Bihar Board Class 10th Social Science Geography Notes Chapter 1 भारत: संसाधन एवं उपयोग

 

1. भारत : संसाधन एवं उपयोग
भूगोल के पिता- हिकेटियस

इरैटोस्थनिज ने सर्वप्रथम ज्योग्राफिका शब्द का प्रयोग किया।
युनानी विद्वान पाइथागोरस ने बताया कि पृथ्वी चपटी नहीं।
भूगोल-भूगोल पृथ्वी का वर्णन है।

अर्थात
ऐसा शास्त्र जिसमें पृथ्वी के ऊपरी स्वरूप और उसके प्राकृतिक विभागों जैसे- पहाड़, महादेश, देश, नगर, नदी, समुद्र, झील, वन आदि का अध्ययन करते हैं। भूगोल कहलाता है।

संसाधन का महत्व- उपयोग मे आनेवाली प्रत्येक वस्तुऐं संसाधन कहलाते हैं। भूमि, मृदा, जल और खनिज भौतिक संसाधन है तथा वनस्पति, वन्य-जीव तथा जलीय-जीव जैविक संसाधन हैं।
प्रसिद्ध भूगोलविद् जिम्मरमैन ने कहा था कि- ‘संसाधन होते नहीं, बनते हैं।’

संसाधन के प्रकारः- उत्त्पति के आधार पर संसाधन के दो प्रकार होते हैं :

1.जैव संसाधनः- ऐसे संसाधन जिसकी प्राप्ति जैव मंडल से होती हैं। उसे जैव संसाधन कहते हैं। जैसे- मनुष्य, वनस्पती, मत्स्य, पशुधन एवं अन्य प्राणी समुदाय।

2.अजैव संसाधनः- निर्जीव वस्तुओं के समुह को अजैव संसाधन कहते हैं। जैसे- चट्टानें, धातु एवं खनिज आदि।उपयोगिता के आधार पर संसाधन के दो प्रकार होते हैं-

नवीकरणीय संसाधनः- वैसे संसाधन जिन्हें भौतिक, रासायनिक या यांत्रिक प्रक्रिया द्वारा नवीकृत या पुनः प्राप्त किए जा सकते हैं। उसे नवीकरणीय संसाधन कहते हैं। जैसे- सौर-उर्जा, पवन उर्जा, जल-विद्युत, वन एवं वन्य प्राणी।

अनवीकरणीय संसाधनः– ऐसे संसाधन जिन्हें उपयोग के पश्चात् पुनः प्राप्त नहीं कर सकते हैं, उसे अनवीकरणीय संसाधन कहते हैं। जैसे- कोयला, पेट्रोलियम आदि।स्वामित्व के आधार पर संसाधन के चार प्रकार होते हैं-

व्यक्तिगत संसाधन- ऐसे संसाधन जो किसी खास व्यक्ति के अधिकार क्षेत्र मे होता हैं, उसे व्यक्तिगत संसाधन कहते हैं। जैसे- भूखंड, घर, बाग-बगिचा, तालाब, कुँआ इत्यादि।

सामुदायिक संसाधन- ऐसे संसाधन किसी खास समुदाय के अधिकार क्षेत्र में होता है। उसे सामुदायिक संसाधन कहते हैं। जैसे- गाँव में चारण-भूमि, श्मशान, मंदिर या मस्जिद परिसर, समूदायिक भवन, तालाब, खेल के मैदान आदि।

राष्ट्रीय संसाधन- देश या राष्ट्र के अंतर्गत सभी उपलब्ध संसाधन को राष्ट्रीय संसाधन कहते हैं। जैसे- सड़क, स्कूल, कॉलेज आदि।

अंतर्राष्ट्रीय संसाधन- ऐसे संसाधन जिसका नियंत्रण अंतर्राष्ट्रीय संस्था करती है, उसे अंतर्राष्ट्रीय संसाधन कहते हैं। तटरेखा से 200km दूरी छोड़कर खुले महासागरीय संसाधन अंतर्राष्ट्रीय संसाधन होते हैं।
विकास के स्तर पर संसाधन चार प्रकार के होते हैं-

संभावी संसाधनः- ऐेसे संसाधन जो किसी क्षेत्र विशेष में मौजूद होते हैं, जिसे उपयोग में लाए जाने की संभावना होती है। उसे संभावी संसाधन कहते हैं। जैसे- हिमालयी क्षेत्र के खनिज, जिनका उत्खनन अिधक गहराई मे होने के कारण दुर्गम एवं महँगा हैं। उसी प्रकार राजस्थान एवं गुजरात क्षेत्र में पवन और सौर्य ऊर्जा आदि।

विकसित संसाधनः- ऐसे संसाधन जिसका सर्वेक्षण के पश्चात् उपयोग हेतु मात्रा एवं गुणवत्ता का निर्धारण हो चुका हैं, उसे विकसित संसाधन कहते हैं। जैसे- कोयला, पेट्रोलियम आदि।

भंडार ससाधनः- ऐसे संसाधन पर्यावरण में उपलब्ध होते हैं तथा आवश्यकताओं की पूर्ति में सक्षम हैं। जिन्हें उच्च तकनीक से उपयोग में ला सकते हैं, उसे भंडार संसाधन कहते हैं। जैसे- जल, हाइड्रोजन एवं ऑक्सीजन का यौगिक है जिसमें ऊर्जा उत्पादन की असीम क्षमता छिपी हुई हैं। लेकिन उच्च तकनीक के अभाव में ऐसे संसाधनों का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं।

संचित कोष संसाधनः- ऐसे संसाधन भंडार संसाधन के ही अंश हैं, जिसे उपलब्ध तकनीक के आधार पर प्रयोग में लाया जा सकता हैं इनका तत्काल उपयोग प्रारंभ नही हुआ है। यह भविष्य की पूँजी है। जैसे- नदी जल भविष्य में जल विद्युत उत्पन्न करने में उपयुक्त हो सकते हैं।

संसाधन नियोजनः- संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग ही संसाधन नियोजन है। संसाधन नियोजन किसी भी राष्ट्र के विकास के लिए आवश्यक होता है। भारत जैसे देश के लिए तो यह अनिवार्य है।

भारत में संसाधन नियोजनः- संसाधन-नियोजन एक जटिल प्रक्रिया है।
संसाधन नियोजन के सोपानों को निम्न रूप मेंं बाँटकर अध्ययन किया जाता है।
(क) देश के विभिन्न प्रदेशों में संसाधनों की पहचान कराने के लिए सर्वेक्षण कराना।
(ख) सर्वेक्षण के बाद मानचित्र तैयार करना एवं संसाधनों का गुणात्मक एवं मात्रात्मक आधार पर मापन या आकलन करना।
(ग) संसाधन-विकास योजनाओं को मूर्त्त-रूप देने के लिए उपयुक्त प्रौद्योगिकी कौशल एवं संस्थागत, नियोजन की रूप रेखा तैयार करना।
(घ) राष्ट्रीय विकास योजना एवं संसाधन विकास योजनाओं के मध्य समन्वय स्थापित करना।

संसाधनों का संरक्षणः सभ्यता एवं संस्कृति के विकास में संसाधनों की अहम भूमिका होती है। किंतु संसाधनों का अविवेकपूर्ण या अतिशय उपयोग विविध प्रकार के

सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं पर्यावरणीय समस्याओं को जन्म देते हैं।

संसाधनों का नियोजित एवं विवेकपूर्ण उपयोग ही संसाधन संरक्षण कहलाता है।

सतत् विकास की अवधारणाः संसाधन मनुष्य के जीवन का आधार है। जीवन की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए ससाधानों के सतत् विकास की अवधारणा अत्यावश्यक है। ‘संसाधन प्रकृति के द्वारा उपहार है’ की अवधारणा के कारण मानव ने इनका अंधा-धुंध दोहन किया, जिसके कारण पर्यावरणीय समस्याएं भी उत्पन्न हो गई हैं।
स्वार्थ के वशीभूत होकर संसाधनों का विवेकहीन दोहन किया गया।

संसाधनों के विवेकहीन दोहन से भूमंडलीय-तापन, ओजोन क्षय, पर्यावरण-प्रदूषण, मृदा-क्षरण, भूमि-विस्थापन, अम्लीय-वर्षा, असमय ऋतु-परिवर्तन जैसी संकट पृथ्वी पर आ गई है। अगर ऐसे ही संसाधनों का दोहन चलता रहा, तो पृथ्वी का जैव संसार विनाश हो जाएगा।

जीवन लौटाने के लिए संसाधनों का नियोजित उपयोग होना आवश्यक है। इससे पर्यावरण को बिना क्षति पहुंचायें, भविष्य की आवश्यकताओं के मद्देनजर, वर्त्तमान विकास को कायम रखा जा सकता है। ऐसी धारणा ही सतत् विकास कही जाती है। इससे वर्त्तमान विकास के साथ भविष्य भी सुरक्षित रह सकता है।

(क) प्राकृतिक संसाधन

प्रकृति-प्रदत्त वस्तुओं को प्राकृतिक संसाधन कहते हैं। जैसे- जल, वायु, वन आदि।
हम भूमि पर निवास करते हैं। हमारा आर्थिक क्रिया-कलाप इसी पर संपादित होता है। इसलिए भूमि एक महत्त्वपूर्ण संसाधन है। कृषि, वानिकी, पशु-चारण, मत्स्यन, खनन, वन्य-जीव, परिवहन-संचार, जैसे आर्थिक क्रियाएँ भूमि पर ही सम्पन्न होते हैं।
भूमि संसाधन के कई भौतिक स्वरूप हैं, जैसे- पर्वत, पठार, मैदान, निम्नभूमि और घाटियाँ इत्यादि। भारत भूमि संसाधन में संपन्न है। यहाँ कुल भूमि का 43 प्रतिशत भू-भाग पर मैदान है जो कृषि और उद्योगों के लिए उपयोगी है। 30 प्रतिशत भाग पर्वतीय क्षेत्र और 27 प्रतिशत भाग पठारी क्षेत्र है।

मृदा निर्माण :
मृदा- पृथ्वी की सबसे ऊपरी पतली परत को मृदा कहते हैं। मृदा पारितंत्र का एक महत्वपूर्ण घटक है। यह सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण प्राकृतिक नवीकरणीय संसाधन है।
मृदा का निर्माण एक लंबी अवधी में पूर्ण होती है जो एक जटिल प्रक्रिया है। कुछ सेंटीमीटर गहरी मृदा के निर्माण में लाखों वर्ष लग जाते हैं। चट्टानों के टूटने-फूटने तथा भौतिक, रासायनिक और जैविक परिवर्तनों से मृदा निर्माण होता है। भूगोलविद् इसे अत्यंत धीमी प्रक्रिया मानते हैं।

मृदा निर्माण के कारक
    उच्चावच या धराकृति
    मूल शैल या चट्टान
    जलवायु
    वनस्पति
    जैव पदार्थ
    खनिज कण
    समय

तापमान परिवर्तन, प्रवाहित जल की क्रिया, पवन, हिमनद और अपघटन की अन्य क्रियाएँ भी ऐसे तŸव हैं, जो मृदा निर्माण में सहयोग करती हैं।
मृदा के प्रकार एवं वितरण :

मृदा निर्माण की प्रक्रिया के निर्धारक तŸव, उनके रंग-गठन, गहराई, आयु व रासायनिक और भौतिक गुणों के आधार पर भारत की मृदा के छः प्रकार होते हैं।

1. जलोढ़ मृदा

यह मृदा भारत में विस्तृत रूप में फैली हुई सर्वाधिक महŸवपूर्ण मृदा है। उत्तर भारत का मैदान पूर्ण रूप से जलोढ़ निर्मित है, जो हिमालय की तीन महत्वपूर्ण नदी प्रणालियों सिंधु, गंगा और बह्मपुत्र द्वारा लाए गए जलोढ़ के निक्षेप से बना है।

कुल मिलाकर भारत के लगभग 6.4 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र पर जलोढ़ मृदा फैली हुई है।

जलोढ़ मिट्टी का गठन बालू, सिल्ट एवं मृत्तिका के विभिन्न अनुपात से होता है। इसका रंग धुँधला से लेकर लालिमा लिये भूरे रंग का होता है।

ऐसी मृदाएँ पर्वतीय क्षेत्र में बने मैदानों में आमतौर पर मिलती हैं। आयु के आधार पर जलोढ़ मृदा के दो प्रकार हैं- पुराना एवं नवीन जलोढ़।

पुराने जलोढ़ में कंकड़ एवं बजरी की मात्रा अधिक होती है। इसे बांगर कहते हैं। यह ज्यादा उपजाऊ नहीं होते हैं।

बांगर की तुलना में नवीन जलोढ़ में महीन कण पाये जाते हैं, जिसे खादर कहा जाता है। खादर में बालू एवं मृत्तिका का मिश्रण होता है। ये काफी उपजाऊ होते हैं।

उत्तर बिहार में बालू प्रधान जलोढ़ को ‘दियारा भूमि‘ कहते हैं। यह मक्का की कृषि के लिए विश्व प्रसिद्ध है।
जलोढ़ मृदा में पोटाश, फास्फोरस और चूना जैसे तब वों की प्रधानता होती है, जबकि नाइट्रोजन एवं जैव पदार्थों की कमी रहती है। यह मिट्टी गन्ना, चावल, गेहूँ, मक्का,

दलहन जैसी फसलों के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
अधिक उपजाऊ होने के कारण इस मिट्टी पर गहन कृषि की जाती है। जिसके कारण यहाँ जनसंख्या घनत्व अधिक होता है।

2. काली मृदाः
इस मिट्टी का रंग काला होता है जो इसमें उपस्थित एल्युमीनियम एवं लौह यौगिक के कारण है। यह कपास की खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त मानी जाती है। जिस कारण इसे ‘काली कपास मृदा‘ के नाम से भी जाना जाता है।
इस मिट्टी की सबसे बड़ी विशेषता है कि इसमें नमी धारण करने की क्षमता अत्यधिक होती है। यह मृदा कैल्शियम कोर्बोनेट, मैग्नीशियम, पोटाश और चूना जैसे पौष्टिक तŸवों से परिपूर्ण होती है। इसमें फास्फोरस की कमी होती है।

3. लाल एवं पीली मृदा :
इस मृदा में लोहा के अंश होने के कारण लाल होता है। जलयोजन के पश्चात यह मृदा पीले रंग की हो जाती है। जैव पदार्थों की कमी के कारण यह मृदा जलोढ़ एवं काली मृदा की अपेक्षा कम उपजाऊ होती है। इस मृदा में सिंचाई की व्यवस्था कर चावल, ज्वार-बाजरा, मक्का, मूंगफली, तम्बाकू और फलों का उत्पादन किया जा सकता है।

4. लैटेराइट मृदा :
इस प्रकार की मिट्टी का विकास उच्च तापमान एवं अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में हुआ है। इस मृदा में ह्यूमस की मात्रा नगण्य होती है। यह मिट्टी कठोर होती है। अल्युमीनियम और लोहे के ऑक्साइड के कारण इसका रंग लाला होता है।

कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में मृदा संरक्षण तकनीक के सहारे चाय एवं कहवा का उत्पादन किया जाता है। तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश और केरल में इस मृदा में काजू की खेती उपयुक्त मानी जाती है।

5. मरूस्थलीय मृदा :
इस मृदा का रंग लाल या हल्का भूरा होता है। इस प्रकार की मृदा में वनस्पति और उर्वरक का अभाव पाया जाता है। किन्तु, सिंचाई की व्यवस्था कर कपास, चावल, गेहूँ का भी उत्पादन किया जा सकता है।

6. पर्वतीय मृदा :
पर्वतीय मृदा प्रायः पर्वतीय और पहाड़ी क्षेत्रों में देखने को मिलती है। यह मृदा अम्लीय और ह्यूमस रहित होते हैं। इस मृदा पर ढ़ालानों पर फलों के बगान एवं नदी-घाटी में चावल एवं आलू का लगभग सभी क्षेत्रों में उत्पादन किया जाता है।
भूमि उपयोग का बदलता स्वरूप

भूमि उपयोग के निम्नलिखित वर्ग हैं-
(क) वन विस्तार
(ख) कृषि अयोग्य बंजर भूमि
(ग) गैर-कृषि कार्य में संलग्न भूमि जैसे इमारत, सड़क, उद्योग इत्यादि।
(घ) स्थायी चारागाह एवं गोचर भूमि
(ङ) बाग-बगीचे एवं उपवन में संलग्न भूमि।
(च) कृषि योग्य बंजर भूमि, जिसका प्रयोग पाँच वर्षों से नहीं हुआ है।
(छ) वर्तमान परती भूमि।
(ज) वर्तमान परती के अतिरिक्त वह परती भूमि जहाँ 5 वर्षों से खेती नहीं हुई हो।
(झ) शुद्ध बोयी गयी भूमि।

भारत में भू-उपयोग के स्वरूप
भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र 32.8 लाख वर्ग किमी के मात्र 93 प्रतिशत भाग का ही भूमि-उपयोग का आँकड़ा उपलब्ध है। जम्मू-कश्मीर में पाक-अधिकृत तथा चीन अधिकृत भूमि का भू-उपयोग सर्वेक्षण नहीं हुआ है।
भारत पशुधन के मामले में विश्व के अग्रणी देशों में शामिल किया जाता है। किन्तु, यहाँ स्थाई चारागाह के लिए बहुत कम भूमि उपलब्ध है जो पशुधन के लिए पर्याप्त नहीं है जिसके कारण पशुपालन पर प्रतिकुल प्रभाव पड़ता है।
पंजाब और हरियाणा में कुल भूमि के 80 प्रतिशत भाग पर खेती की जाती है जबकि अरूणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर एवं अंडमान निकोबार द्वीप समूह में 10 प्रतिशत से कम क्षेत्र में खेती की जाती है।
किसी भी देश में पर्यावरण को संतुलित बनाए रखने के लिए उसके कुल भू-भाग का 33 प्रतिशत वन होना चाहिए। लेकिन भारत में आज भी मात्र 20 प्रतिशत भू-भाग पर ही वनों का विस्तार है जो पर्यावरण के लिए हानिकारक है।

भू-क्षरण और भू-संरक्षण
मृदा को अपने स्थान से विविध क्रियाओं द्वारा स्थानांतरित होना भू-क्षरण कहलाता है। गतिशीत-जल, पवन, हिमानी और सामुद्रिक लहरों द्वारा भू-क्षरण होता है। तीव्र वर्षा से भी मृदा का कटाव होता है।

भमि निम्नीकरण- वह प्रक्रिया जिसमें भूमि खेती के अयोग्य बनती है, उसे भूमि निम्नीकरण कहते हैं। वनोन्मूलन, अति-पशुचारण, खनन, रसायनों का अत्यधिक उपयोग के कारण भूमि निम्नीकरण होता है।

उड़ीसा वनोन्मूलन के कारण भूमि-निम्नीकरण का शिकार हुआ है। गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में अत्यधिक पशुचारण के कारण भूमि निम्नीकरण हुआ है। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अधिक सिंचाई के कारण भूमि निम्नीकरण हुआ है। अधिक सिंचाई से जलाक्रांतता की समस्या पैदा होती है जिससे मृदा में लवणीय और क्षारीय गुण बढ़ जाती है जो भूमि के निम्नीकरण के लिए उत्तरदायी होते हैं।

भूमि निम्नीकरण आधुनिक मानव सभ्यता के लिए एक विकट समस्या है, इसका संरक्षण आवश्यक है।
गेहूँ, कपास, मक्का, आलू आदि के लगातार उगाने से मृदा में ह्रास होता है। इसलिए तिलहन-दलहन पौधे लगाने से मृदा में उर्वरा शक्ति वापस लौट आती है।

पहाड़ी क्षेत्रों में समोच्च जुताई द्वारा मृदा अपरदन को रोका जा सकता है। पवन अपरदन वाले क्षेत्रों में पट्टिका कृषि से मृदा अपरदन को रोका जा सकता है। रसायन का उचित उपयोग कर मृदा संरक्षण को रोका जा सकता है। रसायनों के लगातार उपयोग से मृदा के पोषक तŸवों में कमी होने लगती है। ये पोषक तव जल, वायु, केंचुआ और अन्य शूक्ष्म जीव हो सकते हैं।

एंड्रीन नामक रसायन मेढ़क के प्रजनन पर रोक लगा देता है जिससे कीटों की संख्या बढ़ जाती है जिसके कारण फसलों की हानि होती है। रासायनिक उर्वरक की जगह जैविक खाद का उपयोग कर मृदा क्षरण को रोका जा सकता है।

मृदा क्षरण को रोकने के लिए वृक्षा रोपण महत्वपूर्ण है। वृक्ष के पियों से प्राप्त ह्युमस मृदा की गुणवत्ता को बढ़ाते हैं।

(ख) जल संसाधन (Jal Sansadhan)

पृथ्वी के सतह का तीन-चौथाई भाग जल से ढ़का है। पृथ्वी के अधिकतर स्तर पर जल की उपस्तिथि के कारण ही इसे नीला ग्रह कहा जाता है।

जल श्रोत- जिस स्त्रोत से जल की प्राप्ति होती है, उसे जल स्त्रोत कहते हैं।

जल-श्रोत विभिन्न रुपों में पाये जाते हैं-

1. भू-पृष्ठीय जल, 2. भूमिगत जल, 3. वायुमंडलीय जल तथा 4. महासागरीय जल।

जल संसाधन का वितरण- अधिकांश जल दक्षिणी गोलर्द्ध में ही है। इसी कारण दक्षिणी गोलर्द्ध को ‘जल गोलार्द्ध’ और उत्तरी गोलार्द्ध को ‘स्थल गोलर्द्ध’ के नाम से जाना जाता है ।

विश्व के कुल मृदु जल का लगभग 75 प्रतिशत अंटार्कटिका, ग्रीनलैंड एवं पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फ की चादर या हिमनद के रूप में पाया जाता है और लगभग 25% भूमिगत जल स्वच्छ जल के रूप में उपलब्ध है।

ब्रह्मपुत्र एवं गंगा विश्व की 10 बड़ी नदियों में से हैं। इन नदियों को विश्व की बड़ी नदियों में क्रमशः आठवाँ एवं दसवाँ स्थान प्राप्त है ।

जल संसाधन का उपयोग- 1951 ई० में भारत में प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता 5177 घन मीटर थी, जो 2001 में 1829 घन मीटर प्रति व्यक्ति तक पहुंच गई है। संभावना है 2025 ई० तक पहुंचते-पहुंचते प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता 1342 घन मीटर हो जाएगी।

पेयजल- घरेलू कार्य, सिंचाई, उद्योग, जन-स्वास्थ्य, स्वच्छता तथा मल-मूत्र विसर्जन इत्यादि कार्यों के लिए जल अत्यंत जरूरी है। जल-विद्युत निर्माण तथा परमाणु-संयत्र, शीतलन, मत्स्य पालन, जल-कृषि, वानिकी, जल-क्रीड़ा जैसे कार्य की कल्पना बिना जल के नहीं की जा सकती है।

बहुउद्देशीय परियोजनाएं- ऐसी परियोजनाएँ, जिसका निर्माण एक साथ कई उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जाता है, उसे बहुउद्देशीय परियोजना कहते हैं।

बहुउद्देशीय परियोजनाओं को भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं० जवाहरलाल नेहरू ने गर्व से ‘आधुनिक भारत का मंदिर’ कहा है।

बहुउद्देशीय परियोजना के विकास के उद्देश्य-  बाढ़ नियंत्रण, मृदादृअपरदन पर रोक, पेय एवं सिंचाई के लिए जलापूर्ति, परिवहन, मनोरंजन, वन्य-जीव संरक्षण, मत्स्य-पालन, जल-कृषि, पर्यटन इत्यादि।

भारत में अनेक नदी-घाटी परियोजनाओं का विकास हुआ है- भाखड़ा-नांगल, हीराकुंड, दामोदर, गोदावरी, कृष्णा, स्वर्णरेखा एवं सोन परियोजना जैसी अनेक परियोजनाएं भारत के बहुअयामी विकास में सहायक हो रहे हैं ।

नर्मदा बचाओ आंदोलन- ‘नर्मदा बचाओं आंदोलन’ एक गैर सरकारी संगठन है, जो स्थानीय लोगों, किसानों, पर्यावरणविदों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को गुजरात के नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध के विरोध के लिए प्रेरित करता है। इस आंदोलन के प्रवर्त्तक मेधा पाटेकर थे।

बहुउद्देशीय परियोजनाओं से होने वाली हानियाँः
(1) पर्याप्त मुआवजा न मिल पाना,
(2) विस्थापित होना,
(3) पुनर्वास की समस्या,
(4) आस-पास बाढ़ का आ जाना।

बहुउद्देशीय परियोजनाओं के कारण भूकंप की समस्या बढ़ जाती है। इतना ही नहीं, बाढ़ से जल-प्रदूषण, जल-जनित बीमारियाँ तथा फसलों में कीटाणु जनित बीमारियों का भी संक्रमण हो जाता है।

जल संकट- जल की अनुपलब्धता (कमी) को जल-संकट कहा जाता है। बढ़ती जनसंख्या, उनकी मांग तथा जल के असमान वितरण भी जल दुर्लभता का परिणाम है।
वर्तमान समय में भारत में कुल विद्युत का लगभग 22 प्रतिशत भाग जल-विद्युत से प्राप्त होता है।

उद्योगों की वजह से मृदु जल पर दबाव बढ़ रहा है। शहरों में बढ़ती आबादी एवं शहरी जीवन शैली के कारण जल एवं विद्युत की आवश्यकता में तेजी से वृद्धि हुई है।
जल की पर्याप्त मात्रा होने के बावजूद लोग प्यासे हैं। इस दुर्लभता का कारण है, जल की खराब गुणवत्ता, यह किसी भी राज्य या देश के लिए चिंतनीय विषय है। घरेलू एवं औद्योगिक-अवशिष्टों, रसायनों, कीटनाशकों और कृषि में प्रयुक्त होने वाले उर्वरक जल में मिल जाने से जल की गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित हुई है जो मानव के लिए अति नुकसानदेह है।

केवल कानपुर में 180 चमड़े के कारखानें हैं जो प्रतिदिन 58 लाख लीटर मल-जल गंगा में विसर्जित करती है ।

जल संरक्षण एवं प्रबंधन की आवश्कता- जल संसाधन की सीमित आपूर्ति, तेजी से फैलते प्रदूषण एवं समय की मांग को देखते हुए जल संसाधनों का संरक्षण एवं प्रबंधन अपरिहार्य है। जिससे स्वस्थ-जीवन, खाद्यान्न-सुरक्षा, आजीविका और उत्पाद अनुक्रियाओं को सुनिश्चित किया जा सके।
जल संसाधन के दुर्लभता या संकट से निवारण के लिए सरकार ने ‘सितंबर 1987’ में ‘राष्ट्रीय जल नीति’ को स्वीकार किया ।

इसके अंतर्गत सरकार ने जल संरक्षण के लिए निम्न सिद्धांतों को ध्यान में रखकर योजनाओं को बनाया गया है-
(a) जल की उपलब्धता को बनाये रखना।
(b) जल को प्रदूषित होने से बचाना।
(c) प्रदूषित जल को स्वच्छ कर उसका पुनर्चक्रण।

वर्षा जल संग्रहण एवं उसका पुनःचक्रण-
जल दुर्लभता एवं उनकी निम्नीकरण वर्तमान समय की एक प्रमुख समस्या बन गई है। बहुउद्देशीय परियोजनाओं के विफल होने तथा इसके विवादास्पद होने के कारण वर्षा जल-संग्रहण एक लोकप्रिय जल संरक्षण का तरीका हो सकता है ।

भूमिगत जल का 22 प्रतिशत भाग का संचय वर्षा-जल का भूमि में प्रवेश करने से होता है।

सूखे एवं अर्द्धसूखे क्षेत्रों में वर्षा-जल को एकत्रित करने के लिए गड्ढ़ो का निर्माण किया जाता था, जिससे मिट्टी सिंचित कर खेती की जा सके। उसे राजस्थान के जैसलमेर में ‘खादीन’ तथा अन्य क्षेत्रों में ‘जोहड़’ के नाम से पुकारा जाता है। राजस्थान के बिरानो फलोदी और बाड़मेर जैसे सूखे क्षेत्रों में पेय-जल का संचय भूमिगत टैंक में किया जाता है। जिसे ‘टांका’ कहा जाता है। मेघालय स्थित चेरापूंजी एवं मॉसिनराम में विश्व की सर्वाधिक वर्षा होती है। जहाँ पेय जलसंकट का निवारण लगभग (25 प्रतिशत) छत जल संग्रहण से होता है । मेघालय के शिलांग में छत जल संग्रहण आज भी परंपरागत रूप में प्रचलित है।

पं० राजस्थान में इंदिरा गाँधी नहर के विकास से इस क्षेत्र को बारहमासी पेयजल उपलब्ध होने के कारण से यह वर्षा जल संग्रहण की की उपेक्षा हो रही है, जो खेद जनक है।
वर्तमान में महाराष्ट्र, म०प्र०, राजस्थान एवं गुजरात सहित कई राज्यों में वर्षा जल संरक्षण एवं पुनः चक्रण किया जा रहा है।
स्वतंत्रता के बाद भारत में आर्थिक, सामाजिक, व्यापारिक सहित समग्र विकास के उद्देश्य से जल संसाधन के उपयोग हेतु योजनाएं तैयार की गई। बिहार में भी इन

उद्देश्यों को ध्यान में रखकर कई परियोजनाएं बनायी गई हैं, जिनमे तीन प्रमुख हैं-
1. सोन परियोजना, 2. गंडक परियोजना, 3. कोसी परियोजना।

सोन नदी-घाटी परियोजना : सोन नदी-घाटी परियोजना बिहार की सबसे प्राचीन परियोजना के साथ-साथ यहाँ की पहली परियोजना है। ब्रिटिश सरकार ने सिंचित भूमि में वृद्धि कर अधिकाधिक फसल उत्पादन की दृष्टि से इस परियोजना का विकास 1874 ई० में किया था ।

सुविकसित रूप से यह नहर तीन लाख हेक्टेयर भूमि को सिंचित करती हैं। 1968 ई० में इस योजना के डेहरी से 10 किमी० की दूरी पर स्थित इंद्रपुरी नामक स्थान पर बांध लगाकर बहुउद्देशीय परियोजना का रूप देने का प्रयास किया गया। इससे पुराने नहरों, जल का बैराज से पुनर्पूर्ति, नहरी विस्तारीकरण एवं सुदृढ़ीकरण हुआ है। यही वजह है कि सोन का यह सूखाग्रस्त प्रदेश आज बिहार का ‘चावल का कटोरा’ (त्पबम ठवूस वि ठपींत) के नाम से विभूषित हो रहा है।

इस परियोजना के अंर्तगत जल-विद्युत उत्पादन के लिए शक्ति-गृह भी स्थापित हुए हैं। पश्चिमी नहर पर डेहरी के समीप शक्ति-गृह की स्थापना की गई है। जिससे 6.6 मेगावाट ऊर्जा प्राप्त होती है। इस ऊर्जा का उपयोग डालमियानगर का एक बड़े औद्योगिक-प्रतिष्ठान के रूप में उभर रहा है।

बिहार विभाजन के पूर्व ‘इंद्रपुरी जलाशय योजना’, ‘कदवन जलाशय योजना’ के नाम से जानी जाती थी।

इसके अतिरिक्त भी बिहार के अंर्तगत कई नदी घाटी परियोजनाएं प्रस्तावित हैं; जिसके विकास की आवश्यकता है। जिनमें दुर्गावती जलाशय परियोजना, ऊपरी किऊल जलाशय परियोजना, बागमती परियोजना तथा बरनार जलाशय परियोजना इत्यादि शामिल है ।

(ग) वन एवं वन्‍य प्राणी संसाधन (Van Evam Vanya Prani Sansadhan)

वन- वन उस बड़े भू-भाग को कहते हैं जो पेड़ पौधों एवं झाड़ियों द्वारा आच्छादित होते है।

वन दो प्रकार के होते हैं-

1. प्राकृतिक वन और 2. मानव निर्मित वन
2.प्राकृतिक वन- वे वन जो स्वतः विकसित होते हैं, उसे प्राकृतिक वन कहते हैं।
3.मानव निर्मित वन- वे वन जो मानव द्वारा विकसित होते हैं, उसे मानव निर्मित वन कहते हैं।

वन और वन्य जीव संसाधनों के प्रकार और वितरण : वन विस्तार के नजरिए से भारत विश्व का दसवां देश है, यहां करीब 68 करोड़ हेक्टेअर भूमि पर वन का विस्तार है। रूस में 809 करोड़ हेक्टेअर वन क्षेत्र है, जो विश्व में प्रथम है। ब्राजील में 478 करोड़ हेक्टेअर, कनाडा में 310 करोड़ हेक्टेअर, संयुक्त राज्य अमेरिका में 303 करोड़ हेक्टेअर, चीन में 197 करोड़ हेक्टेअर, ऑस्ट्रेलिया में 164 करोड़ हेक्टेअर, कांगो में 134 करोड़ हेक्टेअर, इंडोनेशिया में 88 करोड़ हेक्टेअर और पेरू में 69 करोड़ हेक्टेअर वन क्षेत्र है। भारत में, 2001 में 19.27 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र पर वन फैले हुए थे। (वन सर्वेक्षण, थैंप ) के अनुसार 20.55 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र में वन का विस्तार है। अंडमान निकोबार द्वीप समूह सबसे आगे है, जहां 90.3 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र में वन विकसित है।

वृक्षों के घनत्व के आधार पर वनों को पांच वर्गो में रखा जा सकता है।
1.अत्यंत सघन वन (कुल भौगोलिक क्षेत्र में वृक्षों का घनत्व 70 प्रतिशत से अधिक )
2.सघन वन (कुल भौगोलिक क्षेत्र में वृक्षों का घनत्व 40-70 प्रतिशत)
3.खुले वन (कुल भौगोलिक क्षेत्र में वृक्षों का घनत्व 10 से 40 प्रतिशत)
4.झाड़ियां एवं अन्य वन (कुल भौगोलिक क्षेत्र में वृक्षों का घनत्व 10 प्रतिशत से कम)
5.मैंग्रोव वन (तटीय वन)- इस प्रकार के वन समुद्र के तटों पर पाए जाते हैं। इस प्रकार के वनों का विस्‍तार पूर्वी तट, पश्चिमी तट और अण्‍डमान निकोबार द्विप समुह में है।

6.अत्यंत सघन वन- भारत में इस प्रकार के वन का विस्तार 54.6 लाख हेक्टेअर भूमि पर है जो कुल भौगोलिक क्षेत्र का 1.66 प्रतिशत है, असम और सिक्किम को छोड़कर सभी पूर्वोंत्तर राज्य इस वर्ग में आते हैं।

7.सघन वन- इसके अन्तर्गत 73.60 लाख हेक्टेअर भूमि आते हैं जो कुल भौगोलिक क्षेत्र का 3 प्रतिशत है। हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, मध्य प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र एवं उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में इस प्रकार के वनों का विस्तार है ।

8.खुले वन- 2.59 करोड़ हेक्टेअर भूमि पर इस वर्ग के वनों का विस्तार है, यह कुल भौगोलिक क्षेत्र का 7.12 प्रतिशत है। कर्नाटक, तामिलनाडु, केरल, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा के कुछ जिलों एवं असम के 16 आदिवासी जिलों में इस प्रकार के वनों का विस्तार है।

9.झाड़ियां एवं अन्य वन- राजस्थान का मरुस्थलीय क्षेत्र एवं अर्द्ध शुष्क क्षेत्र में इस प्रकार के वन पाए जाते है। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार एवं पश्चिम बंगाल के मैदानी भागों में वृक्षों का घनत्व 10 प्रतिशत से भी कम है।

10.मैंग्रोव वन (तटीय वन)- इस प्रकार के वनों का विकास समुद्र के तटों पर हुआ है। इसलिए इसे तटीय वन भी कहते हैं। इसका विस्तार केरल, कर्नाटक आदि राज्यों में हुआ है।
वन सम्पदा तथा वन्य जीवों का ह्रास एवं संरक्षण : विकास के नाम पर वनों का विनाश होना शुरू हुआ। बीसवीं सदी के मध्य तक 24 प्रतिशत क्षेत्र पर वन विस्तार था, जो इक्किसवीं सदी के आरंभ में ही संकुचित होकर 19 प्रतिशत क्षेत्र में रह गया है। इसका मुख्य कारण मानवीय हस्तक्षेप, पालतू पशुओं के द्वारा अनियंत्रित चारण एवं विविध तरीकों से वन सम्पदा का दोहन है। भारत में वनों के ह्रास का एक बड़ा कारण कृषिगत भूमि का फैलाव है।

वनों एवं वन्य जीवों के विनाश में पशुचारण और ईंधन के लिए लकड़ियों का उपयोग की भी काफी भूमिका रही है। रेल-मार्ग, सड़क मार्ग, निर्माण, औद्योगिक विकास एवं नगरीकरण ने भी वन विस्तार को बड़े पैमाने पर तहस-नहस किया है।

जैसे-जैसे वनों का दामन सिकुड़ा, वैसे-वैसे वन्य जीवों का आवास भी तंग होता गया।

आज स्थिति यह है कि बहुत से वन्य प्राणी लुप्त हो गए हैं या लुप्त प्राय हैं। भारत में चीता और गिद्ध इसके उदाहरण हैं ।
विलुप्त होने के खतरे से घिरे कुछ प्रमुख प्राणी हैं, कृष्णा सार, चीतल, भेड़िया, अनूप मृग, नील गाय, भारतीय कुरंग, बारहसिंगा, चीता, गेंडा, गिर सिंह, मगर, हसावर, हवासिल, सारंग, श्वेत सारस, घूसर बगुला, पर्वतीय बटेर, मोर, हरा सागर कछुआ, कछुआ, डियूगाँग, लाल पांडा आदि।

अमृता देवी वन्य संरक्षण परसार : अमृता देवी राजस्थान के विशनोई गाँव (जोधपुर जिला) की रहनेवाली थी। उसने 1731 ई० में राजा के आदेश को दरकिनार कर वनों से लकड़ी काटनेवालों का विरोध किया था। राजा के लिए नवीन महल निर्माण के लिए लकड़ी काटा जाना था। अमृता देवी के साथ गाँव वालों ने भी राजा के आदमियों का विरोध किया। महाराजा को जब इसकी जानकारी मिली तो उन्हें काफी पश्चाताप हुआ और अपने राज्य में वनों की कटाई पर रोक लगा दी ।

वर्तमान समय में वन एवं वन्य जीवों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। भारत की संकटापन्न पादप प्रजातियों की सूची बनाने का काम सर्वप्रथम 1970 में बॉटेनिकल सर्वे ऑफ इंडिया तथा वन अनुसंधान संस्थान देहरादून द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। इन्होंने जो सूची बनाई उसे ‘रेड

डेटा बुक’ का नाम दिया गया। इसी क्रम में असाधारण पौधों के लिए ‘ग्रीन बुक’ तैयार किया गया।

रेड डेटा बुकः इसमें सामान्य प्रजातियों के विलुप्त होने के खतरे से अवगत किया जाता है।

संकटग्रस्त प्रजातियाँ सर्वमान्य रूप से चिन्हित होते हैं।

विश्व स्तर पर, संकटग्रस्त प्रजातियों की एक तुलनात्मक स्थिति के प्रति चेतावनी देती है। स्थानीय स्तर पर संकटग्रस्त प्रजातियों की पहचान एवं उनके संरक्षण से संबंधित कार्यक्रम को प्रोत्साहन देना।

अंतर्राष्ट्रीय प्राकृतिक संरक्षण एवं प्राकृतिक संसाधन संरक्षण संघ ने संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में कार्य कर रही एक महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्था है।

इस संस्था ने विभिन्न प्रकार के पौधों और प्राणियों के जातियों को चिन्हित कर निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया हैः

(क) सामान्य जातियाँ- ये वे जातियाँ हैं जिनकी संख्या जीवित रहने के लिए सामान्य मानी जाती हैं जैसे- पशु, साल, चीड़ और कृतंक इत्यादि।

(ख) संकटग्रस्त जातियाँ- ये वे जातियाँ है जिनके लुप्त होने का खतरा है। जिन विषम परिस्थितियों के कारण इनकी संख्या कम हुई है, यदि वे जारी रहती हैं तो इन जातियों का जीवित रहना कठिन है। काला हिरण, मगरमच्छ, भारतीय जंगली गधा, गेंडा, पूंछ वाला बंदर, संगाई (मणिपुरी हिरण) इत्यादि इस प्रकार के जातियों के उदाहरण हैं।

(ग) सुभेद्य जातियाँ- इसके अंतर्गत ऐसी जातियों को रखा गया है, जिनकी संख्या घट रही है। यह वैसी जातियाँ हैं जिनपर ध्यान नहीं दिया गया तो यह संकटग्रस्त जातियों की श्रेणी में आ सकते हैं। नीली भेड़, एशियाई हाथी, गंगा की डॉल्फिन आदि इस प्रकार की जातियों के उदाहरण हैं।

(घ) दुर्लभ जातियाँ- इन जातियों की संख्या बहुत कम है और यदि इनको प्रभावित करने वाली विषम परिस्थितियाँ नहीं बदलती हैं तो यह संकटग्रस्त जातियों की श्रेणी में आ सकती हैं।

(ङ) स्थानिक जातियाँ- प्राकृतिक या भौगोलिक सीमाओं से अलग विशेष क्षेत्रों में पाई जाने वाली जातियाँ, अंडमानी टील, निकोबरी कबूतर, अंडमानी जंगली सुअर और अरुणाचल के मिथुन इसी वर्ग में आते हैं।

(च) लुप्त जातियाँ- ये वे जातियाँ हैं जो इनके रहने के आवासों में खोज करने पर अनुपस्थित पाई गई हैं। ये उपजातियाँ स्थानीय क्षेत्र, प्रदेश, देश, महाद्वीप या पूरी पृथ्वी से लुप्त हो गई हैं। एशियाई चीता और गुलाबी सर वाली बत्तख एवं डोडो पंक्षी इसके अच्छी उदाहरण हैं।

वन्य प्राणियों के संरक्षण के लिए संरक्षित क्षेत्रों में (क) राष्ट्रीय उद्यान, (ख) विहार या अभ्यारण्य तथा (ग) जैव मंडल सम्मिलित हैं।

(1) राष्ट्रीय उद्यान : ऐसे पार्कों का उद्देश्य वन्य प्राणियों के प्राकृतिक आवास में वृद्धि एवं प्रजनन की परिस्थितियों को तैयार करना है। हमारे देश में राष्ट्रीय उद्यानों की संख्या 85 है।

(2) विहार क्षेत्र या अभम्यारण्य : यह एक ऐसा सुरक्षित क्षेत्र होता है जहाँ वन्य जीव सुरक्षित ढंग से रहते हैं। यह निजी संपत्ति हो सकती है। भारत में इनकी संख्या 448 है। बिहार में बेगूसराय तथा काँवर झील तथा दरभंगा का कुशेश्वर इसके लिए चिन्हित किया गया है।

(3) जैव मंडल : यह वह क्षेत्र है जहाँ प्राथमिकता के आधार पर जैवदृविविधता के संरक्षण के कार्यक्रम चलाए जाते हैं। विश्व के 65 देशों में करीब 243 सुरक्षित जैवदृमंडल क्षेत्र हैं। भारत में इनकी संख्या 14 है।

बाघ परियोजना : वन्य जीवन संरचना में बाघ एक महत्वपूर्ण जंगली जाति है। 1973 में अधिकारियों ने पाया कि देश में 20 वीं शताब्दी के आरंभ में बाघों की संख्या अनुमानित संख्या 5500 से घटकर मात्र 1827 रह गई है। बाघों को मारकर उनको व्यापार के लिए चोरी करना, आवासीय स्थलों का सिकुड़ना, भोजन के लिए आवश्यक जंगली उपजातियों की संख्या कम होना और जनसंख्या में वृद्धि बाघों की घटती संख्या के मुख्य कारण हैं। बाघ परियोजना विश्व की बेहतरीन वन्य जीव परियोजनाओं में से एक है और इसकी शुरुआत 1973 में हुई। शुरू में इसमें बहुत सफलता प्राप्त हुई क्योंकि बाघों की संख्या बढ़कर 1985 में  4002 और 1989 में

4334 हो गयी। परंतु 1993 में इसकी संख्या घटकर 3600 तक पहुँच गई भारत में 37,761 वर्ग किमी० पर फैले हुए 27 बाघ रिजर्व हैं।

चिपको आंदोलन : उत्तर प्रदेश टेहरी-गढ़वाल पर्वतीय जिले में सुंदर लाल बहुगुणा के नेतृत्व में अनपढ़ जनजातियों द्वारा 1972 में यह आंदोलन आरंभ हुआ था। इस आंदोलन में स्थानीय लोग ठेकेदारों की कुलहाड़ी से हरे-भरे पौधों को काटते देख, उसे बचाने के लिए अपने आगोस में पौधा को घेर कर इसकी रक्षा करते थे। इसे कई देशों में स्वीकारा गया।

वन्य जीवों के संरक्षण के लिए कानूनी प्रावधान : वन्य जीवों के संरक्षण के लिए बनाए गए नियमों तथा कानूनी प्रावधानों को दो वर्गों में बांट सकते हैं, ये हैं-

(क) अंतर्राष्ट्रीय नियम : वन्य जीवों के संरक्षण के लिए दो या दो से अधिक राष्ट्र समूहों के द्वारा (अंतर्राष्ट्रीय समझौते के अंतर्गत) नियम तथा कानूनी प्रावधान बनाए गए हैं। प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर 1968 में अफ्रीकी कनवेंशन, अंतर्राष्ट्रीय महत्व के वेटलैंड्स का कनवेंशन 1971 तथा विश्व प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक धरोहर संरक्षण एवं रक्षा अधिनियम 1972 के अंतर्गत बनाए गए अंतर्राष्ट्रीय नियमों के द्वारा वन्य जीवों के संरक्षण के प्रयास किए जा रहे हैं। इस पर सख्ती से अनुपालन करके वन्य जीवों की रक्षा की जा सकती है।

(ख) राष्ट्रीय कानून : संविधान की धारा 21 के अंतर्गत अनुच्छेद 47, 48 तथा 51 (क) वन्य जीवों तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के नियम हैं। वन्य जीव सुरक्षा एक्ट 1972, नियमावली 1973 एवं संशोधित एक्ट 1991 के अंतर्गत पक्षियों तथा जानवरों के शिकार पर प्रतिबंध लगाया गया है।
जैव विविधताः पृथ्वी पर पौधों और जीव-जंतुओं की लगभग 17-18 लाख से ज्यादा प्रजातियों का विवरण मिलता है। पृथ्वी पर विभिन्न प्रजातियों के पौधों और जीवदृजंतुओं का होना जैव विविधता को दर्शाता है।

जैव विविधता का सामान्य अर्थकृ जीवों की विभिन्नता अर्थात् किसी विशेष क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के जीवों एवं वनस्पतियों जैसे- जानवर, पक्षी, जलीय जीव, पेड़-पौधे, छोटे-छोटे कीटों आदि की उपस्थिति को जैव विविधता कहते हैं। जैव विविधता अलग-अलग स्थान पर अलग-अलग होती है।

हमारा देश जैव-विविधता के संदर्भ में विश्व के सर्वाधिक देशों में से एक है, इसकी गणना विश्व के 12 विशाल जैविक-विविधता वाले देशों में की जाती है, यहाँ विश्व की सारी

जैव उप जातियों का 8 प्रतिशत संख्या (लगभग 16 लाख) पाई जाती है।

राष्ट्र के स्वस्थ्य जैव मंडल एवं जैविक उद्योग के लिए समृद्ध जैव-विविधता अनिवार्य है।

जैव विविधता का उपयोग कृषि तथा बहुत सारे औषधीय उपयोग में होता है।

(घ) खनिज संसाधन (Khanij Sansadhan)

खनिजः पृथ्वी की परत में विद्यमान धातुयुक्त ठोस पदार्थ को खनिज कहते हैं। जैसे- सोडियम क्लोराइड, कैल्शियम कार्बोनेट, जिंक सल्फाइड आदि।
खनिज संसाधन आधुनिक सभ्यता एवं संस्कृति के आधार स्तंभ हैं। भारत में लगभग 100 से अधिक खनिज मिलते हैं।

खनिजों के प्रकार : खनिज सामान्यतः दो प्रकार के होते हैंः-

1.धात्विक खनिजः इन खनिजों में धातु होता है। जैसे- लौह अयस्क, तांबा, निकल, मैंगनीज आदि। पुनः इसे दो भागों में विभक्त किया जा सकता हैः-

(क) लौहयुक्त खनिजः जिन धात्विक खनिजों में लोहे का अंश अधिक पाया जाता है वे लौह युक्त खनिज कहलाते हैं, जैसे- मैंगनीज, निकल, टंगस्टन आदि।

(ख) अलौहयुक्त खनिजः जिन धात्विक खनिजों में लोहे का अंश न्यून होता है या नहीं होता है वे अलौहयुक्त खनिज कहलाते हैं, जैसे- सोना, चांदी, शीशा, बॉक्साइट, टिन, तांबा आदि।

2.अधात्विक खनिजः इन खनिजों में धातु नहीं होते हैं, जैसे- चुना-पत्थर, डोलोमाइट, अभ्रक, जिप्सम आदि। अधात्विक खनिज भी दो प्रकार के होते हैं-

(क) कार्बनिक खनिजः इसमें जीवाश्म होते हैं। ये पृथ्वी में दबे प्राणी एवं पादप जीवों के परिवर्तित होने से बनते हैं, जैसे- कोयला, पेट्रोलियम आदि।

(ख) अकार्बनिक खनिजः इनमें जीवाश्म नहीं होते हैं, जैसे- अभ्रक, ग्रेफाइट आदि।
धात्विक एवं अधात्विक खनिज में अंतरः

1.धात्विक खनिज को गलाने पर धातु प्राप्त होता है जबकि अधात्विक खनिज को गलाने पर धातु प्राप्त नहीं हो सकता।

2.धात्विक खनिज कठोर एवं चमकीले होते हैं जबकि अधात्विक खनिजों की अपनी चमक नहीं होती है।

3.धात्विक खनिज प्रायः आग्नेय चट्टानों में मिलते हैं जबकि अधात्विक खनिज प्रायः परतदार चट्टानों में मिलते हैं।

4.धात्विक खनिज को पीटकर तार बनाया जा सकता है। ये पीटने पर टूटता नहीं है जबकि अधात्विक खनिज को पीटकर तार नहीं बनाया जा सकता। ये पीटने पर चूर-चूर हो जाते हैं।

लौह एवं अलौह खनिजों में अंतरः

1.जिन खनिजों में लोहे का अंश पाया जाता है तथा जिनका उपयोग लोहा एवं इस्पात बनाने में किया जाता है; लौह खनिज कहलाते हैं। जैसे- लौह अयस्क, निकिल, टंगस्टन, मैंगनीज आदि। जबकि जिन खनिजों में लोहे का अंश न्यून या बिलकुल नहीं होता है वे अलौह खनिज कहलाते हैं, जैसे- सोना, शीशा, अभ्रक आदि।

2.लौह खनिज स्लेटी, धूसर, मटमैला आदि रंग के होते हैं जबकि अलौह खनिज अनेकों रंग के हो सकते हैं।

3.लौह खनिज रवेदार चट्टानों में पाये जाते हैं जबकि अलौह खनिज सभी प्रकार के चट्टानों में मिल सकते हैं।

लौह-अयस्कः लोहा आधुनिक सभ्यता की रीढ़ है। यह उद्योगों की जननी है। लोहा खान से शुद्ध रूप में नहीं मिलता बल्कि लौह अयस्क के रूप में निकलता है।
शुद्ध लोहे की मात्रा के आधार पर भारत में पाये जाने वाले लौह अयस्क तीन प्रकार के होते हैं- हेमेटाइट, मैग्नेटाइट और लिमोनाइट।
भारत में पूरे विश्व के लौह भंडार का एक चौथाई भाग आंकलित है।

भारत में लौह अयस्क प्रायः सभी राज्यों में पाया जाता है परंतु यहाँ के कुल भंडार का 96 प्रतिशत- कर्नाटक, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, गोवा, झारखंड राज्यों में सीमित है।

कर्नाटक राज्य भारत का लगभग एक चौथाई लोहा उत्पादन करता है। यहाँ बेल्लारी, हासपेट, संदूर आदि क्षेत्रों में लौह अयस्क की खाने हैं।

छत्तीसगढ़ देश का दूसरा उत्पादक राज्य है जो देश का करीब 20 प्रतिशत लोहा उत्पन्न करता है। दांतेवाड़ा जिले का बैलाडिला तथा दुर्ग जिले के डल्ली एवं राजहरा प्रमुख उत्पादक हैं। रायगढ़, बिलासपुर तथा सरगुजा अन्य उत्पादक जिले हैं।

उड़ीसा देश का 19 प्रतिशत लोहा उत्पादन करता है। यहाँ की प्रमुख खानें- गुरू महिषानी, बादाम पहाड़ (मयूरगंज) एवं किरीबुरू हैं।

गोवा देश का चौथा बड़ा लोहा उत्पादक राज्य है और देश का 16 प्रतिशत लोहा यहीं से प्राप्त होता है। यहाँ की प्रमुख खानें- साहक्वालिम, संग्यूम, क्यूपेम, सतारी, पौंडा एवं वियोलिम में स्थित हैं।

झारखंड देश का पांचवा बड़ा लौह अयस्क उत्पादक राज्य है और 15 प्रतिशत से अधिक लोहे का उत्पादन करता है। यहाँ के पूर्वी तथा पश्चिमी सिंहभूम, सरायकेला, प्लामू, धनबाद, हजारीबाग, लोहरदगा तथा राँची मुख्य उत्पादक जिले हैं।

महाराष्ट्र में लौह अयस्क की खानें चंद्रपुर, रत्नागिरी और भण्डारा जिलों में स्थित है।

आंध्रप्रदेश के करीमनगर, बारंगल, कुर्नूल, कड़प्पा आदि जिले लौह अयस्क उत्पादक हैं।

तमिलनाडु की तीर्थ मल्लई पहाड़ियों (सलेम) एवं यादपल्ली (नीलगिरी) क्षेत्र में लोहे के भण्डार हैं।

मैंगनीज अयस्कः मैंगनीज के उत्पादन में भारत का स्थान विश्व में रूस एवं दक्षिण अफ्रीका के बाद तीसरा है। मैंगनीज का उपयोग शुष्क बैटरियों के निर्माण, फोटोग्राफी, चमड़ा एवं माचिस उद्योग में भी होता है। साथ ही इसका उपयोग पेंट तथा कीटनाशक दवाओं के बनाने में भी किया जाता है। भारत के कुल उत्पादन का 85 प्रतिशत मैंगनीज का उपयोग मिश्र धातु बनाने में किया जाता है।

विश्व में जिम्बाबे के बाद भारत में ही मैंगनीज का सबसे बड़ा संचित भंडार है जो विश्व के कुल भंडार का 20 प्रतिशत है।

उड़ीसा भारत में मैंगनीज के उत्पादन में अग्रणी है। यहाँ देश के कुल उत्पादन का 37 प्रतिशत मैंगनीज उत्पादन होता है।

महाराष्ट्र भारत के कुल उत्पादन का लगभग एक चौथाई मैंगनीज उत्पादन करता है।

धात्विक खनिज (अलौह) : इसके अंतर्गत बॉक्साइट, सोना, चाँदी, तांबा, टिन, शीशा, जस्ता आदि आते हैं।

बॉक्साइटः भारत में बॉक्साइट का इतना भंडार है, कि एल्यूमिनियम में हम आत्मनिर्भर हो सकते हैं। इसका बहुमुखी उपयोग वायुयान निर्माण, विद्युत उपकरण निर्माण, घरेलू साज-सज्जा के सामानों का निर्माण, बर्तन बनाने, सफेद सीमेंट तथा रासायनिक वस्तुएं बनाने में किया जाता है।

बॉक्साइट का वितरणः बॉक्साइट भारत के अनेक क्षेत्रों में मिलता है किंतु मुख्य रूप से इसका भंडार उड़ीसा, गुजरात, झारखंड, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, तमिलनाडु एवं उत्तर प्रदेश में अवस्थित है। देश का आधा से अधिक बॉक्साइट का भंडार उड़ीसा राज्य में है। उड़ीसा भारत के कुल उत्पादन 42 प्रतिशत बॉक्साइट उत्पादन करता है।

तांबाः तांबा एक अति उपयोगी अलौह धातु है। यह बिजली का अच्छा संचालक है जिससे इसका ज्यादा उपयोग विद्युत उपकरण बनाने में किया जाता है। इससे बर्तन एवं सिक्के भी बनाए जाते हैं। भारत में तांबा का अभाव है।
झारखंड का पूर्वी एवं पश्चिमी सिंहभूम जिले तांबा का सबसे बड़ा उत्पादक है।

अधात्विक खनिज

अभ्रकः भारत विश्व में शीट अभ्रक का अग्रणी उत्पादक है। प्राचीन काल से अभ्रक का उपयोग आयुर्वेदिक दवाओं के लिए किए जाते रहे हैं लेकिन विद्युत उपकरण में इसका खास उपयोग होता है क्योंकि यह विद्युत रोधक होने के कारण उच्च विद्युत शक्ति को सहन कर सकता है।

भारत में उत्पादन की दृष्टि से, अभ्रक निक्षेप की तीन पेटियां हैं, जो बिहार, झारखंड, आंध्रप्रदेश तथा राजस्थान राज्यों के अंतर्गत आती है। बिहार, झारखंड में उत्तम कोटि के रूबी अभ्रक का उत्पादन होता है। बिहार झारखंड भारत का 80 प्रतिशत अभ्रक उत्पादन करता है। राजस्थान देश का तीसरा अभ्रक उत्पादक राज्य है। संयुक्त राज्य अमेरिका भारतीय अभ्रक का मुख्य आयातक है।

चूना पत्थरः भारत के चूना पत्थर का 76 प्रतिशत सीमेंट 16 प्रतिशत लौह इस्पात तथा 4 प्रतिशत रासायन उधोग में उपयोग किया जाता है। देश का 35 प्रतिशत चूना पत्थर मध्य प्रदेश में पाया जाता है।

खनिजों का आर्थिक महत्व
पृथ्वी पर जैसे जल और थल अति महत्वपूर्ण खजाने हैं। ठीक उतने ही महत्वपूर्ण खनिज संसाधन भी हैं। खनिज संसाधन के अभाव में देश के औधोगिक विकास को गति एवं दिशा नहीं दे सकते। फलतः देश का आर्थिक विकास अवरूद्ध हो सकता हैं। खनिज संसाधन का संबंध हमारे वर्तमान और भविष्य से हैं इसलिए खनिजां के संरक्षण की अति आवश्यकता हैं।

खनिज संसाधनों का संरक्षण
खनिज क्षयशील और अनवीकरणीय संसाधन हैं। इसकी मात्रा सिमित है इसका फिर से निर्माण असंभव हैं। उद्योगों में अधिक खनिजो के दोहन और उपयोग के कारण इसके अस्तित्व संकट में पड़ गया है इसलिए खनिजों का संरक्षण आवश्यक है। खनिज संसाधन के विवेकपूर्ण उपयोग करने से खनिज संकट से बचा जा सकता हैं। खनिज संसाधन के विवेकपूर्ण उपयोग तीन बातों पर निर्भर करता है- खनिजों के लगातार दोहन पर नियंत्रण, उनका बचतपूर्वक उपयोग तथा कच्चे माल के रूप में सस्ते विकल्पों की खोज।

खनिजो के संरक्षण के साथ-साथ उसके प्रबंधन पर ध्यान दिया जाए तो खनिज संकट से निपटा जा सकता हैं।

(ङ) शक्ति (ऊर्जा) संसाधन (Shakti Urja Sansadhan)

शक्ति एवं उर्जा विकास की पूँजी हैं।

शक्ति संसाधन के प्रकारः
शक्ति संसाधन के वर्गीकरण के विविध आधार हो सकते हैं। उपयोग स्तर के आधार पर शक्ति के दो प्रकार हैं-

सतत् शक्ति एवं समापनीय शक्ति।

सौर किरणें, भूमिगत उष्मा, पवन, प्रवाहित जल आदि सतत् शक्ति के स्रोत हैं जबकि कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस एवं विखण्डनीय तत्व समापनीय शक्ति स्रोत हैं।
उपयोगिता के आधार पर उर्जा के दो भागो में विभक्त किया जाता है। पहला प्राथमिक ऊर्जा, जैसे- कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस आदि तथा दूसरा गौण ऊर्जा, जैसे- विद्युत, क्योंकि यह प्राथमिक ऊर्जा से प्राप्त किया जाता है।

स्रोत के स्थिति के आधार पर शक्ति को दो भागो में वर्गीकृत किया जाता है। पहला क्षयशिल शक्ति संसाधन जैसे- पेट्रोलियम, कोयला, प्राकृतिक गैस तथा आण्विक खनिज आदि तथा दूसरा अक्षयशिल शक्ति संसाधन, जैसे- प्रवाही जल, पवन, लहरें, सौर शक्ति आदि।

संरचनात्मक गुणों के आधार पर ऊर्जा के दो स्त्रोत हैं। जैविक ऊर्जा स्त्रोत और अजैविक ऊर्जा स्त्रोत। मानव एवं प्राणी जैविक तथा जल शक्ति, पवन-शक्ति, सौर शक्ति तथा इंधन शक्ति आदि अजैविक ऊर्जा स्त्रोत हैं।

समय के आधार पर ऊर्जा को पारम्परिक तथा गैर पारम्परिक स्त्रोतों में विभक्त किया गया है। कोयला, पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस पारम्परिक तथा सूर्य, पवन, ज्वार, परमाणु ऊर्जा तथा गर्म झरने आदि गैर पारम्परिक शक्ति संसाधन के उदाहरण हैं।

पारम्परिक ऊर्जा स्रोतः- कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस जैसे खनिज ईंधन जो जीवाश्म ईंधन के नाम से भी जाने जाते हैं ये पारम्परिक शक्ति संसाधन हैं तथा ये समाप्य संसाधन है।

कोयलाः- कोयला शक्ति और ऊर्जा का महत्वपूर्ण स्रोत है। भूगर्भिक दृष्टि से भारत के समस्त कोयला भण्डार को दो मुख्य भागों में बांटा जा सकता हैः-

1.गोंडवाना समूहः- इस समूह में भारत के 96 प्रतिशत कोयले का भण्डार है तथा कुल उत्पादन का 99 प्रतिशत भाग प्राप्त होता है। गोंडवाना कोयला क्षेत्र मुख्यतः चार नही-घाटियों में पाये जाते हैं-
1.दामोदर घाटी, 2. सोन घाटी, 3. महानदी घाटी तथा 4. वार्घा-गोदावरी घाटी।

2.टर्शियरी समूहः- गोडवाना समूह के बाद टर्शियरी समूह के कोयला का निर्माण हुआ। यह 5.5 करोड़ वर्ष पुराना है। टर्शियरी कोयला मुख्यतः असम, अरूणाचल प्रदेश, मेघालय और नागालैण्ड में पाया जाता है।

कोयले का वर्गीकरणः- कार्बन की मात्रा के आधार पर कोयला को चार वर्गों में रखा गया हैः

1.ऐंथासाइटः- यह सर्वोच्य कोटि का कोयला है जिसमें कार्बन की मात्रा 90% से अधिक होती है। जलने पर यह धुँआ नही देता है।

2.बिटुमिनसः- यह 70 से 90% कार्बन की मात्रा धारण किये हुए रहता है तथा इसे पारिष्कृत कर कोकिंग कोयला बनाया जा सकता है। भारत का अधिकतर कोयला इसी श्रेणी का है।

3.लिग्नाईटः- यह निम्न कोटि का कोयला माना जाता है जिसमें कार्बन की मात्रा 30 से 70% होता है। यह कम ऊष्मा तथा अधिक धुआँ देता है।

4.पीटः- इसमें कार्बन की मात्रा 30% से भी कम पाया जाता है। यह पूर्व के दलदली भागों में पाया जाता है।
गांडवाला समूह का कोयला क्षेत्रः-

झारखण्ड – कोयले के भण्डार एवं उत्पादन की दृष्टि से झारखण्ड का देश में पहला स्थान है। यहाँ देश का 30 प्रतिशत से भी अधिक कोयला का सुरक्षित भण्डार है। झरिया, बोकारो, गिरिडीह, कर्णपुरा, रामगढ़ इस राज्य के प्रमुख उत्पादक क्षेत्र हैं। पश्चिम बंगाल के रानीगंज कोयला क्षेत्र का कुछ भाग इसी राज्य में पड़ता है।

त्तीसगढ़ः- सुरक्षित भण्डार की दृष्टि से इस राज्य का स्थान तीसरा किन्तु उत्पादन में यह भारत का दूसरा बड़ा राज्य है। यहाँ देश का 15 प्रतिशत सुरक्षित भण्डार है लेकिन उत्पादन 16 प्रतिशत होता है।

उड़िसाः- उड़िसा में एक चौथाई कोयले का भण्डार है पर उत्पादन मात्र 14.6 प्रतिशत ही होता है।

टर्शियरिय कोयला क्षेत्रः- टर्शियरी युग में बना कोयला नया एवं घटिया किस्म का होता है। यह कोयला मेघालय मे दारगिरी, चेरापूंजी, लेतरिंग्यू, माओलौंग और लांगरिन क्षेत्र से निकाला जाता है। ऊपरी असम में माकुम, जयपुर, नजिरा आदि कोयले के क्षेत्र हैं। अरूणाचल प्रदेश में नामचिक और नामरूक कोयला क्षेत्र है। जम्मू और कश्मिर में कालाकोट से कोयला निकाला जाता हैं।

लिग्नाइट कोयला क्षेत्र :
यह एक निम्न कोटि का कोयला होता है। इसमें नमी ज्यादा तथा कार्बन कम होता है। इसलिए यह अधिक धुँआ देता है। लिग्नाइट कोयले का भण्डार मुख्य रूप से तमिलनाडु के लिग्नाइट वेसिन में पाया जाता है। जहाँ देश का 94 प्रतिशत लिग्नाइट कोयले का सुरक्षित भंडार है।

पेट्रोलियम :
पेट्रोलियम शक्ति के समस्त साधनों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं व्यापक रूप से उपयोगी संसाधन है। पेट्रोलियम से विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ जैसे- गैसोलीन, डीजल, किरासन तेल, स्नेहक, कीटनाशक दवाएँ, दवाएँ, पेट्रोल, साबुन, कृत्रिम रेशा, प्लास्टिक आदि बनाए जाते हैं।

तेल क्षेत्रों का वितरण :

भारत में मुख्यतः पाँच तेल उत्पादक क्षेत्र हैं :

1.उत्तरी-पूर्वी प्रदेश : यह देश का सबसे पुराना तेल उत्पादक क्षेत्र है, जहाँ 1866 ई० में तेल के लिए खुदाई शुरू की गई थी। ऊपरी असम घाटी, अरूणाचल प्रदेश, नागालैण्ड आदि विशाल तेल उत्पादक क्षेत्र इसके अन्तर्गत आते हैं।

2.गुजरात क्षेत्र : यह क्षेत्र खम्भात के बेसिन तथा गुजरात के मैदान में विस्तृत है। यहाँ पहली बार 1958 में तेल का पता चला था। इसके मुख्य उत्पादक अंकलेश्वर, कलोल, नवगाँव, कोसांबा, मेहसाना आदि हैं।

3.मुम्बई हाई क्षेत्र : यह क्षेत्र मुम्बई तट से 176 किलोमीटर दूर उŸार-पश्चिम दिशा में अरब सागर में स्थित है। यहाँ 1975 में तेल खोजने का कार्य शुरू हुआ। यहाँ समुद्र में सागर सम्राट नामक मंच बनाया गया है जो जलयान है और पानी के भीतर तेल के कुँए खोदने का कार्य करता है।

4.पूर्वी तट प्रदेशः- यह कृष्ण-गोदावरी और कावेरी नदियों के बेसिल तथा मुहाने के समुद्री क्षेत्र में फैला हुआ है।

5.बारमेर बेसिनः- इस बेसिन के मंगला तेल क्षेत्र से सितम्बर 2009 से उत्पादन शुरू हो गया हैं। यहाँ प्रतिदिन 56000 बैरल तेल का उत्पादन हो रहा है। 2012 तक यह क्षेत्र भारत का 20 प्रतिशत पेट्रोलियम उत्पन्न करेगा।

तेल परिष्करणः- कुओं से निकाला गया कच्चा तेल अपरिष्कृत एवं अशुद्ध होता हैं। अतः उपयोग के पूर्व उसे तेल शोधक कारखानो में परिष्कृत किया जाना आवश्यक होता है। उसके बाद ही डिजल, किरासन तेल, स्नेहक पदार्थ तथा अन्य कई वस्तुएँ प्राप्त होती है।

प्राकृतिक गैसः- प्राकृतिक गैस हमारे वर्तमान जीवन में बड़ी तेजी से एक महत्वपूर्ण ईंधन बनता जा रहा है। इसका उपयोग विभिन्न उद्योगों में मशीन को चलाने में, विद्युत उत्पादन में, खाना पकाने में तथा मोटर गाड़ियाँ चलाने में किया जा रहा है।
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विधुत शक्तिः- विद्युत शक्ति उर्जा का एक महत्वपूर्ण स्त्रोत है। वर्तमान विश्व में विद्युत के प्रति व्यक्ति उपभोग को विकास का एक सुचकांक माना जाता है। जब विद्युत के उत्पादन में कोयला, पेट्रोलियम या प्राकृतिक गैस से प्राप्त उष्मा का उपयोग किया जाता है तो उसे ताप विद्युत कहते हैं। इसके अतिरिक्त विद्युत का उत्पादन आण्विक खनिजों के विखण्डन से भी किया जाता है। जिसे परमाणु विद्युत कहते हैं।

जल विद्युतः- जल विद्युत उत्पादन के लिए सदावाहिनी नदी में प्रचुर जल की राशि, नदी मार्ग में ढ़ाल, जल का तीव्र वेग, प्राकृतिक जल प्रपात का होना अनुकूल भौतिक दशाएँ हैं जो पर्वतीय एवं हिमानीकृत क्षेत्रों में पाया जाता हैं। भारत में सन् 1897 ई0 में दार्जिलिंग में प्रथम जल विधुत संयंत्र की स्थापना हुई थी। इसके बाद कर्नाटक के शिवसमुद्रम् में काबेरी नदी के जलप्रपात पर दूसरे जल विद्युत संयंत्र की स्थापना हुई।
1947 तक भारत में 508 मेगावाट बिजली की उत्पादन की जाने लगी।
भारत के मुख्य बहुउद्देशीय परियोजनाएँ
बहुउद्देशीय परियोजना- ऐसी परियोजना जिससे एक साथ अनेक लाभ के प्राप्त की जा सके, उसे बहुउद्देशीय परियोजना कहते हैं।

अर्थात्
ऐसी परियोजना जिससे एक साथ कई उद्देश्य प्राप्त करने के लिए स्थापित किए जाते हैं, उसे बहुउद्देशीय परियोजना कहते हैं।

1.भाखड़ा-नंगल परियोजना- भाखड़ा नंगल बाँध विश्व की ऊँची बाँधों में से एक है, जो हिमालय क्षेत्र में सतलज नदी पर है। जिसकी ऊँचाई 225 मीटर है। यह भारत की सबसे बड़ी परियोजना है। इससे 7 लाख किलोवाट विद्युत उत्पन्न किया जाता है।

2.दामोदरघाटी परियोजना– यह परियोजना दामोदर नदी पर झारखंड और पश्चिम बंगाल को बाढ़ से बचाने के लिए किया गया है। इससे 1300 मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जाता है।

3.कोशी परियोजना- नेपाल स्थित हनुमान नगर में कोशी नदी पर बाँध बनाकर इस परियोजना से 20000 किलोवाट बिजली उत्पन्न किया जाता है।

4.रिहन्द परियोजना- इस परियोजना को सोन की सहायक नदी रिहन्द पर उŸार प्रदेश में 934 मीटर लंबा बाँध बनाकर किया गया है। इससे 30 लाख किलोवाट बिजली उत्पादन किया जाता है।

5.हीराकुंड परियोजना- उड़ीसा के महानदी पर विश्व का सबसे लंबा बाँध बनाकर 2.7 लाख किलोवाट बिजली उत्पादन किया जाता है।

6.चंबल घाटी परियोजना- चंबल नदी पर राजस्थान में तीन बाँध गाँधी सागर, राणाप्रताप सागर और कोटा में स्थापित कर तीन शक्ति गृहों की स्थापना कर 2 लाख मेगावाट बिजली उत्पादन किया जाता है।

7.तुंगभद्रा परियोजना- यह दक्षिण भारत की सबसे बड़ी नदी-घाटी परियोजना है, जो कृष्णा नदी की सहायक नदी तुंगभद्रा नदी पर बनाई गई है।
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ताप शक्ति
तापीय विद्युत का उत्पादन करने के लिए ताप शक्ति संयंत्रों में कोयला, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस का उपयोग होता है। जल विद्युत की तरह यह प्रदुषण रहित नहीं है।

परमाणु शक्ति- जब उच्च अणुभार वाले परमाणु विखंडित होते हैं तो ऊर्जा का उत्सर्जन होता है। यूरेनियम परमाणु ऊर्जा का कच्चा माल है। भारत में यूरेनियम का विशाल भंडार झारखण्ड के जादूगोड़ा में है।
भारत में 1955 में प्रथम आण्विक रियेक्टर मुम्बई के निकट तारापुर में स्थापित किया गया जिसका मुख्य उद्देश्य उद्योग एवं कृषि को बिजली प्रदान करना था।
देश में अब तक छः विद्युत परमाणु विद्युत गृह स्थापित किए गए हैं।

1.तारापुर परमाणु विद्युत गृह- यह एशिया का सबसे बड़ा परमाणु विद्युत गृह है।
2.राणाप्रताप सागर परमाणु विद्युत गृह- यह राजस्थान के कोटा में स्थापित है। यह चंबल नदी के किनारे है।
3.कलपक्कम परमाणु विद्युत गृह- यह तमिलनाडु में स्थित है।
4.नरौरा परमाणु विद्युत गृह- यह उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के पास स्थित है।
5.ककरापारा परमाणु विद्युत गृह- यह गुजरात राज्य में समुद्र के किनारे स्थित है।
6.कैगा परमाणु विद्युत गृह- यह कर्नाटक राज्य के जागवार जिला में स्थित है।
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गैर-पारम्परिक शक्ति के स्त्रोत
अधिक दिनों तक हम शक्ति के पारम्परिक स्त्रोतों पर निर्भर नहीं रह सकते हैं क्योंकि यह समाप्य संसाधन है। इसलिए गैर-पारम्परिक शक्ति संसाधनों से ऊर्जा के विकास बहुत ही अधिक आवश्यक है। ऊर्जा के गैर पारम्परिक स्त्रोतों में बायो गैस, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारीय एवं तरंग ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा एवं जैव ऊर्जा महत्वपूर्ण हैं।

सौर ऊर्जा- यह कम लागत वाला पर्यावरण के अनुकूल तथा निर्माण में आसान होने के कारण अन्य ऊर्जा स्त्रोतों की अपेक्षा ज्यादा लाभदायक है।
राजस्थान और गुजरात में सौर ऊर्जा की ज्यादा संभावनाएँ हैं।

पवन ऊर्जा- पवन चक्कियों से पवन ऊर्जा की प्राप्ति की जाती है। भारत विश्व का सबसे बड़ा पवन ऊर्जा उत्पादक देश है। देश में पवन ऊर्जा की संभावित उत्पादन क्षमता 50000 मेगावाट है। गुजरात के कच्छ में लाम्बा का पवन ऊर्जा संयंत्र एशिया का सबसे बड़ा संयंत्र है। दूसरा बड़ा संयंत्र तमिलनाडु के तूतीकोरिन में स्थित है।

ज्वारीय ऊर्जा तथा तरंग ऊर्जा- समुद्री ज्वार और तरंग के कारण गतिशील जल से ज्वारीय और तरंग ऊर्जा प्राप्त किया जाता है।

भूतापीय ऊर्जा- यह ऊर्जा पृथ्वी के उच्च ताप से प्राप्त किया जाता है।

बायो गैस एवं जैव ऊर्जा- ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि अपशिष्ट, पशुओं और मानव जनित्र अपशिष्ट के उपयोग से घरेलू उपयोग हेतु बायो गैस उपयोग की जाती है। जैविक पदार्थों के अपघटन से बायो गैस प्राप्त की जाती है।
जैविक पदार्थों से प्राप्त होनेवाली ऊर्जा को जैविक ऊर्जा कहते हैं। कृषि अवशेष, नगरपालिका, औद्योगिक एवं अन्य अपशिष्ट पदार्थ जैविक पदार्थों के उदाहरण है।

शक्ति संसाधनों का संरक्षण :
ऊर्जा संकट विश्व व्यापी संकट बन चूका है। इस परिस्थिति में समस्या के समाधान की दिशा में अनेक प्रयास किए जा रहे हैं।

1.ऊर्जा के प्रयोग में मितव्ययीता : ऊर्जा संकट से बचने के लिए ऊर्जा के उपयोग में मितव्ययीता जरूरी है। इसके लिए तकनीकी विकास आवश्यक है। ऐसे मोटर गाड़ीयों का निर्माण हो जो कम तेल में ज्यादा चलते हैं। अनावश्यक बिजली को रोककर हम ऊर्जा की बचत बड़े स्तर पर कर सकते हैं।

2.ऊर्जा के नवीन क्षेत्रों की खोज- ऊर्जा संकट समाधान के लिए परम्परागत ऊर्जा के नये क्षेत्रों का खोज किया जाए। वैसे जगहों का पता लगाया जाए जहाँ पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैसों का भंडार हो।

3.ऊर्जा के नवीन वैकल्पिक साधनों का उपयोग- वैकल्पिक ऊर्जा स्त्रोत में जल-विद्युत, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, जैव ऊर्जा, भूतापीय ऊर्जा, सौर ऊर्जा आदि के विकास कर उपभोग कर शक्ति के संसाधन को संरक्षित किया जा सकता है।

4.अंतराष्ट्रीय सहयोग- ऊर्जा संकट से बचने के लिए सभी राष्ट्र को आपसी भेद-भाव को भुलकर ऊर्जा समाधान हेतु आम सहमति से नीति निर्धारण करना चाहिए।

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