संस्कृत व्याकरण सुबन्त पद | परिभाषा, भेद एवं उदाहरण सहित
सुबन्त पद
जैसा कि कहा जा चुका है, प्रत्येक सुबन्त पद लिंग, वचन, पुरुष और कारक से युक्त रहा करता है। संस्कृत में छह कारक माने गए हैं— कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान और अधिकरण । सम्बन्ध और सम्बोधन कारक नहीं हैं, क्योंकि इनका क्रिया के साथ सीधा सम्बन्ध नहीं है।
कर्ता — क्रिया करनेवाला कर्ता कहलाता है । कर्ताकारक में प्रथमा विभक्ति होती है। जैसे— मोहन पढ़ता है— मोहनः पठति । यहाँ 'मोहनः' कर्ताकारक है।
कर्म — क्रिया का फल जिसपर पड़े, उसे 'कर्म' कहते हैं । कर्मकारक में द्वितीया विभक्ति होती है। जैसे— सः चन्द्रं पश्यति — वह चन्द्रमा देखता है। यहाँ देखना क्रिया का असर 'चन्द्रं' पर पड़ रहा है, इसलिए यह कर्मकारक हुआ।
करण— क्रिया करने में जो अत्यंत सहायक हो, उसे करणकारक कहते हैं। करणकारक में तृतीया विभक्ति होती है; जैसे— यन्त्रेण कार्यम् करोति – यन्त्र से काम करता है। इस वाक्य में काम करने का साधन यन्त्र है, इसलिए 'यन्त्रेण' में करणकारक हुआ ।
सम्प्रदान— जिसको कुछ दिया जाए, उसे सम्प्रदानकारक कहते हैं। सम्प्रदानकारक में चतुर्थी विभक्ति होती है। जैसे— ब्राह्मणाय गां ददाति - - ब्राह्मण को गाय देता है। इस वाक्य में गाय देने की बात ब्राह्मण के लिए है, इसलिए 'ब्राह्मणाय' सम्प्रदानकारक हुआ।
अपादान — जिससे कोई वस्तु अलग हो, उसे अपादानकारक कहते हैं। अपादानकारक में पञ्चमी विभक्ति होती है। जैसे - वृक्षात् पत्रं पतति — पेड़ से पत्ता गिरता है । इस वाक्य में पेड़ से पत्ता का अलग होना प्रतीत होता है, इसलिए 'वृक्षात्' में अपादानकारक हुआ।
सम्बन्ध — जिससे किसी तरह का सम्बन्ध सूचित हो, उसे सम्बन्धकारक कहते हैं। सम्बन्धकारक में षष्ठी विभक्ति होती है। जैसे—– रामस्य अश्वः अस्ति—राम का घोड़ा है। इस वाक्य में अश्व (घोड़ा) का सम्बन्ध राम से है, इसलिए 'रामस्य' में षष्ठी विभक्ति हुई।
अधिकरण— आधार ( अवलंब) को अधिकरणकारक कहते हैं। अधिकरणकारक में सप्तमी विभक्ति होती है। जैसे— वृक्षे काकः अस्ति — पेड़ पर कौआ है। इस वाक्य में कौए के रहने का आधार वृक्ष है, इसलिए 'वृक्षे' अधिकरणकारक हुआ।
सम्बोधन — जिससे किसी को पुकारने का भाव सूचित हो, उसे सम्बोधनकारक कहते हैं। सम्बोधनकारक में प्रथमा विभक्ति होती है। जैसे— हे दिनेश ! अयि सीते ! अरे दुष्टाः !
यहाँ संक्षेप में कारकों का स्वरूप बतलाया गया है, विशेष जानकारी के लिए 'कारकप्रकरण' देखना चाहिए।
अभ्यास
1. सुबन्त पद किसे कहते हैं ?
2. करणकारक और अपादानकारक में क्या अंतर है ?
3. सम्प्रदानकारक के दो उदाहरण दें।
सुप् विभक्ति
नीचे सुप् विभक्ति एवं उससे निष्पन्न कुछ शब्दों के रूप दिए जा रहे हैं।
विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमा सु (स्) औ जस् (अः)
द्वितीया अम् औट् (औ) शस् (अः)
तृतीया टा (आ) भ्याम् भिस् (भिः)
चतुर्थी ङे (ए) भ्याम् भ्यस् (भ्यः)
पञ्चमी ङसि (अः) भ्याम् भ्यस् (भ्यः)
षष्ठी ङस् (अः) ओस् (ओः) आम्
सप्तमी ङि (इ) ओस् (ओ) सुप् (सु)
सम्बोधन में प्रथमा के समान ही रूप होते हैं, केवल एकवचन में कुछ रूप बदल जाते हैं। नीचे इन विभक्तियों से बने शब्दों के रूप दिए जाते हैं।
'देव' [देवता] (पुँल्लिंग)
एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमा देवः देवौ देवाः
(देव, देव ने) (दो देव, दो देवों ने) (अनेक देव, अनेक देवों ने)
द्वितीया देवम् देवौ देवान्
(देव को) (दो देवों को) (अनेक देवों को)
तृतीया देवेन देवाभ्याम् देवैः
(देव से, द्वारा) (दो देवों से) (देवों से)
चतुर्थी देवाय देवाभ्याम् देवेभ्यः
(देव के लिए, को) (दो देवों के लिए, को) (अनेक देवों के लिए, को)
पञ्चमी देवात्, देवाद् देवाभ्याम् देवेभ्यः
(देव से) (दो देवों से) (देवों से)
षष्ठी देवस्य देवयोः देवानाम्
(देव का, के, की) (दो देवों का, के, की) (देवों का, के, की)
सप्तमी देवे देवयो: देवेषु
(देव में, पर ) (दो देवों में, पर) (देवों में, पर)
सम्बोधन देव देवौ देवाः
(हे देव !) (हे दो देवो ! ) (हे देवो!)
बालक, गज, राम, कृष्ण, वृक्ष, विद्यालय, ग्राम, तडाग (तालाब), बाण, मृग, अश्व, सर्प, मठ, शकट (गाड़ी), दर्पण, दीप, छाग (बकरा ), कूप (कुआँ), चाप (धनुष), सूर्य, चन्द्र आदि सभी अकारान्त पुंल्लिंग शब्दों के रूप देव शब्द के समान होते हैं। कहीं-कहीं न् का ण् और स् का ष् हो जाता है, तदर्थ णत्व और षत्व विधान देखना चाहिए।
अकारान्त पुंल्लिंग 'विश्वपा' (विश्व-रक्षक) शब्द
एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमा विश्वपाः विश्वपौ विश्वपाः
द्वितीया विश्वपाम् विश्वपौ विश्वपः
तृतीया विश्वपा विश्वपाभ्याम् विश्वपाभिः
चतुर्थी विश्वपे विश्वपाभ्याम् विश्वपाभ्यः
पञ्चमी विश्वपः विश्वपाभ्याम् विश्वपाभ्यः
षष्ठी विश्वपः विश्वपोः विश्वपाम्
सप्तमी विश्वपि विश्वपोः विश्वपासु
सम्बोधन विश्वपाः विश्वपौ विश्वपाः
इसी प्रकार गोपा (गोपालक), दुग्धपा, धूम्रपा, सोमपा (सोमरस पीनेवाला), बलदा आदि आकारान्त पुंल्लिंग शब्दों के रूप होंगे।
'मुनि' शब्द (पुँल्लिंग)
एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमा मुनिः मुनी मुनयः
द्वितीया मुनिम् मुनी मुनीन्
तृतीया मुनिना मुनिभ्याम् मुनिभिः
चतुर्थी मुनिये मुनिभ्याम् मुनिभ्यः
पञ्चमी मुनेः मुनिभ्याम् मुनिभ्यः
षष्ठी मुनेः मुन्योः मुनीनाम्
सप्तमी मुनौ मुन्योः मुनिषु
सम्बोधन मुने मुनी मुनयः
सखि और पति शब्द को छोड़कर हरि, कवि, अग्नि, ऋषि, गिरि, असि, यति, व्याधि, शुचि, अरि, निधि, विधि, पाणि आदि सभी इकारान्त पुंल्लिंग शब्दों के रूप मुनि शब्द के समान होते हैं।
अनुवाद
(प्रथम पुरुष, एकवचन कर्ता तथा क्रिया से सम्बद्ध)
रमेश पढ़ता है— रमेशः पठति ।
कुत्ता दौड़ता है— कुक्करः धावति ।
राधा लिखती है— राधा लिखति ।
वह घूमता है— सः भ्रमतिः ।
बकरी चरती है— अजा चरति ।
दिनेश नहीं लिखता है— दिनेशः न लिखति ।
मोहन खाता है— मोहनः खादति ।
कोयल कूकती है— कोकिलः कूजति ।
वहाँ हाथी है— तत्र गजः अस्ति ।
अभ्यास
1. संस्कृत में अनुवाद करें-
लड़का पढ़ता है। सीता नहीं पढ़ती है। राम नहीं लिखता है। रमा क्या खाती है ? यहाँ गाय चरती है। वहाँ हरिण घूमता है। कौआ नहीं कूकता है। बकरी दौड़ती है । यहाँ कुत्ता नहीं है।
क्रिया-संकेत—
पढ़ता है— पठति
दौड़ता है— धावति
लिखता है— लिखति
घूमता है—भ्रम
चरता है— चरति
खाता है— खादति
कूकता है— कूजति
है— अस्ति
शब्द-संकेत—
कुत्ता — कुक्कुरः, वह (पुं० ) — सः, बकरी — अजा, कोयल — कोकिलः, हाथी — गजः, नहीं — न, कौआ — काकः, क्या — किं, वहाँ — तत्र, यहाँ — अत्र, गाय — गौः, — हरिण — हरिणः
'पति' [ स्वामी] (पुँल्लिंग)
एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमा पतिः पती पतयः
द्वितीया पतिम् पती पतीन्
तृतीया पत्या पतिभ्याम् पतिभिः
चतुर्थी पत्ये पतिभ्याम् पतिभ्यः
पञ्चमी पत्युः पतिभ्याम् पतिभ्यः
षष्ठी पत्युः पत्योः पतीनाम्
सप्तमी पत्यौ पत्योः पतिषु
सम्बोधन पते पती पतयः
अन्य शब्दों के साथ समास होने पर 'पति' के रूप 'मुनि' के समान होते हैं। जैसे— भूपति, महीपति, सेनापति, श्रीपति आदि ।
'सखि' [मित्र] (पुँल्लिंग)
एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमा सखा सखायौ सखायः
द्वितीया सखायम् सखायौ सखीन्
तृतीया सख्या सखिभ्याम् सखिभिः
चतुर्थी सख्ये सखिभ्याम् सखिभ्यः
पञ्चमी सख्युः सखिभ्याम् सखिभ्यः
षष्ठी सख्युः सख्योः सखीनाम्
सप्तमी सख्यौ सख्योः सखिषु
सम्बोधन सखे सखायौ सखायः
ईकारान्त पुंल्लिंग 'सुधी' (बुद्धिमान्) शब्द
एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमा सुधीः सुधियौ सुधियः
द्वितीया सुधियम् सुधियौ सुधियः
तृतीया सुधिया सुधीभ्याम् सुधीभि
चतुर्थी सुधिये सुधीभ्याम् सुधीभ्यः
पञ्चमी सुधियः सुधीभ्याम् सुधीभ्यः
षष्ठी सुधियः सुधियोः सुधियाम्
सप्तमी सुधियि सुधियोः सुधीषु
सम्बोधन सुधीः सुधियौ सुधियः
ईकारान्त पुंल्लिंग मन्दधी, हतधी, नी (नेता) आदि शब्दों के रूप 'सुधी' के समान चलते हैं।
'साधु' (पुल्लिंग)
एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमा साधुः साधू साधवः
द्वितीया साधुम् साधू साधून्
तृतीया साधुना साधुभ्याम् साधुभिः
चतुर्थी साधवे साधुभ्याम् साधुभ्यः
पञ्चमी साधोः साधुभ्याम् साधुभ्यः
षष्ठी साधोः साध्वोः साधूनाम्
सप्तमी साधौ साध्वोः साधुषु
सम्बोधन साधो साधू साधवः
गुरु, भानु, विधु, मृत्यु, तरु, प्रभु, विष्णु, सेतु (पुल), ऋतु, धातु, पशु, शिशु, शत्रु आदि सभी उकारान्त पुंल्लिंग शब्दों के रूप साधु शब्द के समान होते हैं।
'दातृ' [दानी] (पुंल्लिंग)
एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमा दाता दातारौ दातारः
द्वितीया दातारम् दातारौ दातृन्
तृतीया दात्रा दातृभ्याम् दातृभिः
चतुर्थी दात्रे दातृभ्याम् दातृभ्यः
पञ्चमी दातुः दातृभ्याम् दातृभ्यः
षष्ठी दातुः दात्रोः दातृणाम्
सप्तमी दातरि दात्रोः दातृषु
सम्बोधन दातः दातारौ दातारः
पितृ, भ्रातृ, जामातृ आदि कुछ शब्दों को छोड़कर नेतृ (अगुआ), श्रोतृ ( सुननेवाला), कर्तृ (करनेवाला), हन्तृ ( मारनेवाला), ज्ञातृ आदि ऋकारान्त पुंल्लिंग शब्दों के रूप दातृ शब्द के समान होते हैं।
'लता' (स्त्रीलिंग)
एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमा लता लते लताः
द्वितीया लताम् लते लताः
तृतीया लतया लताभ्याम् लताभिः
चतुर्थी लतायै लताभ्याम् लताभ्यः
पञ्चमी लतायाः लताभ्याम् लताभ्यः
षष्ठी लतायाः लतयोः लतानाम्
सप्तमी लतायाम् लतयोः लतासु
सम्बोधन लते लते लताः
बालिका, रमा, कन्या, गङ्गा, यमुना, सभा, आशा, माया, दया, आज्ञा आदि सभी आकारान्त स्त्रीलिंग शब्दों के रूप लता के समान होते हैं।
अनुवाद
(प्रथम पुरुष द्विवचनान्त कर्ता तथा क्रिया से सम्बद्ध)
दो मुनि घूमते हैं— मुनी भ्रमतः ।
दो लड़के पढ़ते हैं— बालकौ पठतः ।
दो छात्र लिखते हैं—छात्रौ लिखतः
दो हरिण कहाँ दौड़ते हैं— हरिणौ कुत्र धावतः ?
वे दोनों घूमते हैं — तौ भ्रमतः ।
दो कुत्ते नहीं दौड़ते हैं— कुक्करौ न धावतः ।
दो कोयलें कूकती हैं— कोकिलौ कूजतः।
वहाँ दो कौए हैं— तत्र काकौ स्तः ।
यहाँ दो दाता हैं— अत्र दातारौ स्तः ।
अभ्यास
1. संस्कृत में अनुवाद करें-
दो कुत्ते घूमते हैं। दो छात्र नहीं पढ़ते हैं। वहाँ दो लड़के दौड़ते हैं। यहाँ दो लड़के क्या लिखते हैं? वे दोनों कहाँ घूमते हैं? वहाँ दो पेड़ हैं। दो कुत्ते कहाँ दौड़ते हैं? दो लड़के क्या पढ़ते हैं ? दो घोड़े दौड़ते हैं।
क्रिया-संकेत—
दो पढ़ते हैं— पठतः
दो कूकती हैं— कूजतः
दो घूमते हैं—भ्रमतः
दो दौड़ते हैं— धावतः
दो लिखते हैं— लिखतः
दो हैं— स्तः
शब्द-संकेत—
दो लड़के — बालकौ, दो छात्र — छात्रौ, दो हरिण — हरिणौ, वे दोनों (पुं०) — तौ, दो कुत्ते — कुक्करौ, दो कोयलें — कोकिलौ, दो कौए — काकौ, कहाँ — कुत्र, दो पेड़ — वृक्षौ
'पितृ' [पिता ] (पुंल्लिंग)
एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमा पिता पितरौ पितरः
द्वितीया पितरम् पितरौ पितॄन्
तृतीया पित्रा पितृभ्याम् पितृभिः
चतुर्थी पित्रे पितृभ्याम् पितृभ्यः
पञ्चमी पितुः पितृभ्याम् पितृभ्यः
षष्ठी पितुः पित्रोः पितॄणाम्
सप्तमी पितरि पित्रोः पितृषु
सम्बोधन पितः पितरौ पितरः
भ्रातृ, जामातृ (दामाद), देवृ (देवर) तथा नृ (नर) शब्दों के रूप पितृ शब्द के समान होते हैं। केवल ‘नृ' के षष्ठी बहुवचन में दो रूप होते हैं— नृणाम् तथा नृणाम्।
'मति' [बुद्धि] (स्त्रीलिंग)
एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमा मतिः मती मतयः
द्वितीया मतिम् मती मतीः
तृतीया मत्या मतिभ्याम् मतिभिः
चतुर्थी मत्यै, मतये मतिभ्याम् मतिभ्यः
पञ्चमी मत्याः, मतेः मतिभ्याम् मतिभ्यः
षष्ठी मत्याः, मतेः मत्योः मतीनाम्
सप्तमी मत्याम्, मतौ मत्योः मतिषु
सम्बोधन मते मती मतयः
उन्नति, गति, भक्ति, शक्ति, जाति, रीति, नीति, धूलि, कान्ति, कीर्ति, स्मृति, बुद्धि, रात्रि, शान्ति, वृष्टि (मेघ), हानि, भूमि, मूर्ति आदि सभी इकारान्त स्त्रीलिंग शब्दों के रूप मति शब्द के समान होते हैं।
'नदी' (स्त्रीलिंग)
एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमा नदी नद्यौ नद्यः
द्वितीया नदीम् नद्यौ नदीः
तृतीया नद्या नदीभ्याम् नदीभिः
चतुर्थी नद्यै नदीभ्याम् नदीभ्यः
पञ्चमी नद्याः नदीभ्याम् नदीभ्यः
षष्ठी नद्याः नद्योः नदीनाम्
सप्तमी नद्याम् नद्योः नदीषु
सम्बोधन नदि नद्यौ नद्यः
नारी, गौरी, देवी, युवती, वाणी, जननी, दासी, गोपी, नगरी, रजनी, राज्ञी (रानी) आदि ईकारान्त स्त्रीलिंग शब्दों के रूप नदी शब्द के समान होते हैं।
'धेनु' [गाय] (स्त्रीलिंग)
एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमा धेनुः धेनू धेनवः
द्वितीया धेनुम् धेनू धेनूः
तृतीया धेन्वा धेनुभ्याम् धेनुभिः
चतुर्थी धेनवे, धेन्वै धेनुभ्याम् धेनुभ्यः
पञ्चमी धेनोः धेन्वाः धेनुभ्याम् धेनुभ्यः
षष्ठी धेनोः, धेन्वाः धेन्वोः धेनूनाम्
सप्तमी धेनौ, धेन्वाम् धेन्वोः धेनुषु
सम्बोधन धेनो धेनू धेनवः
रेणु (धूल), तनु (शरीर), चंचु (चोंच) आदि उकारान्त स्त्रीलिंग शब्दों के रूप 'धेनुके समान चलते हैं।
'फल' (नपुंसक)
एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमा फलम् फले फलानि
द्वितीया फलम् फले फलानि
तृतीया फलेन फलाभ्याम् फलैः
चतुर्थी फलाय फलाभ्याम् फलेभ्यः
पञ्चमी फलात्, फलाद् फलाभ्याम् फलेभ्यः
षष्ठी फलस्य फलयोः फलानाम्
सप्तमी फले फलयोः फलेषु
सम्बोधन फल फले फलानि
मित्र, वन, पुष्प, वचन, वस्त्र, अन्न, मुख, भोजन, धन, स्वर्ण, दुग्ध, घृत, व्यंजन (तरकारी), तैल, कमल, उद्यान, ईंधन ( जलावन), गृह, बल, रूप, हृदय, अस्त्र, शस्त्र, सुख, दुःख, पाप, पुण्य, चन्दन, नयन, शास्त्र, तट, तीर, पुस्तक, संगीत, मूल्य, मूल (जड़), कुशल, विष, क्षेत्र (खेत), आम्र, पत्र आदि सभी अकारान्त नपुंसक शब्दों के रूप फल शब्द के समान होते हैं।
'वारि' [जल] (नपुंसक)
एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमा वारि वारिणी वारीणि
द्वितीया वारि वारिणी वारीणि
तृतीया वारिणा वारिभ्याम् वारिभिः
चतुर्थी वारिणे वारिभ्याम् वारिभ्यः
पञ्चमी वारिणः वारिभ्याम् वारिभ्यः
षष्ठी वारिणः वारिणोः वारीणाम्
सप्तमी वारिणि वारिणोः वारिषु
सम्बोधन वारि, वारे वारिणी वारीणि
'स्वसृ' [बहन ] (स्त्रीलिंग)
एकवचन द्विवचन एकवचन
प्रथमा स्वसा स्वसारौ स्वसारः
द्वितीया स्वसारम् स्वसारौ स्वसृः
तृतीया स्वस्रा स्वसृभ्याम् स्वसृभिः
चतुर्थी स्वस्रे स्वसृभ्याम् स्वसृभ्यः
पञ्चमी स्वसुः स्वसृभ्याम् स्वसृभ्यः
षष्ठी स्वसुः स्वस्रोः स्वसृणाम्
सप्तमी स्वसरि स्वस्रोः स्वसृषु
सम्बोधन स्वसः स्वसारौ स्वसारः
'वाच्' [वाणी] (स्त्रीलिंग)
एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमा वाक्, वाग् वाचौ वाचः
द्वितीया वाचम् वाचौ वाचः
तृतीया वाचा वाग्भ्याम् वाग्भिः
चतुर्थी वाचे वाग्भ्याम् वाग्भ्यः
पञ्चमी वाचः वाग्भ्याम् वाग्भ्यः
षष्ठी वाचः वाचोः वाचाम्
सप्तमी वाचि वाचोः वाक्षु
सम्बोधन वाक्, वाग् वाचौ वाचः
'मातृ ' [ माता ] (स्त्रीलिंग)
एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमा माता मातरौ मातरः
द्वितीया मातरम् मातरौ मातृः
तृतीया मात्रा मातृभ्याम् मातृभिः
चतुर्थी मात्रे मातृभ्याम् मातृभ्यः
पञ्चमी मातुः मातृभ्याम् मातृभ्यः
षष्ठी मातुः मात्रोः मातॄणाम्
सप्तमी मातरि मात्रोः मातृषु
सम्बोधन मातु मातरौ मातरः
दुहितृ, ननान्दृ, यातृ आदि ऋकारान्त स्त्रीलिंग शब्दों के रूप 'मातृ' के समान होते हैं।
अनुवाद
(प्रथम पुरुष बहुवचनान्त कर्ता तथा क्रिया से सम्बद्ध)
लड़के लिखते हैं— बालकाः लिखन्ति।
कुत्ते यहाँ घूमते हैं— कुक्कुराः अत्र भ्रमन्ति ।
बकरे चरते हैं— छागाः चरन्ति।
हाथी नहीं दौड़ते हैं— गजाः न धावन्ति।
यहाँ लोग खाते हैं— अत्र जनाः खादन्ति ।
वहाँ छात्र पढ़ते हैं— तत्र छात्राः पठन्ति।
वे क्या लिखते हैं?— ते किं लिखन्ति ?
वहाँ घोड़े नहीं हैं— तत्र अश्वाः न सन्ति ।
नदियाँ बहती हैं— नद्यः वहन्ति ।
राधा श्याम की बहन है— राधा श्यामस्य स्वसा अस्ति।
माता की सेवा करनी चाहिए— मातुः सेवां कुर्यात् ।
अभ्यास
1. संस्कृत में अनुवाद करें—
वे क्या पढ़ते हैं? छात्र कहाँ लिखते हैं? यहाँ घोड़े चरते हैं। वहाँ लड़के घूमते हैं। वे क्या खाते हैं? छात्र नहीं दौड़ते हैं। लड़के कहाँ लिखते हैं? यहाँ हाथी नहीं हैं। क्या कुत्ते दौड़ते हैं? सिंह क्या खाते हैं? वहाँ घोड़े नहीं हैं। यहाँ लोग नहीं हैं।
क्रिया-संकेत—
लिखते हैं— लिखन्ति
घूमते हैं— भ्रमन्ति
चरते हैं— चरन्ति
हैं— सन्ति
दौड़ते हैं— धावन्ति
खाते हैं— खादन्ति
पढ़ते हैं— पठन्ति
बहती हैं — वहन्ति
शब्द-संकेत—
लड़के—बालकाः, कुत्ते—कुक्कुराः, वे (पूँ० ) — ते, बकरे — छागाः, कई छात्र—छात्राः, हाथी — गजः, लोग — जनाः, घोड़े — अश्वाः, कई सिंह — सिंहाः
2. निम्नलिखित शब्दों के रूप तृतीया विभक्ति के सभी वचनों में लिखें।
नदी, वारि, मति, साधु, स्वसृ पितृ
3. निम्नलिखित शब्दों के रूप पञ्चमी विभक्ति के सभी वचनों में लिखें।
लता, धेनु, दातृ, फल, मातृ, सखि
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