NCERT Class 10th Social Science Civics Notes Chapter 2 संघवाद
इस अध्याय मे हम संघवाद, संघीय शासन व्यवस्था, संघवाद के प्रकार, भारत में संघीय व्यवस्था, संघ सूची, राज्य सूची, समवर्ती सूची आदि के बारे में विस्तार से पड़ेगे।
संघवाद
संघवाद :-
एक ऐसा तंत्र जहाँ देश की शासन-शक्ति केंद्र और राज्यों के बीच संवैधानिक रूप से विभाजित रहती है, संघवाद कहलाती हैं।
संघीय शासन व्यवस्था :-
संघीय शासन व्यवस्था एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें शासन की शक्तियाँ संविधान द्वारा केंद्र और राज्य/प्रांत सरकारों के बीच विभाजित की जाती हैं। सामान्यतः इसमें दो स्तर की सरकारें होती हैं — केंद्र सरकार (राष्ट्रीय स्तर) और राज्य/प्रांत सरकारें (क्षेत्रीय स्तर)।
केंद्र सरकार राष्ट्रीय महत्व के विषयों (जैसे रक्षा, विदेश नीति) का संचालन करती है, जबकि राज्य/प्रांत सरकारें स्थानीय एवं दैनिक प्रशासन से जुड़े विषयों (जैसे पुलिस, कृषि, स्वास्थ्य) को संभालती हैं।
दोनों स्तर की सरकारें अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में स्वतंत्र होती हैं, एक-दूसरे के अधीन नहीं होतीं, और सीधे जनता के प्रति जवाबदेह होती हैं।
एकात्मक शासन व्यवस्था :-
एकात्मक शासन व्यवस्था एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें शासन की सभी प्रमुख शक्तियाँ केवल केंद्रीय सरकार के पास होती हैं। राज्य या प्रांत सरकारें (यदि हों) अपनी शक्तियाँ केंद्र से प्राप्त करती हैं और केंद्र के अधीन कार्य करती हैं।
इस व्यवस्था में पूरे देश के लिए एक ही सर्वोच्च सरकार होती है, जो सभी महत्वपूर्ण निर्णय लेती है। केंद्र सरकार आवश्यकता पड़ने पर राज्यों/प्रांतों की शक्तियों में परिवर्तन कर सकती है।
संघीय शासन व्यवस्था और एकात्मक शासन व्यवस्था में अंतर :-
| संघीय शासन व्यवस्था | एकात्मक शासन व्यवस्था |
|---|---|
| सत्ता केंद्र और राज्यों के बीच विभाजित होती है। | सत्ता का मुख्य केंद्र केवल केंद्रीय सरकार होती है। |
| शक्तियों का बँटवारा संविधान द्वारा निर्धारित होता है। | राज्य/प्रांत की शक्तियाँ केंद्र द्वारा निर्धारित होती हैं। |
| केंद्र और राज्य दोनों अपने-अपने क्षेत्र में स्वतंत्र होते हैं। | राज्य/प्रांत सरकारें केंद्र के अधीन कार्य करती हैं। |
| किसी स्तर की सरकार दूसरे के अधिकार नहीं छीन सकती। | केंद्र सरकार राज्यों की शक्तियों में परिवर्तन कर सकती है। |
| दो या अधिक स्तर की सरकारें होती हैं। | सामान्यतः एक ही सर्वोच्च सरकार होती है। |
| उदाहरण: भारत, अमेरिका | उदाहरण: ब्रिटेन (UK) |
संघीय शासन व्यवस्था की महत्वपूर्ण विशेषताएँ :-
- सरकार के दो या अधिक स्तर होते हैं (केंद्र और राज्य)।
- एक ही नागरिकों पर अलग-अलग स्तर की सरकारें शासन करती हैं।
- शक्तियों का बँटवारा संविधान द्वारा स्पष्ट रूप से किया जाता है।
- हर स्तर की सरकार का अपना अधिकार-क्षेत्र होता है।
- कोई भी सरकार दूसरे स्तर के अधिकार मनमाने ढंग से नहीं छीन सकती।
- संविधान के मूल प्रावधानों में बदलाव के लिए सभी स्तरों की सहमति आवश्यक होती है।
- स्वतंत्र न्यायपालिका संविधान की व्याख्या और केंद्र और राज्यों के बीच विवाद होने पर निर्णायक की भूमिका निभाता है।
- केंद्र और राज्यों के लिए राजस्व के अलग-अलग स्रोत निर्धारित होते हैं।
संघीय व्यवस्था के दो प्रमुख उद्देश्य :-
- देश की एकता बनाए रखना और मजबूत करना
- क्षेत्रीय विविधताओं का सम्मान करना
सफल संघीय व्यवस्था के लिए दो जरूरी शर्तें :-
- आपसी भरोसा: सभी स्तरों की सरकारों को एक-दूसरे पर भरोसा होना चाहिए कि वे अपने-अपने दायरे में काम करेंगी।
- सहमति: सत्ता के बँटवारे के नियमों पर सभी राज्यों की सहमति होनी चाहिए।
संघीय शासन व्यवस्था के गठन के दो तरीके :-
दुनिया के अलग-अलग संघीय देशों में सत्ता का बँटवारा एक जैसा नहीं होता। यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह संघ कैसे बना:
🔹 तरीका 1: साथ आकर संघ बनाना :-
🔸 कैसे बनता है :- दो या अधिक स्वतंत्र राष्ट्र मिलकर एक बड़ा संघ बनाते हैं।
🔸 विशेषता :- वे अपनी पहचान बनाए रखते हैं और संप्रभुता साझा करते हैं। ऐसे देशों में राज्य आमतौर पर केंद्र से अधिक शक्तिशाली होते हैं।
🔸 उदाहरण :- अमेरिका, स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रेलिया।
🔹 तरीका 2: साथ लेकर संघ बनाना :-
🔸 कैसे बनता है :- एक बड़ा देश अपनी आंतरिक विविधता को ध्यान में रखकर राज्यों का गठन करता है। बाद में केंद्र और राज्यों के बीच सत्ता का बँटवारा किया जाता है।
🔸 विशेषता :- इस तरह बने संघों में केंद्र सरकार राज्यों की तुलना में ज्यादा ताकतवर होती है। सभी राज्यों को समान अधिकार तो मिलते हैं, लेकिन किसी विशेष परिस्थिति में किसी एक राज्य को विशेष दर्जा भी दिया जा सकता है।
🔸 उदाहरण :- भारत, बेल्जियम, स्पेन।
भारत में संघीय व्यवस्था :-
भारत एक विशाल और विविधताओं वाला देश है — यहाँ कई भाषाएँ, धर्म और संस्कृतियाँ हैं। संविधान भारत को “राज्यों का संघ” घोषित करता है। इसमें संघ शब्द नहीं आया पर भारतीय संघ का गठन संघीय शासन व्यवस्था के सिद्धांत पर हुआ है।
संविधान ने शुरू में दो स्तर की सरकारें बनाई (केंद्र और राज्य), लेकिन बाद में पंचायतों और नगरपालिकाओं के रूप में तीसरा स्तर जोड़ा गया। तीनों स्तर की सरकारों के अपने अलग अधिकार-क्षेत्र हैं।
विधायी शक्तियों का बँटवारा (तीन सूचियाँ) :-
संविधान में केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का बँटवारा तीन सूचियों के माध्यम से किया गया है:
🔸 (i) संघ सूची :- इसमें राष्ट्रीय महत्व के विषय हैं जैसे रक्षा, विदेशी मामले, बैंकिंग, संचार और मुद्रा। संघ सूची में वर्णित विषयों के बारे में कानून बनाने का अधिकार सिर्फ़ केंद्र सरकार को है।
🔸 (ii) राज्य सूची :- इसमें प्रांतीय और स्थानीय महत्व के विषय हैं जैसे पुलिस, व्यापार, वाणिज्य, कृषि और सिंचाई। राज्य सूची में वर्णित विषयों के बारे में सिर्फ़ राज्य सरकार ही कानून बना सकती है।
🔸 (iii) समवर्ती सूची :- इसमें साझा दिलचस्पी के विषय हैं जैसे शिक्षा, वन, मज़दूर-संघ, विवाह, गोद लेना और उत्तराधिकार। इन पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं।
नोट :- समवर्ती सूची में यदि दोनों के कानूनों में टकराव हो, तो केंद्र का कानून मान्य होगा।
🔸 बाकी बचे विषय (अवशिष्ट विषय) :- जो विषय किसी सूची में नहीं हैं (जैसे कंप्यूटर सॉफ्टवेयर), उन पर कानून बनाने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है।
भारतीय संघ की विशिष्टताएँ :-
भारत ‘सबको साथ लेकर चलने’ वाली संघीय व्यवस्था है, इसलिए सभी राज्यों को बराबर अधिकार नहीं हैं।
🔸 विशेष दर्जा :- असम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और मिज़ोरम जैसे राज्यों को अनुच्छेद 371 के तहत उनकी संस्कृति और सामाजिक स्थिति के कारण विशेष शक्तियाँ प्राप्त हैं।
🔸 केंद्र शासित प्रदेश :- कुछ छोटे/विशेष क्षेत्र अपने आकार के चलते स्वतंत्र प्रांत नहीं बन सकते। चंडीगढ़, लक्षद्वीप और दिल्ली जैसे इलाके इसी कोटि में आते हैं और इन्हें केंद्र शासित प्रदेश कहा जाता है। इन क्षेत्रों को राज्यों वाले अधिकार नहीं हैं। इन इलाकों का शासन चलाने का विशेष अधिकार केंद्र सरकार को प्राप्त है।
भारत को ‘राज्यों का संघ’ क्यों कहा जाता है?
भारत विविधताओं वाला विशाल देश है। संविधान ने सत्ता को केंद्र और राज्यों के बीच बाँटकर राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय स्वायत्तता दोनों सुनिश्चित कीं। इसलिए भारत को राज्यों का संघ कहा जाता है।
सत्ता के बँटवारे में बदलाव की प्रक्रिया (संविधान में संशोधन) :-
यह बँटवारा हमारे संविधान की बुनियादी संरचना है। इसमें बदलाव करना बहुत कठिन है। अकेले संसद इस व्यवस्था में बदलाव नहीं कर सकती।
🔸 आवश्यक शर्तें :-
- ऐसे किसी भी बदलाव को पहले संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से मंजूर किया जाना होता है।
- फिर कम से कम आधे राज्यों की विधान सभाओं से उसे मंजूर करवाना होता है।
विवाद की स्थिति में न्यायपालिका की भूमिका :-
- संवैधानिक प्रावधानों और कानूनों के क्रियान्वयन की देख-रेख में न्यायपालिका महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों के विवाद की स्थिति में उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय ही अंतिम फैसला करते हैं।
केंद्र और राज्य का वित्तीय अधिकार :-
सरकार चलाने और अपनी जिम्मेवारियों का निर्वाह करने के लिए ज़रूरी राजस्व की उगाही के संबंध में केंद्र और राज्य सरकारों को कर लगाने और संसाधन जमा करने के अधिकार हैं।
भाषायी राज्य :-
- भारत में राज्यों का गठन भाषा के आधार पर करना लोकतंत्र की पहली बड़ी और कठिन परीक्षा थी।
- 1947 से 2019 तक भारत के राजनीतिक मानचित्र में कई महत्वपूर्ण बदलाव हुए।
- कई पुराने राज्य समाप्त हुए, नए राज्य बने, तथा सीमाएँ और नाम बदले गए।
राज्यों का पुनर्गठन कैसे हुआ?
🔸 भाषा के आधार पर राज्यों का गठन :-
- नए राज्यों को बनाने के लिए 1950 के दशक में भारत के कई पुराने राज्यों की सीमाएँ बदलीं।
- उद्देश्य: ऐसा यह सुनिश्चित करने के लिए किया गया कि एक भाषा बोलने वाले लोग एक राज्य में आ जाएँ।
🔸 अन्य आधारों पर बने राज्य :-
कुछ राज्यों का गठन केवल भाषा पर नहीं, बल्कि क्षेत्रीय संस्कृति, भूगोल और जातीयताओं (एथनीसिटी) की विभिन्नता को रेखांकित करने और उन्हें आदर देने के लिए भी किया गया। उदाहरण: इनमें नगालैंड, उत्तराखंड और झारखंड जैसे राज्य शामिल हैं।
भाषा के आधार पर राज्यों का गठन के दौरान केंद्र सरकार का डर बनाम वास्तविकता :-
- कई राष्ट्रीय नेताओं को डर था कि भाषायी राज्यों से देश टूट सकता है।
- इसी कारण केंद्र सरकार ने पुनर्गठन को कुछ समय के लिए टाल दिया।
🔸 लेकिन बाद का अनुभव बताता है:
- भाषायी राज्यों से देश और अधिक एकीकृत व मजबूत हुआ।
- प्रशासन पहले की तुलना में अधिक सुविधाजनक हुआ।
भारत की भाषा-नीति :-
🔹 क्या भारत की कोई राष्ट्रभाषा है?
- नहीं। भारतीय संविधान में किसी एक भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया गया।
- हिंदी को राजभाषा (Official Language) माना गया।
🔸 कारण: हिंदी लगभग 40% भारतीयों की मातृभाषा है, बाकी 60% लोग अन्य भाषाएँ बोलते हैं। ऐसे में हिंदी को अकेली राष्ट्रभाषा थोपना गलत होता।
🔹 अन्य भाषाओं का संरक्षण :-
- संविधान में हिंदी के अलावा 22 अन्य भाषाओं को अनुसूचित भाषा का दर्जा दिया गया।
- केंद्र सरकार की नौकरियों के उम्मीदवार इनमें से किसी भी भाषा में परीक्षा दे सकते हैं।
- राज्यों की अपनी राजभाषाएँ हैं और अधिकांश काम उसी भाषा में होता है।
अंग्रेज़ी का विवाद और समाधान :-
संविधान के अनुसार सरकारी कामकाज की भाषा के तौर पर अंग्रेज़ी का प्रयोग 1965 में बंद हो जाना चाहिए था।
🔸 विरोध :- गैर-हिंदी भाषी राज्यों (विशेषकर तमिलनाडु) ने इसका कड़ा विरोध किया। तमिलनाडु में इस मांग ने उग्र रूप ले लिया था।
🔸 सरकार का समाधान (लचीलापन) :- केंद्र सरकार ने हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी को राजकीय कामों में प्रयोग की अनुमति देकर इस विवाद को सुलझाया।
🔸 आलोचना :- अनेक लोगों का मानना था कि इस समाधान से अंग्रेजी-भाषी अभिजन को लाभ पहुँचेगा।
केंद्र–राज्य संबंधों में बदलाव और संघवाद की मज़बूती :-
सत्ता की साझेदारी केवल नियमों से नहीं, बल्कि नेताओं और पार्टियों के व्यवहार से तय होती है। भारत में इसे हम दो चरणों में देख सकते हैं:
🔹 (1) 1990 से पहले का दौर (एकदलीय प्रभुत्व) :-
🔸 स्थिति :- इस दौर में केंद्र और अधिकांश राज्यों में एक ही पार्टी (कांग्रेस) की सरकार थी।
🔸 नुकसान :- राज्य सरकारों ने अपनी स्वायत्तता का प्रयोग बहुत कम किया; वे केंद्र के निर्देशों पर अधिक निर्भर रहीं।
जब केंद्र और राज्य में अलग-अलग दलों की सरकारें रहीं तो केंद्र सरकार ने राज्यों के अधिकारों की अनदेखी करने की कोशिश की।
🔸 शक्तियों का दुरुपयोग :- उन दिनों केंद्र सरकार अक्सर संवैधानिक प्रावधानों का दुरुपयोग करके विपक्षी दलों की राज्य सरकारों को भंग कर देती थी। यह संघवाद की भावना के प्रतिकूल काम था।
🔹 (2) 1990 के बाद का दौर (गठबंधन सरकार और क्षेत्रीय दल)
1990 के बाद भारतीय राजनीति में एक बड़ा बदलाव आया, जिसने संघवाद को मजबूत किया:
- अनेक राज्यों में क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ।
- केंद्र में गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ।
🔸 क्यों हुआ ऐसा?
किसी एक दल को लोकसभा में स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। राष्ट्रीय दलों को क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर सरकार बनानी पड़ी।
🔸 इस दौर के फायदे :-
- सत्ता में वास्तविक साझेदारी बढ़ी।
- राज्यों की स्वायत्तता का सम्मान बढ़ा।
- सहयोग और सहमति की नई राजनीतिक संस्कृति विकसित हुई।
🔹 न्यायपालिका (सुप्रीम कोर्ट) का योगदान :-
इस प्रवृत्ति को सुप्रीम कोर्ट के एक बड़े फैसले से भी बल मिला। इस फ़ैसले के कारण राज्य सरकार को मनमाने ढंग से भंग करना केंद्र सरकार के लिए मुश्किल हो गया।
🔹 नतीजा: संघवाद हुआ मजबूत :-
- इन तीनों कारणों से आज भारत का संघवाद पहले से कहीं ज्यादा प्रभावी है।
- सत्ता की साझेदारी अब सिर्फ किताबों में नहीं, बल्कि असल जिंदगी में भी दिखती है।
- राज्य सरकारें अब अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हैं और केंद्र उनकी अनदेखी नहीं कर सकता।
गठबंधन सरकार :-
गठबंधन सरकार वह सरकार होती है जो दो या अधिक राजनीतिक दलों के आपसी सहयोग से बनाई जाती है। जब किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, तब कई दल मिलकर सरकार बनाते हैं।
गठबंधन में शामिल दल सामान्यतः एक साझा कार्यक्रम स्वीकार करते हैं और मिलकर शासन चलाते हैं।
भारत में सत्ता का विकेंद्रीकरण :-
भारत में तीन स्तरों की सरकार की जरूरत क्यों पड़ी?
- भारत बहुत बड़ा देश है। हमारे राज्य यूरोप के देशों से भी बड़े हैं।
- उदाहरण: उत्तर प्रदेश की जनसंख्या रूस से ज्यादा है। महाराष्ट्र लगभग जर्मनी के बराबर है।
- इतने बड़े राज्यों के अंदर भी बहुत विविधता है। अलग-अलग क्षेत्रों की अलग-अलग समस्याएँ हैं।
- इसलिए सिर्फ केंद्र और राज्य सरकार से काम नहीं चल सकता। राज्य के अंदर भी सत्ता का बँटवारा करना जरूरी था।
- इसी जरूरत को पूरा करने के लिए तीसरा स्तर – स्थानीय सरकार बनाई गई।
विकेंद्रीकरण क्या है?
जब केंद्र और राज्य सरकारों से कुछ शक्तियाँ लेकर स्थानीय सरकारों (गाँव और शहर) को दे दी जाती हैं, तो इसे सत्ता का विकेंद्रीकरण कहते हैं।
विकेंद्रीकरण की आवश्यकता (विकेंद्रीकरण के फायदे) :-
- स्थानीय समस्याओं का समाधान स्थानीय स्तर पर बेहतर होता है।
- लोगों को अपने क्षेत्र की समस्याओं की अधिक समझ होती है।
- संसाधनों का उपयोग अधिक कुशलता से किया जा सकता है।
- नागरिकों की सीधी भागीदारी संभव होती है।
- लोकतंत्र और स्व-शासन मजबूत होता है।
1992 का संवैधानिक संशोधन : तीसरे स्तर को सशक्त बनाना :-
1992 में संविधान में संशोधन करके लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के इस तीसरे स्तर को ज्यादा शक्तिशाली और प्रभावी बनाया गया।
🔸 संशोधन के मुख्य प्रावधान :-
- स्थानीय स्वशासी निकायों के नियमित चुनाव अनिवार्य किए गए।
- पंचायतों और नगरपालिकाओं को संवैधानिक मान्यता मिली।
- निर्वाचित स्वशासी निकायों के सदस्य तथा पदाधिकारियों के पदों में
- अनूसचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और पिछड़ी जातियों के लिए सीटें आरक्षित हैं।
- कम से कम एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गईं।
- हर राज्य में पंचायत और नगरपालिका चुनाव कराने के लिए प्रत्येक राज्य में राज्य चुनाव आयोग की स्थापना की गई।
- राज्य सरकारों को स्थानीय निकायों को कुछ शक्तियाँ और राजस्व सौंपने का प्रावधान किया गया।
पंचायती राज व्यवस्था (स्थानीय शासन – ग्रामीण क्षेत्र) :-
गाँवों के स्तर पर स्थानीय शासन व्यवस्था को पंचायती राज कहा जाता है। इसके तीन स्तर होते हैं:
- (क) ग्राम पंचायत (गाँव स्तर)
- (ख) पंचायत समिति (ब्लॉक/प्रखंड स्तर)
- (ग) जिला परिषद (जिला स्तर)
(क) ग्राम पंचायत (गाँव स्तर) :-
- प्रत्येक गाँव में, (और कुछ राज्यों में ग्राम-समूह की) एक ग्राम पंचायत होती है।
- यह एक तरह की परिषद् है जिसमें कई सदस्य और एक अध्यक्ष होता है।
- सदस्य वार्डों से चुने जाते हैं और उन्हें सामान्यतया पंच कहा जाता है।
- अध्यक्ष को प्रधान या सरपंच कहा जाता है।
- इनका चुनाव गाँव अथवा वार्ड में रहने वाले सभी वयस्क लोग मतदान के जरिए करते हैं।
- यह पूरे पंचायत के लिए फ़ैसला लेने वाली संस्था है।
- पंचायतों का काम ग्राम-सभा की देखरेख में चलता है।
🔹 ग्राम सभा :-
- गाँव के सभी मतदाता इसके सदस्य होते हैं।
- ग्राम पंचायत का काम ग्राम सभा की देखरेख में होता है।
- ग्राम सभा साल में कम से कम 2–3 बार बैठक करती है।
- इसे ग्राम पंचायत पंचायत का बजट पास करना और कामकाज की समीक्षा करना इसका मुख्य कार्य है।
(ख) पंचायत समिति (ब्लॉक/प्रखंड स्तर) :-
कई ग्राम पंचायतों को मिलाकर एक पंचायत समिति बनती है। इसे मंडल या प्रखंड स्तरीय पंचायत भी कहते हैं।
🔸 सदस्य :- इसके सदस्यों का चुनाव उस इलाके के सभी पंचायत सदस्य करते हैं।
(ग) जिला परिषद (जिला स्तर) :-
किसी ज़िले की सभी पंचायत समितियों को मिलाकर ज़िला परिषद् का गठन होता है।
🔸 सदस्य :-
- जिला परिषद के अधिकांश सदस्यों का चुनाव होता है।
- उस जिले से चुने गए सांसद (MP) और विधायक (MLA) भी इसके सदस्य होते हैं।
- ज़िला स्तर की संस्थाओं के कुछ अधिकारी भी सदस्य के रूप में होते हैं।
🔸 प्रमुख :- ज़िला परिषद् का प्रमुख इस परिषद् का राजनीतिक प्रधान होता है।
शहरी स्थानीय शासन :-
- शहरों में नगरपालिका होती है।
- बड़े शहरों में नगर निगम होता है।
- दोनों का संचालन निर्वाचित प्रतिनिधि करते हैं।
- नगरपालिका का प्रमुख उसका राजनीतिक प्रधान होता है।
- नगरनिगम के ऐसे पदाधिकारी को मेयर कहते हैं।
इस व्यवस्था की उपलब्धियाँ और चुनौतियाँ :-
🔹 स्थानीय शासन का महत्व :-
- यह दुनिया में लोकतंत्र का सबसे बड़ा प्रयोग है।
- लगभग 36 लाख प्रतिनिधियों का चुनाव होता है।
- इससे लोकतंत्र की जड़ें मजबूत हुई हैं।
- महिलाओं का प्रतिनिधित्व और आवाज़ मजबूत हुई है।
🔹 समस्याएँ और सीमाएँ :-
- ग्राम सभाओं की बैठकें नियमित नहीं होतीं।
- कई राज्यों ने स्थानीय सरकारों को पर्याप्त अधिकार नहीं दिए।
- इस प्रकार हम स्वशासन की आदर्श स्थिति से काफ़ी दूर हैं।