Bihar Board Class 10th Social Science Geography Notes Chapter 5 बिहार : कृषि , वन , खनिज , ऊर्जा , उद्योग एवं परिवहन
5. बिहार : कृषि एवं वन संसाधन
बिहार : कृषि , वन , खनिज , ऊर्जा , उद्योग एवं परिवहन
बिहार एक कृषि प्रधान राज्य है, यहाँ की 80 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है।
यहाँ चार फसलें-भदई, अगहनी, रबी एवं गरमा लगाई जाती है।
भदई- इसकी शुरूआत मई-जून से होती है और अगस्त-सितम्बर में कटाई कर ली जाती है। भदई धान, ज्वार, बाजरा, मकई के अंतिरिक्त जूट और सब्जी की खेती इस समय में की जाती है।
अगहनी- यह बिहार की सबसे महत्वपूर्ण फसल है। यह फसल मध्य जून से अगस्त तक लगाई जाती है और नवम्बर दिसम्बर में काट ली जाती है। धान, ज्वार, बाजरा, अरहर, गन्ना इस फसल की मुख्य पैदावार है।
रबी- जिस फसल को अक्टूबर-नवम्बर के मध्य में लगाया जाता है और अप्रैल में काट लिया जाता है। गेंहूँ, जौ, दलहन, तेलहन इस फसल की खास उपज है।
गरमा- इस फसल को गरमी के मौसम में उन क्षेत्रो में लगाया जाता है जहाँ सिंचाई की समुचित व्यवस्था है, या फिर निम्न भूमि में जहाँ स्थानीय जल श्रोतों में मिट्टी गिली रहती है, इस फसल में गरमा, धान और ग्रीष्मकालीन सब्जियाँ उगाई जाती है।
खाद्यान्न फसलें :
धान : धान बिहार की महत्वपूर्ण खाद्यान्न फसलें हैं। इसकी खेती राज्य के सभी भागों में की जाती है।
धान का सबसे अधिक उत्पादन पश्चिमी चम्पारण, रोहतास तथा औरंगाबाद में होता है। पहले स्थान पर पश्चिमी चम्पारण है जबकि रोहतास और औरंगाबाद क्रमशः द्वितीय और तृतीय स्थान पर है।
गेहूँ- खाद्यान्न फसलों में धान के बाद गेहूँ दूसरा महत्वपूर्ण फसल है। गेहूँ के उत्पादन में रोहतास जिला प्रथम स्थान पर है।
मक्का : यह बिहार का तीसरा मुख्य खाद्यान्न फसल है। यह भदई, अगहनी, रबी एवं गरमा चारों फसलों में पैदा होता है। मक्का का सबसे अधिक उत्पादन खगड़िया जिला में होता है, दूसरे और तीसरे स्थान पर क्रमशः समस्तीपुर एवं बेगूसराय है।
मोटे अनाज : मोटे अनाजों में महुआ, मिलेट, ज्वार और बाजरा को शामिल किया जाता है। प्रथम स्थान पर मोटे अनाज के उत्पादन में मधुबनी जिला आता है। दूसरे स्थान पर किशनगंज है।
तेलहन : राई, सरसों, तीसी, सूरजमुखी, कुसुम, रेड़ी, तिल, मूँगफली मुख्य रूप से तेलहन फसलें हैं। तिलहन उत्पादन में सबसे आगे पश्चिम चंपारण है।
दलहन : बिहार में दलहन फसल में चना, मसूर, खेसारी, मटर, मूँग, अरहर, उरद तथा कुरथी प्रमुख है। चना, मसूर, खेसारी, मटर एवं गरमा मूँग रबी दलहन की फसलें हैं तथा अरहर तथा मूँग खरीफ की फसलें हैं।
दलहन उत्पादन में पटना प्रथम स्थान पर है। तथा औरंगाबाद और कैमुर क्रमशः द्वितीय और तृतीय स्थान पर है।
व्यावसायिक फसलें
गन्ना : हमारे राज्य में गन्ना की खेती के लिए सभी अनुकुल भौगोलिक परिस्थितियाँ विद्यमान हैं, फिर भी यहाँ गन्ना का प्रति हेक्टेयर उत्पादन बहुत कम है, यहाँ के उत्तरी पश्चिम भाग में इनकी खेती प्रमुखता से होती है।
गन्ने के उत्पादन में पश्चिमी चम्पारण पहले स्थान पर हैं जबकि दूसरे और तीसरे स्थान पर क्रमश: गोपालगंज और पूर्वी चम्पारण जिले हैं।
जूट : जूट का उत्पादन बिहार के उत्तर पूर्वी जिलों में होता है, क्योंकि यह अधिक वर्षा वाला क्षेत्र हैं, जो कि जूट उत्पादन के लिए उपयुक्त हैं। सम्पूर्ण देश का आठ प्रतिशत जूट उत्पादन बिहार में होता है। पश्चिम बंगाल और असम के बाद, बिहार का तिसरा स्थान हैं।
तम्बाकू : तम्बाकू उत्पादन में बिहार का भारत में छठा स्थान हैं, इसकी खेती के लिए गंगा का दियारा क्षेत्र सबसे उपयुक्त हैं।
सब्जियाँ, फल एवं मशाले : बिहार में सब्जियों के अंतर्गत आलू, प्याज, भिन्डी, परोर, लौकी, पालक, लाल साग, लूबिया, फूलगोभी पटल, पत्तागोभी आदि की खेती की
जाती हैं। इनमें आलू सबसे प्रमुख सब्जी ही नही बल्कि एक महत्वपूर्ण खाद्य पदार्थ भी हैं। इसकी खेती बिहार के लगभग सभी जिलों में होती हैं।
मिर्च : मिर्च की खेती दियरा क्षेत्र में गंगा के दोनों किनारे पर वृहत पैमाने पर की जाती है। बिहार में अन्य मसालें जैसे- हल्दी, धनियां, अदरक, सौफ एवं लहसुन की भी खेती की जाती हैं।
मौसमी फलां में आम, लीची, अमरूद, केला, पपीता, सिंघाड़ा एवं मखाने बिहार में उत्पन्न किए जाते हैं। आम के लिए भागलपूर, मुजफ्फरपूर, पूर्णिया, दरभंगा जिले प्रसिद्ध है। लीची के लिए मुजफ्फरपूर और वैशाली को ख्याति प्राप्त हैं।
कुषि की समस्याएँ : बिहार की 90 प्रतिशत आबादी देहातों में रहती हैं और 80 प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर आश्रित है। बिहार में कृषि निम्नलिखित समस्याओं से जूझ रहा है।
1.मिट्टी कटाव एवं गुणवत्ता का ह्रास – भारी वर्षा और बाढ़ के कारण मिट्टी का कटाव होता है, साथ ही वर्षां से लगातार रासायनिक खादों के उपयोग से भी मिट्टी की ह्रास हो रहा है।
2.घटिया बीजों का उपयोग – उच्च कोटी के बीज का उपयोग नहीं होने के कारण प्रति एकड़ उपज अन्य राज्यों की अपेक्षा कम है।
3.खेतों का छोटा आकार का होना – हमारे राज्य में खेतों का छोटा आकार होने के कारण वैज्ञानिक खेती संभव नहीं हो पाती है।
4.किसानों में रूढ़िवादिता – यहाँ के किसान परिश्रम पर कम और रूढ़िवादिता पर ज्यादा भरोसा करते हैं।
5.सिंचाई की समस्या – यहाँ की कृषि मॉनसून पर निर्भर है, सिंचाई की समुचित व्यवस्था नहीं है।
6.बाढ़ – यहाँ की ज्यादातर नदियाँ विनाशकारी बाढ़ के लिए प्रसिद्ध है। प्रत्येक वर्ष यहाँ बाढ़ की समस्याओं से किसान परेशान रहते हैं।
जल संसाधन :
बिहार में जल का भंडार है, जो दो स्त्रोतों से प्राप्त होता है-
1.धरातलीय जल : इसमें नदियाँ, जलाशय , तालाब आते हैं।
2.भूमिगत जल : इसमें कुआँ, झरने, नलकूप, हैंडपम्प आदि आते हैं।
बिहार में 95 प्रतिशत से अधिक जल संसाधन का उपयोग सिंचाई में होता है। यहाँ मॉनसून से वर्षा की अवधि मात्र चार महिने की होती है।
बिहार में सिंचाई के लिए नहर प्रमुख साधन है। यहाँ कुल सिंचित भूमि का 40.63 प्रतिशत भूमि की सिंचाई नहरों द्वारा होती है।
आजादी के पहले की नहरें :
सोन नहर : यह सिंचाई परियोजना का एक भाग है, यह बिहार का पहला आधुनिक नहर है, इसे 1874 में डिहरी पर निर्मित किया गया, इससे दो नहरें निकाली गई है।
सारण नहर- गोपालगंज प्रखंड में 1880 में इस नहर का निर्माण किया गया था।
त्रिवेणी नहर- इस नहर का निर्माण 1903 में पश्चिमी चम्पारण में भारत-नेपाल सीमा पर गण्डक नदी त्रिवेणी नामक स्थान के निकट हुआ, इसकी कुल लम्बाई 1,094 किमी है।
आजादी के बाद की नहरें :
कोसी नहर- कोसी नदी पर भारत-नेपाल सीमा पर हनुमान नगर के पास बाँध बनाकर दो नहरें निकाली गई है- पूर्वी कोसी के किनारें पर पूर्वी कोसी नहर और पश्चिमी किनारें पर पश्चिमी कोसी नहर
पूर्वी कोसी नहर की लम्बाई 44 किमी है तथा पश्चिमी कोसी नहर की लंबाई 115 किमी है।
गण्डक नहर- गण्डक नदी पर त्रिवेणी नामक स्थान से 85 किमी दक्षिण बाल्मीकि नगर के पास एक 743 किमी लम्बा और 760 मी० ऊँचा बाँध बनाया गया था। इस बाँध से पश्चिम की ओर तिरहुत नहर और पूरब की ओर सारण नहर निकाली गई है।
नलकूप- सिंचाई के लिए नलकूप नहर के बाद दूसरा प्रमुख साधन है।
कुआँ- बिहार में कुँऐं का उपयोग प्राचीन काल से होता आ रहा है, लेकिन अब इसका प्रचलन कम हो गया है। इसके जगह पर अब पम्पसेटों का प्रयोग होने लगा है।
कुआँ से सिंचाई का काम बिहार में मात्र 2 प्रतिशत है।
तालाब- भारत में 9 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि की सिंचाई तालाबों द्वारा किया जाता है। जबकि बिहार में मात्र 2.10 प्रतिशत ही भूमि की सिंचाई तालाबों द्वारा किया जाता है।
तालाबों द्वारा सिंचाई में मधुबनी जिला प्रथम स्थान पर है तथा दूसरे स्थान पर नालंदा जिला है।
बिहार में सिंचाई के अन्य साधनों में झील, पोखर, पईन अहर, कृत्रिम झील, ढेकू और मोट आदि है।
बिहार की नदी घाटी योजनाऐं :
बिहार में बहुत सारी बहुउद्देशीय नदी घाटी योजनाओं का विकास किया गया है जिससे जल-विद्युत, उत्पादन, सिंचाई मछली पालन, पेय-जल, औद्योगिक उपयोग, मनोरंजन एवं यातायात का विकास हो सके। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए कई योजनाएँ बनाई कई हैं। जिसमें तीन प्रमुख योजनाऐं हैं-
1.सोन नदी घाटी परियोजना
2.गण्डक नदी घाटी परियोजना
3.कोसी नदी घाटी परियोजना
अन्य परियोजनाएँ हैं-
1.दुर्गावती जलाशय परियोजना
2.चन्दन बहुआ परियोजना
3.बागमती परियोजना
4.बरनार जलाशय परियोजना
1.सोन नदी घाटी परियोजना :
यह परियोजना बिहार की सबसे पुरानी और पहली नदी घाटी परियोजना है इसका विकास अंग्रजी सरकार ने 1874 में सिंचाई के लिए किया था। इसकी कुल लम्बाई 130 किमी है।
2.गण्डक नदी घाटी परियोजना :
यह उत्तर प्रदेश और बिहार की संयुक्त परियोजना है जो भारत और नेपाल के सहयोग से बाल्मीकिनगर के पास शुरू किया गया है। इस परियोजना से बिजली, सिंचाई और जल की आपूर्ति नेपाल को भी की जाती है।
इस परियोजना से भैंसालोटन स्थान पर एक बाँध बनाकर जलाशय का भी निर्माण किया गया है जिससे दो नहरें निकाली गई है। प्रथम पश्चिमी नहर द्वारा गोपालगंज, सारण और सिवान में लगभग 4 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जाती है। पूर्वी नहर द्वारा पश्चिमी चम्पारण, पूर्वी चम्पारण, मुजफ्फरपुरए वैशाली तथा समस्तीपुर जिले की लगभग 4.5 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जाती है।
3.कोसी नदी घाटी परियोजना :
इस परियोजना की परिकल्पना 1896 में किया गया था किन्तु वास्तविक रूप से 1955 में कार्य प्रारंभ हुआ।
इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य नदी के बदलते मार्ग को रोकना है। उपजाऊ भूमि की बर्बादी पर नियंत्रण, भयानक बाढ़ से क्षति पर रोक, जल से सिंचाई का विकास, जल विद्युत उत्पादन, मत्स्य पालन, नौका रोहण और पर्यावरण पर नियंत्रण आदि है।
वन संसाधन :
बिहार विभाजन के बाद अधिकतर वन क्षेत्र झारखंड राज्य में चला गया। वर्तमान में बिहार में मात्र 7.68 प्रतिशत ही क्षेत्र में वन है। बिहार में कुल 6374 वर्ग किमी अधिसूचित वन क्षेत्र है। मात्र 76 वर्ग किमी में अतिसघन वन है।
वनों एवं वन्य जीवों का संरक्षण :
बिहार में कुल भौगोलिक क्षेत्र का मात्र 6.87 प्रतिशत भाग ही वनों से अच्छादित है। जबकि राष्ट्रीय नीति के अनुसार 33 प्रतिशत भू-भाग पर वन होना चाहिए।
बिहार में वन्य प्राणीयों के संरक्षण के लिए प्राचीन काल से ही कई रीति-रिवाजों का प्रचलन है। कई धार्मिक अनुष्ठान वृक्षों के नीचे ही किए जाते हैं। यहाँ परम्परागत रूप से वट, पीपल, आँवला और तुलसी की पूजा की जाती है। यहाँ चींटी से लेकर साँप जैसे विषैले जंतु को भोजन दिया जाता है। पक्षियों को दाना देने की प्रथा है। साथ ही
राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर वन्य प्राणीयों के संरक्षण के लिए कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।
बिहार में 14 अभ्यारण्य और एक राष्ट्रीय उद्यान है। पटना का संजय गाँधी जैविक उद्यान, बेगूसराय का कावर झाल, दरभंगा का केशेश्वर स्थान वन्य जीवों के संरक्षण के लिए प्रसिद्ध है।
वन एवं वन्य जीवों के संरक्षण के लिए राज्य सरकार की वन, पर्यावरण तथा जल संसाधन विकास विभाग प्रमुख है। इसके अलावा वन्य जीवों के संरक्षण के लिए कई स्वयंसेवी संस्थाऐं भी काम कर रही है।
(क) बिहार : खनिज एवं ऊर्जा संसाधन (Bihar Khanij evam Urja Sansadhan)
खनिज संपदा की उपलब्धता किसी भी क्षेत्र या राज्य के आर्थिक विकास का सूचक होता है। बिहार विभाजन के बाद लगभग संपूर्ण खनिज संपदा झारखंड में चला गया और बिहार राज्य लगभग खनिज सम्पदा से खाली हो गया।
बिहार में चूना पत्थर और पाइराईट ही ऐसे दो खनिज हैं जो पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है।
बिहार में खनिजों को निम्नलिखित वर्गों में बाँटा गया है।
1.धात्विक खनिज : इसके अंतर्गत बॉक्साइट, मेग्नेटाइट और सोना अयस्क आते हैं।
2.अधात्विक खनिज : चूना पत्थर, अभ्रक, डोलोमाइट, सिलिका सैंड, पाइराइट, क्वाटर्ज, फेल्सपार, चीनी मिट्टी, स्लेट एवं शोरा जैसी अधात्विक खनिज बिहार में मिलते हैं।
शक्ति के साधन :
बिहार शक्ति के साधनों में से किसी भी साधन में विकसित नहीं है। दूसरे पर अधिक निर्भर रहना पड़ता है।
परम्परागत ऊर्जा के स्त्रोत :
परम्परागत ऊर्जा स्त्रोतों में बिहार के कई तापीय विद्युत केन्द्र हैं इनमें कहलगाँव, कांटी और बरौनी तापीय विद्यूत केन्द्र प्रमुख है।
कहलगाँव सुपर थर्मल पावर बिहार की सबसे बड़ी तापीय विद्युत परियोजना है। इसकी स्थापना 1979 में की गई थी। कहलगाँ सुपर थर्मल पावर की उत्पादन क्षमता 840 मेगावाट है।
कांटी तापीय विद्युत केन्द्र मुजफ्फरपुर के निकट है, इसकी उत्पादन क्षमता 120 मेगावाट है।
बरौनी ताप विद्युत परियोजना की स्थापना 1970 में की गई। इसकी उत्पादन क्षमता 145 मेगावाट है। इस परियोजना की स्थापना रूस के सहयोग से किया गया था।
Bihar Khanij evam Urja Sansadhan
जल विद्युत :
बिहार में जल विद्युत परियोजना का काम तेजी से हो रहा है, इसके विकास के लिए 1982 में बिहार राज्य जल विद्युत निगम का गठन किया गया इसके द्वारा 2055 मेगावाट उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है।
गैर-परम्परागत ऊर्जा स्त्रोत :
बिहार में गैर-परम्परागत ऊर्जा स्त्रोत एवं नवीकरणीय ऊर्जा की बहुत संभावनाएँ हैं। जिसमें बायो गैस, सौर-ऊर्जा और पवन-ऊर्जा द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में ऊर्जा की आवश्यकता की पूर्ति हो सकती है।
बिहार में 92 सम्भावित स्थलों की पहचान की गई है जहाँ लघु जल-विद्युत परियोजनाओं को विकसित किया जा सके, जिनकी कुल क्षमता 46.1 मेगावाट है।
बायोगैस गांवों में भोजन बनाने संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए नवीकरणीय ऊर्जा का महत्वपूर्ण स्त्रोत है। अब तक 1.25 लाख संयंत्र स्थापित किए जा चूके हैं।
(ख) बिहार : उद्योग एवं परिवहन (Bihar Udyog evam Parivahan)
बिहार के अधिकतर बड़े उद्योग बिहार विभाजन के बाद झारखण्ड राज्य में चले गए और बिहार से बड़े उद्योग लगभग विलुप्त हो गये।
दसवीं पंचवर्षीय योजना काल में औद्योगिक विकास दर 9.8 प्रतिशत था। किन्तु बिहार की औद्योगिक आय पूरे देश के औद्योगिक आय का मात्र 0.4 (2004-05) प्रतिशत ही था।
बिहार में 1500 लघु उद्योग, 98000 अतिलघु/अत्यन्त लघु औद्योगिक इकाइयाँ और 68000 शिल्प उद्योग इकाइयाँ मौजूद हैं।
कृषि पर आधारित उद्योग :
चीनी उद्योग :
भारत की पहली चीनी मिल डच कम्पनी द्वारा 1840 में बेतिया में स्थापित किया गया था।
बिहार में 10 टन गन्ना से एक टन चीनी प्राप्त होता है। 1960 के पूर्व यहाँ पूरे भारत की लगभग एक तिहाई चीनी बिहार से प्राप्त होता था।
बिहार में 10 टन गन्ना से एक टन चीनी प्राप्त होता है। 1960 के पहले यहाँ पूरे भारत का लगभग एक तिहाई चीनी बिहार से प्राप्त होता था।
बिहार में चीनी उद्योग एक महत्वपूर्ण उद्योग है। पहले यहाँ चीनी मिलों की संख्या 29 थी लेकिन 2006-07 में इसकी संख्या घटकर मात्र 09 रह गई है।
बिहार में चीनी की अधिकतर मिलें उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में विकसित है। पश्चिमी चम्पारण, पूर्वी चम्पारण, सीवान, गोपालगंज, और सारण जिला में चीनी मिलें केंद्रित हैं, क्योंकि यह क्षेत्र गन्ना उत्पादन के लिए अत्यन्त अनुकूल हैं।
चीनी मिलें से सह उत्पादन के रूप में विद्युत, कागज, छोवा एवं इथेनॉल का निर्माण भी होता है।
Bihar Udyog evam Parivahan
जूट उद्योग : जूट बिहार की ही नहीं, बल्कि पूरे भारत का महत्वपूर्ण उद्योग है। कपास के बाद भारत का यह दूसरा महत्वपूर्ण उद्योग है। आजादी से पहले भारत में जूट के 110 कारखाने थे। इनमें सबसे अधिक पश्चिम बंगाल और बिहार में केन्द्रित थे। आजादी के बाद जूट पैदा करने वाला अधिकतर भाग बंगलादेश में भाग गया जिसके कारण इस उद्योग को भारी झटका लगा। वर्तमान में बिहार में जूट के तीन बड़े कारखाने हैं कटिहार, पूर्णिया और दरभंगा में है। अभी सिर्फ कटिहार का कारखाना कार्यरत है।
तम्बाकू उद्योग : तम्बाकू पर आधारित उद्योग में बीड़ी तथा सिगरेट के कारखाने आते हैं। तम्बाकू उत्पादन में बिहार का स्थान देश में लागातार घट रहा है।
चावल, दाल एवं आटा मील : बिहार की सबसे प्रमुख फसल धान है। धान को कूट कर चावल तैयार किया जात है। बिहार में सबसे अधिक चावल की मिलें भोजपूर रोहतास और पूर्वी चम्पारण जिलों में हैं, इन जीलो में चावल की मिलां की संख्या 520 हैं। यहाँ लगभग 2000 आटा की मिलें हैं,
तेल मिल :– बिहार में तीसी, राई, सरसां, तेल, सूरजमूखी से तेल निकाले जाते हैं और इसकी फसल भी लगाई जाती हैं। यहाँ 500 तेल मिले हैं।
चर्म उद्योग :- बिहार में यह उद्योग मुख्य रूप से कुटीर उद्योग के रूप में विस्तृत हैं, अधिकांश चर्म उद्योग बेतिया, मुजफ्फरपूर, पूर्णिया, कटिहार, पटना, आरा और औरंगाबाद में अवस्थित हें।
वस्त्र उद्योग बिहार का एक प्राचिन उद्योग हैं, यह काम यहाँ ग्रामिन एवं शहरी क्षेत्र दोनो में होता हैं। बिहार में सूती, रेशमी एवं ऊनी वस्त्र तैयार किया जाता हैं। कच्चे माल के अभाव के कारण बिहार में सूती वस्त्र उद्योग का अधिक विकास नही हुआ हैं। डुमराव, गया, मोकामा, मुंगेर फुलवारीशरीफ ओरमाझी, भागलपूर में हुआ हैं। भागलपूर मुजफ्फरपूर गया एवं दरभंगा में रेशमी वस्त्र का उद्योग हुआ हैं।
खनिज आधरित उद्योग :- बिहार में खनिज का अभाव हैं खनिज पर आधारित उद्योगों में सीमेंट उद्योग का रासायन उद्योग एवं काँच उद्योग प्रमुख हैं।
सीमेंट उद्योग :- सिमेंट उद्योग के लिए सबसे प्रमुख माल चूना पत्थर हैं। बिहार में सम्पूर्ण देश का मात्र 5% चूना पत्थर प्राप्त होता हैं।
रासायनिक उद्योग :
अम्ल, क्षार एवं उर्वरक रासायनिक उद्योग में भारी वस्तुओं के उद्योग है। बिहार में उर्वरक का सबसे महत्वपूर्ण कारखाना बरौनी में स्थापित है।
रंग, वर्निश, तेल, साबुन, दवाईयाँ आदि रासायनिक उद्योग के अंतर्गत आते हैं।
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काँच उद्योग :
यह उद्योग बिहार का प्राचीन उद्योग है, यहाँ पहले काँच की चूड़ियाँ बनाई जाती थी। बिहार में काँच का उत्पादन पटना, हाजीपुर, दरभंगा और भागलपूर में होता है।
पर्यटन उद्योग :
बिहार में पर्यटन प्रमुख उद्योग के रूप में उभरने की क्षमता है। लेकिन बिहार सरकार इस उद्योग पर कम ध्यान दे रही है। यहाँ की सांस्कृतिक विरासत, धार्मिक स्थलें, प्राकृतिक सौंदर्य पूरे संसार के लोगों को आकृष्ट करने की क्षमता रखता है। बिहार के पर्यटन मानचित्र में बौद्ध मठ, जैन मंदिर, सिखों के गुरूद्वारे और सूफी संतों की दरगाहें मौजूद है। इन पर्यटन स्थलों में राजगीर, पाटलीपुत्र, वैशाली, बौधगया, नालंदा, पावापुरी, पटना साहेब, गया, सुलतानगंज, बाल्मिकीनगर, देव, सोनपुर, सासाराम, मनेर, बिहारशरीफ जैसे अनेक स्थान प्रसिद्ध हैं।
बिहार में इस उद्योग पर विशेष ध्यान नहीं है फिर भी यहाँ राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय पर्यटकों की संख्या में वृद्धि हो रही है।
अन्य प्रमुख उद्योग- ऊपर वर्णन किये गए उद्योगों के अलावा अन्य उद्योगों का यहाँ विकास हुआ है। इनमें बरौनी में तेलशोधन कारखाना और पेट्रो रसायन उद्योग स्थापित है। मुंगेर में बंदुक, पूर्णिया में कीटनाशक उद्योग और बेतिया में प्लास्टिक उद्योग स्थापित हैं। कहलगाँव, बरौनी तथा काँटी में ताप विद्युत केन्द्र स्थापित हैं।
नालंदा में कोल्डस्टोरेज और आलू से सम्बंधित (पाउडर, चिप्स) उद्योग खोला गया है।
बिहार में औद्योगिक पिछड़ेपन का प्रमुख कारण-
1.कच्चे माल की कमी यहाँ की सबसे बड़ी समस्या है। यहाँ खनिजों का अभाव है।
2.संरचनात्मक सुविधाओं में कमी- परिवहन, ऊर्जा, भण्डारण की कमी, बाजार की कमी
3.आधुनिकरण हेतु पूँजी और तकनिकी की कमी।
4.विदेशी निवेश की कमी
बिहार में परिवहन :
बिहार का अधिकतर भाग मैदानी है, इसलिए यहाँ परिवहन के प्रायः सभी स्थलीय साधनों का विकास हुआ है।
बिहार में मूल रूप से सड़क मार्ग एवं रेलमार्ग तथा सीमित रूप से नदी जलमार्ग, वायु मार्ग एवं रज्जूमार्ग का विकास हुआ है।
सड़क मार्ग :
बिहार में सड़क मार्ग का विकास सबसे पहले हुआ। यह बिहार के प्राचीन साधनों में से है। आजादी के बाद बिहार में सड़क का विस्तार अधिक हुआ है। आजादी के समय यहाँ सड़कों की कुल लंबाई 2104 किमी थी जबकि वर्तमान में यहाँ सड़कों की लंबाई 81680 किमी है।
रेल मार्ग :
बिहार में रेलमार्ग का विकास ब्रिटिशकाल में सर्वप्रथम 1860 में हुआ था। गंगा के किनारे इस्ट इंडिया कम्पनी ने कोलकाता तक पहली रेल लाईन बिछाई।
2001 तक बिहार में रेल लाईन की कुल लंबाई 6,283 किमी० हो गई। हाजीपुर में 2002 में पूर्व मध्य रेलवे का मुख्यालय स्थापित किया गया था।
Bihar Udyog evam Parivahan
जल मार्ग :
बिहार एक भू-आवेशित राज्य है। इसे समुद्री मार्ग से कोई सम्पर्क नहीं है। यहाँ जलमार्ग के लिए नदियों का उपयोग किया जाता है।
गंगा, घाघरा, कोसी, गण्डक और सोन नदियाँ मुख्य रूप से जल परिवहन के लिए उपयोग की जाती है।
वर्तमान में गंगा नदी में हल्दिया-इलाहाबाद राष्ट्रीय जल मार्ग विकसित किया गया है। महेन्द्रु घाट के निकट एक राष्ट्रीय पोत संस्थान की स्थापना भी की गई है।
वायु मार्ग :
बिहार की ढ़िली अर्थव्यवस्था के कारण यहाँ वायु मार्ग का विकास पूरी तरह नहीं हो पाया है। सिर्फ यहाँ पटना और बोधगया में ही अन्तर्राष्ट्रीय महत्व के हवाई अड्डों का विकास हुआ है। यहाँ से काठमाण्डू, कोलकाता, मुम्बई, लखनऊ, राँची तथा दिल्ली के लिए वायु सेवा उपलब्ध है। बोध गया से साप्ताहिक उड़ान बैंकॉक के लिए होती है। इसके अलावा यहाँ मुजफ्फरपुर, जोगवनी, रक्सौल, भागलपुर, बिहटा आदि सात हवाई अड्डे हैं।
रज्जू मार्ग :
रज्जू मार्ग का उपयोग पर्वतीय एवं दूर्गम स्थानों के लिए होता है। बिहार में राजगीर के गृद्धकूट पर्वत पर बौद्ध शांति स्तूप पर जाने के लिए रज्जू मार्ग का विकास किया गया है। इसका निर्माण 1972 में जापान सरकार के द्वारा किया गया था। बांका जिला में मन्दार हिल को भी जल्द ही रज्जू मार्ग से शीघ्र जोड़ दिया जायेगा। यह स्थान जैनियों के लिए तीर्थ स्थल है।
(ग) बिहार : जनसंख्या और नगरीकरण (Bihar Jansankhya aur Nagrikaran)
बिहार आरंभ से ही सघन जनसंख्या वाला देश रहा है, यहाँ 3000 वर्ष पहले से ही मानव बसाव के प्रमाण मिलते हैं। बिहार घनी आबादी वाले राज्यों में से एक है, इसका मुख्य कारण यहाँ की भौगोलिक स्थिति है, अर्थात समतल भू-भाग, उपजाऊ मिट्टी, सालों भर जल से भरी नदियाँ एवं सुगम पहुँचने की सुविधा है। वŸार्मान समय में बिहार जनसंख्या के दृष्टि से उत्तर-प्रदेश और महाराष्ट्र के बाद तीसरे स्थान पर है। 2001 के जनगणन के अनुसार बिहार की जनसंख्या भारत की कुल जनसंख्या का 8.07 प्रतिशत है। बिहारइमें लिंग अनुपात 919 महिलायें प्रति हजार पुरूष है। यह राष्ट्रीय अनुपात 933 से कम है।
Bihar Jansankhya aur Nagrikaran
जनसंख्या वितरण :
बिहार की जनसंख्या वितरण सभी जगह एक समान नहीं है। कहीं पर जनसंख्या बहुत अधिक है तो कहीं पर बहुत ही कम।
जहाँ भी धरातल समतल जलोढ़ और मैदानी हैं वहाँ घनी आबादी है। बिहार में सबसे अधिक जनसंख्या वाला जिला पटना है।
जनसंख्या घनत्व :
2001 की जनसंख्या के अनुसार बिहार में प्रतिवर्ग किलोमीटर घनत्व 881 व्यक्ति है। सबसे अधिक जनसंख्या घनत्व पटना जिला में है जहाँ प्रतिवर्ग किमी पर 1471 व्यक्ति निवास करते हैं। इसके बाद दरभंगा और वैशाली का स्थान आता है, जहाँ क्रमशः 1342 और 1332 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी रहते हैं। जनसंख्या घनत्व में चौथे स्थान पर बेगुसराय जिला है, जहाँ 1222 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है।
सबसे कम जनसंख्या घनत्व वाला जिला पश्चिमी चम्पारण, बाँका, जमुई और कैमुर है, जिसका घनत्व 382 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी० है।
नगरों का विकास :
बिहार में नगरों के विकास का इतिहास बहुत पुराना है, यहाँ के अधिकतर प्रमुख नगर नदी के तट पर बसे हुए हैं। प्राचीन नगरों में पाटलिपुत्र, नालन्दा, गया, वैशाली, बोधगया, उदवेतपुरी, सीतामढ़ी आदि है।
आजादी के बाद यहाँ नगरों के विकास में तेजी आई है। औद्योगिक विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा एवं जीवन के मौलिक सुविधाओं के विकास के कारण कई नगर यहाँ विकसित हुए हैं। इनमें बरौनी, हाजीपुर, दानापुर, डालमिया नगर, मुंगेर, जमालपुर, कटिहार आदि हैं। बिहार भारत का सबसे कम शहरीकृत राज्य है। यहाँ 2001 के जनगणना के अनुसार नगरीय आबादी मात्र 10.5 प्रतिशत है।