इस अध्याय में हम धातुओं और अधातुओं के भौतिक एवं रासायनिक गुणधर्मों, उनकी अभिक्रियाशीलता श्रेणी, आयनिक यौगिकों के निर्माण (जैसे NaCl), धातुकर्म ( अयस्कों से शुद्ध धातु प्राप्त करने की विधियाँ), और संक्षारण से बचाव के तरीकों के बारे में विस्तार से पढ़ेंगे।
धातु एवं अधातु
तत्वों का वर्गीकरण (ज्ञात तत्वों की संख्या) :-
वर्तमान में 118 तत्व ज्ञात हैं। इनमें से लगभग 90 से अधिक धातुएँ, लगभग 22 अधातुएँ तथा कुछ उपधातु पाए जाते हैं।
धातु :-
वे पदार्थ जो कठोर, चमकीले, आघातवर्ध्य, तन्य, ध्वानिक होते हैं तथा ऊष्मा और विद्युत के सुचालक होते हैं, उन्हें धातु कहते हैं।
🔸 प्रमुख धातुओं के उदाहरण :- सोडियम (Na), पोटैशियम (K), मैग्नीशियम (Mg), लोहा (Fe), एल्युमिनियम (Al), कैल्शियम (Ca), बेरियम (Ba)।
धातुओं के उपयोग :-
धातुओं के गुण जैसे मज़बूती, कठोरता, तन्यता, आघातवर्ध्यता और ऊष्मा व विद्युत की सुचालकता के कारण उनका उपयोग इमारतों, पुलों और रेल पटरियों के निर्माण में, हवाई जहाज, समुद्री जहाज और गाड़ियों के निर्माण में, घरेलू बर्तनों में, आभूषणों के निर्माण में, मशीनों के पुर्जों के निर्माण में किया जाता है।
धातुओं के उपयोग (in short) :-
- निर्माण कार्य – इमारतें, पुल, रेल की पटरियाँ
- परिवहन साधन – हवाई जहाज, समुद्री जहाज, गाड़ियाँ
- घरेलू उपयोग – बर्तन, आभूषण
- उद्योग – मशीनों के पुर्जे, औज़ार
- विद्युत क्षेत्र – तार और केबल (तांबा, एल्युमिनियम)
अधातु :-
वे पदार्थ जो सामान्यतः नरम, मलिन, भंगुर होते हैं, ऊष्मा तथा विद्युत के कुचालक होते हैं तथा ध्वानिक नहीं होते, उन्हें अधातु कहते हैं।
🔸 प्रमुख अधातुओं के उदाहरण :- ऑक्सीजन (O), हाइड्रोजन (H), नाइट्रोजन (N), सल्फर (S), फॉस्फोरस (P), फ्लोरीन (F), क्लोरीन (Cl), ब्रोमीन (Br), आयोडीन (I)।
अधातुओं के उपयोग :-
- ऑक्सीजन (O) ऑक्सीजन हमारे जीवन के लिए आवश्यक है, जिसे सभी सजीव श्वसन क्रिया के समय अंदर लेते हैं।
- नाइट्रोजन (N) नाइट्रोजन का उपयोग उर्वरकों में किया जाता है, जिससे पौधों की वृद्धि होती है।
- क्लोरीन (Cl) क्लोरीन का उपयोग जल शुद्धिकरण प्रक्रम में किया जाता है ताकि पानी को पीने योग्य बनाया जा सके।
- आयोडीन (I) आयोडीन का विलयन घावों पर एंटीसेप्टिक के रूप में लगाया जाता है।
- सल्फर (S) सल्फर का उपयोग दियासलाई, रबर उद्योग तथा सल्फ्यूरिक अम्ल के निर्माण में किया जाता है।
- फॉस्फोरस (P) फॉस्फोरस का उपयोग माचिस, उर्वरक और पटाखों के निर्माण में किया जाता है।
धातुओं और अधातुओं में अंतर :-
| धातु | अधातु |
|---|---|
| धातुएँ सामान्यतः कठोर होती हैं। | अधातु सामान्यतः नरम या भंगुर होती हैं। |
| धातुएँ चमकीली होती हैं। | अधातु मलिन (बिना चमक) होती हैं। |
| धातुएँ आघातवर्ध्य होती हैं (इनसे चादर बनाई जा सकती है)। | अधातु आघातवर्ध्य नहीं होती हैं। |
| धातुएँ तन्य होती हैं (इनसे तार बनाए जा सकते हैं)। | अधातु तन्य नहीं होती हैं। |
| धातुएँ ध्वानिक होती हैं। | अधातु अध्वानिक होती हैं। |
| धातुएँ ऊष्मा एवं विद्युत की सुचालक होती हैं। | अधातु ऊष्मा एवं विद्युत की कुचालक होती हैं। |
| धातुएँ प्रायः ठोस अवस्था में पाई जाती हैं। | अधातु ठोस, द्रव या गैस तीनों अवस्थाओं में पाई जाती हैं। |
| उदाहरण: लोहा, ताँबा, एल्युमिनियम | उदाहरण: ऑक्सीजन, सल्फर, क्लोरीन |
पदार्थों की पहचान :-
पदार्थों को उनके भौतिक गुणधर्मों के आधार पर अलग-अलग समूहों में बाँटना आसान होता है। इसी आधार पर हम किसी पदार्थ की धातु या अधातु के रूप में पहचान कर सकते हैं।
🔸 Notes: भौतिक गुणधर्मों के आधार पर ही हम तत्वों का वर्गीकरण नहीं कर सकते, क्योंकि इसमें कई अपवाद हैं।
धातुओं के भौतिक गुणधर्म :-
🔸 कठोरता :- सामान्यत अधिकांश धातुएँ कठोर होती हैं (अपवाद: सोडियम, पोटैशियम नरम होते हैं)। प्रत्येक धातु की कठोरता अलग अलग होती है।
🔸 धात्विक चमक :- धातुएँ अपने शुद्ध रूप में चमकदार होती हैं। इस गुण को धात्विक चमक कहते हैं। उदाहरण: सोना, चाँदी, ताँबा, एल्युमिनियम आदि।
🔸 आघातवर्ध्यता :- धातुओं को पीटकर पतली चादर बनाने का गुण होता है। इस गुणधर्म को आघातवर्ध्यता कहते हैं। सोना और चाँदी सबसे अधिक आघातवर्ध्य धातुएँ हैं। उपयोग: पन्नी, बर्तन, गहने बनाने में।
🔸 तन्यता :- धातुओं को पतले तार के रूप में खींचने के गुण को तन्यत्ता कहा जाता है। सोना सबसे अधिक तन्य धातु है (1 ग्राम सोने से लगभग 2 km लंबा तार बन सकता है)। उपयोग: बिजली के तार, केबल आदि।
🔸 ऊष्मा चालकता :- धातुएँ ऊष्मा की सुचालक होती हैं। चाँदी और ताँबा ऊष्मा के सर्वोत्तम चालक हैं। लेड और मर्करी ऊष्मा के कुचालक हैं। उपयोग: इसी कारण खाना पकाने के बर्तन एल्युमिनियम, ताँबा, लोहा से बनाए जाते हैं।
🔸 विद्युत चालकता :- धातुएँ विद्युत की सुचालक होती हैं। बिजली के तारों पर PVC या रबर की परत चढ़ाई जाती है ताकि विद्युत का संचार सुरक्षित रहे।
🔸 ध्वानिकता :- धातुएँ कठोर सतह से टकराने पर आवाज़ उत्पन्न करती हैं। इस गुण को ध्वानिकता कहते हैं। उदाहरण: स्कूल की घंटी धातु की बनी होती है।
अधातुओं के भौतिक गुणधर्म :-
- अवस्था :- अधिकांश अधातु ठोस या गैसीय अवस्था में पाए जाते हैं। (ब्रोमीन द्रव अवस्था में पाया जाता है।)
- कठोरता :- अधातु सामान्यतः नरम या भंगुर होते हैं।
- चमक :- अधातु सामान्यतः मलिन (चमक रहित) होते हैं। (अपवाद: आयोडीन में चमक होती है।)
- आघातवर्ध्यता :- अधातु आघातवर्ध्य नहीं होते, इसलिए इन्हें पीटकर चादर नहीं बनाई जा सकती।
- तन्यता :- अधातु तन्य नहीं होते, अतः इनसे तार नहीं बनाए जा सकते।
- ध्वानिक गुण :- अधातु अध्वानिक होते हैं, यानी चोट करने पर ध्वनि उत्पन्न नहीं करते।
- ऊष्मा एवं विद्युत चालकता :- अधातु सामान्यतः ऊष्मा एवं विद्युत के कुचालक होते हैं। (अपवाद: ग्रेफाइट विद्युत का सुचालक है।)
तत्वों को भौतिक गुणों के आधार पर वर्गीकरण की सीमाएँ और अपवाद :-
केवल भौतिक गुणधर्मों के आधार पर तत्वों को धातु और अधातु में पूरी तरह वर्गीकृत नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसमें कई अपवाद पाए जाते हैं।
🔸 (i) भौतिक अवस्था से जुड़े अपवाद :-
- सामान्य नियम: सभी धातुएँ कमरे के तापमान पर ठोस होती हैं।
- अपवाद:
- मर्करी एक धातु होते हुए भी द्रव अवस्था में पाई जाती है।
- अधिकतर धातुओं का गलनांक अधिक होता है, परंतु गैलियम और सीज़ियम का गलनांक इतना कम होता है कि हथेली पर रखने से पिघल जाते हैं।
- 👉 निष्कर्ष: सभी धातुओं का गलनांक अधिक हो, यह आवश्यक नहीं।
🔸 (ii) चमक से संबंधित अपवाद :-
- सामान्य नियम: धातुएँ चमकदार होती हैं, अधातुएँ नहीं।
- अपवाद: लेकिन आयोडीन एक अधातु होते हुए भी चमकीला होता है।
- 👉 निष्कर्ष: चमक केवल धातुओं का ही गुण नहीं है।
🔸 (iii) अपररूपता से संबंधित अपवाद :-
- कुछ अधातुएँ विभिन्न रूपों (अपररूपों) में पाई जाती हैं।
- उदाहरण – कार्बन: कार्बन एक अधातु है, लेकिन यह विभिन्न रूपों (अपररूपों) में पाया जाता है।
- हीरा – सबसे कठोर प्राकृतिक पदार्थ, अत्यधिक उच्च गलनांक और क्वथनांक।
- ग्रेफाइट – विद्युत का सुचालक (जबकि अधातुएँ सामान्यतः कुचालक होती हैं)।
- 👉 निष्कर्ष: एक ही अधातु के अलग-अलग अपररूपों के गुण भिन्न हो सकते हैं।
🔸 (iv) क्षारीय धातुओं के अपवाद :-
- सामान्य नियम: धातुएँ कठोर होती हैं।
- अपवाद: लीथियम, सोडियम और पोटैशियम जैसी क्षारीय धातुएँ: बहुत मुलायम होती हैं (चाकू से काटी जा सकती हैं)
- इनका घनत्व और गलनांक कम होता है
- 👉 निष्कर्ष: सभी धातुएँ कठोर और भारी हों, यह आवश्यक नहीं।
उभयधर्मी ऑक्साइड :-
ऐसे धातु ऑक्साइड, जो अम्ल तथा क्षारक दोनों से अभिक्रिया करके लवण तथा जल प्रदान करते हैं, उभयधर्मी ऑक्साइड कहलाते हैं। उदाहरण: एल्युमिनियम ऑक्साइड, जिंक ऑक्साइड
- अम्ल के साथ: Al₂O₃ + 6HCl → 2AlCl₃ + 3H₂O
- क्षार के साथ: Al₂O₃ + 2NaOH → 2NaAlO₂ + H₂O
धातुओं के रासायनिक गुणधर्म :-
धातुओं की ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया :-
लगभग सभी धातुएँ ऑक्सीजन से अभिक्रिया करके अपने-अपने धातु ऑक्साइड बनाती हैं। समीकरण: धातु + ऑक्सीजन → धातु ऑक्साइड
उदाहरण :-
- कॉपर (ताँबा) से:
- 2Cu + O₂ → 2CuO
- ताँबा + ऑक्सीजन → ताँबा ऑक्साइड
- कॉपर को वायु की उपस्थिति में गर्म करने पर काले रंग का कॉपर(II) ऑक्साइड बनाता है।
- एल्युमिनियम से:
- 4Al + 3O₂ → 2Al₂O₃
- एल्युमिनियम + ऑक्सीजन → एल्युमिनियम ऑक्साइड
- एल्युमिनियम ऑक्साइड बनाता है।
धातु ऑक्साइड की प्रकृति :-
अधिकांश धातु ऑक्साइड क्षारकीय (Basic) होते हैं।
उदाहरण: कॉपर ऑक्साइड + हाइड्रोक्लोरिक अम्ल → लवण + जल
धातु ऑक्साइड की जल में घुलनशीलता :-
अधिकांश धातु ऑक्साइड जल में अघुलनशील हैं।
🔸 अपवाद: सोडियम ऑक्साइड व पोटैशियम ऑक्साइड जल में घुलकर क्षार बनाते हैं।
अपवाद: उदाहरण:
- Na₂O + H₂O → 2NaOH
- K₂O + H₂O → 2KOH
ऑक्सीजन के साथ धातुओं की अभिक्रियाशीलता :-
सभी धातुएँ ऑक्सीजन से एक समान दर से अभिक्रिया नहीं करतीं। धातुएँ ऑक्सीजन के साथ भिन्न-भिन्न अभिक्रियाशीलता दर्शाती हैं।
🔸 अत्यधिक अभिक्रियाशील धातुएँ (पोटैशियम, सोडियम):
- खुले में रखने पर तेज़ी से अभिक्रिया करके आग पकड़ लेती हैं।
- इन्हें किरोसिन तेल में डुबोकर रखा जाता है।
🔸 मध्यम अभिक्रियाशील धातुएँ (मैग्नीशियम, एल्युमिनियम, जिंक, लेड):
- सामान्य ताप पर इनकी सतह पर ऑक्साइड की पतली परत बन जाती है, जो आगे ऑक्सीकरण रोकती है।
- गर्म करने पर जलते हैं (जैसे मैग्नीशियम रिबन चमकदार लौ के साथ जलता है)।
🔸 कम अभिक्रियाशील धातुएँ (आयरन, कॉपर):
- आयरन: गर्म करने पर जलता नहीं, लेकिन लौह चूर्ण बर्नर में तेज़ी से जलता है।
- कॉपर: गर्म करने पर काले कॉपर(II) ऑक्साइड की परत बनाता है, पर दहन नहीं होता।
🔸 अत्यंत कम अभिक्रियाशील धातुएँ (सिल्वर, गोल्ड):
ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया नहीं करतीं, यहाँ तक कि अत्यधिक ताप पर भी नहीं।
धातुओं की जल के साथ अभिक्रिया :-
धातुएँ जल के साथ अभिक्रिया करके सामान्यतः हाइड्रोजन गैस तथा धातु ऑक्साइड/हाइड्रॉक्साइड बनाती हैं। जो धातु ऑक्साइड जल में घुलनशील होते हैं, वे जल में घुलकर धातु हाइड्रॉक्साइड बनाते हैं।
सभी धातुएँ जल से अभिक्रिया नहीं करतीं।
🔸 समीकरण:
- धातु + जल → धातु ऑक्साइड + हाइड्रोजन
- धातु ऑक्साइड + जल → धातु हाइड्रॉक्साइड
जल के साथ विभिन्न धातुओं की अभिक्रियाशीलता :-
🔹 ठंडे जल के साथ तीव्र अभिक्रिया :-
पोटैशियम एवं सोडियम जैसी धातुएँ ठंडे जल के साथ तेज़ एवं ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया करती हैं। उत्पन्न हाइड्रोजन गैस तुरंत प्रज्ज्वलित हो जाती है।
- 2K(s) + 2H₂O(l) → 2KOH(aq) + H₂(g) + ऊष्मा
- 2Na(s) + 2H₂O(l) → 2NaOH(aq) + H₂(g) + ऊष्मा
🔹 ठंडे जल के साथ धीमी अभिक्रिया :-
🔸 कैल्सियम (Ca): जल के साथ कैल्सियम की अभिक्रिया थोड़ी धीमी होती है। यहाँ उत्सर्जित ऊष्मा हाइड्रोजन के प्रज्ज्वलित होने के लिए पर्याप्त नहीं होती है।
रासायनिक समीकरण: Ca(s) + 2H₂O(l) → Ca(OH)₂(aq) + H₂(g)
🔸 Note: हाइड्रोजन गैस के बुलबुले कैल्सियम की सतह से चिपक जाते हैं, इसलिए कैल्सियम तैरने लगता है।
🔹 गर्म जल के साथ धीमी अभिक्रिया :-
🔸 मैग्नीशियम (Mg): मैग्नीशियम ठंडे जल के साथ अभिक्रिया नहीं, लेकिन गर्म जल के साथ अभिक्रिया करके वह मैग्नीशियम हाइड्रॉक्साइड एवं हाइड्रोजन गैस उत्पन्न करता है।
रासायनिक समीकरण: Mg + 2H₂O (गर्म) → Mg(OH)₂ + H₂
भाप के साथ धातुओं की अभिक्रिया :-
एल्युमिनियम, आयरन तथा जिंक जैसी धातुएँ न तो शीतल जल के साथ और न ही गर्म जल के साथ अभिक्रिया करती हैं, लेकिन भाप के साथ अभिक्रिया करके यह धातु ऑक्साइड तथा हाइड्रोजन प्रदान करती हैं।
- एल्युमिनियम (Al) की भाप के साथ अभिक्रिया: 2Al(s) + 3H₂O(g) → Al₂O₃(s) + 3H₂(g)
- लोहा (Fe) की भाप के साथ अभिक्रिया: 3Fe(s) + 4H₂O(g) → Fe₃O₄(s) + 4H₂(g)
जल के साथ कोई अभिक्रिया नहीं :-
लेड, कॉपर, सिल्वर तथा गोल्ड जैसी धातुएँ जल के साथ बिल्कुल अभिक्रिया नहीं करती हैं।
धातुओं की अम्ल के साथ अभिक्रिया :-
धातुएँ तनु अम्लों (जैसे HCl, H₂SO₄) के साथ अभिक्रिया करके संगत लवण और हाइड्रोजन गैस उत्पन्न करती हैं।
🔸 समीकरण: धातु + तनु अम्ल→लवण + H₂
तनु हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl) के साथ अभिक्रियाएँ :-
मैग्नीशियम, एल्युमिनियम, जिंक और आयरन तनु HCl से अभिक्रिया करते हैं:
- मैग्नीशियम (Mg): Mg(s) + 2HCl(aq) → MgCl₂(aq) + H₂(g) ↑
- एल्युमिनियम (Al): 2Al(s) + 6HCl(aq) → 2AlCl₃(aq) + 3H₂(g) ↑
- जिंक (Zn): Zn(s) + 2HCl(aq) → ZnCl₂(aq) + H₂(g) ↑
- आयरन (Fe): Fe(s) + 2HCl(aq) → FeCl₂(aq) + H₂(g) ↑
नाइट्रिक अम्ल (HNO₃) के साथ अपवाद :-
- तनु या सांद्र HNO₃ के साथ अधिकांश धातुएँ हाइड्रोजन गैस नहीं देतीं।
- कारण: HNO₃ एक प्रबल ऑक्सीकारक है, जो उत्पन्न H₂ को ऑक्सीकृत करके जल बना देता है।
- HNO₃ स्वयं नाइट्रोजन के ऑक्साइड (NO₂, NO, N₂O) में अपचयित हो जाता है।
🔸 अपवाद: मैग्नीशियम (Mg) और मैंगनीज (Mn) अति तनु HNO₃ के साथ अभिक्रिया करके H₂ गैस देते हैं।
सक्रियता श्रेणी :-
सक्रियता श्रेणी वह सूची है, जिसमें धातुओं को उनकी अभिक्रियाशीलता के अवरोही क्रम (सबसे अधिक से सबसे कम) में व्यवस्थित किया जाता है।
| K | पोटैशियम | सबसे अधिक अभिक्रियाशील |
| Na | सोडियम | ⬇ |
| Ca | कैल्सियम | ⬇ |
| Mg | मैग्नीशियम | ⬇ |
| AL | ऐलुमिनियम | ⬇ |
| Zn | जिंक | घटती अभिक्रियाशीलता |
| Fe | आयरन | ⬇ |
| Pb | लेड | ⬇ |
| [ H ] | [ हाइड्रोजन ] | ⬇ |
| Cu | कॉपर ( ताँबा ) | ⬇ |
| Hg | मर्करी ( पारद ) | ⬇ |
| Ag | सिल्वर | ⬇ |
| Au | गोल्ड | सबसे कम अभिक्रियाशील |
अधिक अभिक्रियाशील से K > Na > Ca > Mg > Al > Zn > Fe > Pb > Cu > Ag > Au कम अभिक्रियाशील तक
आयनिक यौगिकों के गुणधर्म :-
🔸 (i) भौतिक प्रकृति :- धन एवं ऋण आयनों के बीच मजबूत आकर्षण बल के कारण आयनिक यौगिक ठोस एवं थोड़े कठोर होते हैं। ये यौगिक सामान्यतः भंगुर होते हैं तथा दाब डालने पर टुकड़ों में टूट जाते हैं।
🔸 (ii) गलनांक एवं क्वथनांक :- आयनिक यौगिकों का गलनांक एवं क्वथनांक बहुत अधिक होता है, क्योंकि मजबूत अंतर-आयनिक आकर्षण को तोड़ने के लिए ऊर्जा की पर्याप्त मात्रा की आवश्यकता होती है।
🔸 (iii) घुलनशीलता :- वैद्युत संयोजक यौगिक सामान्यतः जल में घुलनशील तथा किरोसिन, पेट्रोल आदि जैसे विलायकों में अविलेय होते हैं।
🔸 (iv) विद्युत चालकता :- विद्युत चालन के लिए आवेशित कणों की गतिशीलता आवश्यक होती है।
अवस्थाओं के अनुसार विद्युत चालकता :-
- ठोस अवस्था: आयनिक यौगिक विद्युत का चालन नहीं करते।
- कारण: आयन स्थिर स्थानों पर बंधे होते हैं, गतिशील नहीं होते।
- जलीय विलयन में: विद्युत के सुचालक होते हैं।
- कारण: जल में घुलने पर आयन मुक्त हो जाते हैं और विद्युत क्षेत्र में गति करके विद्युत का चालन करते हैं।
- गलित अवस्था में: विद्युत के सुचालक होते हैं।
- कारण: ऊष्मा से आकर्षण बल कमज़ोर पड़ता है और आयन गतिशील हो जाते हैं।
धातुओं की प्राप्ति के स्रोत :-
- पृथ्वी की भूपर्पटी धातुओं का मुख्य स्रोत है।
- समुद्री जल में भी कुछ धातुएँ विलेय लवणों के रूप में पाई जाती हैं। उदाहरण: सोडियम क्लोराइड (NaCl), मैग्नीशियम क्लोराइड (MgCl₂)
- खनिज :- पृथ्वी की भूपर्पटी में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले तत्व या यौगिक को खनिज कहते हैं।
- अयस्क :- कुछ स्थानों पर खनिजों में कोई विशेष धातु काफ़ी मात्रा में होती है, जिसे निकालना लाभकारी होता है। इन खनिजों को अयस्क कहते हैं।
धातुओं का निष्कर्षण :-
धातु का निष्कर्षण उसकी सक्रियता पर निर्भर करता है। सक्रियता श्रेणी के आधार पर धातुएँ स्वतंत्र अवस्था या यौगिकों के रूप में पाई जाती हैं।
🔹 स्वतंत्र अवस्था में पाई जाने वाली धातुएँ :-
🔸 सबसे कम अभिक्रियाशील धातुएँ :-
- सक्रियता श्रेणी में नीचे स्थित धातुएँ बहुत कम अभिक्रियाशील होती हैं।
- ये धातुएँ पृथ्वी की भूपर्पटी में स्वतंत्र (मुक्त) अवस्था में पाई जाती हैं।
- उदाहरण: सोना (Au), चाँदी (Ag), प्लैटिनम (Pt), ताँबा (Cu)
- इनमें से कॉपर और सिल्वर कभी-कभी सल्फ़ाइड या ऑक्साइड अयस्क के रूप में संयुक्त अवस्था में भी पाए जाते हैं।
🔹 यौगिकों के रूप में पाई जाने वाली धातुएँ :-
🔸 उच्च अभिक्रियाशील धातुएँ :-
- सक्रियता श्रेणी के शीर्ष पर स्थित धातुएँ अत्यधिक अभिक्रियाशील होती हैं।
- ये कभी भी स्वतंत्र अवस्था में नहीं पाई जातीं।
- उदाहरण: पोटैशियम (K), सोडियम (Na), कैल्सियम (Ca), मैग्नीशियम (Mg), एल्युमिनियम (Al)
- ये धातुएँ सदैव संयुक्त अवस्था (यौगिकों) में पाई जाती हैं।
🔸 मध्यम अभिक्रियाशील धातुएँ :-
- सक्रियता श्रेणी के मध्य भाग में स्थित धातुएँ मध्यम अभिक्रियाशील होती हैं।
- उदाहरण: जिंक (Zn), आयरन (Fe), लेड (Pb)
- ये धातुएँ पृथ्वी की भूपर्पटी में मुख्यतः ऑक्साइड, सल्फ़ाइड, कार्बोनेट के रूप में पाई जाती हैं।
धातु निष्कर्षण के मुख्य चरण :-
- चरण 1: खनन: पृथ्वी की सतह या अंदर से अयस्क को निकालने की प्रक्रिया को खनन कहते हैं।
- चरण 2: अयस्क का सांद्रण: अयस्क से अशुद्धियों (गैंग जैसे मिट्टी, रेत, पत्थर) को हटाकर अयस्क को शुद्ध किया जाता है।
- चरण 3: धातु का निष्कर्षण: सांद्रित अयस्क से धातु प्राप्त करने की प्रक्रिया।
- चरण 4: शुद्धिकरण: प्राप्त धातु को अधिक शुद्ध किया जाता है।
गैंग :-
पृथ्वी से खनित अयस्कों में धातु के साथ-साथ मिट्टी, रेत, चट्टानें आदि अशुद्धियाँ मिली होती हैं। इन अवांछित अशुद्धियों को गैंग कहते हैं।
अयस्कों का समृद्धीकरण :-
अयस्क समृद्धीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें अयस्क से गैंग को अलग करके धातु के यौगिक की सांद्रता बढ़ाई जाती है।
🔸 समृद्धीकरण का आधार :-
अयस्कों से गैंग को हटाने के लिए जिन प्रक्रियाओं का उपयोग होता है वे अयस्क एवं गैंग के भौतिक या रासायनिक गुणधर्मों पर आधारित होते हैं।
🔹 1. अयस्क का सांद्रण :-
खनन से प्राप्त अयस्क में मिट्टी, रेत आदि गैंग उपस्थित रहती है। निष्कर्षण से पहले गैंग को हटाया जाता है। यही चरण अयस्क का सांद्रण कहलाता है।
🔹 2. अभिक्रियाशीलता के आधार पर धातुओं का वर्गीकरण :-
सांद्रण के बाद धातुओं को उनकी सक्रियता श्रेणी के अनुसार तीन वर्गों में बाँटकर अलग-अलग विधियाँ अपनाई जाती हैं:
1. सक्रियता श्रेणी में नीचे आने वाली धातुओं का निष्कर्षण :-
सक्रियता श्रेणी में नीचे आने वाली धातुएँ काफ़ी अनभिक्रिय होती हैं। इन धातुओं के ऑक्साइड को केवल गर्म करने से ही धातु प्राप्त किया जा सकता है।
🔹 उदाहरण :-
🔸 A. मरकरी (पारा) का निष्कर्षण – सिनाबार से :-
- सिनाबार (HgS) मरकरी का प्रमुख अयस्क है।
- चरण 1: वायु में तापन :-
- 2HgS(s) + 3O₂(g) → 2HgO(s) + 2SO₂(g) (तापन की उपस्थिति में)
- इस चरण में मरकरी सल्फ़ाइड (HgS), मरकरी ऑक्साइड (HgO) में परिवर्तित हो जाता है।
- चरण 2: मरकरी ऑक्साइड का अपघटन :-
- 2HgO(s) → 2Hg(l) + O₂(g) (तापन की उपस्थिति में)
- अधिक गर्म करने पर मरकरी ऑक्साइड अपघटित होकर पारा (Hg) तथा ऑक्सीजन गैस देता है।
🔸 B. कॉपर (ताँबा) का निष्कर्षण :-
- कॉपर प्राकृतिक रूप से Cu₂S (कॉपर ग्लांस) के रूप में पाया जाता है।
- चरण 1: वायु में तापन :-
- 2Cu₂S(s) + 3O₂(g) → 2Cu₂O(s) + 2SO₂(g) (तापन की उपस्थिति में)
- इस चरण में सल्फ़ाइड अयस्क, कॉपर ऑक्साइड (Cu₂O) में बदल जाता है।
- चरण 2: स्व-अपचयन :-
- 2Cu₂O(s) + Cu₂S(s) → 6Cu(s) + SO₂(g) (तापन की उपस्थिति में)
- इस अभिक्रिया में कॉपर ऑक्साइड, कॉपर सल्फ़ाइड द्वारा अपचयित होकर शुद्ध कॉपर (Cu) देता है। इसे स्व-अपचयन प्रक्रिया कहते हैं।
2. सक्रियता श्रेणी के मध्य में स्थित धातुओं का निष्कर्षण :-
- सक्रियता श्रेणी के मध्य में स्थित धातुएँ जैसे आयरन (Fe), जिंक (Zn), लेड (Pb), कॉपर (Cu) मध्यम अभिक्रियाशील होती हैं।
- ये धातुएँ प्रकृति में प्रायः सल्फ़ाइड या कार्बोनेट अयस्क के रूप में पाई जाती हैं।
- धातु को उसके ऑक्साइड से प्राप्त करना आसान होता है, इसलिए निष्कर्षण से पहले अयस्क को ऑक्साइड में बदलना आवश्यक होता है।
अयस्क को ऑक्साइड में बदलना :-
🔸 (i) भर्जन – सल्फाइड अयस्कों के लिए :-
🔹 भर्जन :- सल्फाइड अयस्क को वायु की उपस्थिति में अधिक ताप पर गर्म करने पर वह ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाता है। इस प्रक्रिया को भर्जन कहते हैं।
इस प्रक्रिया में सल्फ़ाइड अयस्क, ऑक्साइड अयस्क में परिवर्तित हो जाता है।
रासायनिक अभिक्रिया: 2ZnS(s) + 3O₂(g) → 2ZnO(s) + 2SO₂(g) (तापन की उपस्थिति में)
🔸 (ii) निस्तापन – कार्बोनेट अयस्कों के लिए :-
🔹 निस्तापन :- कार्बोनेट अयस्क को सीमित वायु में अधिक ताप पर गर्म करने से यह ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाता है। इस प्रक्रिया को निस्तापन कहा जाता है।
रासायनिक अभिक्रिया: ZnCO₃(s) → ZnO(s) + CO₂(g) (तापन की उपस्थिति में)
अपचयन :-
भर्जन या निस्तापन के बाद कार्बन जैसे उपयुक्त अपचायक का उपयोग कर धातु ऑक्साइड से किया जाता है।
🔹 उदाहरण :-
🔸 जिंक ऑक्साइड का अपचयन :- उदाहरण के लिए, जब जिंक ऑक्साइड को कार्बन के साथ गर्म किया जाता है तो यह जिंक धातु में अपचयित हो जाता है।
- रासायनिक अभिक्रिया: ZnO(s) + C(s) → Zn(s) + CO(g) (तापन की उपस्थिति में)
- अभिक्रिया में होने वाली प्रक्रिया:
- ZnO का अपचयन होकर Zn (जिंक) बनता है।
- कार्बन का ऑक्सीकरण होकर CO (कार्बन मोनोऑक्साइड) बनता है।
विस्थापन अभिक्रिया द्वारा अपचयन :-
केवल कार्बन ही नहीं, बल्कि अत्यधिक अभिक्रियाशील धातुएँ भी अपचायक के रूप में प्रयोग की जा सकती हैं। उदाहरण: सोडियम, कैल्सियम, एल्युमिनियम
- उदाहरण
- (मैंगनीज डाइऑक्साइड के साथ):
- 3MnO₂(s) + 4Al(s) → 3Mn(l) + 2Al₂O₃(s) + ऊष्मा
- इसमें:
- Al का ऑक्सीकरण होता है
- MnO₂ का अपचयन होकर Mn बनता है
थर्मिट अभिक्रिया :-
आयरन (III) ऑक्साइड और एल्युमिनियम की अभिक्रिया को थर्मिट अभिक्रिया कहते हैं।
🔸 अभिक्रिया: Fe₂O₃(s) + 2Al(s) → 2Fe(l) + Al₂O₃(s) + ऊष्मा
थर्मिट अभिक्रिया का उपयोग :-
- रेल की पटरियों की दरारें जोड़ने में
- भारी मशीनी पुर्ज़ों की मरम्मत में
3. सक्रियता श्रेणी में सबसे ऊपर स्थित धातुओं का निष्कर्षण :-
सक्रियता श्रेणी में सबसे ऊपर स्थित धातुएँ अत्यंत अभिक्रियाशील होती हैं। उदाहरण: Na, K, Ca, Mg, Al इन धातुओं को कार्बन के साथ गर्म करके या सामान्य रासायनिक अपचयन द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता।
🔸 कारण: इन धातुओं की बंधुता कार्बन की अपेक्षा ऑक्सीजन के प्रति अधिक होती है।
🔹 निष्कर्षण विधि: विद्युत-अपघटनी अपचयन :-
- इन धातुओं को विद्युत अपघटनी अपचयन द्वारा प्राप्त किया जाता है।
- इस विधि में विद्युत धारा की सहायता से गलित यौगिक का अपघटन करके धातु प्राप्त की जाती है।
- उदाहरण के लिए – सोडियम, मैग्नीशियम एवं कैल्सियम को उनके गलित क्लोराइडों के विद्युत अपघटन से प्राप्त किया जाता है।
उदाहरण :- सोडियम क्लोराइड (NaCl) का विद्युत अपघटन
- कैथोड (ऋण आवेशित इलेक्ट्रोड) पर:
- Na⁺ + e⁻ → Na
- सोडियम धातु प्राप्त होती है
- ऐनोड (धन आवेशित इलेक्ट्रोड) पर:
- 2Cl⁻ → Cl₂ + 2e⁻
- क्लोरीन गैस मुक्त होती है
धातुओं का परिष्करण :-
🔸 परिष्करण की आवश्यकता :- अपचयन प्रक्रमों से प्राप्त धातुएँ पूर्ण रूप से शुद्ध नहीं होती हैं। इनमें अपद्रव्य होते हैं, जिन्हें हटाकर ही शुद्ध धातु प्राप्त की जा सकती है।
🔸 विधि :- (विद्युत अपघटनी परिष्करण) धातुओं से अपद्रव्य को हटाने के लिए सबसे अधिक प्रचलित विधि विद्युत अपघटनी परिष्करण है।
विद्युत अपघटनी परिष्करण :-
इस विधि द्वारा अनेक धातुओं का परिष्करण किया जाता है, जैसे कॉपर, जिंक, टिन, निकैल, सिल्वर, गोल्ड आदि।
🔹 विद्युत अपघटनी परिष्करण की व्यवस्था :-
इस प्रकम में अशुद्ध धातु को ऐनोड तथा शुद्ध धातु की पतली परत को कैथोड बनाया जाता है। धातु के लवण विलयन का उपयोग विद्युत अपघट्य के रूप में होता है।
🔹 परिष्करण की प्रक्रिया :-
- विद्युत अपघट्य से जब धारा प्रवाहित की जाती है तब ऐनोड पर स्थित अशुद्ध धातु विद्युत अपघट्य में घुल जाती है।
- इतनी ही मात्रा में शुद्ध धातु विद्युत अपघट्य से कैथोड पर निक्षेपित हो जाती है।
- विलेय अशुद्धियाँ विलयन में चली जाती हैं तथा अविलेय अशुद्धियाँ ऐनोड तली पर निक्षेपित हो जाती हैं जिसे ऐनोड पंक कहते हैं।
संक्षारण :-
जब कोई धातु वातावरण में उपस्थित पदार्थों (मुख्यतः ऑक्सीजन, अम्ल, आद्रता (नमी) आदि) के संपर्क में आकर धीरे-धीरे क्षय (नष्ट) होने लगती है, तो इस प्रक्रिया को संक्षारण कहते हैं।
🔹 संक्षारण के उदाहरण :-
🔸 सिल्वर (चाँदी) का काला पड़ना :- खुली वायु में कुछ समय छोड़ देने पर सिल्वर की वस्तुएँ काली हो जाती हैं। यह वायु में उपस्थित सल्फ़र यौगिकों के साथ अभिक्रिया करके सिल्वर सल्फ़ाइड (Ag₂S) की परत बनने के कारण होता है।
🔸 कॉपर (ताँबा) पर हरी परत :- कॉपर वायु में उपस्थित आर्द्र कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂ + नमी) के साथ अभिक्रिया करता है।इससे इसकी भूरे रंग की चमक धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है और इस पर हरे रंग की परत चढ़ जाती है।
🔸 लोहे पर जंग लगना :- लंबे समय तक आर्द्र वायु में रहने पर लोहे की सतह पर भूरे रंग के परतदार पदार्थ की परत बन जाती है, जिसे जंग कहते हैं।
संक्षारण से सुरक्षा :-
पेंट करके, तेल लगाकर, ग्रीज़ लगाकर, यशदलेपन (लोहे की वस्तुओं पर जस्ते की परत चढ़ाकर), क्रोमियम लेपन, ऐनोडीकरण या मिश्रधातु बनाकर लोहे को जंग लगने से बचाया जा सकता है।
🔸 यशदलेपन :- लोहे एवं इस्पात को जंग से सुरक्षित रखने के लिए उन पर जस्ते (जिंक) की पतली परत चढ़ाने की विधि को यशदलेपन कहते हैं।
मिश्रात्वन क्या है?
धातुओं के गुणधर्मों को बेहतर बनाने की विधि को मिश्रात्वन कहते हैं। इसमें किसी धातु में अन्य धातु या अधातु मिलाकर उसके गुण बदले जाते हैं। इस विधि से इच्छानुसार कठोरता, मजबूती, जंग प्रतिरोध आदि गुण प्राप्त किए जाते हैं।
मिश्रातु :-
दो या दो से अधिक धातुओं के समांगी मिश्रण को मिश्रातु कहते हैं।
मिश्रातु बनाने की विधि :-
- मूल धातु को गलित अवस्था में लाया जाता है।
- अन्य तत्वों को निश्चित अनुपात में मिलाया जाता है।
- मिश्रण को कमरे के ताप पर ठंडा किया जाता है।
अमलगम :-
यदि किसी मिश्रातु में पारद उपस्थित हो तो इसके मिश्रातु को अमलगम कहते हैं।