NCERT Class 10th Science Notes Chapter 8 आनुवंशिकता

 इस अध्याय में हम आनुवंशिकता के अर्थ, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में लक्षणों के स्थानांतरण, ग्रेगर जॉन मेंडल के मटर के पौधों पर किए गए प्रयोगों (एकसंकर और द्विसंकर संकरण), प्रभावी व अप्रभावी लक्षणों, तथा मानव में लिंग निर्धारण की वैज्ञानिक प्रक्रिया के बारे में विस्तार से पढ़ेंगे।

आनुवंशिकता

विभिन्नता क्या है?

एक ही प्रजाति के जीवों में पाए जाने वाले अंतर को विभिन्नता कहते हैं। ये अंतर शरीर की बनावट, रंग, आकार, सहनशीलता आदि में हो सकते हैं। ये विभिन्नताएँ पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित होती हैं।

विभिन्नताएँ कैसे उत्पन्न होती हैं?

जनन के दौरान कोशिका अपने डी.एन.ए. की प्रतिकृति बनाती है। यह प्रक्रिया पूरी तरह सटीक नहीं होती। इसमें कभी-कभी छोटी-मोटी त्रुटियाँ (errors) रह जाती हैं। यही त्रुटियाँ संतानों में विभिन्नता उत्पन्न करती हैं।

विभिन्नता के दो प्रकार :-

शारीरिक कोशिका विभिन्नताजनन कोशिका विभिन्नता
यह शरीर की कोशिकाओं में उत्पन्न होती है।यह जनन कोशिकाओं में उत्पन्न होती है।
यह अगली पीढ़ी में स्थानांतरित नहीं होती।यह अगली पीढ़ी में स्थानांतरित होती है।
यह जैव विकास में सहायक नहीं होती।यह जैव विकास में सहायक होती है।
इन्हें उपार्जित लक्षण कहते हैं।इन्हें आनुवंशिक लक्षण कहते हैं।
उदाहरण: कान छेदना, कुत्तों की पूँछ काटना, व्यायाम से मांसपेशियाँ बढ़नाउदाहरण: बालों का रंग, आँखों का रंग, शरीर की लंबाई


जनन और विभिन्नता का संबंध :-

जब कोई जीव जनन करता है, तो वह अपनी आनुवंशिक जानकारी (DNA) अगली पीढ़ी को देता है। इस प्रक्रिया में कुछ गुण माता-पिता के समान होते हैं, जबकि कुछ नए गुण भी उत्पन्न हो जाते हैं। इन नए गुणों को ही विभिन्नता कहा जाता है।

जनन के दौरान विभिन्नताओं का संचयन (अलैंगिक व लैंगिक जनन में विभिन्नता) :-

🔸 1. अलैंगिक जनन :- इस प्रकार के जनन में केवल एक ही जनक शामिल होता है। इसलिए उत्पन्न संतति लगभग माता-पिता के समान होती है। इसमें विभिन्नताएँ बहुत कम होती हैं और यहाँ अंतर केवल डी.एन.ए. कॉपी में आई मामूली कमियों की वजह से होता है।

🔸 2. लैंगिक जनन :- इसमें दो जनक भाग लेते हैं। दोनों के डी.एन.ए. के मिलने से संतान में नए गुण उत्पन्न होते हैं। इसी कारण लैंगिक जनन में विभिन्नताएँ अधिक और स्पष्ट होती हैं, जो विकास के लिए महत्वपूर्ण होती हैं।

पीढ़ियों में विभिन्नताओं का संचयन :-

विभिन्नताएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी जमा होती रहती हैं:

  • पहली पीढ़ी: माता-पिता से आधारिक शारीरिक डिज़ाइन और कुछ नई विभिन्नताएँ प्राप्त करती है।
  • दूसरी पीढ़ी: इसे पहली पीढ़ी वाली पुरानी विभिन्नताएँ तो मिलती ही हैं, साथ ही कुछ अपनी नई विभिन्नताएँ भी जुड़ जाती हैं।

🔸 निष्कर्ष: जैसे-जैसे पीढ़ियाँ आगे बढ़ती हैं, विभिन्नताओं का भंडार बढ़ता जाता है।

विभिन्नता का महत्व :-

🔸 (i) जीवों के अस्तित्व में सहायता :-

विभिन्नता के कारण कुछ जीव बदलते हुए वातावरण में अपने आप को ढाल लेते हैं और जीवित रह पाते हैं।

  • उदाहरण के लिए –
    • अधिक गर्मी सहने वाले जीव
    • रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता रखने वाले जीव
    • ऐसे जीवों के जीवित रहने की संभावना अधिक होती है।

🔸 (ii) प्राकृतिक चयन :-

प्रकृति उन्हीं जीवों का चयन करती है जो वातावरण के अनुकूल होते हैं। जो जीव अनुकूलन नहीं कर पाते, वे धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं। यही प्रक्रिया जैव विकास का आधार है।

आनुवंशिकता क्या है?

आनुवंशिकता वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा माता-पिता के गुण संतानों में स्थानांतरित होते हैं। आनुवंशिकता के नियम बताते हैं कि यह स्थानांतरण कैसे होता है और लक्षण विश्वसनीय रूप से कैसे आगे बढ़ते हैं।

जनन का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यही होता है कि संतान अपने माता-पिता जैसी होती है, लेकिन पूरी तरह समान नहीं।

आनुवंशिकता के नियम क्यों ज़रूरी हैं?

आनुवंशिकता के नियम हमें यह समझने में सहायता करते हैं कि —

  • कौन-सा लक्षण माता से और कौन-सा पिता से प्राप्त होगा।
  • यदि माता की आँखों का रंग नीला हो और पिता की काला हो, तो संतान की आँखों का रंग क्या होगा, यह अनुमान लगाया जा सकता है।
  • कुछ लक्षण एक पीढ़ी में दिखाई नहीं देते, लेकिन अगली पीढ़ी में फिर से प्रकट हो जाते हैं — इसका कारण भी ये नियम बताते हैं।
  • ये नियम यह समझने में मदद करते हैं कि गुण कैसे विरासत में मिलते हैं और जैव विकास कैसे होता है।

वंशागत लक्षण क्या होते हैं?

वे गुण या विशेषताएँ जो माता-पिता से बच्चों में जीन के माध्यम से स्थानांतरित होती हैं, वंशागत लक्षण कहलाती हैं। उदाहरण: आँखों का रंग, बालों का रंग, कद (लंबाई), रक्त समूह आदि।

🔸 सरल शब्दों में :- जो लक्षण हमें अपने माता-पिता से विरासत में मिलते हैं, उन्हें वंशागत लक्षण कहते हैं।

लक्षणों की वंशागति के नियम: मेंडल का योगदान :-

Gregor Mendel को आनुवंशिकी का जनक कहा जाता है। उन्होंने मटर के पौधे पर प्रयोग करके वंशागति के नियम बताए।

🔹 मुख्य सिद्धांत :-

माता और पिता समान मात्रा में DNA संतति को देते हैं। इसलिए प्रत्येक लक्षण के लिए संतान में दो कारक (Genes) होते हैं –

  • एक माता से
  • एक पिता से

इन्हीं के आधार पर तय होता है कि कौन-सा लक्षण दिखाई देगा।

मेंडल के प्रयोग :-

मेंडल ने मटर के पौधे के अनेक विपर्यासी (विकल्पी) लक्षणों का अध्ययन किया, जो स्थूल रूप से दिखाई देते हैं, उदाहरणतः गोल/झुर्रीदार बीज, लंबे/बौने पौधे, सफेद/बैंगनी फूल इत्यादि।

उसने विभिन्न लक्षणों वाले मटर के पौधों को लिया जैसे कि लंबे पौधे तथा बौने पौधे। इससे प्राप्त संतति पीढ़ी में लंबे एवं बौने पौधों के प्रतिशत की गणना की।

🔹 एकल संकरण (मोनोहाइब्रिड) :-

जब केवल एक ही लक्षण (जैसे- ऊँचाई) का अध्ययन किया जाता है।

  • F1 पीढ़ी: जब शुद्ध लंबे (TT) और शुद्ध बौने (tt) पौधों का संकरण कराया गया, तो सभी पौधे लंबे (Tt) प्राप्त हुए। कोई भी पौधा बीच की ऊँचाई का नहीं था।
  • F2 पीढ़ी: जब F1 पीढ़ी के पौधों का स्वपरागण कराया गया, तो परिणाम चौंकाने वाले थे:
    • 75% पौधे लंबे थे और 25% पौधे बौने थे।

🔸 अनुपात: 3:1 (3 लंबे पैौथे 1 बौना पौधा)।

🔸 निष्कर्ष: लक्षण (बौनापन) F1 में मौजूद था लेकिन व्यक्त नहीं हुआ। ‘T’ की एक प्रति भी पौधे को लंबा बनाने के लिए काफी है।

🔹 द्वि-संकरण द्वि/विकल्पीय संकरण :-

जब दो अलग-अलग लक्षणों (जैसे- बीज का आकार और रंग) का एक साथ अध्ययन किया जाता है।

🔸 प्रयोग: गोल-पीले बीज (प्रभावी) का झुर्रीदार-हरे बीज (अप्रभावी) वाले पौधों से संकरण।

  • F1 पीढ़ी: सभी पौधे गोल और पीले बीज वाले थे।
  • F2 पीढ़ी: यहाँ नए संयोजन देखने को मिले (जैसे: गोल-हरे और झुर्रीदार-पीले बीज)।

🔸 निष्कर्ष – स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम: लक्षणों का प्रत्येक जोड़ा दूसरे जोड़े से स्वतंत्र होकर वंशानुगत होता है। यानी बीज का गोल होना इस पर निर्भर नहीं करता कि पौधा लंबा है या बौना।

मेंडल द्वारा मटर के पौधे का चयन :-

Gregor Mendel ने मटर के पौधे का चयन निम्न कारणों से किया —

  • मटर के पौधों में विपर्यासी (वैकल्पिक) लक्षण स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
  • इनका जीवन चक्र छोटा होता है, जिससे कई पीढ़ियों का अध्ययन आसान होता है।
  • इनमें स्वपरागण होता है, साथ ही कृत्रिम परपरागण भी कराया जा सकता है।
  • एक ही पौधे से अधिक संख्या में बीज प्राप्त होते हैं।

मेंडल के नियम :-

आनुवंशिकता के तीन प्रमुख नियम :-

🔹 1. प्रभाविता का नियम :-

जब दो विपरीत लक्षणों वाले पौधों का संकरण किया जाता है, तो F₁ पीढ़ी में केवल एक लक्षण ही प्रकट होता है, जिसे प्रभावी लक्षण कहते हैं। दूसरा लक्षण अप्रभावी (दबा हुआ) रहता है।

  • उदाहरण:
    • Tt में —
      • T = लंबा (प्रभावी)
      • t = बौना (अप्रभावी)

🔹 2. पृथक्करण का नियम :-

किसी भी लक्षण की दो प्रतियाँ (एलील) युग्मक बनते समय अलग-अलग हो जाती हैं और अलग-अलग युग्मकों में चली जाती हैं। इसे शुद्धता का नियम भी कहते हैं।

🔹 3. स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम :-

एक से अधिक लक्षणों के युग्म एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप से वंशागत होते हैं।

  • उदाहरण:
    • पौधे की लंबाई
    • बीज का आकार

ये दोनों लक्षण अलग-अलग ढंग से संतानों में जाते हैं।

लक्षण अपने आप को किस प्रकार व्यक्त करते हैं?

कोशिका के अंदर डी.एन.ए. पाया जाता है, जिसमें सभी आनुवंशिक जानकारियाँ होती हैं। डी.एन.ए. की क्रियात्मक इकाई को जीन कहते हैं। जीन में उपस्थित सूचना के अनुसार प्रोटीन का निर्माण होता है। ये प्रोटीन ही हमारे शरीर के विभिन्न लक्षणों की अभिव्यक्ति को नियंत्रित करते हैं।

प्रोटीन एंजाइम या हार्मोन के रूप में कार्य करते हैं। यदि एंजाइम सही प्रकार से कार्य करता है तो हार्मोन पर्याप्त मात्रा में बनता है और लक्षण सही रूप में प्रकट होता है।

🔸 उदाहरण:

  • यदि पौधे में जीन T (प्रभावी) होता है, तो एंजाइम ठीक से कार्य करता है, हार्मोन पर्याप्त मात्रा में बनता है और पौधा लंबा होता है।
  • लेकिन यदि जीन t (अप्रभावी) होता है, तो एंजाइम कम प्रभावी होता है, हार्मोन कम बनता है और पौधा बौना रह जाता है।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि — जीन → प्रोटीन → एंजाइम/हार्मोन → लक्षण

लिंग निर्धारण क्या है?

लिंग निर्धारण वह प्रक्रिया है जिससे यह तय होता है कि नवजात शिशु लड़का होगा या लड़की।

👉 अलग-अलग जीवों में लिंग निर्धारण की विभिन्न विधियाँ होती हैं।

विभिन्न जीवों में लिंग निर्धारण :-

🔸 पर्यावरण पर आधारित :- कुछ प्राणियों में (जैसे कुछ सरीसृप) लिंग निर्धारण निषेचित अंडे (युग्मक) के ऊष्मायन ताप पर निर्भर करता है कि संतति नर होगी या मादा।

🔸 लिंग परिवर्तन :- कुछ जीव जैसे घोंघा अपने जीवनकाल में अपना लिंग बदल सकते हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि इन जीवों में लिंग निर्धारण स्थायी या आनुवंशिक नहीं होता।

🔸 आनुवंशिक कारकों द्वारा लिंग निर्धारण :- मनुष्य में लिंग निर्धारण आनुवंशिक आधार पर होता है। अर्थात् माता-पिता से प्राप्त गुणसूत्र (X और Y) यह तय करते हैं कि संतान लड़का होगी या लड़की।

  • XX → लड़की
  • XY → लड़का

मानव गुणसूत्रों की संरचना :-

मानव की प्रत्येक कोशिका में 23 जोड़े गुणसूत्र होते हैं:

  • 22 जोड़े: ये माता और पिता दोनों में एक जैसे होते हैं और शारीरिक लक्षणों को नियंत्रित करते हैं।
  • 1 जोड़ा: इसे ‘लिंग सूत्र’ कहते हैं, जो यह तय करता है कि संतान लड़का होगी या लड़की।
  • स्त्री:→ XX (दोनों X गुणसूत्र समान होते हैं)
  • पुरुष:→ XY (एक X और एक छोटा Y गुणसूत्र)

स्त्री में गुणसूत्र का पूर्ण युग्म होता है तथा दोनों ‘X’ कहलाते हैं। लेकिन पुरुष (नर) में यह जोड़ा परिपूर्ण जोड़ा नहीं होता, जिसमें एक गुण सूत्र सामान्य आकार का ‘X’ होता है तथा दूसरा गुणसूत्र छोटा होता है, जिसे ‘Y’ गुणसूत्र कहते हैं। अतः स्त्रियों में ‘XX’ तथा पुरुष में ‘XY’ गुणसूत्र होते हैं।

लिंग निर्धारण की प्रक्रिया :-

मानव में लिंग निर्धारण आनुवंशिक रूप से होता है। संतान को अपनी माता से हमेशा X गुणसूत्र ही मिलता है क्योंकि माता के पास केवल XX गुणसूत्र होते हैं। इसलिए संतान का लिंग पिता से मिलने वाले गुणसूत्र पर निर्भर करता है।

  • लड़की :-
  • यदि पिता के शुक्राणु से X गुणसूत्र अंडे के X गुणसूत्र से मिल जाए, तो
  • 👉 XX = लड़की पैदा होती है।
  • लड़का :-
  • यदि पिता के शुक्राणु से Y गुणसूत्र अंडे के X गुणसूत्र से मिल जाए, तो
  • 👉 XY = लड़का पैदा होता है।
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