविधाएँ व लाभ मिलते हैं
ऐसे दलों को मान्यता प्राप्त दल कहा जाता है।
मान्यता के लिए शर्तें :-
निर्वाचन आयोग ने मान्यता के लिए स्पष्ट नियम तय किए हैं।
🔸 राज्य दल (State Party) की मान्यता :- यदि कोई पार्टी राज्य विधानसभा के चुनाव में पड़े कुल मतों का 6 फ़ीसदी या उससे अधिक हासिल करती है और कम से कम दो सीटों पर जीत दर्ज करती है तो उसे अपने राज्य के राजनीतिक दल के रूप में मान्यता मिल जाती है।
🔸 राष्ट्रीय दल (National Party) की मान्यता :- यदि कोई दल लोकसभा चुनाव में पड़े कुल वोट का अथवा चार राज्यों के विधान सभाई चुनाव में पड़े कुल वोटों का 6 प्रतिशत हासिल करता है और लोकसभा के चुनाव में कम से कम चार सीटों पर जीत दर्ज करता है तो उसे राष्ट्रीय दल की मान्यता मिलती है।
राष्ट्रीय दल तथा क्षेत्रीय दल में अंतर :-
| राष्ट्रीय राजनीतिक दल | क्षेत्रीय / राज्य राजनीतिक दल |
|---|---|
| देश के अधिकांश राज्यों/संघीय इकाइयों में सक्रिय रहते हैं। | केवल किसी विशेष राज्य या क्षेत्र में सक्रिय रहते हैं। |
| लोकसभा चुनाव या चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में कुल मतों का कम से कम 6% प्राप्त करते हैं। | राज्य विधानसभा चुनाव में कुल मतों का कम से कम 6% प्राप्त करते हैं। |
| लोकसभा में कम से कम 4 सीटें जीतते हैं। | राज्य विधानसभा में कम से कम 2 सीटें जीतते हैं। |
| राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों पर नीतियाँ बनाते हैं। | मुख्यतः क्षेत्रीय/स्थानीय मुद्दों पर ध्यान देते हैं। |
भारत में मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय दल (2023) :-
निर्वाचन आयोग की 2023 अधिसूचना के अनुसार भारत में 6 राष्ट्रीय दल हैं:
- आम आदमी पार्टी (AAP)
- बहुजन समाज पार्टी (BSP)
- भारतीय जनता पार्टी (BJP)
- कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया-मार्क्ससिस्ट (सीपीआई-एम)
- इंडियन नेशनल काँग्रेस (INC)
- नेशनल पीपुल्स पार्टी (NPP)
भारत के 6 राष्ट्रीय दल और उनके चुनाव चिह्न (2026) :-
निर्वाचन आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त वर्तमान राष्ट्रीय दलों की सूची इस प्रकार है:
| दल का नाम | स्थापना वर्ष | चुनाव चिह्न | मुख्य पहचान |
| भारतीय जनता पार्टी (BJP) | 1980 | कमल का फूल | सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और आधुनिक विकास। |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) | 1885 | हाथ का पंजा | सबसे पुराना दल, धर्मनिरपेक्षता और समावेशी विकास। |
| आम आदमी पार्टी (AAP) | 2012 | झाड़ू | सुशासन, शिक्षा और भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति। |
| बहुजन समाज पार्टी (BSP) | 1984 | हाथी | दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यक समुदायों का प्रतिनिधित्व। |
| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी-मार्क्सवादी (CPI-M) | 1964 | हँसिया, हथौड़ा और सितारा | समाजवाद और मजदूरों/किसानों के अधिकार। |
| नेशनल पीपल्स पार्टी (NPP) | 2013 | किताब (Book) | पूर्वोत्तर भारत की प्रमुख राष्ट्रीय पार्टी। |
आम आदमी पार्टी (AAP) :-
- आम आदमी पार्टी का गठन भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बाद 26 नवंबर 2012 को हुआ।
- पार्टी की स्थापना पारदर्शिता, स्वच्छ प्रशासन, जवाबदेही और सुशासन के सिद्धांतों पर की गई।
- गठन के एक वर्ष के भीतर ही पार्टी दिल्ली विधानसभा चुनाव में उभरकर सामने आई और सरकार बनाई।
- वर्तमान में पार्टी ने दिल्ली और पंजाब में सरकार बनाई है।
- 2022 के गुजरात विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी राज्य की राजनीति में एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरी।
- 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने लोकसभा में एक सीट जीती।
बहुजन समाज पार्टी (BSP) :-
- बहुजन समाज पार्टी का गठन 1984 में कांशीराम के नेतृत्व में हुआ।
- यह पार्टी दलितों, आदिवासियों, पिछड़ी जातियों और धार्मिक अल्पसंख्यकों सहित बहुजन समाज के प्रतिनिधित्व का दावा करती है।
- पार्टी महात्मा फुले, पेरियार रामास्वामी नायकर और डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों से प्रेरित है।
- यह दलितों और कमजोर वर्गों के कल्याण एवं अधिकारों के मुद्दों पर सक्रिय है।
- पार्टी का मुख्य आधार उत्तर प्रदेश में है, पर अन्य राज्यों में भी इसकी उपस्थिति है।
- BSP ने उत्तर प्रदेश में चार बार सरकार बनाई है।
- 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को लगभग 3.63% वोट और 10 सीटें मिलीं।
भारतीय जनता पार्टी (BJP) :-
- भारतीय जनता पार्टी का गठन 1980 में हुआ। यह पुराने भारतीय जनसंघ (1951, श्यामा प्रसाद मुखर्जी) का पुनर्गठित रूप है।
- पार्टी भारत की प्राचीन संस्कृति और मूल्यों तथा दीनदयाल उपाध्याय के समग्र मानवतावाद और अंत्योदय के विचारों से प्रेरित है।
- इसका लक्ष्य मज़बूत और आधुनिक भारत का निर्माण है।
- पार्टी की विचारधारा में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद (हिंदुत्व) एक प्रमुख तत्व है।
- BJP समान नागरिक संहिता के पक्ष में है और जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे का विरोध करती रही है।
- 1990 के दशक में पार्टी का समर्थन आधार काफ़ी विस्तृत हुआ और पूरे देश में फैला।
- राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के नेतृत्व में पार्टी 1998 में केंद्र की सत्ता में आई।
- 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में 303 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी।
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) – CPI(M) :-
- पार्टी की स्थापना 1964 में हुई।
- यह मार्क्सवाद-लेनिनवाद में आस्था रखती है।
- पार्टी समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र की समर्थक है तथा साम्राज्यवाद और सांप्रदायिकता की विरोधी है।
- सामाजिक-आर्थिक न्याय के लिए यह लोकतांत्रिक चुनावों को महत्वपूर्ण मानती है।
- पार्टी का मुख्य आधार केरल, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में रहा है।
- गरीबों, मज़दूरों, खेतिहर मज़दूरों और बुद्धिजीवियों के बीच अच्छी पकड़।
- यह पार्टी देश में पूँजी और सामानों की मुक्त आवाज़ाही की अनुमति देने वाली नयी आर्थिक नीतियों की आलोचक है।
- पश्चिम बंगाल में लगभग 34 वर्षों तक शासन किया।
- 2019 के लोकसभा चुनाव में लगभग 1.75% वोट और 3 सीटें प्राप्त कीं।
इंडियन नेशनल काँग्रेस (INC) :-
- इंडियन नेशनल काँग्रेस, जिसे सामान्यतः काँग्रेस पार्टी कहा जाता है, की स्थापना 1885 में हुई।
- यह दुनिया के सबसे पुराने राजनीतिक दलों में से एक है और इसमें समय-समय पर विभाजन हुए हैं।
- आज़ादी के बाद कई दशकों तक राष्ट्रीय राजनीति में इसकी प्रमुख भूमिका रही।
- जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में पार्टी ने भारत को आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने का प्रयास किया।
- काँग्रेस ने 1952 से 1977 तक तथा 1980 से 1989 तक देश पर शासन किया।
- 1989 के बाद पार्टी के जनसमर्थन में कमी आई, पर इसका आधार अभी भी राष्ट्रीय स्तर पर मौजूद है।
- वैचारिक रूप से यह मध्यमार्गी दल है और धर्मनिरपेक्षता, कमजोर वर्गों व अल्पसंख्यकों के हितों पर बल देता है।
- नई आर्थिक नीतियों का समर्थन करते हुए, गरीबों के हितों की रक्षा पर भी जोर देता है।
- 2004 से 2014 तक संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) सरकार का नेतृत्व किया।
- 2019 लोकसभा चुनाव में पार्टी को लगभग 19.5% वोट और 52 सीटें मिलीं।
नेशनल पीपुल्स पार्टी (NPP) :-
- नेशनल पीपुल्स पार्टी का गठन जुलाई 2013 में पी. ए. संगमा के नेतृत्व में हुआ।
- यह पूर्वोत्तर भारत की पहली पार्टी है जिसे राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा प्राप्त हुआ।
- पार्टी देश की विविधता में विश्वास करती है और क्षेत्रीय विकास की चुनौतियों को महत्व देती है।
- इसका मूल उद्देश्य शिक्षा, रोजगार और समाज के सभी वर्गों का सशक्तिकरण है।
- पार्टी ने मेघालय में सरकार बनाई और पूर्वोत्तर के कई राज्यों में सक्रिय है।
- 2019 लोकसभा चुनाव में पार्टी को एक सीट प्राप्त हुई।
दल-बदल :-
विधायिका के लिए किसी दल-विशेष से निर्वाचित होने वाले प्रतिनिधि का उस दल को छोड़कर किसी अन्य दल में चले जाना।
शपथपत्र :-
किसी अधिकारी को सौंपा गया एक दस्तावेज़! इसमें कोई व्यक्ति अपने बारे में निजी सूचनाएँ देता है और उनके सही होने के बारे में शपथ उठाता है। इस पर सूचना देने वाले के हस्ताक्षर होते हैं।
राजनीतिक दलों के सामने प्रमुख चुनौतियाँ :-
लोकतंत्र में राजनीतिक दल अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनके कामकाज को लेकर कई आलोचनाएँ होती हैं। प्रमुख चुनौतियाँ निम्नलिखित हैं:
🔸 चुनौती 1: आंतरिक लोकतंत्र का अभाव :-
सबसे बड़ी चुनौती दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र की कमी है। अधिकांश दलों में निर्णय लेने की शक्ति कुछ नेताओं तक सीमित रहती है। नियमित संगठनात्मक चुनाव नहीं होते और सामान्य कार्यकर्ताओं की भागीदारी भी कम होती है। इससे दलों में लोकतांत्रिक भावना कमजोर पड़ती है।
🔸 चुनौती 2: वंशवाद की राजनीति :-
दूसरी चुनौती वंशवाद की है। कई दलों में नेतृत्व एक ही परिवार के लोगों तक सीमित हो जाता है। इससे योग्य और मेहनती कार्यकर्ताओं के लिए आगे बढ़ने के अवसर कम हो जाते हैं, जो लोकतंत्र के सिद्धांतों के विपरीत है।
🔸 चुनौती 3: पैसे और अपराधियों की बढ़ती भूमिका :-
तीसरी चुनौती राजनीति में धन और आपराधिक तत्वों के बढ़ते प्रभाव की है। चुनावों में अत्यधिक धन का उपयोग किया जाता है और कई बार आपराधिक छवि वाले उम्मीदवारों को भी टिकट मिल जाता है। यह स्थिति लोकतंत्र के लिए हानिकारक मानी जाती है।
🔸 चुनौती 4: सार्थक विकल्प का अभाव :-
चौथी चुनौती विकल्पहीनता की है। आजकल कई दलों के बीच वैचारिक अंतर कम होता जा रहा है, जिससे मतदाताओं को स्पष्ट विकल्प नहीं मिल पाता।
राजनीतिक दलों के सामने चुनौतियाँ (in short) :-
🔸 आंतरिक लोकतंत्र की कमी :- अधिकांश दलों में निर्णय लेने की शक्ति कुछ नेताओं तक सीमित रहती है। नियमित चुनाव और बैठकों का अभाव रहता है।
🔸 वंशवाद की समस्या :- कई दलों में नेतृत्व एक ही परिवार के लोगों तक सीमित हो जाता है, जिससे अन्य योग्य कार्यकर्ताओं के अवसर कम होते हैं।
🔸 पैसा और अपराधी तत्त्वों का प्रभाव :- चुनावों में धन का अत्यधिक उपयोग होता है और कभी-कभी आपराधिक छवि वाले उम्मीदवारों को भी टिकट मिल जाता है।
🔸 विकल्पहीनता की स्थिति :- दलों के बीच वैचारिक अंतर कम होने से मतदाताओं को स्पष्ट विकल्प नहीं मिल पाता।
दलों को कैसे सुधारा जा सकता है?
🔸 दल-बदल विरोधी कानून :- संविधान संशोधन के द्वारा दल-बदल पर रोक लगाई गई। दल बदलने पर प्रतिनिधि की सीट जा सकती है।
🔸 उम्मीदवारों की जानकारी अनिवार्य :- उम्मीदवारों के लिए संपत्ति और आपराधिक मामलों का विवरण शपथपत्र में देना अनिवार्य किया गया, जिससे पारदर्शिता बढ़ी।
🔸 सांगठनिक चुनाव व पारदर्शिता :- चुनाव आयोग ने दलों के लिए संगठनात्मक चुनाव कराना और आयकर रिटर्न भरना आवश्यक बनाया गया।
🔸 कानूनी सुधार के सुझाव :- दलों को अपने संविधान का पालन, सदस्य सूची बनाए रखना और शीर्ष पदों के लिए खुला चुनाव कराना चाहिए।
🔸 महिलाओं की भागीदारी :- महिलाओं को न्यूनतम (लगभग एक-तिहाई) टिकट और प्रमुख पदों पर अवसर दिए जाने चाहिए।
🔸 चुनाव खर्च में सुधार :- चुनावी खर्च का कुछ भाग सरकार द्वारा वहन करने का सुझाव, ताकि धनबल का प्रभाव कम हो।
🔸 जन-दबाव का महत्व :- नागरिक, मीडिया और दबाव समूह सुधार के लिए दलों पर दबाव बना सकते हैं।
🔸 जनभागीदारी आवश्यक :- सुधार की इच्छा रखने वाले लोगों को स्वयं राजनीतिक दलों में शामिल होना चाहिए।