NCERT Class 10th Science Notes Chapter 4 कार्बन एवं उसके यौगिक

 इस अध्याय में हम कार्बन में सहसंयोजी आबंध, कार्बन की सर्वतोमुखी प्रकृति (श्रृंखलन और चतुष्संयोजकता), हाइड्रोकार्बन और समजातीय श्रेणी, प्रकार्यात्मक समूहों, कुछ महत्वपूर्ण कार्बन यौगिकों (एथेनॉल और एथेनोइक अम्ल), तथा साबुन और अपमार्जक की सफाई प्रक्रिया (मिसेल निर्माण) के बारे में विस्तार से पढ़ेंगे।

कार्बन एवं उसके यौगिक

कार्बन :-

कार्बन एक सर्वतोमुखी तत्व है। यह भूपर्पटी में खनिजों (जैसे- कार्बोनेट, हाइड्रोजनकार्बोनेट, कोयला एवं पेट्रोलियम) के रूप में केवल 0.02% है। वायुमंडल में यह कार्बन डाइऑक्साइड के रूप में लगभग 0.03% मात्रा में उपस्थित है। सभी सजीव संरचनाएँ कार्बन पर आधारित होती हैं। कागज, प्लास्टिक, चमड़ा और रबर जैसे पदार्थों में भी कार्बन पाया जाता है।

प्रकृति में कार्बन की उपलब्धता :-

कार्बन प्रकृति में बहुत अल्प मात्रा में पाया जाता है, फिर भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

  • भूपर्पटी में: केवल 0.02% कार्बन यह कार्बोनेट, हाइड्रोजन कार्बोनेट, कोयला और पेट्रोलियम के रूप में पाया जाता है।
  • वायुमंडल में: केवल 0.03% कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂)

कार्बन आयनिक यौगिक क्यों नहीं बनाता?

🔹 कार्बन में सह संयोजी आबंध :-

कार्बन की परमाणु संख्या 6 है (कार्बन का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास: 2, 4)। इसे उत्कृष्ट गैस विन्यास प्राप्त करने के लिए 4 इलेक्ट्रॉनों की आवश्यकता होती है। लेकिन यह न तो इलेक्ट्रॉन खोता है और न ही प्राप्त करता है, क्योंकि:

  • यदि 4 इलेक्ट्रॉन प्राप्त करता (C⁴⁻ ऋणायन): नाभिक में 6 प्रोटॉन होते हैं। 6 प्रोटॉन वाले नाभिक के लिए 10 इलेक्ट्रॉनों को संभालना बहुत मुश्किल और अस्थिर होगा।
  • यदि 4 इलेक्ट्रॉन खो देता (C⁴⁺ धनायन): 4 इलेक्ट्रॉनों को बाहर निकालने के लिए अत्यधिक ऊर्जा की आवश्यकता होगी, जो संभव नहीं है।

🔸 निष्कर्ष: कार्बन इस समस्या का समाधान इलेक्ट्रॉनों की साझेदारी करके करता है। इस साझेदारी से सहसंयोजी आबंध बनते हैं।

सहसंयोजी आबंध :-

दो परमाणुओं के बीच इलेक्ट्रॉन के एक युग्म की साझेदारी के द्वारा बनने वाले आबंध सहसंयोजी आबंध कहलाते हैं।

सहसंयोजी यौगिकों के गुण :-

🔸 कम गलनांक एवं क्वथनांक: सहसंयोजी आबंध वाले अणुओं में भीतर तो प्रबल आबंध होता है, लेकिन इनका अंतराअणुक बल दुर्बल होता है। फलस्वरूप इन यौगिकों के क्वथनांक एवं गलनांक कम होते हैं।

🔸 विद्युत के कुचालक: चूँकि, परमाणुओं के बीच इलेक्ट्रॉनों की साझेदारी होती है और आयन (आवेशित कण) नहीं बनते; सामान्यतः ऐसे सहसंयोजी यौगिक विद्युत के कुचालक होते हैं।

अपररूप की परिभाषा :-

एक ही तत्व का विभिन्न भौतिक गुणों के साथ अलग-अलग रूपों में पाया जाना अपररूप कहलाता हैं।

कार्बन के अपररूप :-

कार्बन के प्रमुख अपररूप: हीरा, ग्रेफ़ाइट, फुलेरीन

🔹 हीरा :-

  • हीरे में कार्बन का प्रत्येक परमाणु कार्बन के चार अन्य परमाणुओं के साथ आबंधित होता है,
  • जिससे एक दृढ़ त्रिआयामी संरचना बनती है।
  • हीरा अब तक का ज्ञात सर्वाधिक कठोर पदार्थ है।
  • हीरा विद्युत का कुचालक है।

🔸 संश्लिष्ट हीरा :- शुद्ध कार्बन को अत्यधिक उच्च दाब एवं ताप पर उपचारित करके हीरे को संश्लेषित किया जा सकता है। ये संश्लिष्ट हीरे आकार में छोटे होते हैं, लेकिन अन्यथा ये प्राकृतिक हीरों से अभेदनीय होते हैं।

🔹 ग्रेफ़ाइट :-

  • ग्रेफ़ाइट में कार्बन के प्रत्येक परमाणु का आबंधन कार्बन के तीन अन्य परमाणुओं के साथ एक ही तल पर होता है,
  • जिससे षट्‌कोणीय व्यूह मिलता है।
  • ग्रेफ़ाइट की संरचना में षट्‌कोणीय तल एक-दूसरे के ऊपर व्यवस्थित होते हैं।
  • ग्रेफ़ाइट चिकना तथा फिसलनशील होता है।
  • ग्रेफ़ाइट अधातु होते हुए भी विद्युत का सुचालक है।

🔹 फुलेरीन :-

  • फुलेरीन कार्बन अपररूप का अन्य वर्ग है।
  • संरचना: इसमें कार्बन परमाणु फुटबॉल के रूप में व्यवस्थित होते हैं।
  • नामकरण: यह अमेरिकी आर्किटेक्ट बकमिंसटर फुलर द्वारा डिज़ाइन किए गए ‘जियोडेसिक गुंबद’ जैसा दिखता है, इसलिए इसका नाम ‘फुलेरीन’ रखा गया।

हीरा और ग्रेफ़ाइट में अंतर :-

गुणहीराग्रेफ़ाइट
संरचनादृढ़ त्रिआयामी (Rigid 3D) संरचनाषट्‌कोणीय व्यूह (Hexagonal arrays) जो परतों के रूप में एक-दूसरे के ऊपर होते हैं
आबंधनएक कार्बन परमाणु चार अन्य कार्बन परमाणुओं से जुड़ा होता हैएक कार्बन परमाणु तीन अन्य कार्बन परमाणुओं से एक ही तल में जुड़ा होता है; एक इलेक्ट्रॉन मुक्त रहता है
कठोरताअब तक का ज्ञात सर्वाधिक कठोर प्राकृतिक पदार्थयह नरम, चिकना तथा फिसलनशील होता है
विद्युत चालकताविद्युत का कुचालक होता हैविद्युत का सुचालक होता है (अन्य अधातुओं के विपरीत)

कार्बन की सर्वतोमुखी प्रकृति :-

अन्य सभी तत्वों के यौगिकों की कुल संख्या से भी अधिक केवल ज्ञात कार्बन यौगिकों की संख्या कई मिलियन है। यह विशिष्टता कार्बन के निम्नलिखित दो अनोखे गुणों के कारण है:

  1. श्रृंखलन
  2. चतुःसंयोजकता

1. श्रृंखलन :-

कार्बन में कार्बन के ही अन्य परमाणुओं के साथ आबंध बनाने की अद्वितीय क्षमता होती है, जिससे बड़ी संख्या मे अणु बनते हैं। इस गुण को श्रृंखलन कहते हैं।

इन यौगिकों में कार्बन की लंबी श्रृंखला, कार्बन की विभिन्न शाखाओं वाली श्रृंखला अथवा वलय में व्यवस्थित कार्बन भी पाए जाते हैं। साथ ही कार्बन के परमाणु एक, द्वि अथवा त्रि आबंध से जुड़े हो सकते हैं।

2. चतुःसंयोजकता :-

कार्बन चतु संयोजकता प्रकृति का तत्व है, यानी कार्बन के बाह्यतम कोश में 4 इलेक्ट्रॉन होने के कारण इसकी संयोजकता 4 है।

🔸 परिणाम: यह कार्बन के 4 अन्य परमाणुओं या ऑक्सीजन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, सल्फ़र, क्लोरीन आदि जैसे अन्य एक-संयोजक तत्वों के साथ आबंध बना सकता है।

🔸 आबंध प्रकार: एकल, द्वि या त्रि आबंध बना सकता है।

संतृप्त और असंतृप्त यौगिक :-

🔸 संतृप्त यौगिक :- कार्बन परमाणुओं के बीच केवल एक आबंध से जुड़े कार्बन के यौगिक संतृप्त यौगिक कहलाते हैं।

🔸 असंतृप्त यौगिक :- कार्बन परमाणुओं के बीच केवल द्वि अथवा त्रि-आबंध वाले कार्बन के यौगिक असंतृप्त यौगिक कहलाते हैं।

एथेन, एथीन, एथाइन :-

  • कार्बन एवं हाइड्रोजन से बनने वाला अन्य यौगिक एथेन है, जिसका रासायनिक सूत्र C₂H₆ है।
  • कार्बन एवं हाइड्रोजन के एक अन्य यौगिक का सूत्र C₂H₄ है, जिसे एथीन कहते हैं।
  • हाइड्रोजन एवं कार्बन के एक अन्य यौगिक का सूत्र C₂H₂ है, जिसे एथाइन कहते हैं।

हाइड्रोकार्बन :-

वे कार्बन यौगिक जिनमें केवल कार्बन (C) और हाइड्रोजन (H) तत्व उपस्थित होते हैं, हाइड्रोकार्बन कहलाते हैं। उदाहरण: मीथेन (CH₄), एथीन (C₂H₄), एथाइन (C₂H₂)

संतृप्त हाइड्रोकार्बन :-

वे हाइड्रोकार्बन जिनमें कार्बन-कार्बन के बीच केवल एकल आबंधन (Single bond) होते हैं और कोई भी दोहरा या त्रि-आबंधन नहीं होता, संतृप्त हाइड्रोकार्बन कहलाते हैं। जैसे: ऐल्केन

ऐल्केन :-

संतृप्त हाइड्रोकार्बन जिनका सामान्य सूत्र CₙH₂ₙ₊₂ होता है और जिनमें केवल एकल आबंधन होते हैं, ऐल्केन कहलाते हैं।

असंतृप्त हाइड्रोकार्बन :-

वे हाइड्रोकार्बन जिनमें कार्बन-कार्बन के बीच कम से कम एक दोहरा या त्रि-आबंधन उपस्थित हो, असंतृप्त हाइड्रोकार्बन कहलाते हैं। जैसे: ऐल्कीन, ऐल्काइन

ऐल्कीन :-

वे असंतृप्त हाइड्रोकार्बन जिनमें एक या अधिक दोहरे आबंधन होते हैं और जिनका सामान्य सूत्र CₙH₂ₙ होता है, ऐल्कीन कहलाते हैं।

ऐल्काइन :-

वे असंतृप्त हाइड्रोकार्बन जिनमें एक या अधिक त्रि-आबंधन (Triple bond) होते हैं और जिनका सामान्य सूत्र CₙH₂ₙ₋₂ होता है, ऐल्काइन कहलाते हैं।

संरचनात्मक समावयव :-

वे कार्बन यौगिक जिनके आणविक सूत्र समान होते हैं, लेकिन परमाणुओं की व्यवस्था (संरचना) भिन्न-भिन्न होती है, संरचनात्मक समावयव कहलाते हैं।

विषम परमाणु :-

हाइड्रोकार्बन श्रृंखला में वे परमाणु जो एक या अधिक हाइड्रोजन परमाणुओं को प्रतिस्थापित करते हैं और इस प्रकार कार्बन की संयोजकता को संतुष्ट रखते हैं, विषम परमाणु कहलाते हैं।सामान्य विषम परमाणु: ऑक्सीजन (O), नाइट्रोजन (N), सल्फर (S), क्लोरीन (Cl) आदि।

प्रकार्यात्मक समूह :-

कार्बन यौगिकों में उपस्थित वह विषम परमाणु या विभिन्न परमाणुओं का समूह, जो उन यौगिकों को विशिष्ट रासायनिक गुण तथा अभिक्रियाशीलता प्रदान करता है, प्रकार्यात्मक समूह कहलाता है।

समजातीय श्रेणी :-

यौगिकों की ऐसी श्रृंखला जिसमें कार्बन श्रृंखला में स्थित हाइड्रोजन को एक ही प्रकार का प्रकार्यात्मक समूह प्रतिस्थापित करता है, उसे समजातीय श्रेणी कहते हैं।

समजातीय श्रेणी की मुख्य विशेषताएँ :-

  • समजातीय श्रेणी के सभी यौगिकों का सामान्य सूत्र समान होता है। (जैसे: ऐल्केन — CₙH₂ₙ₊₂)
  • श्रेणी के क्रमागत (लगातार) सदस्यों के आणविक सूत्रों में –CH₂– का अंतर होता है।
  • श्रेणी के क्रमागत सदस्यों के आणविक द्रव्यमान में 14 u का अंतर होता है।
  • समजातीय श्रेणी के सभी यौगिकों के रासायनिक गुण समान होते हैं, क्योंकि उनका कार्यात्मक समूह एक ही होता है।

कार्बन यौगिकों की नामपद्धति :-

किसी समजातीय श्रेणी में यौगिकों के नामों का आधार बेसिक कार्बन की उन मूल श्रृंखलाओं पर आधारित होता है, जिनको प्रकार्यात्मक समूह की प्रकृति के अनुसार ‘पूर्वलग्न’ ‘उपसर्ग’ या ‘अनुलग्न’ ‘प्रत्यय’ के द्वारा संशोधित किया गया हो।

कार्बन यौगिक के नामकरण की विधि :-

(i) यौगिक में कार्बन परमाणुओं की संख्या ज्ञात कीजिए। तीन कार्बन परमाणु वाले यौगिक का नाम प्रोपेन होगा।

(ii) प्रकार्यात्मक समूह की उपस्थिति में इसको पूर्वलग्न अथवा अनुलग्न के साथ यौगिक के नाम में दर्शाया जाता है।

(iii) यदि प्रकार्यात्मक सूमह का नाम अनुलग्न के आधार पर दिया जाना हो तथा यदि प्रकार्यात्मक समूह के अनुलग्न नाम स्वर a, e, i, o, u से प्रारंभ होता हो तो कार्बन श्रृंखला के नाम से अंत का ‘e’ हटाकर, उसमें समुचित अनुलग्न लगाकर संशोधित करते हैं, जैसे- कीटोन सूमह की तीन कार्बन वाली श्रंखला को निम्नलिखित विधि से नाम दिया जाएगा – Propane – ‘e’ = propan + ‘one’ = propanone प्रोपेनोन.

(iv) असंतृप्त कार्बन श्रृंखला में कार्बन श्रृंखला के नाम में दिए गए अंतिम ‘ane’ को ‘ene’ या ‘yne’ से प्रतिस्थापित करते हैं, जैसे- द्विआबंध वाली तीन कार्बन की श्रृंखला प्रोपीन कहलाएगी तथा त्रि-आबंध होने पर यह प्रोपाइन (propyne) कहलाएगी।

कार्बन यौगिकों के रासायनिक गुणधर्म :-

दहन :-

कार्बन और उसके यौगिक वायु/ऑक्सीजन की उपस्थिति में जलकर CO₂, H₂O, ऊर्जा (ऊष्मा एवं प्रकाश) देते हैं। यह एक ऑक्सीकरण अभिक्रिया है।

🔹 दहन की अभिक्रियाएँ (उदाहरण)

  • (i) कार्बन का दहन: C + O₂ → CO₂ + ऊष्मा + प्रकाश
  • (ii) मीथेन का दहन: CH₄ + O₂ → CO₂ + H₂O + ऊष्मा + प्रकाश
  • (iii) एथेनॉल का दहन: CH₃CH₂OH + O₂ → CO₂ + H₂O + ऊष्मा + प्रकाश

ज्वाला के प्रकार और उसके कारण :-

ज्वाला का रंग और धुआँ ईंधन की प्रकृति और दहन की परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

हाइड्रोकार्बन का प्रकारज्वाला का रंग / प्रकृतिदहन का प्रकार
संतृप्त हाइड्रोकार्बन (जैसे मीथेन, एलपीजी)स्वच्छ नीली ज्वालापूर्ण दहन — जब ऑक्सीजन की पर्याप्त आपूर्ति होती है।
असंतृप्त हाइड्रोकार्बन (जैसे एथीन)काले धुएँ वाली पीली ज्वालाअपूर्ण दहन — कार्बन की प्रतिशत मात्रा अधिक होने के कारण बिना जले कार्बन कण (कज्जली) निकलते हैं।

ऑक्सीकारक :-

कुछ पदार्थों में अन्य पदार्थों को ऑक्सीजन देने की क्षमता होती है। इन पदार्थों को ऑक्सीकारक कहा जाता है। जैसे :- क्षारीय पोटैशियम परमैंगनेट KMnO₄ और अम्लीकृत पोटैशियम डाइक्रोमेट K₂Cr₂O₇

ऑक्सीकरण अभिक्रिया :-

ऑक्सीकरण अभिक्रिया में यौगिक द्वारा ऑक्सीजन का संयोग होता है या हाइड्रोजन का अपसारण (पृथक होना) होता है। एथेनॉल से एथेनोइक अम्ल में परिवर्तन एक ऑक्सीकरण अभिक्रिया है, क्योंकि इस अभिक्रिया में एथेनॉल में ऑक्सीजन का संयोग होता है तथा हाइड्रोजन का अपसारण होता है।

संकलन अभिक्रिया :-

वह अभिक्रिया जिसमें असंतृप्त हाइड्रोकार्बन किसी उत्प्रेरक की उपस्थिति में हाइड्रोजन (या अन्य पदार्थ) जोड़कर संतृप्त हाइड्रोकार्बन में बदल जाते हैं, उसे संकलन अभिक्रिया कहते हैं।

  • उदाहरण: एथीन, निकैल उत्प्रेरक की उपस्थिति में हाइड्रोजन जोड़कर एथेन बनाता है।
  • उपयोग :- इस अभिक्रिया का उपयोग वनस्पति तेलों को वनस्पति घी में बदलने के लिए किया जाता है।

प्रतिस्थापन अभिक्रिया :-

वह अभिक्रिया जिसमें एक प्रकार का परमाणु दूसरे प्रकार के परमाणु का स्थान ले लेता है उसे प्रतिस्थापन अभिक्रिया कहते हैं।

🔸 रासायनिक समीकरण: CH₄ + Cl₂ ⟶ CH₃Cl + HCl (सूर्य का प्रकाश)

🔸 उदाहरण :- संतृप्त हाइड्रोकार्बन सामान्यतः कम अभिक्रियाशील होते हैं। परंतु सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में क्लोरीन के साथ अभिक्रिया करके हाइड्रोजन परमाणुओं का एक-एक करके प्रतिस्थापन करते हैं। यह अभिक्रिया प्रतिस्थापन अभिक्रिया कहलाती है।

एथेनॉल के गुणधर्म :-

  • एथनॉल कक्ष ताप पर द्रव अवस्था में होता है।
  • एथनॉल को सामान्यतः एल्कोहल कहा जाता है।
  • इसका गलनांक (156 K) और क्वथनांक (351 K) कम होता है।
  • यह जल में सभी अनुपातों में घुलनशील है।
  • एथनॉल एक अच्छा विलायक है।
  • यह स्वच्छ नीली ज्वाला के साथ जलता है।
  • इसका उपयोग टिंचर आयोडीन, कफ़ सीरप, टॉनिक जैसी औषधियों में किया जाता है।
  • तनु एथनॉल की थोड़ी मात्रा भी नशा उत्पन्न करती है।
  • शुद्ध एथनॉल की थोड़ी मात्रा भी घातक हो सकती है।

एथनॉल की अभिक्रियाएँ :-

🔸 (i) सोडियम के साथ अभिक्रिया :- एथेनॉल, सोडियम के साथ अभिक्रिया करके हाइड्रोजन गैस तथा सोडियम एथॉक्साइड बनाता है।

समीकरण: 2Na + 2CH₃CH₂OH → 2CH₃CH₂O⁻Na⁺ + H₂↑

🔸 (ii) असंतृप्त हाइड्रोकार्बन बनाने की अभिक्रिया (निर्जलीकरण) :- एथेनॉल को सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल (H₂SO₄) के साथ 443 K तापमान पर गर्म करने पर इसका निर्जलीकरण हो जाता है और यह एथीन बन जाता है।

अभिक्रिया: CH₃CH₂OH —(गर्म, conc. H₂SO₄)→ CH₂ = CH₂ + H₂O

इस अभिक्रिया में सल्फ्यूरिक अम्ल निर्जलीकारक की तरह कार्य करता है।

एथेनोइक अम्ल के गुणधर्म :-

  • एथेनॉइक अम्ल को सामान्यतः ऐसीटिक अम्ल कहा जाता है।
  • यह कार्बोक्सिलिक अम्ल (-COOH) समूह से संबंधित है।
  • ऐसीटिक अम्ल के 3-4% विलयन को सिरका कहा जाता है
  • एवं इसे अचार में परिरक्षक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
  • शुद्ध एथनॉइक अम्ल का गलनांक 290 K होता है
  • ठंडी जलवायु में यह जम जाता है, इसलिए इसे ग्लैशल ऐसीटिक अम्ल कहते हैं।

एथेनोइक अम्ल की अभिक्रियाएँ :-

🔸 (i) एस्टरीकरण अभिक्रिया :- एस्टर मुख्य रूप से अम्ल और ऐल्कोहॉल की अभिक्रिया से निर्मित होते हैं। एथेनॉइक अम्ल, संकेन्द्रित सल्फ्यूरिक अम्ल (H₂SO₄) जैसे अम्ल उत्प्रेरक की उपस्थिति में परिशुद्ध एथनॉल से अभिक्रिया करके एस्टर (एथाइल एथेनोएट) बनाता है।

🔸 (ii) क्षारक के साथ अभिक्रिया :- खनिज अम्लों की भाँति एथेनॉइक अम्ल भी क्षारक (जैसे सोडियम हाइड्रोक्साइड) से अभिक्रिया करके लवण तथा जल बनाता है। यह एक उदासीनीकरण अभिक्रिया है।

🔸 (iii) कार्बोनेट एवं हाइड्रोजनकार्बोनेट के साथ अभिक्रिया :- एथेनॉइक अम्ल कार्बोनेट एवं हाइड्रोजनकार्बोनेट के साथ अभिक्रिया करके लवण, जल तथा कार्बन डाइऑक्साइड गैस बनाता है। इस अभिक्रिया में उत्पन्न लवण को सोडियम ऐसीटेट कहते हैं।

साबुन :-

साबुन लंबी श्रृंखला वाले कार्बोक्सिलिक अम्लों के सोडियम या पोटैशियम लवण होते हैं।

साबुन के अणु की संरचना: साबुन के अणु में दो मुख्य भाग होते हैं, जिनके गुण अलग-अलग होते हैं:

  1. जलरागी सिरा :-
    • यह आयनिक भाग होता है।
    • यह जल में घुलनशील होता है (जल के साथ क्रिया करता है)।
  2. जलविरागी सिरा :-
    • यह लंबी कार्बन श्रृंखला होती है।
    • यह जल में अघुलनशील है, लेकिन तेल या मैल में घुल जाता है।

मिसेल :-

मिसेल वह विशेष गोलाकार संरचना है जो जल में साबुन के अणुओं द्वारा बनती है, जिसमें जलविरागी (हाइड्रोकार्बन) सिरे अंदर की ओर और जलरागी (आयनिक) सिरे बाहर की ओर होते हैं।

जल के अंदर इन अणुओं की एक विशेष व्यवस्था होती है, जिससे इसका हाइड्रोकार्बन सिरा जल के बाहर बना होता है। ऐसा अणुओं का बड़ा गुच्छा बनने के कारण होता है, जिसमें जलविरागी पूँछ गुच्छे के आंतरिक हिस्से में होती है, जबकि उसका आयनिक सिरा गुच्छे की सतह पर होता है। इस संरचना को मिसेल कहते हैं।

मिसेल का महत्व :-

  • मिसेल बनने के कारण तेल और गंदगी जल में घुल जाती है।
  • इसी कारण साबुन का घोल दूधिया/धुंधला दिखाई देता है।
  • साबुन का घोल कोलॉइड विलयन होता है।

अपमार्जक :-

अपमार्जक सामान्यतः लंबी कार्बन श्रृंखला वाले सल्फ़ोनिक लवण अथवा लंबी कार्बन श्रृंखला वाले अमोनियम लवण होते हैं, जो क्लोराइड या बोमाइड आयनों के साथ बनते हैं।

साबुन कठोर जल में सफाई ठीक से नहीं कर पाता। इसलिए कठोर जल की समस्या को सुलझाने के लिए अपमार्जक का उपयोग किया जाता है।

🔸 अपमार्जकों के उपयोग :- शैम्पू, कपड़े धोने के पाउडर और सफाई उत्पादों में।

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